राजनीति पर गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठनों का विदेशी नागपाश

हरिकृष्ण निगम

क्या आज का भारत स्वैच्छिक और गैर-सरकारी संगठनों अथवा सिविल सोसायटी कहलाने वाले संगठनों के नागपाश द्वारा विदेशी सूत्रधारों या कुछ देशविरोधी अंतर्राष्ट्रीय लॉबियों का अखाड़ा बन चुका है? देश में सक्रिय इन एन.जी.ओ. अथवा सी. एस. ओ. ने अपनी अंदरूनी प्रतिद्वंदिता और राजनीति द्वारा वर्तमान व्यवस्था को गंभीर चुनौति ही नहीं दी है बल्कि नए संवैधानिक और सुरक्षा संबंधी खतरे भी पैदा कर दिए हैं।

जब से अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल को देशव्यापी समर्थन मिलने के साथ-साथ विदेशों में भी अनेक प्रबुध्द नागरिकों और मीडिया का अनुमोदन और सहयोग मिला है, सत्तारूढ़ कांग्रेस और वामपंथियों से जुड़े अनेक गैरसरकारी संगठन उत्तेजित होकर अन्ना और उनकी भ्रष्टाचार विरोधी टीम पर नकारात्मक और ध्वंसात्मक गैरसरकारी स्वैच्छिक संगठन होने का आरोप लगा रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस और वामपंथी दल अपने पाले के ऐसे गैरसरकारी संगठनों चाहे वे नक्सलवादी या माओवादी विचारधारा के समर्थक हों या मानवाधिकार के नाम पर आतंकवादियों के पक्ष हों अथवा चर्च के धर्मांतरण के प्रच्छन्न एजेंड की पूति में सहायक हों, उनको भी संरक्षण देकर गले-लगाते रहे हैं। यह एक सामान्य व्यक्ति भी जान चुका हैकि इस प्रकार के एन.जी.ओ. का दूसरा गुट जिसमें नक्सलवादियों के हिमायती विनायक सेन कांग्रेसियों के जासूस की संज्ञा पाए स्वामी अग्निवेश, नेशनल एडवाईजरी कांउन्सिल की विवादित सदस्या अरूणा राय, नर्मादा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर भारत में प्रजातंत्र के अंत की दुनियां में घोषणा करने वाली अरूंधती राय और विवादित शबाना आजमी जैसे दर्जनों प्रभावशाली व राष्ट्रविरोधी रू झान वाले हैं और सत्तारूढ़ संप्रग सरकार के चहेते बने हुए हैं। उपर्युक्त दो प्रकार के विदेशों द्वारा समर्थित स्वैच्छिक संगठनों की, परस्पर गलाकाट प्रतिद्वंदिता हमारी राजनीति व्यवस्था को खोखला कर अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को कहां तक ले जाएगी यह तो समय ही बताएगा।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में इन स्वैच्छिक गैर सरकारी संगठनों के बदलते समय की मांग के अनुरूप नामकरण में भी अनूठा रूपांतरण हुआ है। इन सबके पीछे मात्र एक ही बात समान रही है। वे बहुधा विदेशी ताकतों और अंतर्राष्ट्रीय लॉबियों के हस्तक रहे है और पहले के अनेक अमेरिकी खुलासों और स्वीकृतियों के आधार पर कहा जा सकता है कि वे अमेरिकी खुलासों और स्वीकृतियों के आधार पर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सरकार व सी.आई.ए की आंख और कान की तरह देश में काम करते रहे हैं। वामपंथियों का समय-समय पर रूसी गुप्तचर एजेंसी के.जी.बी. के इशारों पर नीति-निर्धारण के प्रकरण तो कई बार सत्यापित किए जा सकते हैं। शीत युध्द के समय की बात यदि ध्यान में न भी लाएं तो आज भी ‘विकिल्क्सि’ के हर खुलासे में हमारे नेताओं द्वारा चाहे भारत में अमेरिकी राजदूत हो या कोई अन्य प्रतिनिधि उसके सामने वे अपने उन विचारों को रखने के लिए लालायित रहते हैं जो न वे जनता या संसद के सामने कहने का साहस नहीं कर सकते। चाहे राहुल गांधी हों, या दिग्विजय सिंह अथवा शशि थरूर जो बातें वे अमेरिकी प्रतिनिधियों से दिल्ली में गुपचुप कहते हैं वे संसद का भी अपमान है और संविधान की अवमानना भी । इन नेताओं के लिए अमेरिकी प्रतिनिधि अभी भी उनके असली आका हैं-यदि ‘विकिलिक्स’ के भारत संबंधी खुलासों में कुछ भी सच है।

वैसे हमें विस्मृत नहीं करना चाहिए कि शीतयुध्द के दौरान स्वयं हमारे देश के साम्यवादी दल बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश व पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में कार्यरत विदेशी ईसाई मिशनरियों को देश से निष्कासित करने की मांग करते थे। इसमें उस समय पीसकोर के अमेरिकी वालंटियर एवं पी एल-480 के अनुदानों की राशि द्वारा संचालित अमेरिकी संगठनों के सदस्य भी शामिल थे।

