लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

भारत को स्वतंत्र हुए अब छ: दशक से ज्यादा हो गए। पहले तीन दशकों में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व राजनीतिक परिदृश्य पर विशालकाय की भांति छाया रहा। अनेक राज्यों में यह सत्ता में थी। लोकसभा में, गैर -कांग्रेस दल इतनी संख्या नही जुटा पाए थे कि उन्हें मान्यता प्राप्त विपक्ष का पद मिलता और इसके नेता, नेता विपक्ष बन पाते।

 

सत्तार के दशक के मध्य में गुजरात में भ्रष्टाचार के विरुध्द एक सशक्त विद्यार्थी आंदोलन उभरा। इससे प्रेरित होकर जयप्रकाशजी ने भी बिहार में भ्रष्टाचार के विरुध्द विद्यार्थियों को जुटाया। इसी अभियान ने जे0पी0 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीब लाया और उसके माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के। इसके अलावा चुनाव सुधारों में उनकी रुचि के चलते मैं उनसे अलग से मिलता रहता था। उन दिनों वह दोहराते थे कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की जड़ें कांग्रेस सरकारों के अपने भ्रष्टाचार में है। जब तक विपक्षी दल विभाजित रहेंगे तब तक इस बुराई का मुकाबला असरदार ढंग से नहीं किया जा सकेगा।

 

अत: भ्रष्टाचार के विरुध्द जे0पी0 आंदोलन जनसंघ, काग्रेस (ओ), समाजवादी पार्टी, और भारतीय लोकदल को एक साथ लाया। अतत: इन दलों ने कांग्रेस के अजेय गढ़ गुजरात में जनता मोर्चे के रुप में महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की।

 

गुजरात का निर्णय 12 जून, 1975 को घोषित हुआ। ठीक उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से लोकसभा के लिए चुनी गई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित करते हुए भ्रष्ट चुनाव साधनों के आधार पर आगामी वर्षों के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दे दिया। 12 जून को घटित इन दोनों घटनाओं ने आपातकाल, एक लाख से ज्यादा लोगों को बंदी बनाने, प्रेस पर सेंसरशिप इत्यादि जैसी घटनाओं को जन्म दिया जिसकी समाप्ति मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव से हुई जब कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और श्री मोरारजी भाई के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार गठित हुई। नवगठित जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हुआ और वह इस सरकार का एक घटक था। आज की द्विधु्रवीय राजनीति के बीज उसी समय पड़ हो गए थे।अत: इससे स्पष्ट होता है कि हमारे राजनीतिक इतिहास में निर्णायक मोड़ का पहला उत्प्रेरक भ्रष्टाचार था।

 

इसलिए यदि हमारे संविधान के अंगीकृत किए जाने के 6 दशक पश्चात दूसरी बार यदि भ्रष्टाचार परिवर्तन का मुख्य उत्प्रेरक बनने जा रहा है, तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा।

 

जब सन् 2011 प्रारम्भ हुआ तो मैंने टिप्पणी की थी कि हाल ही में समाप्त हुआ वर्ष घपलों और घोटालो का वर्ष था। वास्तव में लोकसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन ही भाजपा के नेतृत्व में समूचे विपक्ष ने तीन घोटाले – राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और मुंबई की रक्षा भूमि घोटाले को उठाने का निर्णय किया।

 

यदि पहले दिन ही विपक्ष को उसकी बात कहने दी जाती तो उस दिन से बना गतिरोध जो पूरे सत्र में बना रहा, शायद नहीं होता। विपक्ष का गुस्सा इससे भड़का कि सत्ताधारी पक्ष ने सामूहिक रुप से विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को बोलने नहीं दिया। शीघ्र ही, अधिकांश विपक्षी दलों का यह मत बना कि जब तक सरकार इन घोटालों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाने को तैयार नहीं होती और दोषियों को दण्डित नहीं किया जाता तब तक संसद में और कोई काम नहीं होगा।

 

