लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

Posted On by &filed under विविधा.


-पंकज झा

क्या आपने वालीवुड की दबंग दुनिया से बाहर कभी ‘बदनाम’ होने के बाद भी नाचते किसी मुन्नी को देखा है? अगर नहीं तो नेट पर हिन्दी साइटों को खंगालना शुरू कर दीजिए. आपको पता चल जाएगा कि केवल मलाइका अरोड़ा ही किसी डार्लिंग के लिए बदनाम होने पर नहीं नाचती है. अपने यहां, बदनाम होकर नाचने वाले लौंडों की ज़मात भी काफी है. आपको मालूम होगा कि हिन्दी पट्टी में वर्षों से मशहूर ‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए’ गाने को उड़ाकर ही ‘डार्लिंग’ के लिए बदनाम होती मुन्नी का जन्म हुआ है.

तो अयोध्या मामले पर फैसला आ जाने के बाद जहां पूरे देश में शांति और सौमनस्यता का माहौल है वहां कुछ बदनाम हुए लौंडों को आप आग लगाने के फिराक में नाचते देख सकते हैं. चुकी ये लौंडे किसी ‘नसीबन’ के लिए बदनाम नहीं हुए हैं. यह बदनाम हुए हैं हिटलर के देश के अपने डार्लिंग मार्क्स और थ्येन-आनमन चौराहे पर भटकते माओ के लिए. तो गुस्सा के बदले आनंद उठाने का आग्रह, क्योंकि अब यह तय हो गया है कि ये तत्व इस देश का कुछ बिगाड़ सकने की हालत में नहीं हैं. इन वृहन्न्लाओं को आप मनोरंजन शुल्क के रूप में चंद टुकड़े तो थम्हा सकते हैं लेकिन यह आपको डरा दें इनमें अब ऐसी पुरुषार्थ नहीं.

इन नमूनों के कुछ के नमूने देखिये. एक ‘शेष’ नाग हैं. इन्होने एक साईट पर लिखा कि ऐसे फैसले उनके गांव में नहीं हुआ करते हैं. तो पता नहीं दुनिया से अलग कौन सा गांव इन्होंने बसा रखा है, जहां केवल दुर्भावनापूर्ण फैसले ही लिए जाते हैं. हो सकता है उनके गांव में कोई ‘खाप’ जैसी पंचायत हो जो इनके अनुकूल ही फैसले सुनाती हो सदा. अन्यथा सद्भावना कायम रखने के इस फैसले से उनको दर्द क्यों हो रहा है. वैसे इसका बाजिव कारण पता लगाना इतना मुश्किल भी नहीं है. ऐसे ही एक और विघ्नसंतोषी का कहना था कि पहले वहां मस्जिद का निर्माण हो जाने देना था फिर अगर कोर्ट को लगता कि वहां हिंदू पक्ष मज़बूत है तो किसी अन्य फैसले के बारे में बाद में सोचा जाता. अब इसका क्या जबाब दें यह पाठक पर ही छोडना उचित होगा. लेकिन अपने इस बात को साबित करने में इन्होंने तमाम न्यायिक मर्यादाओं को ताक पर रख बेचारे न्यायालय की अवमानना तक पहुच गए. ऐसे ही एक मित्र हैं बेचारे चौपाये जिनका उपनाम जिस भारतीय संस्कृति में वर्णित चरों वेदों का प्रतिनिधित्व करता है वही अपने ही पुरुखों को मिली मान्यता पर कुठाराघात करने पन्ने पे पन्ने रंगे जा रहे हैं.

