लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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 (१)

विकलांग मानसिकता

सफलता प्राप्ति के लिए, सबसे पहले हमें, अपनी विकलांग मानसिकता से ऊपर उठना होता है।

”अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ।) का घोष, या शंकराचार्य रचित — ”चिदानन्द रूपश्शिवोहम्‌ शिवोहम्‌” का उद्‌घोष आपको बार बार करते हुए, अपने चित्त-बुद्धि-आत्मा को उस भाव से सराबोर करना होता है। जो आपके मन, बुद्धि और आत्मा को उपर उठा देता है।कहते हैं, ”मनः अस्ति स मानवः”। अर्थात, मनुष्य मानसिक प्राणी है, वह उत्साह की सोच मात्र से उत्साहित हो जाता है।

सुना होगा ही,कि विजय प्राप्ति के लिए सब से कठिन, अपने मन की सीमा पार करना होता है; जिसे पार किए बिना विजयी होना असंभव होता है।

(२)

हीन ग्रन्थि, दास्यता ग्रन्थि, या लघुता ग्रन्थि

हीन ग्रन्थि, दास्यता ग्रन्थि, या लघुता ग्रन्थि इत्यादि ग्रन्थियाँ; ऐसी मानसिक खाइयाँ हैं, जिन्हें पार किए बिना (हम) आप स्वतन्त्र नहीं हो सकते। हम सच्चे अर्थ में स्वतंत्र इसी लिए नहीं है, क्यों कि इन सीमाओं को हम सामूहिक स्तर पर, पार नहीं कर पाए हैं। शरीर स्वतन्त्र है, पर मानसिकता अभी भी गुलामी की है, सारी समस्याओं की जड यही है।

यदि हम ही गुलाम होते, और हमारा शासन दूर दृष्टिका नेतृत्व रखता, तो भी समस्याएं कम होती। पर हमारा नेतृत्व नेतृत्व है ही नहीं। वह सत्ता-शासन के पीछे भागता गुलाम है। वह शासन का, और आसन का, कुरसी का, पीछा कर रहा है। यह कैसा नेतृत्व?

वास्तव में सही नेतृत्व का सम्बंध नेत्र से होता है। जिन्हें दूर के, और निकट के भविष्य की अपेक्षित घटनाएं दिखाई दे, और कुछ तर्क भरा अनुमान कर सकने की क्षमता हो, उसे नेता कहते हैं। ऐसा नेता उस दृष्टि से राष्ट्र को दिशादर्शन करता है, और कठिन समस्याओं का सामना करने की क्षमता रखता है।

(३)

हमारे वैश्विक योगदान

इस लिए हमारे वैश्विक योगदान की सच्चाइयाँ लिखने का प्रयास चल रहा है। जिस से हीन वृत्ति का त्याग सरल हो, इसी दृष्टि से संस्कृत की वैश्विक महत्ता, देवनागरी की वैज्ञानिकता, और अन्य अनेक क्षेत्रों में हमारा वैश्विक योगदान, ऐसे विषयों पर आलेख लिखे गये हैं। सच्चाई ही लिखी गयी है।

इसी दृष्टि से, भारतीय संस्कृत मूल धातुओं का अंग्रेज़ी पर, ऐतिहासिक उदाहरणों सहित प्रभाव (युरप) दिखाने का प्रयास चारेक शब्द वृक्षों को रचकर किया गया था। स्पष्टतः हेतु था, कि हम हमारा ही योगदान जानकर, हीन वृत्ति का त्याग करें, आत्मविश्वास धारण करें, और स्वतन्त्रता का भाव जाग्रत हो।

जब हमी ने संसार को अंक दिए, भाषा दी, संस्कार दिए, तो हमें हीनता का अनुभव कैसा? और भी अनेक ऐसे पहलु हैं, जिसका प्रमाण देने पर उल्लेख किया जा सकता है। संसार भर में कुटुम्ब या परिवार प्रणाली भारत की देन मानने के लिए भी पर्याप्त प्रमाण है।कुटुम्ब परिवार की सारी संज्ञाएं संस्कृत की मुद्राओं सें अंकित इसी लिए हैं। संगीत के स्वर जो साम-वेद से निकले भारत की देन ही माने जाते हैं। सा रे ग म … का सप्तक, और दो रे मी फा का सप्तक, समान सिद्धान्तों पर आधारित भी इसी लिए ही है।

(४)

