पर्यावरण लेख

टाइफून बावी के बहाने प्रकृति की चेतावनी को समझने की जरुरत

दुर्गेश्वर राय

प्रकृति जब विकराल रूप धारण करती है, तो मानव की बनाई हुई पूरी व्यवस्था पल भर में तिनके की तरह बिखरने लगती है। उत्तर-पश्चिमी प्रशांत महासागर से उठा टाइफून बावी हमारी उसी बदलती हुई पृथ्वी की एक भयानक और जीवंत तस्वीर था, जहाँ महासागर अब उबल रहे हैं और हवाएँ तबाही मचा रही हैं। श्रेणी-5 के घातक सुपर टाइफून के रूप में विकसित हुए बावी ने जिस तरह से प्रशांत महासागर के द्वीपों से लेकर पूर्वी एशिया के तटीय भूभागों तक तांडव मचाया, उसने दुनिया भर के पर्यावरणविदों, मौसम वैज्ञानिकों और विचारकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। लगभग 285 किलोमीटर प्रति घंटे की निरंतर प्रचंड गति से बहती हवाओं और 330 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक तेज़ झोंकों के साथ जब इस दानवी चक्रवात ने अमेरिकी द्वीप क्षेत्र गुआम, उत्तरी मारियाना द्वीप समूह और ताइवान से होते हुए चीन के झेजियांग प्रांत के तटीय शहरों पर आघात किया, तो जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया।

चक्रवात किसी भी महासागर के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों की उपज होते हैं। प्रशांत महासागर के जिस माइक्रोनेशिया और मारियाना क्षेत्र में बावी का जन्म हुआ, वहाँ समुद्र की ऊपरी सतह का तापमान 29 से 30 डिग्री सेल्सियस के आसपास दर्ज किया गया था। समुद्र का इतना गर्म होना चक्रवातों के लिए ईंधन का काम करता है। जब समुद्री जल इतना अत्यधिक गर्म होता है, तो उससे भारी मात्रा में वाष्पीकरण होता है, जो वायुमंडल में जाकर विशालकाय बादलों और कम दबाव के विशाल क्षेत्रों का निर्माण करता है। इसके साथ ही, उस समय प्रशांत महासागर में निर्मित हो रही एल-नीनो की स्थितियों ने इस तूफ़ान को पूर्व से पश्चिम की ओर लंबी दूरी तय करने और लगातार गर्म पानी से ऊर्जा सोखने का सुनहरा अवसर प्रदान किया। ऊपरी और निचले वायुमंडल की हवा की गति के बीच का अंतर यानी वर्टिकल विंड शियर का बेहद कम होना भी इसके लिए वरदान सिद्ध हुआ, जिसने इस चक्रवात को टूटने नहीं दिया और इसे एक अत्यंत संगठित तथा भयावह आई यानी चक्रवात के केंद्र का रूप दे दिया। संघनन की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाली गुप्त ऊष्मा ने हवा के दबाव को इतना गिरा दिया कि समुद्री हवाएँ एक दैत्य की भाँति गरजना करने लगीं।

हमारी पृथ्वी ने इससे पहले भी कई भयावह तूफ़ानों का सामना किया है। वर्ष 1979 में आया टाइफून टिप आज भी दर्ज इतिहास का सबसे विशालकाय चक्रवात माना जाता है, जिसका व्यास लगभग 2220 किलोमीटर था और जिसने आधे अमेरिका के बराबर के क्षेत्रफल को अपनी चपेट में ले लिया था। इसी प्रकार वर्ष 2013 में फिलीपींस में तबाही मचाने वाला टाइफून हाययान या योलांडा अपनी 315 किलोमीटर प्रति घंटे की विनाशकारी हवाओं के साथ ज़मीन पर लैंडफॉल करने वाला सबसे उग्र तूफ़ान दर्ज किया गया था। फिर भी, बावी को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता और अधिक गहरा गई है। इसका कारण इसके बनने और तीव्र होने की असामान्य गति है। आधुनिक युग के चक्रवात अब हफ़्तों के बजाय कुछ ही घंटों के भीतर एक सामान्य दबाव के क्षेत्र से बदलकर श्रेणी-4 या श्रेणी-5 के घातक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को मौसम विज्ञान में रैपिड इंटेंसिफिकेशन कहा जाता है। टाइफून बावी में देखी गई यह त्वरित उग्रता इस बात का प्रमाण है कि महासागर अब अपनी सोखने की क्षमता की सीमा तक पहुँच चुके हैं और वे जमा हुई उष्मा को भयानक तूफ़ानों के रूप में बाहर फेंक रहे हैं।

