लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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जापानी में शिक्षा:
डॉ. मधुसूदन

==>जापान का, स्वभाषा में विकास चक्र का प्रचलन।
==>जापान में शोध साहित्य का अनुवाद लगातार प्रकाशित।
==>”गरीब से गरीब वर्ग को भी ऊपर लाना है।”–मोदी
==>”सब का साथ सब का विकास”–मोदी

(एक)जापानी माध्यम में दी जाती शिक्षा:
लेखक को, जापानी माध्यम में दी जाती शिक्षा ही, जापान की प्रगति का प्रबल और मौलिक कारण दिखता है। लेख पढनेपर और लेखक के  दिए तर्कों पर सोचने पर आप भी सहमत होंगे, ऐसी अपेक्षा है।वैसे जापान की प्रगति के घटक और भी है। पर जापानी माध्यम में दी जाती शिक्षा जापान की प्रगति का मौलिक कारण इस लेखक को प्रतीत होता है।जापानी भाषा वैसे कठिन  भाषा मानी जाती है। पर राष्ट्रीय निष्ठा जगाने में स्वभाषा ही काम दे सकती है, वैसे परदेशी भाषा से राष्ट्रीय भाव नहीं जगता।

(दो) (क)स्वभाषा से विकास चक्र का प्रचलन:
स्वभाषा से विकास का चक्र कैसे प्रचलित होता है, इसकी कार्य कारण परम्परा निम्न प्रक्रियाओं के क्रमानुक्रम से समझाई जा सकती है।
एक स्वभाषा से –>साक्षरता का प्रमाण बढता है।
—>ऐसा  प्रमाण बढनेसे—>अधिक  प्रजा सुशिक्षित होती है।
—-> सुशिक्षित प्रजा का आधिक्य–>अच्छे कुशल कर्मचारी प्रदान करता है।
—-> कुशल कर्मचारी उत्पादन बढाकर—>समृद्धि में योगदान देकर विकास में सहायक होता है।
{ कोई संदेह ?}

(ख) सुशिक्षित, बुद्धिमान प्रजा का योगदान:
वहाँ  दूसरी ओर सुशिक्षित, बुद्धिमान प्रजा संशोधन में योगदान देती हैं।
–>संशोधनों के आधारपर  उत्पादन बढाने में सहायता होती है।
–>तो  वैश्विक बाजार में वे उत्पाद पहुंचते हैं।
–> बिकनेपर देशकी  आर्थिक प्रगति संभव होती है
{कोई सन्देह?}

(तीन) जापानी अनुवाद परम्परा का प्रारूप:
जापान अपने संशोधकों को अनुवाद उपलब्ध कराता है।
ऐसे अनुवाद संसारकी ४-५(?) भाषाओं से होते हैं।
इस विधि से जापान अपनी बुद्धिमान प्रजा का ४-५ परदेशी भाषाएँ सीखने का समय तो बचाता ही है।
साथ साथ उन्हें अकेली अंग्रेज़ी की अपेक्षा कई गुना, संशोधन सामग्री उपलब्ध कराता है।

(ग) जापान में संसार के चुने हुये गुणवत्ता वाले, शोध साहित्य का अनुवाद लगातार प्रकाशित हुआ करता है। ऐसी जापानी  अनुवाद प्रणाली कम से कम १८९० के आस पास से, मेजी शासन के समय में प्रारंभ की गयी थी।  उस समय डच, जर्मन, फ्रांसीसी, और अंग्रेज़ी और अमरिकन भाषा से अनुवाद हुआ करते थे।
ऐसे अनुवादों को ३ सप्ताह के अंदर जापान छापकर मूल कीमत से भी सस्ता बेचता है।
और एक अंग्रेज़ी से ही नहीं, अन्य प्रगत भाषाओं से भी बहुगुना लाभ प्राप्त करता है।
(एक पत्र के आधारपर यह तथ्य रखा गया है। )
जापान का लाभ क्या? जापान को इससे कई गुना लाभ होता है।
छात्रों को परदेशी भाषा सीखनी नहीं पडती। एक अंग्रेज़ी के बदले अनेक भाषाओं से मथा हुआ नवनीत प्राप्त होता है।

कितनी परदेशी भाषाओं से अनुवाद किया जाए?

