हमारी ऋषिकेश यात्रा और वहां गंगा आरती के अनुभव

ganga-aartiमनमोहन कुमार आर्य

आज हमने अपने परिवार के कुछ सदस्यों, पत्नी और छोटे पुत्र के साथ ऋषिकेश की यात्रा की। लगभग दो बजे हम ऋषिकेष पहुंचे और वहां स्वर्गाश्रम और परमार्थ निकेतन नामी पौराणिक संस्थाओं के सम्मुख विस्तृत चैड़ाई लिए हुए गंगा नदी के इस ओर के किनारे से नाव पर सवार होकर स्वार्गाश्रम के सम्मुख पहुंच गये। वहां से हम अपनी अपनी पुत्री के बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, की स्वर्गाश्रम शाखा में पहुंचे। पुत्री से मिलकर चायपान कर हम ऋषिकेश से लगभग 10 किमी. दूर शिवपुरी स्थान पर गये जहां नीलकण्ठ आदि अनेक प्रसिद्ध पौराणिक स्थानों के लिए मार्ग जाता है और यह स्थान ऋशिकेश से लगभग 10 किमी. दूरी पर हैं। शिवपुरी के एक जलपान गृह में चाय पीकर हमने परिवार सहित ऊंचे ऊंचे पर्वतों, वनों और गंगा नदी के सौन्दर्य का अवलोकन किया। वहां राफटिंग कर रहे लोगों की अनेक नावों को देखा जिससे दृश्य काफी मनमोहक प्रतीत हो रहा था। लगभग पांच बजे का समय हो गया था।  यहां से हम परमार्थ निकेतन के लिए चले जहां हमने परमार्थ निकेतन के सामने जीवन में पहली बार प्रतिदिन की जाने वाली गंगा आरती में सम्मिलित हुए। हमने आर्यसमाजी पत्रों में वर्षों पहले पढ़ा था कि प्रसिद्ध लेखक सरदार खुशवन्त सिंह भी हरिद्वार की गंगा आरती को पसन्द करते थे। वह प्रायः वर्ष में एक बार वहां आते थे और आरती आरम्भ होने से बहुत पहले ही एक सुविधाजनक स्थान पर अपना आसन जमा लेते थे। उनसे गंगा आरती की प्रशंसा सुन कर हमें भी उसे देखने की प्रेरणा मिली थी।  आज हमें अवसर मिला, इससे पूर्व हमने हरिद्वार की गंगा आरती प्रायः टीवी पर ही देखी है और ऋषिकेश के बारे मे सुनते थे कि वहां भी वैसी ही आरती होती है। वर्षों पूर्व विख्यात प्रवर आर्य विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय ने भी आर्यजगत में अपने एक लेख में हरिद्वार की गंगा आरती का उल्लेख कर उसका विवरण दिया था और वहां विशाल जनसमूह की उपस्थिति में श्रद्धापूर्ण वातावरण में उस पौराणिक कृत्य गंगा आरती की अनुभूतियों का उल्लेख किया था। आज हमें ऋषिकेश में कुछ वैसा ही अवसर प्राप्त हुआ तो हमने उसे देखने का मन बनाया।

 

