भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का असर अब दिखने लगा है

वर्ष 2020 में देश में कई क्षेत्रों, यथा कृषि, उद्योग, श्रम, टैक्स, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, आदि में ऐसे क्रांतिकारी सुधार कार्यक्रम लागू किए गए जो पिछले कई दशकों से केवल विचाराधीन थे। देश में लागू किए गए इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के अच्छे परिणाम, देश में कोरोना महामारी के बाद आर्थिक प्रगति की तेज़ हो रही गति के रूप में, देखने को मिल रहे हैं। देश में हाल ही के समय में प्रारम्भ किए आर्थिक सुधारों के चलते अब तो पूरा विश्व ही भारत की ओर टकटकी लगाए है कि किस प्रकार भारत से व्यापारिक दृष्टि से जुड़ा जाय। इन क्रांतिकारी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का असर विशेष रूप से कृषि के क्षेत्र में तो साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा है जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दृष्टिगोचर है और इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का लाभ भारत के किसानों को भी मिलना शुरू हो गया है। आज भारत, दवाईयों के साथ साथ कृषि उत्पाद भी विश्व के कई देशों तक पहुंचा रहा है एवं अब तो चीन जैसे देश भी चावल आदि खाद्य पदार्थों के लिए भारत की ओर देख रहे हैं।

भारत के कृषि क्षेत्र पर तो कोरोना महामारी का असर लगभग नहीं के बराबर रहा है क्योंकि कृषि क्षेत्र में वित्तीय वर्ष 2020-21 की द्वितीय तिमाही में भी 3.4 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की गई है, जो कि प्रथम तिमाही में दर्ज की गई विकास दर के बराबर है। केंद्र सरकार द्वारा इस संदर्भ में लिए गए कई आर्थिक निर्णयों के चलते भारत में न केवल कृषि उत्पादन लगातार तेज़ गति से बढ़ रहा है बल्कि कृषि उत्पादों का निर्यात भी अब बहुत तेज़ी से वृद्धि दर्ज कर रहा है। अप्रेल-सितम्बर 2019 के बीच 6 माह के दौरान भारत से कृषि उत्पादों का निर्यात 37397 करोड़ रुपए का रहा था जो अप्रेल-सितम्बर 2020 के बीच 6 माह के दौरान, 43.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए, बढ़कर 53626 करोड़ रुपए का हो गया है। वृद्धि दर में यह एक लम्बी छलांग है। कृषि उत्पादों के निर्यात में विशेष रूप से शामिल रहे उत्पादों में मूंगफली में क़रीब 35 प्रतिशत, चीनी में 104 प्रतिशत, गेहूं में 206 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है तथा बासमती और ग़ैर बासमती चावल का भी निर्यात में बड़ा हिस्सा रहा है। अभी हाल ही में अप्रेल-अक्टोबर 2020 के आंकड़े भी जारी किये गए है और इस दौरान कृषि उत्पाद के निर्यात और आगे बढ़कर 70,000 करोड़ रुपए के ऊपर पहुंच गए हैं, जिसका सीधा सीधा लाभ देश के किसानों को मिल रहा है।

पुराने एवं घिसेपिटे 1500 क़ानूनों, जिनकी आज के आर्थिक परिप्रेक्ष्य में कोई अहमियत ही नहीं रह गई थी, को रद्द कर दिया गया है ताकि देश के नागरिकों के साथ साथ विदेशी व्यवसाईयों को भी भारत में व्यापार एवं व्यवसाय करने में आसानी हो। इन्हीं कारणों के चलते कोरोना महामारी के काल में भी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में रिकार्ड वृद्धि दर्ज की गई है एवं दिनांक 4 दिसम्बर 2020 को विदेशी मुद्रा भंडार 57930 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। इससे विश्व के अन्य कई देशों की भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास की झलक मिलती है। विदेशी निवेशकों के साथ साथ अब भारतीय निवेशकों को भी देश में अपने निवेश को बढ़ाने की आवश्यकता है। अभी तक तो देश में पूंजी निवेश के मामले में केंद्र सरकार एवं कुछ राज्य सरकारों का ही योगदान रहा है परंतु केवल सरकारों के भरोसे कब तक अर्थव्यवस्था को बल प्रदान किया जा सकता है, जबकि भारत में केंद्रीय राजस्व का सकल घरेलू उत्पाद से प्रतिशत अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है अतः सरकारों के लिए पूंजीगत ख़र्चे को बढ़ाने की भी अपनी सीमायें हैं। इसलिए देशी निवेशकों के भी, निवेश की दृष्टि से, आगे बढ़ने का समय अब आ गया है। विशेष रूप से रोज़गार का सृजन करने वाले क्षेत्रों यथा, कपड़ा उद्योग, लेदर उद्योग, फ़ुटवेयर उद्योग, फ़ार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, आटोमोबाईल, डायमंड उद्योग, फ़ूड प्रॉसेसिंग उद्योग, आदि में ऐसा वातावरण निर्मित किए जाने की आवश्यकता है ताकि इन क्षेत्रों में देशी निवेशक अपना निवेश बढ़ाएं। देश में बचत एवं निवेश की दर में भी कमी देखने में आ रही है जिसके चलते भी विकास दर में कमी आ सकती है अतः बचत की दर को भी बढ़ाया जाना आवश्यक होगा। इस संदर्भ में निजी कम्पनियों को तो कुछ वर्षों के लिए अपने लाभ की पूरी राशि को ही निवेश के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि देश में ही निवेश बढ़ सके।

