लेखक परिचय

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

जन्म 18 जून 1968 में वाराणसी के भटपुरवां कलां गांव में हुआ। 1970 से लखनऊ में ही निवास कर रहे हैं। शिक्षा- स्नातक लखनऊ विश्‍वविद्यालय से एवं एमए कानपुर विश्‍वविद्यालय से उत्तीर्ण। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण पर लेख प्रकाशित। मातृवन्दना, माडल टाइम्स, राहत टाइम्स, सहारा परिवार की मासिक पत्रिका 'अपना परिवार', एवं हिन्दुस्थान समाचार आदि। प्रकाशित पुस्तक- ''करवट'' : एक ग्रामीण परिवेष के बालक की डाक्टर बनने की कहानी है जिसमें उसको मदद करने वाले हाथों की मदद न कर पाने का पश्‍चाताप और समाजोत्थान पर आधारित है।

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मनोज श्रीवास्तव ”मौन”

यूरोपीय देश अपने आप को विकसित कहते हैं उन्हें भी धरती की धधकती हुई ज्वालामुखी ने आश्‍चर्यजनक क्षति दी है। चीन में बर्फबारी ने काफी नुकसान किया है। अमेरिका में कटरिना व रीना तूफान अक्सर तबाही मचाते रहते हैं। जापान और चिली जैसे देश भूकम्प और सूनामी की भेंट चढ़ रहे है। भारत में समय समय पर भूस्खलन धरती के फटने की घटनाएं, भारी मात्रा में बारिश, भूकम्प के झटके व सूनामी से अक्सर ही क्षति होती रहती है। धरती पर भारत ही ऐसा देश है जो नेपाल में बारिश से होने वाली जल अधिकता की मार भी झेलता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के पानी द्वारा हर साल करोड़ों रूपयों की खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है और हजारों हेक्टेअर भूमि जलमग्न भी हो जाती है। जिसमें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और पष्चिमी बंगाल प्रदेषों का बहुत बड़ा भूभाग प्रभावित हो जाता है और हम असहाय बन धरती के इस कोप को सहते रहते हैं। अप्रैल 2011 में आष्चर्यजनक रूप से फैजाबाद जिले में लगभग 1 कुन्टल का ओला गिरा और इसके साथ साथ ही आधा दर्जन 5 किलो के ओले भी गिरे जो अब तक धरती पर गिरने वाले ओले में सबसे बड़े आकार के हैं इसको लेकर भूवैज्ञानिकों में कौतुहल भी है और साथ ही उन्होने कहा कि ऐसे ओले तेज बवन्डर के चलते आकाश में होने वाली सामान्य घटना के तहत ही होते हैं। वहां इस अजूबे को देखने के लिए ग्रामीणों की काफी भीड़ उमड़ पड़ी थी।

विन्ध्य शृंखला में रहने वाली आबादी को सूखा प्रभावित रहना पड़ता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह चट्टानों वाली पहाड़ी का क्षेत्र है। एक तो यहां बरसात कम होती है और जब कभी होती भी है तो वह जल तपते हुए चट्टानों पर पड़ कर भाप बन कर उड़ जाती है। ऐसे में धरती के गर्भ में जल की कमी दिनों दिन बढ़ ही रही है। खण्डवा जिले के गुरवारी व बिल्नद गांव में 8 इंच चौड़ी धरती कडकडाहट की आवाज के साथ सितम्बर 2010 में फट गयी। भारत में गुजरात राज्य के भुज क्षेत्र में जब सन् 2000 में भूकम्प आया था तो वहां पर एक अपार्टमेन्ट की चार मंजिलें सीधे जमीन में धंस गई थी। इसी इलाके में एक भवन जब धंस रही थी तो उसके छत पर खड़ा था और फिर जब छत जमीन के स्तर पर पहुंची तो कूद कर अपनी जान बचायी थी। उत्तर प्रदेश में कौशाम्बी जिले में इस प्रकार जमीन फटने की दो घटनाएं हुई इटावा जिले के औरैया में भी धरती फटने की धटनाएं हुई जिसमें एक व्यक्ति की मौत भी हो गयी। इन घटनाओं के पीछे भारतीय भूवैज्ञानिकों का मानना है कि धरती के गर्भ में पानी की कमी को ही मुख्य कारण बताया गया है।