रूसी, जर्मन, फ्रांसीसी, हिब्रु, चीनी, जापानी, अंग्रेज़ी इतनी भाषाओं में अनुवाद क्षमता हमें काम आएगी। अंग्रेज़ी में कम से कम ३३%, बाकी भाषाओं में भी अनुमान किया जा सकता है।
जर्मन और फ्रांसीसी एवं रूसी ये तीन भाषाएँ अनेक पी. एच. डी. अभियन्ताओं एवं वैज्ञानिकों को अनुवाद के लिए सीखनी पडती है।

ऐसे अनुवाद के आधारपर  कुशाग्र संशोधन, अन्वेषण, एवं खोज  को भारत जापान के प्रारूप पर आगे बढा सकता है। इस प्रतिपादित विषय को, इकनॉमिक टाइम्स के निम्न समाचार के संदर्भ में देखा जा सकता है।

(चार)”विकास के नए दौर में प्रवेश”— मोदी
“इकनॉमिक टाइम्स”के समाचार का आधार लेकर, प्रधान मंत्री श्री. मोदी जी, एवं संसाधन मंत्री सु. श्री. स्मृति इरानी का ध्यान खींचना चाहता हूँ।

(पाँच) समाचार है।

नई दिल्ली का १७ जनवरी का समाचार है
(१) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को बड़े सपने देखने को कहा। उन्होंने पहली बार देश के लिए आर्थिक और विकास के अपने सिद्धांत को प्रस्तुत (पेश) किया । उन्होंने कहा की भारत में नए युग का सूत्रपात हो गया है। देश ‘बिना उपलब्धियों’ वाले पत झड़ के मौसम से नए बसंत के मौसम में प्रवेश कर रहा है।
(२) शुक्रवार को ई. टी. “ग्लोबल बिजनस समिट” को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित करते हुए एक सवाल पूछा, ‘भारत आज 2 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी है। क्या हम इसे 20 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनाने का सपना नहीं देख सकते हैं?’
(3) उन्होंने अपने संबोधन में विकास के नरेंद्र मोदी सिद्धांत को विस्तार से समझाने के लिए. आप ने
“निम्न प्रगति की शृंखला” समझाई।
 (छः) प्रगति की शृंखला:(प्रणाली)
आपने कहा, “सरकार को एक ऐसे इकोसिस्टम को बढ़ावा देना चाहिए जहां इकॉनमी–>आर्थिक वृद्धि के लिए प्रधान हो और–>आर्थिक वृद्धि सर्वांगीण विकास को बढ़ावा दे। जहां विकास का –>मतलब नौकरी के अवसर पैदा करना हो और रोजगार को—>कौशल से सक्षम बनाया जाए।
जहां कौशल–>उत्पादन के साथ-साथ चले और उत्पादन–>गुणवत्ता का बेंचमार्क हो।
जहां क्वॉलिटी—-> ग्लोबल स्टैंडर्ड को पूरा करे और—>ग्लोबल स्टैंडर्ड से संपन्नता आए। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस संपन्नता से—-> देश में सभी का भला हो।
यह मेरा इकनॉमिक गुड गवर्नेंस और सर्वांगीण विकास का कॉन्सेप्ट है।”
आगे, उन्होंने बताया कि उनकी इच्छा–>सभी भारतीयों को ऊपर उठाने की है, खासतौर पर गरीब से गरीब वर्ग को भी ऊपर लाना है।

लेखक:
हमारे ग्रामीण श्रमिक एवं कृषक को  अंग्रेज़ी द्वारा आज तक ऊपर उठाया नहीं जा सका। और अंग्रेज़ी द्वारा ऊपर उठाने के सारे प्रयास विफल हुए हैं।
अब स्वभाषा से उत्थान विचारा जाए।

No Responses to “जापानी प्रगति का कारण?”