फिर भी आज के परिदृश्य में यह निस्संदेह है कि अन्ना हजारे के वर्तमान अभियान में वंदे मातरम् या भारत माता की जय जैसे नारों ने जिस तरह से देश के कोने-कोने को जोड़ने का प्रयास किया गया है वह स्वैच्छिक संगठनों की मानसिकता में एक अभूतपूर्व रूपांतरण है जो राष्ट्रभक्ति का एक नया वीजमंत्र बन जाता है। अन्यथा वंदे मातरम् के प्रश्न पर हमारे ढ़ोंगी और छद्म सेक्यूलरवादियों को हर बार अब तक सिर्फ विक्षिप्त श्वानों की भांति प्रतिक्रिया जताते ही देखा गया था।

इधर कुछ वर्षों से भद्र समाज या सिविल सोसाइटी कहलाने वाले जनप्रिय संगठन हमारे यहां भी पश्चिम की नकल पर लोकप्रियता पा रहे हैं। सबसे पहले विश्व बैंक ने इसकी परिभाषा और वैद्यता दी थी जो पहले एन.जी.ओ. का ही पर्याय था। एन.जी.ओ. शब्द सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1945 में गढ़ा था और यह उन संस्थाओं के संदर्भ में था जो किसी सरकार या राजनीतिक दल के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं होते थे। पर 70 के दशक में इसकी लोकप्रियता तब बढ़ी जब पश्चिमी देशों द्वारा विकास आदि के नाम पर कुछ व्यक्तियों और संगठनों को धनराशि मुहैया कराने का दौर जारी हुआ। पिछड़े या विकासशील देशों में गरीबी-उन्मूलन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और कृषि आदि सुधाराें के लिए यह राशि दी जाती थी। जब ये संगठन गैर-सरकारी संस्थाएं-एन.जी.ओ. नहीं कहलाते थे तब इन्हें वी.ओ. अथवा स्वैच्छिक संगठन कहा जाता था जो कुछ-कुछ बदनाम भी थे क्योंकि तब मैत्री संगठनों और शांति परिषदों या पीस कोर वालंटियर्स का जमाना था जहां यह राशि उन देशों के प्रच्छन्न एजेंडा के साथ आती थी। रूस, चीन और जापान से भारत की जुड़ी पीस फ्रेंडशाीप आदि परिषदों और सोसायटी का जमाना और सम्मोहन पिछली पीढ़ी के पत्रकारों को आज भी याद होगा बाद में वर्ल्ड बैंक ने इन्हें एन.जी.ओ. के रूप में वैद्यता दिलाने का खुलकर प्रयास किया था।

पिछले तीन दशकों में इस प्रकार के दानदाताओं और अनुदान प्राप्त करने वाले अपने को सिविल सोसायटी आर्गेनाईजेशन (सी.एस.ओ.) कहलाना अधिक पसंद करने लगे। सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी ऐसे स्वघोषित सिविल सोसायटी संगठन उतर आए पर न तो उनकी आय-व्यय का विस्तृत अंकेक्षण होता है और न ही वे अनुदानों से मिली राशि के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

सत्ता का सुख भोगने वाली कांग्रेस ने आज ऐसे सैकड़ों ‘सी.एस.ओ.’ को अपने संरक्षण में रखा है। विज्ञान, पर्यावरण या गंगा रिवर बेसिन ऑथरिटी जैसे प्राधिकरण जिसके अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री हो उसमें और विज्ञान तथा पर्यावरण शोध केंद्र जैसे गैरसरकारी संगठन सरकार के संबंधित मंत्रालयों द्वारा संरक्षित और उनकी समितियों में वे लोग हैं। कुछ एन.जी.ओ. के प्रतिनिधियों ने तो अपनी सुपर कैबिनेट जैसी भी बना रखी है। सोनियां गांधी की अध्यक्षताा वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में भी गैर-सरकारी संगठनों की पहुंच है। जब हाल में यह प्रश्न उठाया गया कि क्या यह तथ्य एन.ए.सी. की वैद्यता पर प्रश्न नहीं उठाता है तब कांग्रेसी प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं एन.ए.सी के सदस्य रचनात्मक एवं सकारात्मक हैं पर अन्ना हजारे की टीम सी.एस.ओ. का ध्वंसात्मक चेहरा है।

नीति विषयक निर्णायक प्रक्रिया में सूचना के अधिकार अधिनियम के लिए अन्ना हजारे द्वारा प्रयासों को अनदेखा करना उसी तरह असंभव है जिस प्रकार आज भ्रष्टाचार विरोधी व्यापक अभियान में जनाक्रोश को जनाधार दिलवाने में सभी भेदभावों या वर्ग विषमता को भुलाकर मध्यम वर्ग में उन्होंने जागृति फैलाई है, सच देखा जाए तो इस देश में सैकड़ों कागजी स्वैच्छिक गैरसरकारी संगठन है और उनमें से अनेक प्रचार कार्य तो जोर शोर से करते हैं पर अपने कार्यक्रमों में से सौ-पचास लोग भी मुश्किल से जुटा पाते हैं और वे अनुदानों और जनहित याचिकाओं की राजनीति पर ही जीवित रहते हैं।

