आखिर कब तक रहता एक म्यान में दो तलवार…

दिन- बुधवार…तारीख- 26 जुलाई…साल- 2017

बिहार की राजनीति में हमेशा याद किया जायेगा क्योंकि इसी दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि हालात इतने बदतर हो गये थे कि मैं अब काम करने की स्थिति में नहीं था. इस एक वाक्य से समझा जा सकता है कि तेजस्वी यादव का इस्तीफा न देना या फिर रेलवे घोटाला मामले में जनता के समक्ष बिंदुवार सफाई न देना तो सीएम के इस्तीफे का एक तात्कालिक कारण बना लेकिन महागठबंधन की सरकार बनते ही जिस प्रकार लालू यादव या यों कहें कि आरजेडी अपने पुराने फॉर्म में लौट रही थी वो नीतीश कुमार के लिए आगे आनेवाले दिनों  खतरे की घंटी साबित होती. सरकार बनने के इन दो सालों के भीतर नीतीश कुमार ने इस खतरे को बखूबी भांप लिया था. लालू यादव प्रत्यक्ष रूप से भले ही सत्ता में शामिल नहीं थे लेकिन वो अपने दोनों बेटों तेजप्रताप व तेजस्वी के साथ ही आरजेडी के मंत्रियों के मार्फत पूरी तरह से सरकार के कामकाज को प्रभावित कर रहे थे. गाहे-बगाहे वह अधिकारियों को हड़काने का काम भी करने लगे थे.

एक कहावत है कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकता तो फिर बिहार में आखिर कबतक लालू और नीतीश एकसाथ रहते ? लालू की राजनीति या फिर उनकी कार्यशैली किसी से छिपी नहीं है. उनके सत्ता चलाने का अंदाज बिल्कुल जुदा है. वो सत्ता का इस्तेमाल अपने स्वार्थ को साधने व वोट-बैंक बढ़ाने में करते हैं.
2015 में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी. सरकार बनने के कुछ दिन तक तो लालू शांत रहे लेकिन फिर वह धीरे-धीरे अपने मंत्री-बेटों के मार्फत सरकार पर नियंत्रण साधने की कोशिश करने लगे. लालू के पुराने गण-दूत भी जाग उठे. शहाबुद्दीन ने सीवान जेल से ही लालू को फोन कर रामनवमी वाले दिन घटी घटना से अवगत कराया और अधिकारियों को टाइट करने की गुहार लगायी. इसकी जानकारी लोगों को तब मिली जब अर्णब गोस्वामी ने रिपब्लिक टीवी पर एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए इसका खुलासा किया. लालू यादव अपने पुराने फॉर्म में लौट आये थे और फोन कर अधिकारियों को हड़काना शुरू कर दिया था. इसी क्रम में उन्होंने किसी घटनाक्रम को लेकर आरा के पुलिस-पदाधिकारी को हड़काया.

 

अपने मंत्री-पुत्रों खासकर तेजप्रताप के स्वास्थ्य विभाग पर तो पूरी तरह लालू ने कब्जा कर रखा था. स्वास्थ्य विभाग के सरकारी कार्यक्रम में अक्सर उन्हें भाषण देते या फिर घोषणा करते देखा जाता था. इस बात को लेकर मीडियाकर्मी कई बार उनसे सवाल करते तो वो अपने अंदाज में उन्हें जवाब देते कि आप से पूछकर कहीं जायेंगे. उनके आवास पर आईजीआईएमएस के 5 डॉक्टरों की टीम की नियुक्ति का मामला हो या फिर किसी अधिकारी के ट्रांसफर-पोस्टिंग की, सब में वह हस्तक्षेप करने लगे थे. ऐसा नहीं था कि नीतीश कुमार को इसकी जानकारी नहीं थी लेकिन वह इनसब बातों को नजरअंदाज कर बिहार के विकास के लिए अपने सात निश्चय कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे थे.