  1. Rekha Singh

    देश मे ५०० आचार्य कुलम खोलने की व्यवस्था की तरफ भारत स्वाभिमान संस्था के कार्यकरता बाबा रामदेव और आचार्ये बाल कृष्ण जी के साथ लगे हुए है । इस पर काम जोरो से हो रहा है । जिलो मे कुछ लोग अपनी जमीनो को आचार्य कुलम के लिए दें भी रहे है कार्य प्रगति पर है। बाबा रामदेव जी ने , मोदी जी ने भारत की प्रतिभाओ को जोड़ -जोड़कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसित किया , बहुत काम हुआ है , बहुत काम हो रहा है ————–

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  2. Anil Gupta

    सदैव की भांति पुनः एक उत्कृष्ट लेख.समस्या के मूल तक जाये बिना समस्या हल नहीं हो सकती है.अभी संभवतः मोदीजी विकास की दिशा निर्धारित करने में व्यस्त हैं.उनके सलाहकार मंडल में अधिकांशतः सेवानिवृत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारीगण हैं.लेकिन कुछ ताज़ा और नए ढंग से सोचने वाले लोगों को अपने सलाहकारों में रखा जाये तो अधिक श्रेयस्कर होगा.श्रद्धेय मधुसूदन जी का प्रस्तुत लेख भी ताज़ा हवा के एक झोंके की तरह ही है.ये वो बिंदु हैं जिन पर अभी कोई चर्चा नहीं करना चाहता लेकिन जिनका बहुत गहरा और दूरगामी महत्त्व है.विशेषकर दुनिया का अच्छा वैज्ञानिक शोध देशी भाषा में अनुवादित होकर उपलब्ध हो तो उससे अंग्रेजी के वर्चस्व से त्रस्त विज्ञानी वर्ग लाभान्वित हो सकेगा.वैसे भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में एक अनुवाद प्रकोष्ठ है लेकिन वो वैज्ञानिक साहित्य को अनुवादित करके प्रकाशित करने का महत्वपूर्ण कार्य सामान्यत्तया नहीं करता है.इस दिशा में गंभीरता से विचार करके कार्यारम्भ करना चाहिए.मानव गर्ग जी ने भी बहुत सार गर्भित विचार रखे हैं.तकनीकी और वैज्ञानिक युवा वर्ग को स्वभाषा की ओर प्रेरित करना भी अपेक्षित है.

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      श्री. अनिल गुप्ता जी। धन्यवाद।

      इस राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्र का, मैंने अनेक सभी पहलुओं से, अद्यतन (up to date), अध्ययन किया है।(प्रायः ५०+ आलेख प्रवक्ता में ही देखें।)
      अन्यान्य विद्वत सम्मेलनों (कान्फ़रेन्सस) में भी प्रस्तुति की है।
      और एक समर्पित सेवक की भाँति इसी काम में कुछ कर पाऊं, तो धन्यता का अनुभव होगा।विशेष, और कोई अपेक्षा नहीं है।
      ॥ वंदे मातरम्‌ ॥
      डॉ. मधुसूदन