आज संकेत स्पष्ट है यदि आपका स्वैच्छिक संगठन कांग्रेसदल का हित साधता है तो आप सकारात्मक हैं और आपको अपनी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए सबकुछ उपलब्ध हो सकता है। यदि आप भाजपा, हिंदू संगठनों और मोदी पर आक्रामक रूख से निरंतर विषवमन के लिए सन्नद् हैं तब आप के लिए हर द्वार खुला है। पर यदि आपने अन्ना हजारे की तरह कड़वा, असुविधाजनक और राजनीतिबाजों को न पचने वाली कोई सच बात कही तो आपको देश के लिए एक खतरामयी कहा जा सकता है।

जनहित याचिकाओं और सार्वजनिक हित में कानून की शरण लेने वालों की आज संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि कभी-कभी यह प्रतीत होता है कि अनेक लोगों ने इसे स्वप्रचार के साथ-साथ अपनी सामाजिक सक्रियता को भी एक पेशे के रूप में ढ़ालने की कोशिश कर डाली है। साथ ही वे अनेक गैर सरकारी संगठन जो बहुधा विदेशी अनुदानों के बल पर देश की अनेक समस्याओं के स्वंयभू संरक्षक बन बैठे हैं अपने प्रच्छन्न राजनीतिक एजेंडे को लागू करने के लिए जनहित याचिकाओं की शरण लेते हैं। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में कुछ ऐसी याचिकाओं को सिर्फ इसलिए खारिज किया था कि जो कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने सिर्फ इसलिए खारिज किया था जो कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने सिर्फ नाम कमाने व अपना सामाजिक प्रभाव जताने के लिए दायर की थी।

वैसे हमारे देश में सामाजिक न्याय की उपादेयता न्यायालयों ने पिछले अनेक वर्षों से हस्तक्षेप के उन उदाहरणों से कई बाद सिध्द की है जो न्यायिक सक्रियता या जुडीशियल एक्टिविज्म के नाम से काफी चर्चित रही है। पर आज समय इतना बदल चुका है कि राजनीतिबाजों या उनके मंतव्यों को पूरा करने वाले कुछ प्रसिध्द खेमेबाजों की शिकायतों के पुलिंदे में कुछ भी हो सकता है। किसी को हमारे राष्ट्रगान से सिंध शब्द निकलवाने की जिद हो या किसी उद्योग के अधिग्रहण से पहले स्थानीय हितों के संरक्षण के नाम पर शतप्रतिशत अपने वर्ग के लोगों को नौकरियां दिलवाना हो या अपने गांव के सामने मेल या एक्सप्रेस ट्रेन को रूकवाने के लिए स्टेशन बनवाना हो। यह एक मनोविमोह का विषय बन चुका है। आज न्यायपालिका को शहर साफ करने से लेकर शासन तंत्र को छोटी-मोटी खामियों को दूर करने में पहल करनी पड़ती हौ। इसीलिए कुछ लोग तो न्यायिक सक्रियता शब्द को ही भ्रांतिपूर्ण मानने लगे हैं क्योंकि इससे यह अर्थ निकलता है कि पहले जैसे न्यायपालिका सोई हुई थी और आज वह सक्रिय हो गई है।

कुछ अपवादों को छोड़कर अनेक प्रतिष्ठित लोगों की दायर याचिका में भी उनका स्वार्थपूर्ण संकीर्ण मंतव्य झलकता है पर फिर भी न्याय का यह उपलब्ध अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न अंग कहा जा सकता है। पर अपनी अंतर्रात्मा की आवाज और राजनीति में धाक जमाने के उद्देश्य से इसका दुरूपयोग हो रहा है। किसी पुस्तक को प्रतिबंधित कराना है; नई फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगवाना हो या तस्लीमा नसरीन जैसी चर्चित लेखिका को देश में न आने देना हो-न्यायालय के लिए याचिका तैयार है। अब तो उन मुद्दों पर भी याचिकाएं दाखिल की जाती है जो देश विरोधी अंतर्राष्ट्रीय ताकतों के खेल का हिस्सा बन जाती है। नर्मदा बचाओ आंदोलन, अनेक दूसरे बांध, बिजलीघर या दूसरी बड़ी परियोजनाओं के विरूध्द विस्थापितों के नाम पर हमारे देश में ऐसा कई बार हो चुका है। पश्चिम के कुछ देश गैर-सरकारी आंदोलनकारी संस्थाओं के बांध-निर्माण में रूकावट के लिए करोड़ों रूपया दे चुका है।

देश की परिस्थितियां आज जिस प्रकार करवटें ले रही है, उसमें जितना शीघ्र हम गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठनों के प्रच्छन्न राष्ट्रविरोधी एजेंडे और मृग-मरीचिकाओं से दूर हटें उतना ही हमारे और देश के लिए अच्छा होगा।

* लेखक अंतराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं। 

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