लूटना मकसद है और लुटना मजबूरी

अनिल द्विवेदी

लगभग दो साल पहले लालबत्ती को दरकिनार कर मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह और उनके मंत्रिमण्डल के सहयोगियों ने एक साइकिल यात्रा विधानसभा तक की थी. यही कोई सात किलोमीटर की थका देने वाली साइकिल यात्रा के बाद भी जोश बरकरार था और नारे लगे थे :’जब से कांग्रेस आई है, कमरतोड़ महंगाई है..! जब आप किसी पर उंगलियां उठाते हैं तो याद रखना चाहिये कि चार उंगलियां आपकी तरफ भी उठी हैं. राज्य में जिस तरह सीमेंट और खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं या बिजली महंगी करने की तैयारी हो रही है, पार्टी के विधायकों को जनता का साथ देते हुए अपनी ही सरकार के खिलाफ एक साइकिल यात्रा और निकालना चाहिये :यदि उन्हें प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाना है तो.

 

रजबंधा मैदान स्थित कॉफी हाऊस के पास के एक रेस्टोरेंट में चाय की कीमत सात रूपये से बढ़ाकर दस रूपये कर दी गई. समोसा से लेकर दोसा तक सभी के दाम 35 प्रतिशत तक बढ़ा दिये गये लेकिन दुकान संचालक की मनमानी पर कड़ा ऐतराज किसी ग्राहक ने नहीं जताया क्योंकि पिछले कई सालों से वे समझ चुके हैं कि लूटना मकसद है और लुटना मजबूरी. यह तब हो रहा है जब पेट्रोल के बढ़े दाम वापस ले लिये गये हैं और राज्य में अकाल जैसी स्थिति नहीं है! इसलिए वातानुकूलित कमरों में बैठे खाद्य सचिव से लेकर अदने से खाद्य अधिकारी तक से यह सवाल पूछा जाना चाहिये कि कीमतें अचानक क्यों बढ़ा दी जाती हैं? लोगों को नहीं मालूम कि कीमतें बढ़ाने के पहले इसका एप्रुवल लेने का कोई नियम है या नहीं, लेकिन यदि है तो इसका पालन कौन करायेगा?

 

कुछ माह पूर्व मैं कलकत्ता में था. आश्चर्य कि वहां दोसा 30 रूपये और समोसा आठ रूपये में उपलब्ध था. पड़ोसी राज्यों में भी इतनी अंधेरगर्दी नहीं है लेकिन यहां कीमतों में आग लगी है क्योंकि जिन लोगों पर नियंत्रण या निगाह रखने की जिम्मेदारी है, उनकी आंखों पर रिश्वत की पट्टी बंधी हुई है इसलिए खानापूर्ति की कार्रवाई होती है बस! आश्चर्य कि राजनीतिक दलों के लिये यह कोई मुद्दा नहीं. ग्राहकों की जेब में डाका डल रहा है तो डलने दीजिये लेकिन नेताओं के जन्मदिन पर चमचागिरी या धर्म रक्षा के नाम पर धरना-प्रदर्शन कर खुद को जिंदा रखने वाले नेता ऐसी ज्यादती के खिलाफ कभी नहीं उतरते.

 

गुजरे दिनों सीमेंट कंपनियों ने हद कर दी. उन्होंने सिंडीकेट बनाकर मनमर्जी तरीके से पहले सीमेंट बोरी के दाम 60 से 70फीसदी तक बढ़ा दिये जिसके बाद सीमेंट की बोरियां तीन सौ रूपये तक में बिकीं लेकिन जब सरकार व विपक्ष ने भौंहें टेढ़ी की तो दाम सीधे पचास प्रतिशत तक गिर गये. इसके लिये देवजी पटेल, कुलदीप जुनेजा और विधान मिश्रा जैसे नेताओं को बधाई. खासतौर पर पटेल एक ऐसे योद्धा हैं जो जनहित में अपनों के खिलाफ भी गाण्डीव उठाने से नहीं चूकते. सुना है कि उन्हें आबकारी आयोग का अध्यक्ष बनाने के लिये जिन नेताओं ने सिफारिश की, उनमें कुछ कांग्रेस के दिगगज भी शामिल हैं! खैर..इन नेताओं ने जिस तरह सीमेंट कंपनियों को ललकारा या लड़ाई जारी रखने का साहस दिखाया है, वैसी ही उम्मीद उद्योग मंत्री दयालदास बघेल से भी थी लेकिन भाजपा सरकार में मंत्री कितने लाचार और कमजोर हैं, इसकी बानगी विधानसभा में दिखी जहां उद्योग मंत्री ने स्वीकारा कि राज्य शासन के पास मूल्य नियंत्रण को लेकर कोई अधिकार नहीं है.