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  3. Mohan Gupta

    कई वर्षो के पर्यतनो के वाबजूद भी भारत में अंग्रेजी को जानने वाले और समझने बाले की संख्या लगभग ५ % हैं। इनमे से कई लोग ऐसे हैं जो एक भी वाक्य पुनर्यता अंग्रेजी में नहीं बोल सकते। हर वाक्य में हिंदी या अन्य किसी भाषा के शब्द का प्रयोग करते हैं। ड्र. मधुसूदन जी ने हिंदी के बारे में कई लेख लिखे हैं। कहना कठीन हैं के इन लेखो का कितना प्रभाव हुआ हैं। अभी भी भारत में निर्मित भारतीय बाजार में जितने पधारत बिकते हैं , उनमे से ९० % पधार्तो के लेबल पर हिंदी नहीं लिखी होती जबकि १०० % पधार्तो के लेबलों पर अंग्रेजी लिखी होती हैं। ऐसे ही हालात पोस्टर्स, नामपट signboard , leaflets , phamlets , पैकिंग materials की हैं। हिंदी फिल्मो की नामावली cast हिंदी में होने की वजाय पुरणतया अंग्रेजी में होती हैं , हिंदी फिल्म का नाम भी हिंदी में नहीं लिखा जाता. आशा हैं के डॉ मधुसूदन जी द्वारा लिखित उच्च कोटि के लेखो द्वारा हिंदी जगत पर प्रभाब पडेगा। डॉ मधुसूदन जी के लेखो से एक बात तो सपष्ट हैं भारत की प्रगति तब तक नहीं होगी जब तक भारत में अंग्रेजी एक प्रमुख भाषा बनी रहेगी। भारत की प्रगति तभी होगी जब सारे भारत में सारे काम काज हिंदी या संस्कृत में होगा।

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  4. दुर्गा शंकर नागदा

    धन्यवाद । नमश्कार ।
    मधुसूदन जी का लेख उत्तम तथा सराहनीय लगा।

    किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति उसके नागरिकों का मनोबल होता है । अपनी मातृभाषा मे ही मनुष्य के सोचने समझने की क्षमता अधिक होती है और वह उसी से नये शोध आसानी से कर सकता है । इसलिए भारत में हिंदी या संस्कृत का ही प्रयोग व प्रचलन आम होना चाहिए । ईसी से भारत की आर्थिक वृद्धि तथा भारतीयों का मनोबल बढ़ेगा ।

    यह बात आदरणीय मोदी जी व समृति जी को बधाई सहित मई माह में ही अनुरोध कर दिया गया था परन्तु उनका कोई पहुंच मात्र भी अभी तक नहीं प्राप्त हुआ ।

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  5. मानव गर्ग

    माननीय मधु जी,

    अ. जो आप कह रहे हैं, वह कोई क्षेपणी-विज्ञान (rocket science) नहीं है, पर फिर भी हम लोग इसे समझ नहीं पाते । इसके २ मुख्य कारण मन में आते हैं –

    १. हमारे यहाँ राष्ट्रीय स्तर की नीति समृद्ध लोग बनाते हैं । ये लोग आङ्ग्लभाषा के रोध को अपने श्रम से पार करके श्रेष्ठता-भ्रान्ति (superiority complex) का अनुभव कर रहे होते हैं, और इन्हें लगता है कि जो वे कर पाए हैं, वे सभी लोग श्रम करके कर सकते हैं और उन्हें करना भी चाहिए । सफलता के मद में अन्धे हुए ये लोग राष्ट्रित में निष्पक्ष मनन नहीं कर पाते । ये भी परभाषा के माध्यम से दी गई शिक्षा का दुष्प्रभाव ही है ।

    २. जो लोग समृद्ध नहीं हैं, वे समृद्ध लोगों को ही अपना आदर्श मानते हैं । अतः वे भी आङ्ग्लभाषा के ही पक्षधर बन जाते हैं । यही कारण है कि आज भारत में गाँव गाँव के सभी लोग अपने बच्चे को आङ्ग्लभाषा-माध्यमिक शिक्षा ही देना चाहते हैं ।

    अतः आज के सन्दर्भ में आङ्ग्लभाषा-माध्यमिक शिक्षा एक बहुत गम्भीर कुचक्र बन चुकी है । ऐसे में आपका जापान का प्रत्युदाहरण देकर इस कुचक्र को तोड़ने का प्रयास बहुत ही उत्तम और महत्त्वपूर्ण है । आशा है कि भारत के बहुत हितैषियों तक आपकी बात पहुँचेगी, विशेषतः प्रशासन तक ।