सरकार और स्पीकर द्वारा आहूत अनेक बैठकें इस गतिरोध का समाधान करने में असफल रहीं। हालांकि ज्यों ही बजट सत्र नजदीक आने लगा और विपक्ष के साथ सरकार की बैठकें हुई, उससे यह अहसास हुआ कि इन परिस्थितयों में जे0पी0सी0 का गठन एक सही कदम होगा। गत् सप्ताह कुछ प्रमुख पत्रकारों के साथ प्रधानमंत्री का संवाद निराशाजनक रहा। इसमें भ्रष्टाचार पर चिंता कम और नकली गठबंधनीय दवाबों के बारे में ज्यादा जोर दिया गया।

 

वास्तव में भाजपा इस तथ्य के प्रति सचेत है कि दूसरे दलों के गठबंधन में नीतिगत मामलों में अवरोधी प्रभाव रहता है। पिछले सप्ताह हैदराबाद की एन0डी0ए0 रैली में, मैंने बताया कि वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली सरकार की उपलब्धियों में से तीन नए राज्यों – उत्तारांचल, छत्तासगढ, और झारखंड के सहज निर्माण को मैं विशिष्ट उपलब्धि मानता हूं। यदि हमारे गठबंधन की सहयोगी तेलगुदेशम पार्टी राजी होती तो हम काफी आसानी से तेलंगाना राज्य भी बना सकते थे लेकिन हमारे गठबंधन धर्म ने इसकी अनुमति नही दी। लेकिन न तो वाजपेयी सरकार और न ही राज्यों में अन्य एन0डी0ए0 सरकारों को गठबंधन धर्म को ईमानदारी या सुशासन का बहाना या आड़ नहीं बनने दिया गया।

 

पिछले महीने ‘दि हिन्दू‘ में प्रकाशित सीबीआई के पूर्व निदेशक आर.के. राघवन का लेख यूपीए सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से निपटने के घोषित किए ‘एक्शन प्लान‘ के प्रति काफी तीखा प्रतीत होता है। उन्होंने इस तथाकथित प्लान को ‘असफल‘ के रूप में वर्णित किया है। लेख का शीर्षक है ”भ्रष्टाचार के विरूध्द हारती लड़ाई”। राघवन ने सीवीसी थामस को ”सरकार के गले में पड़ा बोझ (एलबेट्राेंस)” के रूप में वर्णित किया है। उन्होंने पूर्व सीवीसी विट्ठल के इस कथन से सहमति प्रकट करते हुए उद्दृत किया है कि भ्रष्टाचार भारत में कम जोखिम और ऊंचे लाभ वाली गतिविधि बन गई है।

 

तथापि मैं, सीबीआई के एक दूसरे पूर्व निदेशक सी.वी. नरसिम्हन, जिनकी ईमानदारी और कुशाग्र बुध्दि को सर्वज्ञ प्रतिष्ठा प्राप्त है, द्वारा रखे गए प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।

 

नरसिम्हन ने सुझाया है कि सरकार को ‘सार्वजनिक लोगों के अपराधिक दुर्व्यवहार‘ (criminal misconduct of public men) का कानून बनाना चाहिए। वे कहते हैं कि यह कानून भ्रष्टाचार निवारक कानून, 1988 के तहत आने वाले सभी अपराधों के विरूध्द होगा। इसके तहत राजनीतिज्ञ और नौकरशाह भी आएंगे।

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इसी प्रकार विदेशों के टैक्स हेवन्स में काले धन के मुद्दे को भी पूरी शक्ति से आगे बढ़ाए रखना चाहिए। देश, सर्वाच्च न्यायालय में लम्बित राम जेठमलानी की जनहित याचिका को इसकी तार्किक परिणिति तक पहुंचते देखना चाहता है। आज चुनावी कानून के तहत चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी को अपनी सम्पत्तियां और देनदारियां बतानी पड़ती हैं। विदेशों में जमा भारतीय धन को भारत वापस लाने के मुद्दे को देखते हुए कानून में यह प्रावधान करना चाहिए कि प्रत्येक प्रत्याशी यह शपथ ले कि उसके पास विदेशों में अघोषित सम्पत्ति नहीं है। कानून में सरकार को यह अधिकार देना चाहिए कि यदि ऐसी सम्पत्ति सरकार को पता चलती है तो वह उसे जब्त कर सके।

 

इसी तरह का प्रावधान सभी मंत्रियों, सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों तथा देश के प्रभावशाली वर्ग की विशेष श्रेणी के लोगों पर भी लागू किया जाना चाहिए।

