शब्द साहित्य एवं भावों का समागम है “कभी सोचा है” कविता संग्रह

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”

मन बड़ा प्रफुल्लित होता है जब किसी नए साहित्य को पढ़ने का अवसर प्राप्त होता है ! ६ मार्च की शाम जैसे ही दफ्तर से घर पहुंचा बंद लिफ़ाफ़े में एक पुस्तक प्राप्त हुई, जिज्ञासा वश बिना देर किये लिफाफा खोल कर देखा ! वैसे तो कोई भी साहित्यिक पुस्तक मेरे मन को हर्षित करने के लिए काफी होती है मगर यदि कोई रचना अपने किसी अज़ीज़ मित्र अथवा जानने वाले की हो तो मन में दुगुने प्रसन्नता के पुष्प खिल उठते हैं ! इस बार जो कविता संग्रह मेरे हांथो में थी उसके आवरण पृष्ठ पर कविता संग्रह का शीर्षक “कभी सोचा है” एवं इसकी लेखिका प्रज्ञा तिवारी का नाम ही मेरी जिज्ञासा को बढाने के लिए पर्याप्त था ! मैंने बिना अधिक समय लगाये शुरू कि आठ नौ कविताओं को पढ़ लिया ! सारी कवितायेँ कुछ जानी पहचानी सी जेहन में उतर कर ह्रदय को करीब से छूने लगी थी, लेकिन दिल पर जब हठात किसी एक कविता ने साम्राज्य बनाया तो वहां पर पाठक(अर्थात मै) को असहज होकर रुकना पड़ा ! कविता के स्वर जिन्दगी के तमाम उलझते कड़ियों को बड़ी शालीनता से बयाँ कर रहे थे! ये पंक्तिया मुझे इन किताबों के पन्नो के पार कहीं वीरान में ज़िंदगी के अनहद समंदर की तलाश करने को मजबूर कर रहीं थी————-

अफ़सानो के गिरेबां में झाकना

तो मुझे याद करना

दीवानों के काएअवान में झाकना

तो मुझे याद करना

परदों से खिड़कियों को

जो ढँक ना पाया

आँखों से आसुओं में

जो बरस ना पाया

हो सके तो उसके गुनाहों को

कभी माफ़ करना ……….मुझे याद करना !!!!

इमानदारी से लिखूं तो इस कविता ने ह्रदय को छू लिया और इसके शब्द मन के भाव बन कर पुरे जीवन को यादों से भिगोने को उत्सुक दिखने लगे थे ! साहित्य वृत्त में समाहित लेखनी की तमाम विधाओं की धनी आदरणीय प्रज्ञा तिवारी द्वारा रचित एक सौ सात कविताओं के इस संग्रह में वैसे तो सभी कवितायेँ उनके साहित्य कुशलता को पुष्ट करती हैं, परन्तु कुछ कवितायेँ ऐसी हैं जिन रचनाओ ने व्यक्तिगत तौर पर मुझे काफी प्रभावित किया है ! मेरी नज़र में मानव समाज में मनुष्यता के मूल्यों को समझते हुए मानव परिभाषा के आधुनिक यथार्थ का सही चित्रण वर्तमान मानव समाज के निहित लिखी गयीं इन पंक्तियों में देखने को मिल सकता है, और शायद वर्तमान मानव की सच्चाई के इर्द गिर्द इन पंक्तियों के भाव को रखने का सफल प्रयास कवियत्री द्वारा किया गया है …………………

चलते-चलते रुका बड़ा दरख़्त बन गया है आदमी

हंसते-हंसते बड़ा कमबख्त बन गया है आदमी !

इसे मत रोको, मत टोको, मुसाफिर है ये

सुनी पगडंडीयों पर चलते हुए बड़ा सख्त बन गया है आदमी !!!!!!

पगडंडीयों से होते हुए जैसे जैसे ये कृति अपने यौवन काल में पहुचती है तो कविता के स्वर कुछ ऐसे बदलते हैं जैसे यौवन की अगाध पीड़ा की चीख वेदना रूपी स्वर बन कर निकल रही हो ! अपने युग युगांतर से यादों को सहेजे हुए कविता का सहारा लेकर अपने यादों को दुनिया के तमाम सजीव निर्जीव तथ्यों से जोड़ कर कवियत्री ने “याद आते हो” कविता के माध्यम से अपनी भावना को यूँ बयाँ किया है—–

सागर किनारों की लहरे जब छूती हैं मुझे

तो तुम याद आते हो

डूबते सूरज के पीछे से झाकते हुए

धीरे से मुस्कराते हो

तुम याद आते हो !!!!!!

पड़ाव दर पड़ाव, कविता दर कविता यह संग्रह अपने निखार के चरमोत्कर्ष को प्राप्त होती है ! जीवन के तमाम छोटे बड़े पहलुओं को खुद में समाहित करती इन कविताओं में किसी भी साहित्यकार के उत्साह, वेदना, खुशी, पीड़ा को सहजता से देखा जा सकता है ! जीवन को साहित्य की कसौटी पर रख कर अपने शब्दों के माध्यम से प्रज्ञा जी ने जीवन का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है ! गरीब-अमीर, नौजवान-बुजुर्ग, पुरुष-महिला सबको करीब से पढ़ती उनकी कविताएं जीवन की सम्पूर्ण अभियक्ति को “कभी सोचा है ” के माध्यम से एक सूत्र में पिरोने का काम करती हैं ! पुरे कविता संग्रह की तमाम कवितायेँ जैसे शरणार्थी , मर्यादा, कभी सोचा है, बम, नन्ही हथेलियाँ, यार हवा, संतुष्टि ऐसी कवितायेँ हैं जो समाज पटल पर एक मृदुल चोट छोड़ जाती हैं !

अंत में मै उस परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि इस कविता संग्रह की लेखिका एवं मेरी आदरणीय प्रज्ञा जी इसी तरह से साहित्य की सेवा में सतत गतिशील एवं सफल रहें एवं जल्द ही उनके द्वारा रचित अन्य पुस्तकों को पढ़ने का अवसर प्राप्त हो ! अपनी मंद बुद्धि से इन रचनाओं को समझने का प्रयास किया हूँ किसी भी नासमझी के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ !

 

 

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