हम शीघ्र परमार्थ निकेतन के आरती स्थल पर पहुंचे। सायं 5.15 का समय था। कार्यक्रम का शुभारम्भ हो चुका था। गंगा के तट पर बने एक घाट पर लौह धातु के एक बड़े यज्ञकुण्ड में हवन किया जा रहा था इसके इर्द गिर्द यजमान बैठे थे। निकट ही बड़ी संख्या में अनेक विदेशी स्त्री-पुरुषों, जिसमें अधिकांश युवा थे, आरती व यज्ञ में उपस्थित थे। चारों ओर सैकड़ों की संख्या में अन्य भारतीय स्त्री-पुरुष भी उपस्थित थे। सूर्यास्त का समय होने को था। यज्ञ के मन्त्रों की स्पष्ट ध्वनि सुनाई नहीं दे रही थी जिसका कारण था कि वहां ध्वनि विस्तारक यन्त्र की तेज ध्वनि पर कोई कैसट व सीडी बज रही थी जिसमें किसी पौराणिक ग्रन्थ, हो सकता है कि किसी पुराण आदि का पाठ हो, संस्कृत में पाठ हो रहा था। यज्ञ की समाप्ती के बाद पौराणिक भजन हुए। एक पौराणिक भजन था ‘गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा कृष्ण हरि गोविन्द बोलो’ इसके बाद ‘हनुमान चालिसा’ का ध्वनि विस्तारक यन्त्र पर पाठ किया गया। सभी देशी व विदेशी भक्तगण आंखे बन्द कर धीरे धीरे हाथ से भजन के अनुरुप श्रद्धापूर्वक तालियां बजा रहे थे। इसके बाद ‘हरे रामा हरे कृष्णा, रामा रामा कृष्णा कृष्णा’ भजन व गीत भी सीडी आदि के द्वारा प्रसारित हुआ जिसे भी सभी भक्त गणों ने तन्मय होकर श्रद्धापूर्वक गाया। कुछ एक दो अन्य भजन भी हुए और उसके बाद गंगा की आरती हुई जिसमें अनेक दीप व ज्योतियां प्रज्जवलित हो रही थीं। हमें इसमें कुछ विशेष बात तो नहीं दिखाई दी, केवल वहां लोगों की श्रद्धा भक्ति को देखकर मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न हो गये थे। आर्यसमाज में ईश्वर के प्रति इस प्रकार से श्रद्धा देखने को नहीं मिलती। यज्ञ में श्रद्धा अवश्य होती है परन्तु दोनों में अन्तर प्रतीत होता है। यह जानते हुए कि यह पौराणिक कृत्य है, हम वह सब शान्त भाव से देख व सुन रहे थे। गंगा आरती का कार्यक्रम लगभग 6.10 बजे सायं समाप्त हो गया है और हम अपनी पुत्री, पुत्र व पत्नी के साथ देहरादून के लिए चल पड़े। रास्ते में हमें विचार आया कि ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में पौराणिक मतों सहित उनके नाना प्रकार के कृत्यों का वैदिक प्रमाणों सहित युक्ति व तर्कों से खण्डन किया है। ऋषि द्वारा पौराणिक मतों व अन्धविश्वासों का खण्डन का अध्ययन करने पर लगता है कि वह उन सभी स्थानों पर गये हैं जिसका खण्डन व वर्णन उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में किया है। आज हमने भी यह पौराणिक कृत्य देखा तो हमें उसमें कोई विशेष बात दृष्टि गोचर नहीं हुई। एक विचार मन में और आया है कि हम गीता प्रेस गोरखपुर से निवेदन करें कि महर्षि दयानन्द ने वेदमन्त्रों पर आधारित सन्ध्या की विधि लिखी है जो पूर्णतः वेदानुकूल है एवं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध करने वाली है। उस सन्ध्या विधि को उन्हें प्रकाशित करने का निवेदन करें जिससे हमारे पौराणिक भाई भी ऋषि द्वारा लिखित सन्ध्या से परिचित हो सके। गीता प्रेस वाले इसे प्रकाशित नहीं करेंगे परन्तु पत्र लिखने में जाता क्या है? हमने पहले भी पत्र लिखे और कई बार अच्छे परिणाम सामने आ जाते हैं व आये हैं। ऐसा ही वर्षों पूर्व उनका कल्याण का एक विशेषांक ‘वेदांक’ के रुप में प्रकाशित हुआ था।

 