 

राजा के स्पेक्ट्रम घोटाले में सी.ए.जी. द्वारा लगाए गए अनुमान 1 लाख 76 हजार करोड़ रूपए की चपत से देश को हतप्रभ कर दिया है। यदि ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रेटि द्वारा विदेशों के टैक्स हेवन्स में ले जाए गए भारतीय धन का मूल्यांकन बीस लाख पिचहत्तर हजार करोड़ रूप्ए लगभग बैठता है तो कल्पना की जा सकती है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को यह सारा धन वापस लाने को बाध्य कर दे तो भारत की गरीबी को मिटाने पर कितना चमत्कारी प्रभाव हो सकता है!

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प्रधानमंत्री के इंटरव्यू पर सुर्खियां

 

मैं इतना बड़ा अपराधी नहीं हूं जितना बताया जा रहा है : प्रधानमंत्री

(I’m not as big a culprit as being made out to be : PM)

Times News Network

 

मनमोहन का अकेलापन

(THE LONELINESS OF BEING MANMOHAN)

OUTLOOK

 

एक प्रधानमंत्री मीडिया को गपशप के लिए इसलिए नहीं बुलाता क्योंकि उसके प्रधान सचिव ने बताया कि उस सुबह उनका कोई कार्यक्रम नहीं है।

(A PM does not invite media over for a chat because his Principal Secretary has told him that he has nothing scheduled that morning½

INDIA TODAY

 

4 Responses to “भ्रष्टाचार का मुद्दा परिवर्तन का उत्प्रेरक बन सकता है”

  1. sunil patel

    यह समय हजारो सालो तक भ्रष्टाचार का युग कहलायगा. यह भ्रष्टाचार, घोटालो का परचम है, पराकास्था है.
    आदरणीय आडवानी जी बिलकुल सही कह रहे है की “भ्रष्टाचार का मुद्दा परिवर्तन का उत्प्रेरक बन सकता” – बात तो सही है किन्तु वर्तमान की परिस्थितियां कुछ और ही कहती है :
    १. हमारे देश में किसी पार्टी का झंडा लेकर घूमते लोगो को उस झंडे का, पार्टी की इतिहास ही नहीं पता होता है.
    २. बुद्धिजीवी वर्ग तो भाजपा से आशा रखता है किन्तु उसी परिवार के लोग प्रलोभोनो, विज्ञापनों में आकर दूसरी पार्टी को वोट देते है.
    ३. भाजपा में professionalism की कमी है. एक पार्टी लहसुन और प्याज से सरकार गिरा सकती है और भाजपा पूरी रसोई में आग लगने पर भी रोटी सेंक नहीं पाती है.
    ४. २००३ में भाजपा INDIA SHINING के नारे लगा रही थी और कांग्रेस गली गली में, चाय की दुकानों में “आम आदमी का साथ कांग्रेस का हाथ” बताने में नहीं चूक रही थी.
    ५. २००८ में तो EVM machino ने बेडा गर्क कर दिया. वोट मंगनी वाली भाजपा को भले ही विस्वास हो की वोह हार गई किन्तु जिसने भाजपा को वोट दिया था उसे विस्वाश ही नहीं को रहा था.
    ६. भाजपा सषित राज्यों में भी भ्रष्टाचार में खास कमी नहीं आई है. ग्राफ तो तब कुछ कहता है जब दो लकीरों में एक छोटी और दूसरी बड़ी हो अर्थात बहुत अंतर समझ आता हो.

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  2. हरपाल सिंह

    harpal singh sewak

    कपूर साहब की बातो से मै सहमत हु राम राज्य की परिकल्पना को बर्बाद कर दिया इन सबो ने इनसे बड़ा डोंगी कोई नहीं

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    भाजपा पर देश भक्तों की श्रधा रही है. पर उसने जनता को हर बार निराश किया है. कथनी-करनी का ये विशाल अंतर पाटने की कोई व्यावहारिक योजना अगर भाजपा के पास नहीं तो सब कहना- करना बेमतलब है.