जहां एक ओर पूरे बुन्देलखण्ड में और इससे सटे इलाहाबाद के कौशाम्बी में दरार पड़ने की घटनाएं हो रही है वहीं पर इलाहाबाद के ही जमुनापार स्थित गड़ेरिया के गांव के लोगों ने एक करिष्माई कारनामा रच कर एक ऐसा कर दिखाया कि आज उन ग्रामीणों की तारिफ किए बिना शायद ही कोई रह पाये। क्योंकि यमुनापार स्थित टौंस नदी तट के गड़ेरिया गांव के आस पास कई गांव जहां पर पानी की एक एक बूंद के लिए तरस रहे थे, जानवरों का चारा सूख गये थे, कूंए सूख गये थे, तालाब सूख गये थे इस हालात से निपटने के लिए उन्होेंने दो साल में डेढ़ सौ हेक्टेयर जमीन पर नालियां बनाकर नीम, बबूल, पलास, जंगल जलेबी आदि वन्य वृक्ष लगाये और दस दस हेक्टेयर पौधों की देखरेख प्रति व्यक्ति के हिसाब से बांट ली। मजदूरी के रूप में मनरेगा के तहत भुगतान की भी व्यवस्था कर दी गयी। इसका परिणाम यह हुआ कि 12 कि.मी. दूर चांद खमरिया क्षेत्र से काले हिरण, लकड़बग्घे और अन्य वन्य जीवों भी आने लगे और उनकी संख्या में भी काफी वृध्दि हो गयी। इस क्षेत्र में पानी के भूगर्भीय स्तर में भी काफी इजाफा हुआ है। पर्यावरण के प्रति जागरूक नागरिकों ने गोमती को पुर्नजीवन देने के लिए एक जुट प्रयास किए जा रहे है। यह प्रयास गोमती के उद्गम स्थल से लेकर प्रारम्भ किया गया है जिसमें नदी के रूके हुए बहाव को गति दी जा रही है और इसमें मिलने वाली नदियों को भी सफाई अभियान में जोड़ लिया गया है जिससे कि गोमती में साफ पानी की मात्रा बढ़ सके।

ग्लोबल रूप से होने वाली घटनाओं की एक कड़ी बनायी जाए तो हमें यह समझते देर न लगेगी कि पृथ्वी पर पर्यावरण की हमारी समझ कहीं न कहीं कमजोर पड़ रही है। हमारी धरती को माता कहलाने का पूरा हक है क्योंकि हमारी धरती ने हमें अपार पर्यावरणीय धन सम्पदा प्रदान की है और हम उसके सम्मान में कोई कसर भी नहीं छोड़ते हैं परन्तु विकास के नाम पर हम उसके प्रति अपने दायित्वों की भी जमकर अनदेखी भी करते हैं। विन्ध्य श्रृंखला में आजकल अप्रत्याशित घटना देखने को मिल रही है जिसमें धरती मां के आंचल में दरार पड़ जा रही है जो कि कई मीटर तक गहरी होती है और इसकी चौड़ाई भी कहीं कहीं पर तो एक मीटर से भी अधिक पायी जाती है। आज हमें अनिवार्य रूप से यह सोचने की जरूरत है कि पर्यावरणीय समस्या का सामना करने वाले हम मानव समाज में पर्यावरण को उचित मान नहीं दे रहे है इसके परिणामस्वरूप अनेकानेक खतरे हमारी पृथ्वी पर मंडरा रहे हैं।

 

3 Responses to “धरती के दायित्वों की अनदेखी करने का भार”

  1. arif

    मौन जी सच में हम जिम्मेदारियों से मुख मोड़ रहे है

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  2. vivek mishra

    सच हमारे अपराधों कस भार धरती नहीं सह पा रही है

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  3. sunil patel

    श्री मनोज जी सही कह रहे है.
    प्रकृति खुद को संतुलित कर लेती है. वैसे तो ऐसा होने में हजारो लाखो साल लगते है किन्तु मानव ने इतने जख्म दे दिए है की लगता है की अब और सहन कर पायेगी.

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