जब हम ऋषिकेश जा रहे थे तो हमने भानियावाला स्थान पर देखा की भारतीय स्टेट बैंक के एक एटीएम के सामने एक एटीएम में पैसा डालने वाली गाड़ी खड़ी है। इसकी भनक पड़ते ही लोगों ने वहां लाइन लगा ली थी। लगभग 20-25 लोग कतार में खड़े प्रतीक्षा करते दिखाई दिए। भानियावाला से होते हुए हम देहरादून के प्रसिद्ध हिमालयन हास्पीटल तथा देहरादून के एयरपोर्ट के सामने से होकर गुजरे और लगभग अपरान्ह 3.15 बजे ऋषिकेश पहुंच गये। जब हम अपनी पुत्री के बैंक पहुंचे तो एसबीआई, स्वार्गाश्रम ऋषिकेश शाखा के एटीएम के सामने लगभग 25 लोगों की एक लाइन लगी थी जिसमें अधिकांश व सभी विदेशी थे। हमने देखा कि लोग लगभग 2-3 मिनट में ही अपना धन निकाल कर बाहर आ रहे थे। शायद एटीएम से पच्चीस सौ रुपये निकल रहे थे। वहां से शिवपुरी स्थान पर जाते हुए भी हमने एक एटीएम से लोगों को पैसे निकालते देखा। वहां भी लोगों की जो लाइन थी वह काफी छोटी थी। हमें लगता है कि लोग सरकार के नोट बन्दी के फैसले से प्रसन्न हैं और साथ हि स्वयं को बदले हुए महौल में ढाल रहे हैं। विचार करते हुए हमारा ध्यान स्वामी रामदेव जी की ओर गया जो बहुत लम्बे समय से संप्रग सरकार से नोट बन्दी की मांग करते रहे थे। उनकी मांग पूरी नहीं की गई। वही मांग अब मोदी जी ने पूरी की है। इससे देश के गरीबों को सबसे ज्यादा लाभ होगा। इसके साथ ही आतंकवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद, हवाला तथा फेक करेंसी से होने वाले कार्यों पर रोक लगेगी। जमीने, मकान, शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में भी क्रान्ति आ सकती है। नोट बंदी से सरकार के पास जो अतिरिक्त धन जमा होगा, उसका उपयोग सरकार द्वारा गरीबों व देश की सड़कों के निर्माण, शिक्षा के प्रसार व उद्योग आदि स्थापित करने में किया जा सकता है। इससे रोजगार को भी गति मिलेगी। आने वाला समय ही बतायेगा कि इससे किसको क्या लाभ हुआ और किस-किसको हानि हुईं।

 

आज हमने कुछ समय इस प्रश्न पर भी विचार किया कि कोई व्यक्ति पहले आस्तिक हो और बाद में नास्तिक बन जाये तो उसके क्या कारण हो सकते हैं?एक ज्ञानी मनुष्य, जो पहले ईश्वर को मानता हो और जिसके पास ईश्वर की सत्ता विषयक अनेक तर्क व प्रमाण हों, क्या वह भी नास्तिक बन सकता है? हमने सुना है कि इतिहास में ऐसा हुआ है कि जब आस्तिक लोग नास्तिक बन गये हों। इसमें हम महात्मा बुद्ध और स्वामी महावीर जी को ले सकते हैं। यह लोग वैदिक धर्म के अन्तर्गत किये जाने वाले यज्ञों में पशु हिंसा से त्रस्त होकर शायद अनीश्वरवादी बने थे। आर्यसमाज में भी सुना जाता है कि कुछ लोग किन्हीं कारणों से नास्तिक बने। ऐसे भी उदाहरण हैं कि पंण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी और स्वामी श्रद्धानन्द पहले नास्तिक या अर्ध नास्तिक थे परन्तु स्वामी दयानन्द जी के सत्संग एवं संगति से वह पक्के ईश्वर विश्वासी आस्तिक बने। जो ज्ञानी व्यक्ति बिना प्रलोभन नास्तिक बनता है उसके पीछे एक वा अधिक कारण अवश्य होते हैं। शायद इसी लिए स्वामी दयानन्द जी ने आर्यसमाज के तीसरे नियम में यह प्राविधान किया है कि ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।‘ यह नियम व्यक्ति को नास्तिक से आस्तिक बनाने व आस्तिक को आस्तिक बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान करता है। ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के पहले नियम ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है।‘ यह अकाट्य सिद्धान्त है। जो इसे मानेगा वह हमारे विचार से कभी नास्तिक नहीं हो सकता वा कहा जा सकता। आर्यसमाज के पुराने व नये किसी विद्वान ने इस नियम पर शंका नहीं की। इससे यह लगता है कि आर्यसमाज के सभी सदस्य, विद्वान, नेता और संन्यासी सभी आरम्भ से मृत्यु तक सच्चे आस्तिक ही रहे थे। हमारा इस विषय का चिन्तन जारी है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं।

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