 

आपको याद दिला दें कि छत्तीसगढ़ राज्य बने मात्र दो साल हुए थे और तत्कालीन अजीत जोगी सरकार में सीमेंट की कीमतें 15 से 20 रूपये तक उछालें मार गई थीं तब भाजपा ने इसे जोगी टैक्स की संज्ञा देते हुए सडक़ से विधानसभा तक लड़ाई लड़ी थी लेकिन अब भाजपा के पास क्या जवाब है? कच्चा माल की पर्याप्त उपलब्धता, रायल्टी तथा सस्ती विद्युत दरों के बावजूद सीमेंट कंपनियों का यह बयान गले नहीं उतरता कि मांग और पूर्ति में अंतर के चलते कीमतें बढ़ाई गईं. यही सवाल राज्य की दो करोड़ जनता के मन में भी है जिसे सहारा दिया पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बयान ने. श्री जोगी ने विधानसभा में राज्य सरकार पर सीमेंट निर्माता कंपनियां से सांठगांठ करने का आरोप लगाया और चिंताजनक प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में सीमेंट उत्पादन के लिए कंपनियों को भूमि, श्रम, खनिज, बिजली, सडक़ और पानी जैसी आधारभूत संरचना उपलब्ध होने के बावजूद सीमेंट के दाम में वृध्दि क्यों की गई? आश्चर्य कि महाराष्ट और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भी सीमेंट इतनी महंगी नहीं है जितनी आग यहां लगी है. यह हाल तब हैं जब राज्य में गयारह सीमेंट प्लांट चल रहे हैं तथा पांच नए सीमेंट उद्योगों को स्थापना के लिए मंजूरी मिली है और उनमें से कई शुरू हो चुके हैं.

 

अब कीमतें बढ़ाने के पीछे का खेल समझिये. सीमेंट कंपनियां कितनी प्रभावी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि जब विधानसभा में सीमेंट मूल्य वृद्धि को लेकर सवाल-जवाब हो रहे थे तो एक सीमेंट कंपनी का प्रतिनिधि दर्शक दीर्घा में बैठकर जायजा ले रहा था. अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसने कितनों को मैनेज किया होगा? मुंबई की एक सीमेंट कंपनी ने कुछ दिनों पहले ही अपना प्लांट यहां शुरू किया है. उसके लाइजनिंग अफसर नेबताया कि एक अफसर ने सिर्फ फाइलें ओके कराने के लिये ही पांच लाख रूपये वसूल लिये! मंत्रियों व विधायकों की अपनी डिमाण्ड है. मजबूरी की हद देखिये कि समय-समय पर राजनीतिक आंदोलन और सम्मेलनों के लिये अलग से चंदा भी देना पड़ता है. दो साल पहले एक बड़े होटल में आयोजित एक राष्ट्रीय बैठक के लिये सीमेंट कंपनी की तरफ से 42 लाख रूपये का भुगतान किया गया था. इन खुलासों से साफ है कि सीमेंट में मूल्य वृद्धि क्यों हुई या उसका विरोध खुलकर क्यों नहीं किया जा रहा? अब कंपनियां यदि घूस देंगी तो उसकी वसूली जनता से ही करेंगी ना. जबकि अभी चुनावी मौसम आना बाकी है. सीमेंट की कीमतों के बोझतले दबने के बाद आम आदमी को जल्द ही बिजली का झटका लगने जा रहा है. विद्युत वितरण कंपनी ने जो प्रस्ताव सरकार को भेजा है, उसके मुताबिक सभी श्रेणी की बिजली दरों में 50 प्रतिशत की वृद्धि करने की तैयारी है. आश्चर्य कि सबसे ज्यादा दरें कृषि और उद्योग बिजली में बढ़ाई जा सकती हैं. भाजपा ने यदि जोगी टैक्स की संज्ञा दी थी तो अब कांग्रेस को भी नाम तलाशने के लिये बुद्धिजीवियों की मदद लेनी चाहिये.

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