एक कवि के मन की व्यथा

पड़े पड़े घर में ऊब गया हूँ ,
घन चक्कर सा घूम गया हूँ |
बाहर जाओ तो पुलिस डाटती है,
घर रहो तो बीबी फटकारती है |
लिखते लिखते कलम थक गयी है ,
बुद्धि भी अब बहुत थक गयी है |
हाथो में अब पड गये है छाले ,
कागजो के भी पड गये है लाले |
अब कही मन नहीं लगता है ,
समझाने में नहीं समझता है |
पूरी रात नींद नहीं है आती ,
दिन में बीबी है धमकाती |
बच्चे भी अब तंग है करते
आइस क्रीम की मांग है करते |
आइस क्रीम अब कहाँ से लाऊ ?,
उनको अब मै कैसे समझाऊ ?
कब खुलेगा ये लॉक डाउन कमीना
अब तो मुश्किल हो गया है जीना ,
कोरोना कर रहा है सबको तंग
इसको देख देख हो रहे है दंग |
बंद पड़े है सभी कवि सम्मेलन ,
लगता नहीं है कही भी मेरा मन |
तालियों को भी अब तरस गया हूँ ,
अपने आप में अब भटक गया हूँ |
अब तो हूँ मै पिंजरे में बंद ,
उठ रहा है मेरे मन में द्वंद|
बाहर निकलने को फडफडा रहा हूँ ,
कोरोना की करनी मै भुगत रहा हूँ |

आर के रस्तोगी

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