मामला तब बिगड़ गया जब लालू के मॉल निर्माण के दौरान मिट्टी घोटाला सामने आया. इसमें सीधे तौर पर तेजप्रताप के वन विभाग के ऊपर अंगुली उठी. वन विभाग भी लालू के बेटे तेजप्रताप के पास था और इसका जमकर फायदा उठाया लालू कुनबा ने. ऐसा कहा गया कि बिना टेंडर के ही वन विभाग के अंतर्गत आनेवाले चिड़ियाघर ने मिट्टी की खरीद-बिक्री की. हालांकि मामला तूल पकड़ने पर चिड़ियाघर के अधिकारियों ने इसपर अपनी सफाई दी. इधर, लगातार भाजपा नेता सुशील मोदी लालू कुनबा पर हमला बोल रहे थे. उनकी बेनामी संपत्ति का पोल खोल रहे थे. मीडिया में कभी मीसा भारती के अवैध संपत्ति का जिक्र आता तो कभी तेजप्रताप के पेट्रोल पंप को लेकर सवाल उठते. चारा की तरह ही लारा को लेकर भी लोगों ने मजाक बनाना शुरू कर दिया था. लालू, मीसा व तेजप्रताप पर बेनामी संपत्ति अर्जित करने का दाग लग चुका था. पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को रेलवे घोटाला में लपेटे में लेकर बची-खुची कसर सीबीआई ने पूरी कर दी. अब एक प्रकार से राजनीति में सक्रिय पूरा लालू कुनबा घोटाले और बेनामी संपत्ति के भंवरजाल में फंस चुका था. हालांकि लालू लगातार कहते रहे कि तेजस्वी को फंसाया गया है. तेजस्वी ने भी अपना बचाव किया कि निमुछिया लड़का कैसे घोटाला कर सकता है ? सब भाजपा की चाल है लेकिन महागठबंधन की सरकार पर दाग तो लग चुका था. चौक-चौराहों पर लोग इसकी चर्चा भी करने लगे थे.

 

लालू यादव बराबर अपनी हरकतों से सरकार और महागठबंधन को खतरे में डाल रहे थे. मीडिया में वह ऐसा दिखाते थे कि भले ही नीतीश कुमार सीएम हैं लेकिन सरकार वो ही चला रहे हैं. एक हद तक वो अपने वोट-बैंक को ऐसा मैसेज देने में कामयाब भी हो गये थे. महागठबंधन की ताबूत में आखिरी कील उस वक्त ठोंक दी गयी जब लालू अपने खासमखास सिपहसालार प्रेमचंद गुप्ता के मार्फत दिल्ली में अरूण जेटली से मिले. उस वक्त ऐसी चर्चा जोरों पर थी कि लालू भाजपा से मिलकर बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को गिरा सकते हैं. राजनीति के मंझे खिलाड़ी नीतीश कुमार ने हालात को भांपते हुए उसी वक्त यह तय कर लिया था कि लालू का साथ जितनी जल्दी हो छोड़ देने में ही भलाई है. इस प्रकरण के बाद  ही महागठबंधन से अलग होने की स्क्रिप्ट लिखी गयी.

 

बहरहाल नीतीश कुमार ने इस पूरे प्रकरण में काफी संयम का परिचय दिया और तेजस्वी को पूरा मौका भी कि वो जनता के समक्ष बिंदुवार अपनी सफाई पेश करें. दूसरी ओर, लालू के समक्ष यह संकट था कि यदि वह तेजस्वी से इस्तीफा दिलवा देते हैं तो लोग यह मान लेंगे कि तेजस्वी ने घोटाला किया है जिससे उसका राजनीतिक करियर हाशिये पर चला जायेगा, जिसने अभी परवान चढ़ना शुरू ही किया था. लालू तेजस्वी में अपना अक्स देखते हैं. उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि तेजस्वी ही वह शख्स है जो उनके बाद आरजेडी की नैया पार लगा सकता है. पार्टी को बचाये रखने के लिए तेजस्वी को बचाये रखना बहुत जरूरी है. इधर, नीतीश कुमार के सामने संकट यह था कि वो हर हाल में मिस्टर क्लीन वाली अपनी छवि बनाये रखें. इसके लिए तेजस्वी का इस्तीफा निहायत ही जरूरी था.

 

इस प्रकार लालू  की जिद, कांग्रेस की उदासीनता और नीतीश की छवि ने मिलकर बिहार में दो साल पुरानी महागठबंधन की सरकार का तख्ता पलट किया और एनडीए को गद्दीनशीं. मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश का ही है केवल सहयोगी पार्टियां बदल गयी हैं. अब नीतीश कुमार भाजपा व उसकी सहयोगी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चलायेंगे. कलतक सरकार में शामिल रहे आरजेडी व कांग्रेस अब बिहार में विपक्ष की भूमिका निभायेंगे.

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