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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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बाबा रामदेव ने जब से राजनैतिक शुध्दिकरण अभियान का शंखनाद किया है एक राष्ट्रव्यापी बहस शुरू हो गई है। यह एक शुभ लक्षण है, प्रश्न से समाधन अथवा तर्क से निर्णय तक पहुँचने का। विगत 18 से 20 वर्ष के सामाजिक जीवन में श्रध्देय स्वामीजी महाराज ने लगभग 3 करोड़ लोगों को योग एवं राष्ट्रप्रेम की दीक्षा में दीक्षित किया तथा इन 3 करोड़ लोगों के साथ जुड़े लगभग 30 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष रूप से तथा टी.वी.व अन्य मीडिया के माध्यम से 100 करोड़ से अधिक लोगोंतक श्रध्देय स्वामीजी महाराज के संदेश पहुँचे हैं। भारत स्वाभिमान के गठन के मात्र ेक वर्ष में (रामनवमी 2009 से रामनवमी 2010) तक लगभग 2 लाख लोगों को श्रध्देय स्वामीजी महाराज ने ‘भारत स्वाभिमान’ के राष्ट्रनिर्माण के कार्य हेतु दीक्षित किया है।

भारत स्वाभिमान आंदोलन के इस व्यवस्था परिवर्तन के ऐलान से जहाँ करोड़ों देशवासियों के हृदय में एक नयी उम्मीद जगी है। वहीं सत्ता के शिखर पर बैठे या बैठने की जुगाड़ में लगे कुछ लोगों की यह अभियान, चिंता बढ़ा रहा है। इस पूरे आंदोलन को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस के दौरान देश के शीर्ष पत्रकारों द्वारा जो मुख्य प्रश्न सामने आए उनके संक्षिप्त समाधन पूज्य स्वामीजी की भाषा में यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रश्नः बाबा सत्ताओं के शिखर पर बैठी इन शक्तियों से आपको डर नहीं लगता?

उत्तरः मैंने स्वयं देश के लगभग 115 करोड़ भारतीयों के सुख, स्वास्थ्य, समृध्दि, सम्मान के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया। अब देश को यदि मेरी आवश्यकता होगी तो 115 करोड़ लोग मेरी रक्षा में खड़े होंगे। पतंजलि योगपीठ व आयुर्वेद की सेवा का यह मिशन भी आज करोड़ों लोगों की आस्था का केन्द्र बन चुका है। इसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता।

प्रश्नः आप मुनष्य को कौन सी चेतना या दुनिया में ले जाना चाहते हैं?

उत्तरः मनुष्य की चेतना, चरित्र, आचरण, ज्ञान या जीवन के चार स्तर हैं। असुरत्व, मनुष्यत्व, देवत्व और अति दैवी चेतना या जीवन मुक्त अवस्था। हम निम्न चेतना से उसे दैवी चेतना की ओर ले जाना चाहते हैं और यही हम सबकी आत्मा की पुकार है।

प्रश्नः आप श्रध्दा के शिखर पर बैठे हैं। अपना सब कुछ दाँव पर लगाना क्या समझदारी है?

उत्तरः मेरे अपने सम्मान, सुरक्षा, यश व प्रतिष्ठा आदि से मेरे राष्ट्र की सुरक्षा, सम्मान, यश, प्रतिष्ठा व राष्ट्र का गौरव अधिक महत्वपूर्ण है। इस तन पर मुझसे पहले इस वतन का अधिकार है।

प्रश्नः व्यक्तिवादी सोच में सोये व खोये हुए व्यक्ति को जो हर बात में देश, समाज से मुझे क्या लेना-देना की रट लगा रहा है, कैसे जगायेंगे उसे?

उत्तरः हम योग से उसकी चेतना या मैं का विस्तार करेंगे और वह व्यक्तिवादी चिन्तन से राष्ट्रवादी, मानवतावादी, अध्यात्मवादी व विकासवादी सोच को अवश्य स्वीकार करेगा।

प्रश्नः आपकी दोहरी भूमिका से बहुत से सवाल पैदा हो रहे हैं, क्या कहेंगे आप?

