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    कम नहीं हुई है मिट्टी के दीयों की महत्ता

    सौम्या ज्योत्सना

    मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार

    दीपावली की बात मिट्टी के दीयों की चर्चा के बगैर अधूरी है. इसके बिना दीपावली की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. हज़ारों सालों से यह परंपरा चली आ रही है. इससे सबसे अधिक लाभ इसका कारोबार करने वालों को होता है. मिट्टी से दीया बनाने वाले कुम्हार समुदाय से लेकर इसे बेचने वाले कारोबारी तक इसी त्यौहार का इंतज़ार करते हैं. लेकिन बदलते समय और तकनीक के विकास ने इस कारोबार को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है. शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक लोग दीयों की अपेक्षा बिजली से चलने वाले इलेक्ट्रिकल दीयों को प्राथमिकता देने लगे हैं. हालांकि इसके बावजूद मिट्टी के दीयों की महत्ता पूरी तरह से समाप्त नहीं मानी जाती है.

    यह तथ्य है कि मौलिकता सदा अपनी ओर खींचती है और इसी मौलिकता का प्रमाण है, दीये और मिट्टी से बनी कलात्मक वस्तुएं. इन मिट्टी की दीयों में हाथों की खुशबू है, मेहनत का रंग है और पंचतत्व का मिश्रण है. भले ही आज चाइनीज लाइटों का चलन बढ़ गया हो, लेकिन घर के आंतरिक कोने मिट्टी के दीयों के बिना अधूरे हैं. हालांकि कांसा, चांदी या पीतल का दीया भी चलन में रहता है लेकिन परंपराओं के अनुसार मिट्टी के दीयों का महत्व सदा बना हुआ है और हमेशा बना रहेगा. लेकिन इसे गढ़ने, आकार देने, उसके हर एक कोने को बारीकी से तराशने और चाक को करीने से घुमाने में एक कुम्हार अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है. आजकल दीवाली के अवसर पर कुम्हारों की बस्ती भी एक आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. दूर-दूर तक फैली मिट्टी और उस मिट्टी से गढ़ी कलात्मक सामग्रियों के प्रति लोगों का उत्साह भी नज़र आ रहा है. मगर कुम्हारों के लिए लोगों के उत्साह और प्रोत्साहन के साथ-साथ जीविकोपार्जन के लिए आर्थिक जरूरतें भी होती हैं, जो पहले की अपेक्षा पूरी नहीं हो पा रही हैं.


    ग्रामीण व मिट्टी बर्तन के व्यवसायी शहवीर पंडित बिहार के मोतिहारी जिला स्थित एक ग्रामीण कस्बे से ताल्लुक रखते हैं. पहले और आज के दौर में मिट्टी के दीये और अन्य सामग्री के महत्व के सिलसिले वह बताते हैं कि पहले दीया ज्यादा मात्रा में बिकता था क्योंकि अधिकांश लोग केवल दीया ही जलाते थे मगर अब उसके स्थान पर रंगीन बत्ती वाली लाइट लोगों की पसंद बनती जा रही है, जिस वजह से दीयों की बिक्री प्रभावित हुई है. इसके अलावा बढ़ती महंगाई ने भी इस व्यवसाय को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है. महंगाई के कारण लागत और श्रम मूल्य तो बढ़ गया, परंतु लोगों के खरीदने की क्षमता प्रभावित हुई है. रही सही कसर इलेक्ट्रिकल दीयों ने पूरी कर दी है.

    शाही लीची के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध बिहार के मुजफ्फरपुर शहर स्थित ब्रह्मपुरा इलाके के रहने वाले मिट्टी के कारोबारी मोहम्मद इसराइल बताते हैं कि पहले की अपेक्षा अब मिट्टी और इससे जुड़ा व्यवसाय लगातार घाटे में चल रहा है. मिट्टी के एक ट्राली की कीमत 6 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है. इसकी तुलना में दीये और अन्य सामग्रियों के बिकने के बाद भी कई बार ट्राली की कीमत तक वसूल नहीं हो पाती है. साथ ही मौसम भी साथ नहीं दे रहा है. धूप की मौजूदगी में अचानक बारिश हो जाती है, जिस कारण बहुत परेशानी होती है. इससे आमदनी भी लगातार कम हुई है. असंगठित क्षेत्र का कारोबार होने के कारण सरकार के तरफ से भी कोई विशेष सहायता भी नहीं मिल पाती है. हालांकि राज्य सरकार की ओर से इस समुदाय के उत्थान के लिए और उनके कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है, लेकिन समुदाय में जागरूकता की कमी और विभाग की उदासीनता के कारण कुम्हार समुदाय इसका कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता है. यही कारण है कि इस समुदाय के लोगों को दीपावली से ही उम्मीदें रहती हैं कि कुछ आमदनी होगी.


    वास्तव में, भारत में असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. जिसमें कोरोना के बाद काफी व्यापक स्तर पर बदलाव हुआ है क्योंकि कई लोग जहां विस्थापित हो गए हैं वहीं कोई विशेष लाभ नहीं होने के कारण धीरे धीरे इस समुदाय की नई पीढ़ी इससे दूर होती जा रही है. पिछले दो दशकों में तेजी से आर्थिक विकास देखने के बावजूद भी भारत में 90% श्रमिक अनौपचारिक रूप से कार्यरत हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग आधा उत्पादन करते हैं. Periodic Labor Force Survey (पीएलएफएस) के आंकड़ों के अनुसार देश के 75 प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे हैं और स्वयं अपना जीविकोपार्जन कर रहे हैं. लेकिन इस आमदनी में जीवन व्यतीत करना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. हालांकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए सरकार की ओर से ई-श्रम पोर्टल को साल 2021 में ही लांच किया गया है, जिसमें बिहार राज्य पंजीयन संख्या में दूसरे स्थान पर है मगर अफसोस इस बात का है कि अधिकांश लोगों को इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है क्योंकि जिसके लिए दो वक्त की रोटी भी रोज कमा कर खानी पड़े, उसे डिजिटलाइजेशन के बारे में जानकारी का अभाव होना यथार्थ ही लगता है.

    हालांकि दीयों की चमक किसी भी आर्टिफिशियल लाइट्स से कम नहीं होगी क्योंकि सालों से चली आ रही परंपराओं का अचानक अंत असंभव है. बच्चों के लिए मिट्टी से बने कुल्हिया-चुकिया से खेलना आज भी उत्साहवर्धक है तथा बचपन को जीवंत बनाए रखने के समान है. इसके अतिरिक्त बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में सामा-चकेवा भी मिट्टी के बर्तनों और दीयों की चमक के बिना अधूरा है. भले ही दीपावली के समय शहरी इलाकों में मिट्टी के दीयों की जगह इलेक्ट्रिक झालरों ने ले ली हो, लेकिन प्रतिदिन शाम में दरवाज़ों पर इसी मिट्टी के दीयों से दीपक जलाने की परंपरा शहरों में भी कायम है. जो इस बात का सबूत है कि विकास के दौर में भी भारतीय सभ्यता और परंपरा कायम है और यही ही परंपरा इस कारोबार से जुड़े लोगों के विश्वास को मज़बूत बनाता है. विकास के इस दौर में भी मिट्टी के दीयों का महत्व बरकरार है. 

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