यह पूरी परिघटना व्यापक वैश्विक जलवायु संकट का प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसे मानव ने अपनी भौतिकवादी आकांक्षाओं के बल पर आमंत्रित किया है। औद्योगिक क्रांति के बाद से जीवाश्म ईंधनों कोयला, पेट्रोल, और प्राकृतिक गैस के अंधाधुंध दहन से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों ने पृथ्वी के वायुमंडल को एक तपे हुए ओवन में बदल दिया है। इस अतिरिक्त गर्मी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा हमारे महासागरों ने अपने भीतर समाहित किया है। परिणाम स्वरूप, महासागरीय हीटवेव यानी समुद्री लू की घटनाएँ आम हो गई हैं, जो बावी जैसे सुपर टाइफूनों को जन्म देती हैं।

टाइफून बावी हमें छोटे द्वीपीय देशों और तटीय क्षेत्रों की अत्यधिक संवेदनशीलता से भी रूबरू कराता है। गुआम, रोटा या ताइवान जैसे क्षेत्रों में  ऐसे चक्रवात  सांस्कृतिक और सामाजिक अस्तित्व पर प्रहार करते हैं। समुद्र के बढ़ते जलस्तर के साथ जब विशालकाय समुद्री लहरें तटीय इलाकों में प्रवेश करती हैं, तो कृषि योग्य भूमि हमेशा के लिए अनुपयोगी हो जाती है, पेय जल के स्रोत दूषित हो जाते हैं और हज़ारों परिवार अपनी सदियों पुरानी जड़ों से उखड़ जाते हैं, जिसे हम जलवायु शरणार्थी कहते हैं। ये वे लोग हैं जिनका अपना कोई दोष नहीं है, लेकिन वे दुनिया के विकसित और अत्यधिक उत्सर्जन करने वाले राष्ट्रों की नीतियों की कीमत अपनी रोज़ी-रोटी और घर खोकर चुका रहे हैं। यह स्थिति मानवीय न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

आज यदि प्रशांत महासागर में बावी जैसा सुपर टाइफून आता है, तो कल हिंद महासागर में चक्रवात, यूरोप में जानलेवा हीटवेव, या हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने और भूस्खलन की भयावह घटनाएँ घटती हैं। ये सभी घटनाएँ अलग-अलग टुकड़े नहीं हैं, बल्कि ये एक ही विशाल और बिगड़े हुए वैश्विक जलवायु तंत्र की कड़ियाँ हैं। जब पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ता है, तो जलचक्र और वायुमंडलीय परिसंचरण की पूरी प्रणाली बिखर जाती है। हवाओं की पारंपरिक दिशाएँ बदल जाती हैं, मानसून का पैटर्न अनिश्चित हो जाता है मौसम की चरम सीमाएँ जैसे- अत्यधिक बारिश या अत्यधिक सूखा-मानव जीवन को त्रस्त करने लगती हैं।

बावी जैसे तूफ़ान मानव सभ्यता के लिए चेतावनी की घंटी हैं। वे हमें स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि विकास की जिस राह पर हम चल रहे हैं, वह टिकाऊ नहीं है। विशाल ढाँचे खड़े कर लेना, नदियों और समुद्रों के तटीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण करना, प्राकृतिक आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स को नष्ट करना और वनों की अंधाधुंध कटाई करना हमें प्रकृति के प्रकोप से सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता। बावी ने दिखा दिया कि जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, तो इंसानी तकनीक और ढाँचे उसके सामने कितने असहाय और बौने साबित होते हैं।

समय की माँग यह है कि हम आपदा के कारणों के निवारण की ओर कदम बढ़ाएँ। इसके लिए एक दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और जीवनशैली में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है। हमें जीवाश्म ईंधनों से किनारा करके सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर तेज़ी से बढ़ना होगा। इसके अतिरिक्त, तटीय क्षेत्रों के प्राकृतिक रक्षा कवच जैसे मैंग्रोव वन, कोर रीफ और तटीय दलदली भूमियों का पुनरुद्धार करना होगा, जो चक्रवात की लहरों और हवाओं के प्रभाव को कम करने में एक प्राकृतिक अवरोधक का काम करते हैं। नगर नियोजन और ढांचागत विकास को पर्यावरण-अनुकूल बनाना होगा ताकि वे ऐसी चरम प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में सक्षम हो सकें।

टाइफून बावी हमारी रोती हुई और कराहती हुई पृथ्वी की एक पुकार थी। यह एक सन्देश था कि मानव प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसी का एक छोटा सा अंश है। यदि हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने का हुनर नहीं सीखेंगे और अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्गठित नहीं करेंगे, तो आने वाला समय इससे भी अधिक प्रचंड और विनाशकारी आपदाओं का साक्षी बनेगा।

दुर्गेश्वर राय