अब इनपर और इन जैसे तमाम भड़ास पर शब्दशः प्रतिक्रया देना या तत्वतः जबाब देना तो एक आलेख में संभव नहीं है फिर भी एक मौलिक सवाल यह उठता है कि आखिर इस फैसले से इन सभी के पेट में दर्द क्यू है? जी बिल्कुल सही. पेट में दर्द इसलिए क्योंकि लात इनके पेट पर ही पड़ी है. अभी तक देश को बदनाम कर करके, अपने ही बाप पुरुखों की संस्कृति को गरिया करके, देश का सम्मान और स्वाभिमान बेच कर तो पेट भरते रहे हैं ये अभागे. कहावत है कि “किसी को अगर किसी बात का घमंड हो जाय तो ‘ज्ञान’ उस घमंड को दूर कर देता है. लेकिन उसका क्या करें जब किसी को ज्ञान का ही घमंड हो ?’’ तो अपने ज्ञान के मद में चूर इन रावणों की नज़र में लोकतांत्रिक प्रणाली गलत. देश का प्रेस और मीडिया गरियाने लायक. मानवाधिकार समेत सभी तरह के आयोग तभी तक सही जब तक इनकी बात मानें और अब न्यायपालिका भी काम का नहीं. गोया दुनिया भर के सभी सरोकारों का ठेका इन्ही के पास है. हर वो चीज गलत जो इनके मुताबिक़ ना हो. आखिर ये होते कौन हैं और इनकी हैसीयत क्या है कि चुने हुए व्यवस्था से लेकर छन कर आये न्यायिक फैसले तक सब पर सवाल खड़ा करें?

खैर..इस फैसले के बाद फिजा में घुला नव निर्माण का संकल्प ज़रूर इनकी रोजी-रोटी पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है लेकिन केवल इनका पेट पालने के लिए हम देश की एकता को दाव पर लगा दें? असली बात यह है कि न्यायालय ने अपने फैसले में ना केवल भगवान राम के अस्तित्व को स्वीकार किया बल्कि संबंधित जगह पर ही उनका जन्म होना यह भी निश्चित कर दिया. सामान्य तौर पर भले ही यह कोई बड़ी बात ना लगे, जन-जन के ह्रदय में बसे राम मुहताज भी नहीं किसी फैसले के. लेकिन आस्था पर लगी ‘तर्क’ के इस सबसे बड़े मुहर से तो इनके झूठ का साम्राज्य ही बिखरता नज़र आ रहा है. यानी राम अगर सच, तो सारी हिंदू मान्यताएं सच. अंग्रेजों के तलवे चाटने के लिए गढी गयी कहानी कि आर्य बाहर से आये थे वह झूठ. राम सेतु से लेकर सारी हिंदू मान्यताएं सच. फिर तो अगर सब कुछ सच तो कालिख ही पुत गयी ना इन किराए के गुंडों के चेहरे पर? दूकान ही बंद हो गयी न इन रुदालियों की? अगर बड़ी संख्या में लोग मरे ही नहीं तो फिर इन चील कौवों-का पेट कैसे भरे? तो असली चोट यहां इनके उस मर्म पर पहुची है. लेकिन यह चोट ऐसे तत्वों को सबक भी देता है कि मार्क्स सम्प्रदाय की अपनी साम्प्रदायिक राजनीति छोड़ सीधे सच्चे तौर पर अपनी विद्वता – अगर है तो – का देश हित में इस्तेमाल करें, अन्यथा आसुओं के इन सौदागरों को अपनी समाप्ति पर दो बूंद आसू भी नहीं नसीब होंगे.

इस फैसले के बाद देश और मुख्यधारा के सभी माध्यमों में जिस तरह सद्भाव-सौमनस्यता की बयार बह रही है. जिस तरह देश के करोड़ों मुस्लिम बंधु भी राहत की सांस ले रहे हैं. हिंदू घरों में भी जिस तरह से आगत दीवाली की तैयारी हो रही है, वह भारतीय तहजीब का सुन्दर स्वरुप प्रस्तुत कर रहा है. लेकिन सवाल तो यह है कि देश के दर्द की तिजारत करने वाले इन ‘झंडू बामों’ की तो दुकान ही बंद हो जायेगी इस तरह. इन्हें चाहिए कि अपनी कोई अलग अच्छी दूकान खोल लें. पूर्णतः स्वस्थ हुआ यह देश ऐसी ताकतों, ऐसे बदतमीज़ और बदजुबान तत्वों को आख़िरी चेतावनी देता प्रतीत हो रहा है कि अब भी चेत जाओ अन्यथा धोबी के कुत्ते की तरह ना घर के रहोगे ना घाट के. नसीबन के लिए बदनाम कोई लौंडा मोहल्ले के मंच पर ही शोभा देता है या बदनाम होने के बाद भी ठुमकती, अदा दिखाती मुन्नियां फिल्मों में ही अच्छी दिखती है. जन सरोकारों के किसी राष्ट्रीय मंच पर नहीं.