उत्तरः दोहरी भूमिका, जवाबदेही या जिम्मेदारी बहुत बड़े साहस का काम है। यदि मैं योगी व राजयोगी, योगगुरु व राजगुरु की भूमिका को ईमानदारी व जिम्मेदारी से निभाता हूँ तो इसमें प्रश्न का कोई स्थान है ही नहीं। प्रश्न दोहरी जिम्मेदारी पर नहीं, दोहरे चरित्र पर खड़े होते हैं।

प्रश्नः स्वामीजी राजनीति बहुत गंदी हो चुकी है। इसमें क्यों हाथ डाल रहे हैं?

उत्तरः गंदगी को साफ करने के लिए उसमें हाथ तो डालना ही पड़ेगा। मात्र मूक दर्शक बनकर बैठने सेबात नहीं बनेगी।

प्रश्नः राजनीति में जिम्मेदार व ईमानदार लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है।

उत्तरः या तो देश के संविधन व चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता में संशोधन कर दो और लिख दो कि चुनाव में लड़ने का अधिकार केवल भ्रष्ट व बेईमान व गैर जिम्मेदार, अपराधी लोगों को ही है और सत्ता में सत्य का स्थान नहीं है। यदि यह नहीं हो सकता तो फिर राजनीति में स्थान केवल ईमानदार व जिम्मेदार लोगों को ही होना चाहिए। हम हमारा यह मिशन अवश्य पूरा करेंगे।

प्रश्नः एक संन्यासी का ये राजनैतिक शुध्दिकरणका अभियान कितना उचित है?

उत्तरः महर्षि स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानन्द व श्री अरविन्द जैसे सब महान सन्त एक स्वर से कहते हैं- सत्ता, सम्पत्ति व व्यवस्थाओं पर ईमानदार, जिम्मेदार व सात्विक लोगों का ही अधिकार होना चाहिए। गलत लोगों की हाथों में सत्ता, शक्ति व सम्पत्ति होने पर सदा उसका दुरूपयोग हुआ है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-‘हे अर्जुन! इस त्रिलोक में मेरे लिए कुछ पाना या करना शेष नहीं है फिर भी मैं अपना दायित्व निभा रहा हूँ। सत्य की प्रतिष्ठापना, सज्जनों की रक्षा व दुष्टों का विनाश यह मेरा धर्म है। अतः यदि संन्यासी ही शुध्दिकरणनहीं करेंगे तो और करेगा कौन?

प्रश्नः बहुत से साधु-संन्यासी व बाबा आपकी इस पहल की आलोचना भी कर रहे हैं, क्या कहेंगे?

उत्तरः न किसी की आलोचना, न अपनी किसी से तुलना। वर्तमान में भी सभी राष्ट्रवादी व अध्यात्मवादी सन्त पूरी तरह हमारे साथ हैं। हम सब सन्तों का सम्मान करते हैं। परन्तु देश, धर्म व अध्यात्म के बारे में हम अपना आदर्श महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद व श्री अरविन्द आदि महापुरुषों को ही मानते हैं। सन्तों के अलावा शहीदे आजम भगत सिंह, आजाद, बिस्मिल व पूज्य बापू आदि भी हमारे आदर्श पुरुष हैं।

प्रश्नः बहुत से आपके प्रशंसक, आलोचक, बुध्दिजीवी व प्रबुध्द लेखकों का प्रश्न है कि ईमानदार आदमी स्वामीजी कहाँ से लायेंगे?

उत्तरः हमारे देश में 99 प्रतिशत लोग ईमानदार ही हैं। कुटिल तन्त्र, भ्रष्ट व्यवस्था व भ्रष्टाचार ने आम आदमीको बेईमान बनने के लिए मजबूर किया हुआ है। अतः कमी ईमानदार लोगों की है ही नहीं। अव्वलदर्जे के बेईमान तो मात्र 1प्रतिशत लोग ही हैं। इन्होंने पूरे देश के 99 प्रतिशत लोगों के जीवन को व राष्ट्र को नर्क बनाया हुआ है। इन्हीं को बेनकाब करना है।

प्रश्नः क्या आप सफल हो पायेंगे? बहुत चुनौतियों, संकट और हर कदम पर समस्याएँ हैं।

उत्तरः जब मैं घर से योगी बनने के लिए निकला था तब अकेला था। न मेरे साथ कोई उपनाम था, न कोई आश्रय, न राजाश्रय था। जाति व मजहब को मैंने आगे बढ़ने के लिए सीढ़ी नहीं बनाया था।

सत्य, ईमानदारी, संकल्प व आत्मबल के साथ मैं आगे बढ़ा। अपने कर्म को अपना धर्म मानकरनिःस्वार्थ भाव से मानव मात्र की सेवा की और करोड़ों लोगों का मैंने सेवा व सत्य से विश्वास अर्जित किया। आज जब मैं इस नए आंदोलन के द्वारा भारत को विश्व की महाशक्ति बनाने निकला हूँ, अब तो करोड़ों लोग मेरे साथ हैं। वो मेरे हाथ हैं। अब तो असफलता का प्रश्न ही नहीं है।

भगवान श्री राम व योगेश्वर जब रावण व कंसादि असुरों से युध्द कर रहे थे तो किसी ने भी उनके विजय की कल्पना नहीं की थी, परन्तु अन्ततः सत्य विजयी हुआ। जिन अंग्रेजों के साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था, उनको परास्त करने की बात भी कोई नहीं सोच सकता था लेकिन क्रान्तिकारियों के प्रचण्ड आंदोलन व बापू के सत्याग्रह व आंदोलनों ने अंग्रेजों की पराधीनता से देश को मुक्त कराया।इस आंदोलन में भी ऐसा ही होगा असुरत्व पराजित होगा तथा देवत्व विजयी होगा।

प्रश्नः राजनीति विशुध्द रूप से वोटों का खेल बन चुकी है और भ्रष्ट व कुटिल राजनीतिक नेताओं ने देश की जनता या वोटों को जाति, मजहब, प्रान्त व भाषाओं में बाँट दिया है। ऐसे में क्या करेंगे आप?

उत्तरः देश भर में 50 से 60 प्रतिशत जो लोग इसलिए वोट नहीं करते थे कि किसको वोट करें? सभी भ्रष्ट हैं, कोई कम कोई ज्यादा। हम उनको अपने साथ जोड़ेंगे तथा भ्रष्टाचार व गरीबी मुक्त भारत बनाने के संकल्प के साथ एक जिले में हम 5 से 10 लाख ‘भारत स्वाभिमान’ के सदस्य बना रहे हैं तथा इनको रोग व नशा मुक्त करके आत्मनिर्माण व राष्ट्र निर्माण के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं। ये सदस्य हमारे मूल वोट बैंक होंगे जिसमें सब जाति, मजहब, प्रान्त व भाषा-भाषी सम्मिलित होंगे। जाति, प्रान्त, मजहब व अन्य सब संकीर्णता की दीवारों से परे जाकर देशवासियों ने मुझसे प्रेम किया है।

देश के लोगों के सामने आदर्श विकल्प नहीं था। हम एक सशक्त व श्रेष्ठ विकल्प देंगे। देश सदा ही राम व कृष्ण अर्थात् सत्य के साथ बड़ा हुआ है। रावण, कंस अथवा झूठ के साथ नहीं। हर इंसान की आत्मा के भीतर सत्य की पुकार है। उसके सामने जब दो विकल्प होते हैं तो वह सत्य, ईमानदारी, सदाचार, संस्कृति, धर्म व अध्यात्म को ही चुनता है या स्वीकार करता है।

प्रश्नः टाइम्स यू.के. एक वरिष्ठ विदेशी पत्रकार ने पूछा कि 1991 से पहले तो भारत पूर्णतः स्वदेशी के रास्ते पर था तब विकास क्यों नहीं हुआ?

उत्तरः एक तो सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आजादी की पूर्व संध्या से पहले तो ट्रांसफर ऑफ पावर एग्रीमेंट का षड्यंत्र व उसके बाद अंग्रेजी सरकार की तरह ही लोकतन्त्रा को लूटतन्त्रा का रूप दे दिया गया। बस अन्तर केवल इतना था कि पहले तो विदेशी लोग लूटते थे, अब अपने ही वतन के अंग्रेजों के मानस पुत्र देश को लूटने लगे। अर्थात् भ्रष्टाचार देश के विकास की सबसे बड़ी बाध बना है। विकास का 80 से 90 प्रतिशत धन व संसाधन शासकों ने हेरापफेरी करके लूटा तथा उस समय तक भारत में तकनीकी प्रतिभा, पूंजी व अन्य पेशेवर लोगों की कमी थी। आज तो मानव संसाधन, प्रतिभा, पूंजी व तकनीकी आदि किसी भी बात की हमारे यहाँ कमी नहीं है। अतः प्रथम हम भारत को स्वदेशी से स्वावलम्बी बनायेंगे और बाद में जब भारत समृद्ध बन जायेगा तो विश्व की पूंजी भी हमारी ताकत बनेगी, कमजोरी नहीं। विदेशी पूंजी निवेश गरीब देश को और अधिक गरीब बनाता है तथा ताकतवर देश को और अधिक शक्तिशाली बनाता है।

प्रश्नः पूरे विश्व में वैश्वीकरण व उदारीकरण की बात हो रही है, आप स्वदेशीकरण की बात कर रहे हैं। तर्क, विज्ञान व विकास की दृष्टि में आपका पक्ष कितना सबल है?

उत्तरः मैं तकनीकी का विरोधी नहीं हूँ। मैं अपने देश की पूंजी, प्रतिभा व विश्व की उच्चतम एवं आधुनिकतम तकनीकी का प्रयोग करके देश का उत्पादन बढ़ाकर, निर्यात बढ़ाकर इस वैश्वीकरण व उदारीकरण को अपनी ताकत बनाना चाहता हूँ। इस उदारीकरण व वैश्वीकरण को हम अपनी कमजोरी नहीं बनाना चाहते। अपने देश की लगभग 300 लाख करोड़ की पूंजी जो विदेशी बैंकों व देश में काले धन के रूप में जमा है वह यदि विकास में लगती है तो विदेशी पूंजी निवेश की आवश्यकता कहाँ है हमें। विदेशी कंपनियों को भी हमारे ही देश के लोग चलाते हैं तो देश में प्रतिभा की भी कमी नहीं और तकनीकी जहाँ से भी हमें मिले उसका मूल्य चुकाकर उसे लेना ही चाहिए। एक वास्तविकता और भी है कि आज पूरे विश्व में अमेरिका के नासा के वैज्ञानिक, वहाँ के डॉक्टर्स, आई.टी. इंजीनियर्स से लेकर होटलादि उद्योगों में 30 प्रतिशत से अधिक विशुध्द रूप से भारतीयों का ही योगदान है।

प्रश्नः क्या आप वोट के लिए ही काम करेंगे?

उत्तरः वोट का काम तो 5 वर्षों में एक दिन होता है। हमारे आंदोलन का मुख्य ध्येय रोग, नशा व अन्य सामाजिक बुराईयों से मुक्त सामाजिक व आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत समाज का निर्माण करना है और देश की सत्ता, सम्पत्ति, संसाध्नों व व्यवस्थाओं पर जब सत्य का साम्राज्य होगा तो देश में गरीबी, भूख, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी व नक्सलवाद आदि समस्याएँ खत्म होंगी तथा मूलभूत विकास का समस्त ढाँचा खड़ा होने से पूरा देश सर्वांगीण रूप से विकसित होगा तथा विश्व की महाशक्ति के रूप में भारत का उदय होगा।

प्रश्नः राजनीति शब्द से लोगों को घृणा क्यों हुई? हर गलत कार्य के लिए लोग कहते हुए नजर आते हैं कि भाई राजनीति मत करो। यह बहुत राजनीति करता है। हर गलत कार्य को राजनीति क्यों कहा जाने लगा है?

उत्तरः राजनेताओं के गलत आचरण से राजनीति शब्द बदनाम हुआ है।

प्रश्नः आपका ध्येय बहुत पवित्र होने के बावजूद विरोध् के स्वर क्यों उठते हैं?

उत्तरः मैं विरोध् का मुख्य तीन कारण मानता हूँ। एक मुठ्ठी भर चन्द, भ्रष्ट, बेईमानी व कुटिल राजनेता जिनका देश की सत्ता, सम्पत्ति एवं सम्पूर्ण संसाध्नों पर निरंकुश एकाधिकार व पूरा नियन्त्राण है तथा कानून की असीम शक्ति जिनके पास है और उन्होंने यह मान लिया है कि इस पर तो उनका हीएकमात्र अधिकार है। ये सब उनको छिनता हुआ दिखता है, तो वे सब बुरी तरह घायल नाग की तरह पगला कर विरोध् कर रहे हैं। देश की 99प्रतिशत से भी अधिक जनता हमारे साथ है। दूसरा बहुराष्ट्रीय कंपनियां तथा कुछ दुनियाँ के ताकतवर देश जो भारत को दुनियाँ का सबसे बड़े बाजार के रूप में देखते हैं और भारत के कुछ भ्रष्ट नेता जो इन विदेशी कंपनियों के एजेन्ट की तरह कार्य कर रहे हैं वे सब अपने-अपने स्वार्थों के कारण केवल विरोध् ही नहीं अपितु बड़ा षड्यन्त्र या साजिश भी कर सकते हैं।

तीसरा कुछ लोग विरोध् नहीं कर रहे हैं, वे डरे सहमे हुए हैं। उनके मन में एक काल्पनिक निराशा व अविश्वास के कारण बैठा हुआ डर है कि ये कुछ भ्रष्ट नेता नीचता या गिरावट की किसी भी हद तक जाकर हमारे स्वामीजी को या उनके जीवन के अस्तित्व को खत्म कर सकते हैं। इसलिए वे श्रध्दा विश्वास व प्रेम की डोर में बंधे हुए कह रहे हैं कि बाबा राजनीति बहुत गंदी है। इसको साफ करने का जोखिम मत उठाओ-जैसे हमारे हितचिन्तक, माता-पिता, गुरुजन या हमारे प्रियजन हमें कभी भी जोखिम या खतरे के बीच नहीं देखना चाहते लेकिन इस देवासुर संग्राम में लड़ना व विजयी होने को मैं अपना दायित्व, कर्त्तव्य व धर्म मानता हूँ। मेरे लिए योगधर्म व राष्ट्रधर्म दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण ही नहीं अपितु सब धर्मों में राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है तथा हितों में राष्ट्रहित, प्रेम में राष्ट्रप्रेम एवं भक्ति में राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि है।

www.bharatswabhimantrust.org से साभार

5 Responses to “अब तो धर्मयुध्द का शंखनाद हो चुका हैः बाबा रामदेव”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में १९७२-७३ में क्रांति शुरू हुई थी,जिसकी परिणति आपातकाल और उसके बाद जनता पार्टी के उदय और उसके द्वारा सत्ता संभालने में हुई.उसके बाद क्या हुआ यह तो आज इतिहास बन चुका है.जय प्रकाश जी ने भी संपूर्ण क्रांति का आह्वान भ्रष्टाचार के ही विरुद्ध किया था.बावा राम देव ने भी कुछ उसी तरह का करने की ठानी हैं. जय प्रकाश जी के तरह ही बावा राम देव भी अधिकतर भारतीयों को ईमानदार मानते हैं,पर वास्तविकता यह नहीं.हम भारतीय मूलतः बेईमान हैं.अतः बावा राम देव को भी जय प्रकाश जी की तरह असफल होने की संभावना अधिक है. .फिर भी प्रयोग करने में कोई हानि नहीं.बावा को भी असलियत का ज्ञान हो जाएगा.बावा अगर सफल हो गए तो भारत का तो काया पलट हो जायेगा.आइये हम सब बावा की सफलता की कामना करे और इस अभियान में इमानदारी(?) से उनका साथ दे.

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  2. himwant

    भारतीय परम्परा के ईतिहास मे हम राजा को संत बनते देखते आए है. लेकिन यह पहली बार हो रहा है की एक संत राजा बनने की तैयारी कर रहे हैं. भारत के लिए यह प्रयोग नया है. लेकिन जब सभी राजा असफल सिद्ध हो चुके है तो इस प्रयोग को सम्पन्न करेन का साहस अवश्य करना चाहिए.

    वैसे विगत मे अध्यात्म समाज परिवर्तन का ज्यादा सशक्त माध्यम था. लेकिन आज के दौर मे राजनीति समाजिक परिवर्तन की ज्यादा सशक्त संवाहक बन चुकी है. तो फिर धाराए तो उल्टी जानी ही होगी. परमात्मा बाबा रामदेव को सफलता दें. भारतवर्ष की जय हो !!!!!!

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  3. varun jha

    बाबा रामदेव ने एक और बात कही है। कालेधन के सच को बाहर लाने उन्होंने कुछ प्रमुख राजनेताओं एवं मंत्रियों का नारको टेस्ट कराने का सुझाव दिया है। इस सुझाव को भाजपा ने हाथोंहाथ लपकते हुए प्रधानमन्त्री एवं मुख्यमंत्रियों को भी नारको टेस्ट के दायरे में रखे जाने की वकालत की है। भाजपा का यह सुझाव सस्ती राजनीति से प्रेरित है और बचकाना भी है। प्रधानमन्त्री जैसे उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों के लिए नारको टेस्ट की वकालत करना उनका ही नहीं, देश का अपमान करना है। अगर अविश्वास की खाई इतनी गहरी है तो देश के जनता यकीन किस पर करें?यदि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था जीवित हैं तो उसकी बडी वजह विश्वास और ईमानदारी है। कुछ बेईमान मिलकर पूरे देश को बेईमान नहीं ठहरा सकते। इसलिए केवल राजनेताओं को कोसना उचित नहीं है। बेहतर तो यही है, ऐसा कोई सुझाव देने के पूर्व बाबा रामदेव स्वयं को नारको टेस्ट के लिए पेश करते। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि उन्होंने योग को नया बाजार दिया जिसका विराट स्वरूप हरिद्वार में नजर आता है। यह बात भी सभी जानते हैं कि स्वयं को अतिसाधारण एवं जनसेवक बताने वाले बाबा के अधिकांश कार्यक्रम पूंजीपतियों द्वारा प्रायोजित रहते है।
    योग गुरू बाबा रामदेव महंगाई, भ्रष्टाचार एवं कालेधन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान चला रहे हैं। 7 फरवरी से उन्होंने पदयात्रा अभियान की शुरुआत की है। वे अपने अभियान के तहत 5॰ करोड लोगों का हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन 29 मार्च को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री को सौंपेंगे। बाबा ने ऐसे मुद्दों को हाथ में लिया जो जनता से जुडे हैं। भ्रष्टाचार एवं काले धन के खिलाफ जनजागरण का अभियान यदि सही दिशा में चले तो बेहतर है लेकिन इसके भटकने एवं बीच में ही ध्वस्त होने की आशंका ज्यादा प्रबल है। दरअसल बाबा के इस अभियान के पीछे राजनीतिक उद्देश्य निहित हैं। वैसे भी रामदेव अगले आम चुनाव में अपने संगठन को मैदान में उतारने का इरादा रखते हैं। इसकी उन्होंने विधिवत घोषणा भी की है। इसका अर्थ है वे इन मुद्दों को जनता के बीच ले जाकर कांग्रेस, भाजपा एवं अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के बीच अपने संगठन के लिए जगह बनाना चाहते हैं। वे इसमें कितने कामयाब होंगे, कहा नहीं जा सकता क्योकि देश की प्रायः सभी पार्टियां वर्षों की तपस्या के बावजूद अपने-अपने राज्यों से बाहर नहीं निकल पाई हैं। बाबा रामदेव ने योग में जरूर चमत्कार दिखाया है लेकिन यह कोई जरूरी नहीं है कि वे राजनीति में भी ऐसा चमत्कार कर पाएंगे। दरअसल वे योग के माध्यम से प्राप्त राष्टीय ख्याति को राजनीति में भुनाना चाहते हैं। फिर भी उनकी कोशिश यकीनन समाज की बेहतरी के लिए है। इस अर्थ में उनके अभियान का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन उन्होंने कुछ ऐसी बातें कही हैं जिन पर बहस की जा सकती है। मसलन उन्होंने कहा है कि यदि सरकार ने विदेशी बैंकों में जमा अकूत काला धन देश में वापस लाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार, महंगाई और खनिजों के अवैध खनन के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की तो उनके नेतृत्व में लाखों लोग मिस्त्र् की तरह सडकों पर उतरकर आंदोलन करेंगे। इस बयान के संदर्भ में बाबा रामदेव से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि मिस्त्र् की तरह आंदोलन का क्या अर्थ है? क्या भारत में किसी तानाशाह की सरकार है? क्या यहां मिस्त्र् की तरह आपातकाल लागू है? क्या देश में नागरिक अधिकारों को कुचला जा रहा है? क्या भ्रष्टाचार, बेरोजगारी एवं महंगाई की समस्या इतनी भीषण है कि लोग गुस्से में हैं तथा कानून-व्यवस्था हाथ में ले रहे हैं? क्या पूरे देश में अराजकता का माहौल है तथा संसद मूकदर्शक बनी हुई है? अगर ऐसा नहीं है तो मिस्त्र् की जनक्रांति का उदाहरण देने का क्या अर्थ है? मिस्त्र् में नागरिक अधिकारों को कुचला जा रहा है, वहां हुस्नी मुबारक 30 वर्षों से गद्दी पर बैठ हुए हैं, वहां बेरोजगारी, भ्रष्टाचार एवं महंगाई की वजह से लोगों का जीना मुहाल हो गया है, जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने बेताब नजर आया तब वहां जनता सडकों पर उतर आई. इससे स्पष्ट है मिस्त्र् में शांतिपूर्ण जनक्रांति के पीछे कारण कुछ और हैं। लेकिन भारत में तो लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था है। आजादी के बाद लोकतंत्र की जडें और भी मजबूत हुई हैं। जिस महंगाई, काले धन एवं भ्रष्टाचार के लिए रामदेव जनक्रांति का सपना देख रहे हैं, वह पूरे विश्व की समस्या है। अमेरिका सहित सभी छोटे-बडे देश इससे जूझ् रहे हैं। यद्यपि विश्व के देशों का हवाला देकर भारत अपनी कमजोरी को छिपा नहीं सकता पर इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि केन्द्र एवं राज्य सरकारें इन समस्याओं पर नियंत्रण पाने के लिए प्रभावी कदम उठा रही हैं अथवा नहीं? केन्द्र सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श हाउसिंग सोसाय्ाटी, कामनवेल्थ गेम्स जैसे बडे घोटालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामले में भी सरकार ने कदम उठाए हैं तथा महंगाई को कम करने के उपायों पर भी केन्द्र एवं राज्य् सरकारें कदम उठा रही हैं। यह अवश्य है कि इन मुद्दों पर जनता एवं जनप्रतिनिधियों का दबाव बना रहेगा तो सरकार ढिलाई नहीं बरत पाएगी। इसलिए बाबा रामदेव को मिस्त्र् की जनता की तरह सोचने एवं पहल करने की जरूरत नहीं है अलबत्ता सरकार पर नैतिक दबाव बनाने के अन्य उपायों पर अवश्य विचार करना चाहिए।

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  4. abhishek1502

    ये बाबा तो दुष्टों और भ्रष्टाचारियो की लुटिया डुबो कर मानेगा

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  5. प्रेम सिल्ही

    जवाहरलाल नेहरु के प्रयोगात्मक समाजवाद से उत्पन्न अभाव से बचने के लिए तथाकथित स्वतन्त्र भारत की पहली पढ़ी-लिखी पेशेवर युवा पीढ़ी ने १९७० दशक से भारत छोड़ अमरीका और दूसरे पाश्चिम देशों में जा बसने का जो बीज बोया था वह वास्तविकता में उनकी संपूर्ण आज़ादी थी—अंग्रेजों द्वारा बनाये कानूनी चक्रव्यूह से और समाजवाद से| तभी से विदेश में जा बसने का जैसे तांता ही लग चुका है| समय बीतते एक ही राजनीतिक वर्ग को भारत में शासन की बागडोर संभाले जैसे दीमक लग गया है तथा फलस्वरूप वह देश को अंदर से खोखला कीये दे रही है|

    स्वतंत्रता के तिरेसठ वर्षों में भारतीयों कि दशा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है| यदि कुछ परिवर्तन देखने में आये हैं तो बढ़ती जनसँख्या के कारण उनका लाभ समस्त देशवासियों तक नहीं पहुँच पाया है| जब कि दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात योरूप व उत्तरी अमरीका में वहां के नेताओं ने प्रगतिशील कार्य-क्रमों द्वारा अपने देशवासियों के जीवन को तुरंत सुखमयी बनाया है, अपने भारत में जीवन की साधारण आवश्यकताएं भी दुर्लभ हैं| भारतीय नागरिक के देश और देशवासियों के प्रति कर्तव्य या उसके अधिकारों की समाज में कोई चर्चा नहीं की जाती| भारतीयों में राष्ट्र-वाद लोप हो गया है| स्वतन्त्र भारत में साम्प्रदायिक दंगे देश में विदेशी राज की याद दिलाते हैं| प्रजा को कमजोर बनाए रखने में विदेशी सत्ता को सदैव लाभ हुआ है| लेकिन स्वतंत्र भारत में देश-निर्माण से बढ़ कर और कौन विषय हो सकता है? इस राजनीतिक वर्ग ने सत्ता में बने रहने के उद्देश्य से भारतीय राजनीति व अधिकाँश जन-समूह को ही भ्रष्ट कर दिया है| पिछले तिरेसठ वर्षों से सभी प्रकार के राजनीतिक वर्ग और उनके नेता भारत को निजी अखाड़ा बनाए सर्व-व्यापी भ्रष्टाचार और अनैतिकता के वातावरण में फल फूल रहे है| क्या वास्तव में भारत स्वंतंत्र है? प्रवकता.कॉम के इन्हीं पन्नों पर लिमटी खरे द्वारा प्रस्तुत लेख, भारत की यह मजबूरी है, भ्रष्टाचार जरूरी है, बाबा रामदेव का भारत पुनर्निर्माण के लिए रण-नाद की आवश्यकता की मांग है|

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