देववाणी संस्कृत का सियामी (थायलॅन्ड )भाषा पर प्रभाव

आज एक अलग विचार रखना चाहता हूँ। निम्न सूची में आप देख पाएंगे, कि देववाणी संस्कृत का सियामी (थायलॅन्ड )भाषा पर कैसा प्रभाव है।

सूचना: हमारे संस्कृत शब्दों के अर्थ, और थायलॅंड की भाषा के शब्दार्थों में कुछ अंतर अवश्य आ चुका है।

जो शब्द वहां पर रूढ हो चुके हैं, हमारे शुद्धिवादियों को चकित और साशंक भी कर सकते हैं। और उन शब्दों को नितान्त सही मानने पर भी कठिनाई हो सकती है। पर ध्यान रहे कि शब्द फिर भी संस्कृत से ही उपजे हुए हैं।

शब्द और उनके अंग्रेज़ी अर्थ पढने पर आप की निम्न प्रक्रियाएं संभव हैं।

(१) कहीं अर्थ विस्तार की प्रक्रिया देखी जा सकती है।

(२) कहीं, उनकी अपनी रूढि के अनुसार शब्दार्थ कुछ अलग है।

(३) कुछ आपकी दृष्टि से अनुचित लगने वाले शब्द भी आपको मिल पाएंगे।

पर ध्यान रहे कि फिर भी शब्द संस्कृत मूल के ही है, और यह हमारा प्रभाव ही है।

कुछ शब्दार्थ विस्तार हमारे यहां पर भी हुआ है, और अलग अर्थ भी अस्तित्व में आये हुए हैं। उदाहरण दे कर आलेख बहुत लम्बा होगा, इस लिए संयमित प्रस्तुति कर रहा हूँ।

(५)

थायलॅंड (सियाम) की अर्थ शब्द सूची और अर्थ।

थायलॅन्ड की लिपि भी देवनागरी उच्चारण पर अधारित ही है। जैसे भारत की अन्य लिपियां भी देव नागरी का ही अनुसरण करती है।

अंग्रेज़ी शब्द = थाय प्रति शब्द।

Academic = विद्याकार

Achievement = समृद्धि

Analogy = उपमान,

Arithmetic =लेख गणित

Attribute = गुण लक्षण

age =आयु

business activity = धुराकृत कृत कार्य,

Manufacturing Activity = हस्त कर्म कृतकार्य,

arithmetical mean = मध्यम लेखगणित

arithmetical series = अनुक्रम लेख गणित

business Establishment =स्थान कार धुराकृत

Catastrophe =विपत्ति

Causation = हेतुक कर्म

Coefficient Of correlation = सम्प्रसिद्धि सह्सम्बंध

Concept =मनोभाव

Computation =कार गणित,

Arithmetical Concept =मनोभाव गणित शास्त्र,

Consumption = कार-परिभोग,

Correlation = सह-सम्बन्ध

Negative Correlation = सह-सम्बन्ध निषेध

Crisis =विकृत काल

Primary Data = मूल प्रथम-भूमि

Qualitative Data = मूल गुण-भाव

Quantitative Data = मूल परिमाण

Secondary data =मूल दुतिय भूमि,

Decade= दश वर्ष,

Deduction =निर्णय

Degree = अंश

Derivative, = अनुबन्ध

Description,= वर्णना

Effects,=फल

Seasonal Effects,=फल ऋतुकाल

Element = धातु-मूल

Time Element,= धातु मूल वेला

Agricultural Equipment,=परिबन्ध क्षेत्र कर्म

Establishment = स्थान कार

Estimate = प्रमाण

Formula =सूत्र

Geography = भूमि शास्त्र

Geometry = रेखा गणित

Geometric Mean = मध्यम रेखा-गणित

Homogeneous = एकबन्धु

Ideal = उत्तम गति

illusion, illusory = माया

Optical Illusion = दर्शन माया,

incidental = हेतु उपपत्ति

index = दर्शनी

historical series = अनुक्रम प्रवत्ति

incident = उपपत्ति

induction = उपनय

infinite = अनन्त

influence = इद्धिफल

measure = मात्रा

method =विधि

nature = स्वभाव

net correlation = सह सम्बंध शुद्धि

normalcy = प्रकृति भाव

Conical = शिखर भाव

Phenomena = प्रकट कारण

Relationship = सम्बन्ध भाव

Sequence = अनुपर्व

Ultimate = अन्तिम

Zone = खेत

Irrigation = जल प्रदान,

Agriculture = क्षेत्र कर्म,

Economics = श्रेष्ठ शास्त्र

Activity = कृत्यकार

Public Interest = साधारण प्रयोजन

Independent = एकराज

State = राष्ट्र,

Race = जाति-बन्धु,

Nationality = संजाति

Imaginary = चिन्त भाव

Infer = अनुमान

Mean time = वेला मध्यम,

Medium = मध्यस्थान,

Mode = नियम,

Negative = निषेध,

Net = शुद्धि,

Normal = प्रकृति,

Occupation = आजीव

Organic = इन्द्रीय

Peak = शिखर

Potential = शक्य

Seasonality = भाव: ऋतुकाल

Special =विशेष

Zero = शून्य,

Zone of Estimate = खेत काल-प्रमाण

Union = सहभाव

Commerce = वाणिज्य,

Production = फलित कर्म,

Object = वस्तु

Country = प्रदेश

Nation = जाति

People = प्रजा जन,

Population = प्रजाकर

शब्द और भी काफी मिले, पर सीमित लेख में, कुछ उदाहरणों से ही प्रमाण किया गया है।

आपको इन उदाहरणों से देववाणी संस्कृत के शब्दों का थायलॅंड की भाषा पर प्रभाव का अनुमान हो सकता है।

संदर्भ:

डॉ. रघुवीर जी के, लेख।

17 Responses to “थायलॅंन्ड पर संस्कृत का प्रभाव — डॉ. मधुसूदन”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    Dr. Rajesh Kapoor

    आदरणीय प्रो मधुसुदन जी एक विनम्र सुझाव है की हिंदी पर आप द्वारा किये गए अभूतपूर्व कार्य पर एक ग्रन्थ रचना का प्रयास करें जिससे आने वाली पीढियां इससे लाभान्वित हो सकें. भारत के लिए यह एक अतुलनीय योगदान सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं. उस ग्रन्थ का संपादन किसी हिंदी क्षेत्र के निवासी विद्वान से करवाएं तो उचित होगा. अन्यथा उस पर गुजराती प्रभाव स्वाभाविक रूप से आ ही जाता है.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      डॉ. राजेश जी, धन्यवाद।
      आपका सुझाव शिरोधार्य है।
      सही सही आप का प्रत्येक बिन्दु स्वीकार्य है।
      काम चल ही रहा है।
      इस विषय के पहलु भी काफी हैं।
      जो लिखा जा रहा है, पाठकों की रूचि से भी अधिक संस्कृत की पठन पाठन की हीन-दीन दशा और उसकी ओर घोर उपेक्षा का परिणाम प्रतीत होता है।
      आज अमरिका में जितने विश्वविद्यालय संस्कृत पढा रहें हैं, उसे जानकर भारत का सर नीचा हो जाएगा। पीडा इसीकी होती है।
      सारा योगासन व्यवसाय, सारा ध्यान-समाधि (मेडिटेशन) व्यवसाय-हलदी अदरक नीम का भी पेटंट करने वाली कल्चर (संस्कृति नहीं) है यह पश्चिम।
      हमारी गीता को, वॉरन हेस्टिंग्ज़ अंग्रेज़ी अनुवाद कराके, इंग्लैंड ले गया, कार्पोर्शन वहां पढकर सफल होती रही। और हम गुलाम के गुलाम! मॅनेजमेंट की पुस्तक पर “कर्म योग” का श्लोक देखा है। हम सेक्य़ुलर ऐसा नहीं कर सकते!
      भारत जागे,—> पाणिनि की तोडका कोई “नोबेल प्राइज़” पाने वाला क्या, उसके दसवें भाग का वैय्याकरणी भी, आज तक हुआ नहीं है, न आगे होगा।
      अब शेल्डन पॉलॉक (कोलम्बिया युनिवर्सिटी) अंग्रेज़ी के व्याकरण की पाणिनि के पद चिह्नोंपर पुनर्रचना करना चाहता है। २२ विद्वानों की समिति एक बार अंग्रेज़ी का परिष्कार करने में असफल हो चुकी थी।
      और भारत अंग्रेज़ी के पीछे पागल?
      सच है हम हार गये, गांधी हार गये, मैकाला जित गया।
      मेरी पीडा, मैंने किसे सुनाना?धन्यवाद! प्रवक्ता मुझे जगह देता है, कहने के लिए।
      अनगिनत सच्चाईयां पाठकों के सामने रखना चाहता हूँ। सच्चाई ही रखूंगा, सच्चाई के सिवा कुछ नहीं—-भारत (हम) जगे और( हमारा) आसन ग्रहण करें।
      सं सा र भ र— में —- मु क्ति– वि द्या– का — स र्व— श्रे ष्ठ— ज्ञान— दे व- वा णी —के –सि वा– कि सी– औ र– भा षा– में– न हीं—- है। इसे भूल कर हम खतम हो जाएंगे।

      Reply
  2. शिवेंद्र मोहन सिंह

    बहुत सुंदर… स्तुति योग्य प्रयास … मैं यहाँ तमिलनाडु में करीब ८-९ मास से हूँ, और बातचीत में बहुत से शब्द हिंदी के या संस्कृत के होते हैं, हिंदी के शब्द आते ही में उन्हें रोक देता हूँ और कहता हूँ की ये तो हिंदी का शब्द है तो ये लोग बहुत खुश होते हैं. विशेष तमिलनाडु में अधिकतर जन साधारण हिंदी लिखना पढना जानता है सिर्फ एक कमी है की वो हिंदी को समझ नहीं पता है. अगर इस पर थोड़ा ध्यान दिया जाए तो ये समस्या भी समाप्त हो सकती है. ये कार्य हम हिंदी भाषियों को ही करना होगा. आंध्र और केरल में तो हिंदी को लेकर कोई समस्या नहीं है.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      शिवेन्द्र मोहन सिंह जी। धन्यवाद।
      (१)मुझे भी आप की ही भाँति अनुभव कॉइम्बतूर में देढ वर्ष पूर्व, आया था।
      (२)आर्य वैद्य शाला में हिन्दी की जानकारी उन्नति(प्रमोशन) का कारण माना जाता था।
      (३) एक पुस्तक की प्रस्तावना में हिन्दी राष्ट्रभाषा होने के कारण पुस्तक को प्रचारार्थ हिन्दी में लिखा गया है, ऐसा उल्लेख किया गया था। पुस्तक मेरे पास हैं।
      (४)डॉ. कलाम की भी हिन्दी में अनुवादित पुस्तकें पढी जा रही है।
      (५)और दक्षिण भारत हिन्दी प्रचारिणी सभा के कार्यवाह अन्नामलाई जी का विवरण है, कि १९६५ में २०,००० छात्र तमिलनाडु में हिन्दी सीखते थे, आज उससे ३० गुना संख्या ६००,००० छात्र हिन्दी सीख रहें हैं।
      (६) मेरे छात्र और अन्य प्राध्यापकों से पता चल रहा है, कि संस्कृत शब्दों की कडी ही हमें दक्षिण से जोड सकती है।
      (७) हमारे पहले दौर में इस कडी की उपेक्षा और अनुपात से अधिक, अरबी फारसी का अतिवादी अनुनय हमें महंगा पडा। {उत्तर भारतियों को यह बिन्दु जल्दी समझ नहीं पडता. क्यों?}
      (८) दक्शिण में मुसलमान भी प्रायः स्थानिक भाषाएं बोलते हैं।
      (९) फिर हिन्दी भाषियों का वर्चस्ववादी पैंतरा भी उनके विरोध का कुछ मात्रा में कारण था। समय मिलने पर केवल इसी बिन्दु पर लिखूंगा।
      दक्षिण को भी सहानुभूति पूर्वक ही सुलझाया जा सकेगा, बल प्रयोग से नहीं।
      मैं कुछ वहां के, हिन्दी विद्वानों के मत जानना चाहता हूँ।आप वहां कुछ विद्वानों के सम्पर्क से वार्तालाप कर के कुछ जानकारी जुटा सकें, तो देखिए। आलेख में मुझे काम आयेगी। आप प्रतिक्रिया दीजिए।
      धन्यवाद।

      Reply
  3. Vishwa Mohan Tiwari

    साधुवाद
    एक् प्रेरणादयक लेख के लिये।
    एक प्रश्न : क्या यह पता लग सकता है कि (थायलैन्ड) सियाम की सियामी भाषा मे‌ संस्कृत के शब्द कितने प्रतिशत हैं ?
    मैं जब बैंकाक गया था तब गाइड से बात करते समय उसे रोककर बतलाता था कि वे शब्द तो संस्कृत के हैं, जो वह यह सुन कर प्रसन्न होती थी और स्वीकार करती थी कि उसे यह मालूम नहीं था।
    उनके उच्चारण अलग हैं, किन्तु सरलता से समझे जा सकते हैं।
    क्या अपने लेख में वे उच्चारण भी आप दे सकते हैं?
    आपने शब्दों की सूची में अंग्रेज़ी शब्द पहले दिये हैं और सियामी शब्द बाद में, पहले सियामी शब्द देने से अधिक प्रभाव पड़ता है।
    भारतीयों में भारतीयता के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिये पुन: धन्यवाद

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      Dr Madhusudan

      अगला आलेख आपके सुझाव के अनुसार, आज ही प्रवक्ता को भेज दिया है|
      आभार.
      कृपांकित — मधूसूदन|

      Reply
  4. अवनीश कुमार सिंह

    सफलता प्राप्ति के लिए, सबसे पहले हमें, अपनी विकलांग मानसिकता से ऊपर उठना होता है।
    अवश्य,
    ऐसे ही हम युवाओं का मार्गदर्शन करते रहें| हम अवश्य ही भारत और भारतीयता के नव ध्वजवाहक बनेंगे|

    Reply
  5. SATYARTHI

    आचार्यप्रवर मधुसूदन जी जिस प्रकार हमलोगों का ज्ञानवर्धन कर रहे हैं उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापन के लिए मेरे पास उचित शब्द नहीं हैं.संस्कृत और थाई भाषा दोनों में ज्ञानशून्य होने के कारण मधुसूदन जी के इस लेख पर टिप्पणी करना संभव नहीं है पर आचार्य जी से अनुमति की अपेक्षा रखते हुए थाई देश में भारतीय संस्कृति के प्रभाव पर अवश्य कुछ कहना चाहूँगा. मुझे ६ वर्षा पहले बंगकोक में लगभग ६ सप्ताह रहने का अवसर मिला . यह जान कर सुखद आश्चर्य हुआ की वहां के राजाअपने आप को राम की उपाधि से अलंकृत करने में गौरव अनुभव करते हैं. कई सडकों पुलों इत्यादि के नाम राम-१
    राम ४,इत्यादि हैं. वर्त्तमान राजा का नाम राम-९ के अतिरिक्त भूमिबोल अदुल्यदेज (=भूमिबल अतुल्यतेज) जो लगभग शुद्ध संस्कृत उपाधि है.थाई लोगों की अपनी रामायण भी है जिसे राम कियन कहते है यह स्पष्ट ही राम आख्यान का ही अपभ्रंष है थाई टीवी पर अक्सर रामायण के आख्यान प्रसारित होते रहते हैं. थोड़े दिन पहले थाईलैंड के नए एअरपोर्ट का उद्घाटन हुआ .एअरपोर्ट के हॉल में एक विशाल शिल्प कृति लगाई गई है .जानते हैं क्या दर्शाया गया है ? वही हमारा पौराणिक समुद्र मंथन.थाईलैंड के चप्पे चप्पे में ( बौद्ध धर्मावलम्बी i) थाई लोगों द्वारा सहेज कर रखी गई हिन्दू संस्कृतिक विरासत के दर्शन होते हैं.
    जिस अपार्टमेन्ट होटल में हम ठहरे थे वहां रिसेप्शन पर बैठी महिलाओं में एक की नामपट्टी पर
    सुपत्ता लिखा था उन में से एक दूसरी महिला ने जब उसे संबोधित किया तो मुझे पता लगा की उसका नाम सुपत्ता नहीं बल्कि सुभद्रा था.अंग्रेजी को उन्हों ने अपना अलग उच्चारण दे रखा है

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      सत्त्यार्थी जी, आप की टिप्पणी एक संक्षिप्त आलेख ही है।
      भारतीय संस्कृति सारे विश्व में अकेली समन्वय वादी संस्कृति है। एवं मुक्ति मार्ग के विशेषज्ञ हम ही है। इसी लिए विश्व में हमारी अलग पहचान है।
      स्थूल रूप से, अन्य सभी संस्कृतियाँ वर्चस्ववादी ही है।
      अनुरोध: मैं व्यवसाय के कारण “आचार्य” यह अभिधा स्वीकार भी कर लूँ, पर “प्रवर” का प्रयोग मुझ पर जो भार आरोपित करता है, वह योग्यता मुझ में नहीं है। कभी आपकी अपेक्षा पूरी ना कर पाउं तो?

      सविनय, सादर मधुसूदन

      Reply
  6. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    Pratibha Saksena

    हिन्दी संस्कृत > प्राकृत/अपभ्रंश के विकास-क्रम में आती है पर आज उसका जो रूप प्रचलित है वह अनेक विदेशी प्रभावों का परिणाम है . अब वे प्रभाव भाषा ने इतने आत्मसात् कर लिये कि भाषा का अंग बन गये .वैसे भी एक ही मूल से विकसित शब्द-प्रयोगों में स्थान और व्यवहार के अनुसार अर्थों में अंतर हो जाता है .
    अब हमारे यहाँ लोगों को संस्कृत भाषा बोलने में ,समझने में कठिनाई होती है -उसे अपनी विरासत मानने में कठिनाई होती है .अपनी गौरवमयी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं का रण वही स्वाभिमान की कमी और अपनी प्राचीन धरोहरों के का प्रति उदासीनता .
    आपके प्रयास स्तुत्य हैं .प्रभाव पड़ेगा ही .धीरे-धीरे ही सही .
    .

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      प्रतिभा जी –हिन्दी को यदि “राष्ट्र भाषा भारती” का पद निर्वाह करना है, तो क्या करना होगा? इस विषय पर सोच चाहिए। हिन्दी नहीं –पर “राष्ट्र भाषा भारती”। इस लिए हमें दक्षिण से भी शब्द जोडने होंगे, आत्मसात करने होंगे।
      हिन्दी को, अरबी- फारसी के अनुनय के कारण ही, अंशतः, राष्ट्र भाषा रूप में, स्वीकृति नहीं मिल पायी थी। इस गलती को दुहराना नहीं है। {दक्षिण के हिन्दी विद्वानों से कभी बात कीजिए}
      मानता हूँ, कि, कुछ अरबी-फारसी-अंग्रेज़ी शब्द घुल मिल गए हैं, उनका “हिन्दीकरण” भी हो चुका है; स्वीकार्य ही है।
      हिन्दी यदि ऊंचाई पर उठ नहीं सकती तो प्रादेशिक भाषा बन कर रह जाएगी।
      पर रामनन्द सागर के रामायण धारावाही के आधारपर “राष्ट्र भाषा भारती”–और खडी बोली का व्याकरण –और देशकी सभी(उर्दू से भी) भाषाओं से शब्द ग्रहण कर “राष्ट्र भाषा भारती” सोची जा सकती है।पारिभाषिक शब्दावली सभी की संस्कृत ही होगी।
      मैं इस पर और विचार कर रहा हूँ। सारा पत्थर पर लिखा ना मानें। कुछ समय लेकर आलेख सोच रहा हूँ।
      दक्शिण को जोडने में संस्कृत बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी। रामायण धारावाही बंगलूर में भी यातायात रुकवा देती थी। सोचिए।{तेलुगु,कन्नड, मल्ल्यालम ७० से ८०% संस्कृत शब्दो वालीहै} केवल (तमिल ही ४० से ५० % संस्कृत शब्द रखती है)
      अनुभव किया है, कि हिन्दी भाषी प्रदेशों के ही विचारकों को यह बात समझने में कठिनाइ होती है।
      पत्थर पर की लकीर ना मानें। अभी मैं सोच ही रहा हूँ। आप अपने अलग विचार भी दर्शाइए। मुझे काम आएंगे।
      सप्रेम नमस्कार।

      Reply
      • अवनीश सिंह

        बहुत ही शानदार विचार है| पुरे देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए संस्कृत से उपयुक्त कुछ नहीं है| मैं भी अक्सर ये विचार करता हूँ कि संस्कृत को अभी एक झटके में देश पूर्ण रूप से कम-काज की भाषा नहीं बनाया जा सकता| पर बहुत सारी प्रादेशिक भाषाओं में उनके प्रदेश के कार्य हो रहे हैं तो किसी न किसी भाषा को तो संस्कृत का अधिक प्रयोग करते हुए तथा अन्य प्रदेशो की भाषाओँ से शब्द लेते हुए मानकीकृत करना होगा|
        वह भाषा कोई सी भी हो सकती है पर विस्तार की दृष्टि से अभी तो हिन्दी ही उपयुक्त लग रही है पर प्रश्न यही है कि क्या हिंदी के विद्वान दक्षिण की भाषाओँ के साथ समन्वय बिठाना पसंद करेंगे और उनसे शब्द लेने में नहीं हिचकेंगे?