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  4. आर. सिंह

    R.Singh

    हो सकता है मुझे अपनी सीमा उलंघन का अहसास दिलाया जाये फिर भी यह कहने के लिए एक तरह से विवश हूँ की आज भी मैं जनता पार्टी के १९७७ के बाद का उठा पटक याद करता हूँ तो मुझे दुःख पहुचता है.जय प्रकाश जी ने सच पूछिये तो उस समय राष्ट्र पिता का रोल अदा किया था. वे शायद मोरारजी देसाई के इमानदारी और कर्त्तव्य परायणता को वखुबी समझते थे इसीलिए उन्होंने एक तरह से अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके इन्हें प्रधान मंत्री के कुर्सी पर बैठा दिया था,पर चरण सिंह और जगजीवन राम की महत्वंक्षाएं इतनी तीव्र थी की उनका बहुत दिनों तक प्रधान मंत्री के कुर्सी पर टिके रहना बहुत ही कठिन था. क्या नजारा था उस समय का आज भी हमारे जैसे लोग याद करते हैं तो आह ही निकलती है.गांधीजी के समाधि पर जाकर शपथ ग्रहण और तब ,राज्य संचालन.आरम्भ के दो वर्षों को मैं स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे स्वर्णिम युग या यों कहिये की उन दो वर्षों को ही मैं स्वतंत्र भारत के इतिहास स्वर्णिम युग मानता हूँ.अडवानी जी भी उस शासन के अंग थे अतः उनके योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता.पर ऐसा क्यों होता है की अच्छी चीजे टिकाऊ नहीं होती.दो वर्षों के बाद ही मोरारजी देसाई का जड़ उन्ही के मंत्रियों ने काटना शरू किया,परिणति हुई जनता पार्टी के विघटन में .जिस इंदिरा को हम लोग सोचते थे की अब सत्ता में आ ही नासकती वह तीन वर्षों के अल्पावधि में ही सत्ता में पुनः स्थापित हो गयी.इसके गुनहगार कमो वेसी वे सब लोग थे जिन्हें जनता ने गद्दी संभालने का अवसर दिया था. उसमे मैं कल के भारतीय जनसंघ और आज के भारतीय जनता पार्टी को भी दोषी मानता हूँ.
    समय बीतता रहा और सत्ता की बागडोर एक हाथों से दूसरे हाथों जाता रहा,फिर आये वाजपेई जी .अडवानी जी को फिर अवसर मिला .कुछ अच्छे काम भी हुए पर मुझे कहते हुए अफ़सोस होता है की वाजपेई जी अपनी पूर्ण एकनिष्ठा और ईमानदारी के वावजूद मोरारजी नहीं साबित हुए,पर हो सकता है की यह एक तरह से अच्छा ही हुआ की वे चार साल तक तो शासन चला सके.पर भारतीय जनता पार्टी को क्या जल्दी पड़ी थी की उन्होंने एक साल पहले ही चुनाव की घोषणा कर दी?मुझे तो अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा लगा.खैर मेरा यह इतिहास दुहराने का मकसद केवल यह था की जनता ने दूसरों को भी अवसर दिया पर वे लोग भी कुछ ऐसा नहीं कर सके जो भारत बनाम इंडिया के लोगों का सोचने का तरीका बदल सके,उनको ईमानदारी की ओर प्रेरित करे. महात्मा गाँधी और बाद में जयप्रकाश जी ने खुद गद्दी पर काबिज न होकर त्याग का मिसाल कायम करने की कोशिश अवश्य की थी पर उससे सबक किसने लिया?लोग सत्तारूढ़ होने केलिए न जाने कितने हथकंडे अपनाते रहे.नतीजा क्या हुआ ?आज हम उस मुकाम पर खड़े हैं की जनता को भी पता नहीं की किसे अच्छा कहे या किसे बुरा कहे?मैं तो यहाँ तक कहने का दुसाहस कर रहा हूँ की भारतीय जनता पार्टी आडवानी जी के परे और खुद आडवानी जी अपने से आगे का क्यों नहीं सोच रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी क्यों नहीं कोई ऐसा चेहरा सामने ला रही है जिसे देख कर ही जनता को भरोसा हो जाये की वह ऐसा विकल्प हो सकता है की भारत की कायापलट कर सके.
    मेरे विचार से कांग्रेस के भ्रष्टाचार की गाथा बार बार दुहराने से कुछ होने जाने वाला नहीं.

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