    आ. आपका ये कहना कि –
    “पर राष्ट्रीय निष्ठा जगाने में स्वभाषा ही काम दे सकती है, वैसे परदेशी भाषा से राष्ट्रीय भाव नहीं जगता”
    इति, यह भी बहुत महत्त्वपूर्ण है । देखा गया है कि आज के हमारे समाज में २५ वर्ष पूर्व की तुलना में आर्थिक समृद्धि तो बहुत हुई है, और इस कारण राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि भी हुई है । परन्तु यहीं यदि लोगों की राष्ट्र के प्रति आस्था हो और वो आत्मोन्नति के साथ साथ राष्ट्रोन्नति को भी ध्येय बना कर श्रम करें, तो निःसन्देह ही राष्ट्र का वैभव और भी तीव्र गति से बढेगा ।

    इ. आपके विचारों को साधने की दिशा में सोचें, तो सबसे बड़ी चुनौती दिखती है हमारे यहाँ एक स्वाभाविक राष्ट्र भाषा का न होना । भिन्न भिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न मातृभाषाएँ हैं । इस को ध्यान में रखते हुए, हमें विचारों को साधने की दिशा में उपाय सोचने पड़ेंगे ।

    ई. लेख में वर्णित विषय से ही सम्बन्धित एक विषय है पारम्परिक शिक्षा का, शास्त्राध्ययन का । हमारे शास्त्रों में अध्यात्म के साथ साथ भौतिक विज्ञान पर भी महत्त्वपूर्ण वर्णन है । इसलिए शास्त्राध्ययन को प्रोत्साहन देने की अत्यन्त आवश्यकता है । इस दिशा में भी देश में कुछ प्रयास चल रहे हैं, जिनमें बाबा रामदेव की संस्था द्वारा चालित आचार्यकुलम् नामक विद्यालय सर्वप्रथम मन में आते हैं (सौभाग्य से हरिद्वार स्थित प्रथम आचार्यकुलम् विद्यालय जाकर वहाँ के शिक्षकों से मिला था) । इन “आवासीय” विद्यालयों में आङ्ग्लभाषा-माध्यम से आधुनिक शिक्षा के साथ साथ संस्कृत-माध्यम से पारम्परिक शिक्षा भी दी जाती है । भिन्न भिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाती हैं । यह “mainstream” शिक्षा के क्षेत्र में शास्त्राध्ययन को लाने का उत्तम प्रयास व एक अच्छी पहल लगता है ।

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  6. Rekha Singh

    किसी प्रसिद्ध साहित्यकार का कहना सच ही है ” निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति का मूल ” । हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री जब राष्ट्र भाषा मे बोलते है तो एक गरीब , कम या बिना पढ़ा लिखा हुआ व्यक्ति भी उनमे और अपने बीच की दूरी को भूलकर उनको और उनके विचारो और कार्यो को समझ पाता है कारण ? अपनी राष्ट्र भाषा मे विचारो का आदान -प्रदान । दूसरे अपनापन और एकता का भाव तीसरे छलावे से मुक्ति । अपनी भाषा के होने से सभी वर्ग के लोग आपस मे विश्वास के भाव को लेकर जीते है । आज भारत मे एक चीज की सभी लोग अपनी भाषा मे बोलने के कारण जनता को संगठित कर पा रहे है क्योकि एक दूसरे को समझ पा रहे है । जापान की उन्नति , एकता, विकास मे उनकी भाषा का स्थान दिखाई पड़ता है ।
    यह तो सर्व विदित है की यदि वही शब्द हम अपनी भाषा मे कहते है तो उसका प्रभाव ज्यादा और प्रभावशाली होता है ।

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