अपने शोध कार्य के चलते, भारत फ़ार्मा के क्षेत्र में अब वैश्विक स्तर पर अपनी धाक जमा चुका है। परिणामतः कोरोना वायरस की वैक्सीन के मामले में भी भारत पूरे विश्व के लिए एक उम्मीद की किरण के तौर पर उभर रहा है। भारत आज 100 से अधिक देशों को भारत में ही निर्मित दवाईयों का निर्यात कर रहा है। इसी प्रकार, कृषि, ऊर्जा, स्पेस, रक्षा, यातायात एवं निर्माण के क्षेत्र में भी भारत में शोध कार्य पर निवेश बढ़ाने की ज़रूरत है। यूं देखा जाय तो भारत में शोध कार्य पर ख़र्च की जाने वाली राशि अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है। शोध कार्य से नवोन्मेश जन्म लेता है एवं उत्पादकता में सुधार में सहायक होता है। इस प्रकार देश के उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनते हैं। अब समय आ गया है कि देश में कम्पनियों को अपने अपने क्षेत्र में शोध कार्य पर ख़र्च किए जाने की सीमा निर्धारित करनी चाहिए ताकि इन कम्पनियों में नवोन्मेश को प्रोत्साहन मिल सके। विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को प्रोत्साहन देकर उनके शोध कार्यों को भी भारत में स्थानांतरित करवाया जाए तो देश में ही शोध कार्य करने हेतु माहौल तैयार किया जा सकता है।

उत्पादकता की स्थिति तो यह है कि चीन में खेती योग्य ज़मीन भारत की तुलना में केवल आधी ही इस्तेमाल की जाती है जबकि उत्पादन भारत से दुगुना पैदा किया जाता है। इतना ज़्यादा अंतर है भारत एवं चीन में कृषि उत्पादकता के क्षेत्र में। अतः आर्थिक क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार कार्यक्रमों को अब विराम नहीं दिया जा सकता है, इन्हें अविरल जारी रखना ही होगा। कई विदेश रेटिंग संस्थान भी भारत से अब आशा करने लगे हैं कि भारत इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को आगे भी जारी रखेगा एवं अब देश में विभिन राज्य भी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की ओर आगे बढ़ेंगे। इन अंतरराष्ट्रीय रेटिंग संस्थानों का तो यह भी सोचना है कि अभी हाल ही में भारत सरकार द्वारा विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में किए गए सुधार कार्यक्रमों के बाद भारत की आर्थिक विकास दर मध्यम काल में बहुत तेज़ गति पकड़ने वाली है। फ़िच रेटिंग संस्थान ने अभी हाल ही में कहा है कि कृषि क्षेत्र में किए गए क्रांतिकारी सुधार कार्यक्रमों, जिसके अंतर्गत किसानों को अपने कृषि उत्पादों को बाज़ार में बेचने की छूट प्रदान की गई है एवं श्रम क्षेत्र में किए गए सुधार कार्यक्रम जिसके अंतर्गत श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने का प्रयास किया गया है, के चलते भारत की विकास दर में आगे आने वाले समय में भारी वृद्धि देखने को मिल सकती हैं।

भारत की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने भी कहा है कि देश में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को जारी रखा जाएगा ताकि विदेशी निवेशक भारत की ओर अपना रूख बनाए रख सकें। भारत ने तो कोरोना महामारी को भी अपने लिए एक अवसर के तौर पर ही देखा है एवं इस दौरान भी कई क्रांतिकारी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू कर दिया जो कि देश में कई दशकों से केवल विचाराधीन थे।

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