8 Responses to “बदनाम होने के बाद भी नाचते ये दबंग मुन्ने”

  1. रातुल सौम्य

    @ अरविन्द जी …स्वामी विवेकानन्द ने कहा था की किसी से प्रेम और नफरत दोनों उसके फायदे में हो सकते हैं …अगर आपने प्रेम किया तो आप उसे ह्रदय में और अगर नफरत की तो मस्तिष्क में ..आपको उसे रखना ही होता है …अतः बेहतर होगा की ऐसे भ्रष्ट मानसिकता वाले प्राणी जो -सस्ती लोकप्रियता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ..उन्हें ‘अनदेखा’ करना ही बेहतर होगा !

    Reply
  2. sanjeev verma

    pankaj ji
    aapka yah artical behad pasand aaya. aise artical likane ke liye badhai

    Reply
  3. Praful

    गेट वेल सून
    शेष नारायण जी

    और

    गेट वेल सून
    आपकी आवाज डोट कॉम के संपादक जी!

    भाई लोग! आपलोग जरा आपकी आवाज डोट कॉम भी खोल के देख लो फिर पता चल जायेगा की शेष नाग का हिमायती कौन कौन से लोग हैं?

    Reply
  4. Arvind Arora

    शांति के चिर शत्रुओं को बहुत सही उत्तर दिया है आपने पंकज जी, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस प्रकार के शेषनागों तथा दुर्भावना से भरे विषैले हिंसक पशुओं से निपटा कैसे जाए? पहली बात – इन नपुंसकों से आत्‍म गौरव या आत्‍म सम्‍मान तो छोडिए सद्भावना तथा सौहार्द की इच्‍छा रखने की उम्‍मीद करना भी बेमानी होगा… दूसरी बात – तारीख गवाह रही है कि शक्तिहीन होकर आप शांति तथा सम्‍मान पाने की उम्‍मीद नहीं कर सकते क्‍योंकि शक्ति से ही सम्‍मान अर्जित होता है…..

    मेरी बात का सारांश यह है कि कांव-कांव करने वाले इन कौओं से निपटने का कोई समुचित तरीका खोजा जाना चाहिए ताकि शांति स्‍थापना के प्रयासों में रोड़ा अटकाने के प्रयास यह आगे से न कर पाएं…. विचार कीजिएगा…

    Reply
  5. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    काहे हलकान हो रहे हो वचुवा ..दुनिया बहुत बड़ी है ..नाना प्रकार के लोग हैं …हो सकता है आप इस दुनिया या एक घटना को किसी खास नज़रिए से देख रहे हों और जिसको आप पसंद नहीं कर रहे वो किसी अन्य नज़र्ये से देख रहा हो .हो सकता है की दोनों ही सही हों फर्क सिर्फ उद्देश्य या अभिव्यक्ति का ही हो .
    पंकज का आलेख तो मुझे फिर भी सार्थक लग रहा है किन्तु लोग हैं की पता नहीं क्यों इसमें भी -नकारात्मक सन्देश ढूड रहे हैं .

    Reply
  6. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    पंकज जी इन देशद्रोहिओं का क्या इलाज है

    Reply
  7. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    बिलकुल सटीक कहा है आपने पंकज भाई…
    जब सभी सम्प्रदायों ने न्यायालय के निर्णय को स्वीकार किया है तो इन गिद्धों के पेट पर तो लात पद ही जाएगी न. इन रुदालियों को तो प्रवक्ता.कॉम पर भी रोते देखा जा सकता है. इनको आश्चर्य इस बात का है कि कोई दंगा फसाद क्यों नहीं कर रहा…क्योंकि इनकी दाल में तडका तो आम जन के खून से ही लगता है न…
    किन्तु अब इनकी दाल बेस्वाद ही रहेगी. अब एक उम्मीद जागी है कि भारत फिर से अपनी खोई हुई गरीमा को प्राप्त करेगा, यहाँ फिर से शान्ति के फूल खिलेंगे, और ऐसा बहुत जल्द होने वाला है…
    पंकज भाई शानदार तरीके से आपने अपने भावों को व्यक्त किया है. इस महत्वपूर्ण लेख के लिए बहुत बहुत धन्यवाद…

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *