लेखक परिचय

अभिषेक कांत पांडेय

अभिषेक कांत पांडेय

पत्रकार एवं टिप्पणीकार शिक्षा— पत्रकारिता से परास्नातक एवं शिक्षा में स्नातक की डिग्री

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अभिषेक कांत पांडेय

एक सपना अपना भी स्विस बैंक में हो खाता अपना, बस 5०० रूपये से ही खुल जाए तो अच्छा है कम से कम हम भी सीना तान कहेंगे, स्विस बैंक में ईमानदारी की कमाई से 5०० का खाता है। क्या ये सपना पूरा हो सकता है? विदेशों जमा काला धन भारत आ जाए और उसमें से हम भारतीयों को दो-चार लाख मिल जाएगा तब हम सवा सौ करोड़ भारतीयों का खाता स्विस बैंक में खुलवा सकते हैं। सरकार को परिमिशन देना चाहिए, चाहे तो स्विस बैंक ऐसी काली कमाई वाले पैसे को हम भारतीयों में बकायदा बांटकर एक पुण्य का काम कर ले, यहां आकर संगम में डूबकी लगाकर सारे पापों से मुक्त हो जाए।

काला धन कैसे बनता है, काली सोच जब इधर से उधर करने और लोगों का हक मारकर पैसे तिजोरी में रखना। बिल्कुल 6० के दशक वाले किसी फिल्म के किरदार वाला जमींदार शोषण करके किसानों, गरीबों का पैसा अपनी तिजोरी में रखता था। डाकू जो गरीबों का रहनुमा था, वह इन जनता को लूटने वाले जमींदारों जैसे धनी लोगों के घर पर डाका डालता और सारा काला धन बिना किसी हंगामे के अपने कब्जे में ले लेता और फिर उसे गरीबों में बांट देता था। इस तरह काली कमाई वाले ऐसे धनी लोग डाकूओं से डरते थे लेकिन आज तो स्विस बैंक जैसे बैंक में बकायदा काली कमाई को रखकर काला धन कमाने वाले लोग चैन की नींद सो रहे हैं। इनमें से कुछ पैसा कमीशन पर दे​ दिया जाता था-नजराना कि काला धन पर कोई कार्यवाई नहीं हो। इसके लिए राजनीतिक पार्टियों को चंदे के तौर पर धन मुहइया हो जा​ता था। 2० साल से यह मुद्दा नहीं उठा, तो उठने लायक आवाज को दबा दिया जाता था।

अब जब से अखबार में यह पता चला कि विदेशों में जमा काला धन भारत आएगा तो भारत का हर नागरिक को लाखों रुपये मिलेंगे। आठवां अश्चर्य अब तक लग रहा था लेकिन अब तो कालेधन वाले बच नहीं पाएंगे। सच में काला धन आएगा तो खुशहाली आएगी, घी के दीपक जलेंगे। अखबारों में तो यही है। ये लेख लिखते-लिखते न जाने इस देश में कितने लोगों ने काली कमाई अब तक कर ली होगी। त्योहारों में खरीदारी के समय पक्का रसीद मांगने पर दूकानदार झल्ला जाता, आखिर उसे टेक्स का हिसाब देना पड़ता और फिर कैसे होती काली कमाई, तो पकड़ा दिया खाली थैला और कहा रसीद लेनी है पक्की तो कोई और दूकान जाओं, समय न बर्बाद करो। जैसे-तैसे खरीदारी की। वहीं किसी की काली कमाई में इजाफा हुआ। ​मुझे सारा अर्थशास्त्र छोटे-छोटे काला धन से समझ में आ रहा था। कोई पक्की रसीद देने को तैयार नहीं था, भाई मांगने पर भी तो मिल नहीं रहा था। काली कमाई से अपनी झोली भरने वाले धड़धड़ाधड़ खरीदारी कर रहे थे, जैसे उन्हें जरूरत नहीं मोल-भाव रसीद वसीद की।

काला मन तो तेरा काला धन, महंगे स्कूल, महंगी चिकित्सा, महंगी शादी, मंहगे घर-कार और मंहगे अंदाज इन सबकों को पाने के लिए करना पड़ता है- पैसें को काला। टैक्स दे देंगे तो कैसे महंगा जीवन जी पाएंगे। ऐसे लोग एक्सपर्ट है, कोई काम बिना फाइल पर धन रखे बिना थोड़े करेंगे सरकारी बाबू सोच लेता है, हमें तो भी महंगा जीवन जीना है, क्या पता अपना काम हमसे कराने वाला भी तो काली कमाई करता होगा। क्यों छोड़ दे काली कमाई का मौका ज्यादा हो जाएगा तो स्वीस बैंक में खाता खुलवा लेंगे। यही ब्रह्म वाक्य के साथ कुछ लोग काली कमाई में संलग्न हैं।

वैसे जब भी भारत के सड़कों और रेलवे स्टेशन के पास उन झुग्गी झोपड़ी में झांकर देखता हूं तो आंसू सरक जाता है आंखो से। बच्चों के तन पर नाम मात्र का कपड़ा और उनकी पसलियां बताती है। भारत का पैसा विदेशों में नहीं देश में होना चाहिए। इनका पैसा इनके विकास में लगना चाहिए। चंद लोगों की काली कमाई ने 99 प्रतिशत जनता के हक को छीना है और देश की राजनीतिक पार्टियां केवल अब तक राजनीति कर रही है। करोड़ों लोगों के सर पर छत नहीं, गरीब माता-पिता के बच्चे के पेट में दो वक्त का भोजन नहीं, कपड़े नहीं, स्कूल नहीं जाता उनका बचपन, सड़कों के किनारे दो वक्त की रोटी के लिए हाथ फैलाता, बदहाल जीवन इन बच्चों में देखकर कोई तरस खाकर चंद सिक्के देने वाला दया कर, अपना धर्म दान-पुण्य समझता है, चाहे जितना काला धन वह सहेज ही रहा हो। देश का करोड़ों रुपये काली कमाई में तब्दील इस देश से बाहर किसी देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनता है। हम देखते हैं खाली पेट, खुली आंखों से सपना कब आएगा भारत में काला धन।

One Response to “खाली पेट का सपना, कब आयेगा कालाधन”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    स्विस बॅंक के निवेश से स्विट्झरलैण्ड की समृद्धि होती है।
    ऐसे ही और भी दो देश हैं; जिनका पहले १० समृद्ध देशों में बना रहना, जूआघरों के और कालेधन के निवेश पर चलता है। मकाऊ काला धन सफेद करने कसिनो चलाता है। प्रति व्यक्ति G D P P – १४६००० डॉलर है।
    अन्य देश पेट्रोल के कारण इन १० देशों में सम्मिलित है।
    मात्र जापान, सिंगापूर, और हॉन्ग कॉन्ग ही नैतिक मार्गों से समृद्धि करते हैं।
    स्विट्जर्लॅण्ड अपनी समृद्धि को त्यजकर सहकार करने की अपेक्षा नहीं करता।नैतिकता का नाटक करेगा। जो अकाउण्ट की जानकारी देगा, उसमें कुछ होनेकी अपेक्षा करना मुझे तर्क संगत नहीं लगता।

    फिर पता नहीं, उसकी नैतिकता जागे और कुछ कर दें।

    लक्सेमबर्ग और स्विट्ज़रलॅण्ड की आर्थिक समृद्धि ही ऐसे काले निवेश से चलती है।
    अकाउण्ट नम्बर मिलेंगे–उनमें नगण्य धन होगा। कभी का पैसा निकल कर बनाना रिपब्लिक देशो में पहुंच गया होगा। जब पाकिस्तान से दाऊद को हम ला नहीं सकते; स्विट्ज़रलॅण्ड तो दूर की बात है। कुछ सभ्यता का नाटक अवश्य देखने मिलेगा।
    मैं गलत प्रमाणित होना ही चाहता हूँ।
    वंदे मातरम।

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