        Reply
        • डॉ. मधुसूदन

          Dr Madhusudan

          प्रिय अवनीश —धन्यवाद.
          निम्न सोच पर प्रतिक्रिया चाहता हूँ.

          ऐसा यदि हो, तो राष्ट्र भाषा का अलग गठन किया जा सकता है.
          (१) उसे हिंदी नहीं पर “भाषा भारती” नाम दिया जाएगा.
          (२) हरेक भाषा के विद्वान् प्रतिनिधि इस आयोग या समिति में लिए जाएं.
          {अपनी भाषा छोड़ कर किसी और भाषा को मत दे सकने की अनुमति रहेगी}
          { राजनितिग्योको दूर रखा जाना चाहिए.}
          (३) खड़ी बोली का व्याकरण और ———
          (४)शब्द सभी भारतीय (अभारतीय या परदेशी नहीं) भाषाओं से लिए जाएं.
          (५)अपवादात्मक घुल मिल चुके हुए शब्द स्वीकृत किए जाएं
          (६)संस्कृत के रामायण की धारावाही जैसे शब्द बंगलूर में भी समझे जाते थे, यह देखा गया है.
          ====> शिवेंद्र मोहन सिंह जी को दिया हुआ मेरा उत्तर पढ़ने का अनुरोध.
          पूरा आलेख विचार रहा हूँ.
          शर्त एक ही होगी—केवल भारतीय भाषा घटकों का स्वीकार किया जा सकेगा.
          राष्ट्र भाषा भारती –नाम पर विचार होगा.
          कुछ कठिनाइयां कम ही होंगी, असंभव नहीं है.
          भारत की एकता दृढ करने में बहुत बहुत सहायता होगी.
          ===पूरा पत्थर पर लिखा ना समझें. क्यों की यह बीज विचार है====

          Reply
          • अवनीश सिंह

            जी, दक्षिण व् उत्तर को मिलाना बहुत जरुरी है और हमारी सबसे बड़ी दुरी भाषा की ही है| एक दूसरे की भाषाएँ तो हम सीखते नहीं हैं और संस्कृत तो हम कब के भूल चुके हैं| तो परिणामस्वरूप हमें एक विदेशी भाषा में संवाद करते हैं|

            आपके सारे बिन्दुओं से सहमत, शिवेंद्र मोहन सिंह जी को दिया हुआ उत्तर भी पढ़ा|
            इसमें एक अच्छी बात ये हो सकती है की दक्षिण में दक्षिण वाले खुद ही उत्तर की भाषाओँ का प्रचार करें और उत्तर में उत्तर वाले दक्षिण की भाषाओँ की पहुँच बढ़ाएं| इससे भाषाई संघर्ष कम होगा और भाषाई समन्वय को बल मिलेगा |
            कार्य आसान नहीं है पर यदि हम ऐसा क्र पाये तो आने वाले भारत की अपनी बुलंद आवाज होगी जो सारे राज्य एक साथ बोलेंगे|

            इस पर सम्पूर्ण लेखमाला की आवश्यकता है |
            सादर

  7. ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

    आदरणीय श्री मधुसूदन जी….सर्वप्रथम आपके इस अहैतुकी प्रयास को नमन।। पुनश्च जो आपने थायलेण्ड में बोले जाने वाली भाषा के बारे में ,संस्कृत के श्रोत को , जो ढ़ूंढ़ने का किया है वह न केवल सराहनीय है बल्कि अपने देश के तथाकथित प्रगतिशील जनों के लिए प्रेणा दायी है। क्यों भारतीय संस्कृति के पले बढ़े इन युवाओं पर आज कल वैदेशिक पाश्चात्य संस्कृति अधिक प्रभाव पड़ता है। रहा सवाल संस्कृत की व्यापकता का तो थायलेण्ड सरकार द्वारा सभी विमानों में से दो ऐसे विमान हैं जिनका नाम क्रमशः ….गरुड़, और अरूण है, अर्थात इससे यह प्रतीत होता है कि वे लोग अपने देश के पौराणिक सन्दर्भों से भी उतना ही प्रभावित हैं जितना संस्कृत देव वाणी से।

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      पण्डित जी–बहुत बहुत धन्यवाद।
      आप के विचारों से सहमति व्यक्त करता हूँ।
      समय देकर आपने विस्तृत टिप्पणी दी।
      आभार।

      Reply

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