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– हृदयनारायण दीक्षित

भारतीय दर्शन के पांच तत्व गांव-गांव तक चर्चित है। रामचरित मानस की क्षिति जल पावक गगन समीरा वाली चौपाई हिन्दी भाषी क्षेत्रों में गंवई गंवार भी गाते हैं। तुलसीदास ने पांच तत्वों वाली बात कोई अपनी तरफ से ही नहीं कही थी। लेकिन यही पांच तत्व समूचे भारतीय साहित्य में भी मौजूद हैं। महाभारत में धर्म व्याध द्वारा एक ब्राह्मण को सृष्टि रहस्य समझाने की सरल कथा है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पांच तत्व हैं। इस सूची में पूर्व वाले तत्व बाद वाले तत्वों के गुणों से युक्त हैं। आकाश यहां सबसे बाद में हैं। आकाश का गुण शब्द है। इसके पहले वायु है। वायु में आकाश का गुण शब्द है, अपना गुण स्पर्श है। वायु में दो गुण हैं। इसके पहले अग्नि हैं। अग्नि में पहले के दो गुण शब्द व स्पर्श हैं। उसका अपना गुण रूप भी है। अग्नि में तीन गुण हैं। अग्नि के पहले जल है। जल में ऊपर के तीनों गुण शब्द, स्पर्श, रूप तो हैं ही उसका अपना गुण रस है। जल में चार गुण हैं। सूची में बची पृथ्वी में पहले के चार गुण शब्द, स्पर्श, रूप रस के साथ ही अपना गुण गंध भी है। पृथ्वी में पांच गुण हैं। विकास की गति सूक्ष्म से स्थूल की दिशा में चलती है। प्रथम तत्व आकाश है। उसके पास एक गुण है। आकाश का विकास वायु है, दो गुणों से युक्त हैं, वायु का विकास अग्नि तीन गुण वाला है। अग्नि का विकास जल है। यह चार गुणों वाला है। सबसे बाद में विकसित पृथ्वी में 5 गुण हैं। आकाश प्रथम है। संसार पंच महाभूतों का ही प्रपंच है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि रचना के पहले की स्थिति का वर्णन है न सत् था, न असत्, अंधकार ही अंधकार था। तब क्या था? यहां अंधकार आकाश की प्रथम अवस्था हो सकती है। स्वामी विवेकानंद ने ऋग्वेद के हवाले से आकाश को आदि तत्व माना और ‘राजयोग’ में लिखा आकाश ही वायु बनता है, द्रव व ठोस बनता है, आकाश से ही सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र, नक्षत्र, धूमकेतु बनता है आकाश ही प्राणियों वनस्पतियों का शरीर बनाता है। उसका प्रत्यक्ष बोध नहीं होता। बिलकुल ठीक लिखा है। ऋग्वेद की ऋचाएं भी परम व्योम में रहती हैं। देवता भी वही रहते हैं। आकाश का गुण शब्द है, मंत्र ऋचाएं अक्षर-शब्दों की ही काया धारण कर नीचे उतरती है। सविता और ऊषा ऋग्वैदिक ऋषियों के निराले देव हैं, वे आकाश से झांकते हैं। मरुत, वरुण, मित्र इन्द्र आदि देवता आकाश में ही दीपित हैं। सारी दुनिया विश्व प्रपंचों के लिए ‘ऊपर’ की ओर देखती है। परम सत्ता का एक नाम ‘ऊपर वाला’ है। लोग अकसर कहते हैं कि ऊपर वाले की कृपा से यह काम हुआ और ऊपर वाले ने यह काम बिगाड़ दिया। ऊपर वाला ‘आकाश’ ही मूल तत्व है। भावविभोर ऋषि आकाश को पिता कहते हैं और पृथ्वी को माता। ऋषि कहते हैं, पहले दोनों मिले हुए थे। तब उनका नाम ‘रोदसी’ था। एक मंत्र के अनुसार धरती आकाश को अलग करने का काम मरुतों ने किया। काव्य सर्जन के भीतर झांकने पर सृष्टि विकास की परतें आसानी से खुलती हैं। वैज्ञानिक गाड पार्टीकिल – ईश्वरीय तत्व की खोज में है। सृष्टि रचना का मूल आधार कोई आदि तत्व या आदि द्रव्य ही होना चाहिए। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हिन्दू चिन्तन के पांच तत्व हैं। यूनान और यूरोप के दर्शन में चार तत्व ही थे। वे आकाश को रिक्त स्थान या शून्य मानते थे। परवर्ती यूनानी चिन्तक अनक्सिमेंडर ने सृष्टि रचना के मूल तत्व को अनिश्चित – इनडिफनेट (ता-अपईरान) बताया था। अरस्तू ने उनके ‘अनिश्चित तत्व’ को ‘देशगत असीम’ कहा था। अनक्सिमेडर के ‘अनिश्चित तत्व’ के गुण ज्ञात नहीं थे। उनके अनुसार वह मूल चार तत्वों पृथ्वी, अग्नि और वायु से भिन्न है। वह कोई और है, उसी से आकाश उत्पन्न हुआ है। अरस्तू की टिप्पणी है कि अनक्सिमेंडर का असीम – या अनिश्चित सब चीजों को घेरे हुए हैं, सबका मूल संचालक भी है। कह सकते हैं कि अनक्सिमेंडर का असीम उपनिषदों वाला ब्रह्म जैसा है। उपनिषदों का ब्रह्म सबको आवृत करता है। सबके भीतर भी है, सबका संचालक भी है। लेकिन अनक्सिमेंडर का अनिश्चित और कोई अज्ञात तत्व नहीं है। उनका अनिश्चित भारतीय चिन्तन का ‘आकाश’ तत्व ही है। छान्दोग्य उपनिषद (1.9.1-2) के अनुसार समस्त भूत आकाश से उत्पन्न होते हैं। उसी में जाते हैं। वह अनंत है। इसी उपनिषद् में सनत् कुमार ने नारद को बताया आकाश तेज से बड़ा है, सूर्य, चन्द,्र विद्युत, नक्षत्र, अग्नि इसी में हैं। आकाश में उत्पत्ति है, आकाश से हम बोलते सुनते हैं। अनक्सिमेडर को आकाश का गुण नहीं पता था। वह असीम है, अनिश्चित है, सब कुछ उसमें है, भारतीय चिन्तन की यह धारणा उसने संभवतः भारत से प्राप्त की। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन यूनानी दार्शनिक थेल्स अनक्सिमेंडर और हिराक्लिटस एक ही भू-क्षेत्र के निवासी थे। थेल्स जल को आदि द्रव्य मानते थे। हिराक्लिट्स अग्नि को और अनक्सिमेंडर ‘अनिश्चित’ को। थेल्स की धारणाएं ऋग्वेद के आपः मातरम् से मिलती है। हिराक्लिट्स का चिंतन कठोपनिषद् और ऋग्वेद के अग्नि तत्व का निकटवर्ती है। अनेक विचारक उपनिषदों पर यूनानी दर्शन का प्रभाव खोजते हैं। बेशक दोनों देशों के चिन्तन में समानता है पर यूनान में थेल्स से पहले चिन्तन-दर्शन की कोई परम्परा नहीं है। भारत में उपनिषदों के पहले ऋग्वेद है। ऋग्वेद के बीज दर्शन का विस्तार उपनिषदें है। उपनिषदों का प्रभाव ही यूनानी दर्शन पर पड़ा हो तो आश्चर्य क्या है? अनक्सिमेंडर और यूनानी दर्शन के बहुत पहले भारत में कपिल का सांख्य दर्शन छाया हुआ था। सांख्य विकासवादी दर्शन है। प्रत्येक तत्व के दो रूप होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। सूक्ष्म ही विकसित होकर स्थूल बनता है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक तत्व का अपना गुण है। आकाश का गुण शब्द है। वायु का विकास आकाश से ही हुआ लेकिन आकाश बना रहा। उसके बाद वाले तत्वों में भी पूर्ववर्ती सभी तत्वों के गुण आये। महाभारत में संजय ने धृतराष्ट्र को यही सांख्य समझाया था। लेकिन कपिल के सांख्य से भी पहले सृष्टि विकास की यही धारणा बीज रूप में ऋग्वेद में भी मौजूद है। यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस भारतीय चिंतन से प्रभावित दिखाई पड़ते हैं। उनका आत्मा का सिध्दांत भारतीय दर्शन के पुनर्जन्म से मिलता है। हिराक्लिट्स ने कहा कि पुनर्जन्म की अवधारणा पाइथागोरस ने मिस्र से पाई थी। मिस्र में पुनर्जन्म की ठोस अवधारणा नहीं थी। पाइथागोरस भारतीय चिंतन से ही प्रभावित हो सकते हैं। पाइथागोरस के अनुयायी ‘शून्य’ का अस्तित्व मानते थे कि शून्य दो पदार्थों के बीच का हिस्सा है। यह दोनों को अलग करता है। पाइथागोरस का शून्य ही भारतीय दर्शन का आकाश है। भारत में सृष्टि रहस्यों के प्रति गहन जिज्ञासा की परम्परा अतिप्राचीन है। हजारों वर्ष का लम्बा कालखण्ड है। सिंगमंड फ्रायड का अनुयायी कार्लयुंग भी भारतीय चिन्तन से भौचक था। भारत में शोध, दर्शन और वैज्ञानिक चिन्तन की अविच्छिन्न परंपरा है। आकाश प्राचीन काल से ही सबकी जिज्ञासा था। आकाश प्रथमा है। वृहदारण्यक उपनिषद् में आकाश को ब्रह्म जाना गया है। यहां आकाश-ब्रह्म की उपासना का प्रीतिकर मन्त्र है – ओ3म् खं ब्रह्म। (अध्याय 5.1) मन्त्र में आकाश को सनातन बताया गया है – खं पुराणं वायुरं खमिति। इसमें वायु रहती है। शंकराचार्य का भाष्य है ‘ओ3म् खं ब्रह्म’ यह मन्त्र है। इसका अन्यत्र विनियोग नहीं हुआ। ध्यान कर्म में इसका विनियोग है। खं (आकाश) ब्रह्म का शब्द वाच्य ओ3म् है। ओ3म् का उच्चारण और खं-आकाश का ध्यान ही श्रेष्ठ आलम्बन है। ‘ब्रह्म सूत्र’ का आकाश-अधिकरण आकाश ब्रह्म की खूबसूरत विवेचना है। शंकराचार्य ने वृहदारण्यक के भाष्य में सावधान किया है कि लेकिन खं को भौतिक आकाश न समझा जाय क्योंकि उपनिषद् का कहना है – खं पुराणं अर्थात् सनातन आकाश। वैदिक साहित्य और पाणिनि के परवर्ती साहित्य में भी ख का अर्थात आकाश है। आकाश सबको आवृत करता है। सबके भीतर और बाहर है। ‘ख’ सुन्दर हो तो सु-ख यानी सुख और ‘ख’ कष्टदायी हो तो दु-ख यानी दुख। ऐसे सनातन आकाश ‘खं ब्रह्म’ को हम सब प्रणाम करते हैं। * लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

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