लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः- गुजरात निकाय चुनाव में लागू हुआ अनिवार्य मतदान का कानून

प्रमोद भार्गव

गुजरात राज्य में होने वाले निकाय चुनावों में अनिवार्य मतदान का कानून लागू कर दिया गया है। अब जो मतदाता मतदान नहीं करेंगे उन्हें दण्डित भी किया जाएगा। हालांकि मतदान न करने वालों को क्या सजा मिलेगी,इसके नियम अब गुजरात सरकार बनाएगी।   अनिवार्य मतदान लागू कर गुजरात देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है, जहां निकाय चुनाव में मतदाताओं को मतदान करना जरुरी होगा। हालांकि देश के सभी चुनावों में अनिवार्य मतदान लागू करने की बहस अर्से से चल रही है। यह मांग सबसे पहले भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उठाई थी। लेकिन संविधान के जानकार इस अनिवार्यता की व्यावहारिक परेशानियां गिनाते हुए इसे संविधान की मूल भावना के अनुरुप नहीं मानते, इसलिए इस व्यवस्था को लोकसभा व विधानसभा निर्वाचन में लागू नही किया जा रहा है।

अनिवार्य मतदान की कोशिश गुजरात सरकार विधेयक के जरिए 2009 से कर रही थी। वर्ष 2011 में राज्य विधानसभा ने इस मकसद का विधेयक पारित भी कर दिया गया था। लेकिन वहां की राज्यपाल रही श्रीमति कमला बेनिवाल ने इस विधेयक को अपने कार्यकाल में पारित नहीं होने दिया था। उनकी दलील थी की यह विधेयक संविधान की भावना से मेल नही खाता। संविधान की धारा 21 के तहत देश के नागरिकों को स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है। इस नाते यदि नागरिक को मतदान के लिए बाध्य किया जाएगा तो यह उसकी स्वतंत्रता का हनन होगा। लेकिन अब न तो कमला बेनिवाल गुजरात की राज्यपाल रहीं और न ही देश की बागडोर कांग्रेस के हाथ में है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और उन्होंने ही गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दृष्टि से मतदान की अनिवार्यता संबंधी विधेयक विधानसभा से पारित कराया था। लिहाजा अब बेनीबाल की जगह ओपी कोहली राज्यपाल हैं,जिनकी नियुक्ति मोदी सरकार ने की है। अब विधेयक के कानून में तब्दील होते ही नगरीय निकाय में प्रत्येक मतदाता को मतदान करना बाध्यकारी हो गया है। हालांकि इस विधेयक के प्रारुप में ग्राम पंचायत के चुनाव में भी अनिवार्य मतदान का प्रावधान था, किंतु फिलहाल इसे हटा दिया गया है।

किसी भी देश के लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब शत-प्रतिशत मतदान से जनप्रतिनिधि चुने जाएं। इस दृष्टि से विधेयक की मूल भावना अच्छी है। इस नाते इसका विस्तार सभी चुनावों में होना चाहिए। हरेक नागरिक का कर्तव्य भी बनता है कि वह हर हाल में वोट दे। लेकिन नागरिक के पास जहां वोट देने का अधिकार है,वहीं वोट नहीं देने का भी संवैधानिक हक है। नोटा के जरिए ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ चुनने का विकल्प भी है। संविधान के इन प्रावधानों के चलते इस विधेयक के औचित्य पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मौजूदा दौर में हमारे यहां मत-प्रतिशत 35-40 से 65-75 तक रहता है। आतंकवाद की छाया से ग्रसित रहे पंजाब और जम्मू-कश्मीर में यह प्रतिशत 20 तक भी रहा है। लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के साथ इन प्रदेशों में भी मतदान में उम्मीद से ज्यादा इजाफा हुआ है।

फिलहाल दुनिया के 32 प्रजातंात्रिक देशों में अनिवार्य मतदान की पद्धति प्रचलन में है। इनमें से 19 ही ऐसे देश हैं जहां सभी चुनावों में यह पद्धति अपनाई जाती है। आस्ट्रेलिया, अर्जेटीना, ब्राजील, सिंगापुर,इटली तुर्की और बेल्जियम इन देशों में प्रमुख हैं। बेल्जियम व कुछ अन्य देशों में मतदान न करने पर सजा का भी प्रावधान है। अलबत्ता इतना जरुर है कि कुछ देशों में 70 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गों को अनिवार्य रुप से मतदान न करने की छूट मिली हुई है।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए आदर्श स्थिति यही है कि हरेक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करे। इस नाते 2005 में भाजपा के एक सांसद लोकसभा में ‘अनिवार्य मतदान’ संबंधी विधेयक लाए थे, लेकिन बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। कांग्रेस व अन्य दलों ने इस विधेयक के विरोध का कारण बताया था कि दबाव डालकर मतदान कराना संविधान की अवहेलना है। क्योंकि भारतीय संविधान में अब तक मतदान करना मतदाता का स्वैच्छिक अधिकार तो है, लेकिन वह इस कर्तव्य-पालन के लिए बाध्यकारी नहीं है। यही वजह है कि वह इस राष्ट्रिय दायित्व को गंभीरता से न लेते हुए उदासीनता बरतता है। कई जनसमुदाय मतदान का इसलिए भी बहिष्कार करते हैं,  क्योंकि परखे गए प्रतिनिधि उनकी समस्याओं का समाधान करने में अक्षम साबित हो चुके होते हैं। क्या इनको भी दण्ड मिलना चाहिए ? हमारे यहां आर्थिक रुप से संपन्न सुविधा भोगी जो तबका है, वह अनिवार्य मतदान को संविधान में दी निजी स्वतंत्रता में बाधा मानते हुए इसका मखौल उड़ाता है। दरअसल इस बहुमूल्य अधिकार का उपहास करने वाले ऐसे ही लोगों को दण्डित करने की जरुरत है। 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 28 करोड़ मतदाताओं ने वोट नहीं दिए। अब क्या इतने मतदाताओं को सजा देना या उन पर जुर्माना थोपना संभव है ?

गुजरात विधानसभा में अनिवार्य मतदान का जो विधेयक पारित हुआ है, उसमें यह नहीं है कि मतदान न करने पर मतदाता को किस रुप में दण्डित किया जाएगा ? जबकि इस तथ्य का खुला सा होना जरुरी है। दण्ड का प्रावधान केवल उन मतदाताओं के लिए सुनिश्चित होना चाहिए जो जान-बूझकर मतदान में हिस्सा नहीं लेते। लोकतंत्र के इस महाकुंभ में ऐसे लोग भागीदारी नहीं करते जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से स्वयं को ऊपर मानते हुए इस ऐंठ और अहम में रहते हैं कि कोई भी प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाए अथवा किसी भी दल की सरकार बन जाए, हमें क्या फर्क पड़ने वाला है ? इन अहंकारियों की नकेल जरुर दण्ड के प्रावधानों से कसी जानी चाहिए।

अनिवार्य मतदान के सिलसिले में सवाल यह भी खड़ा होता है कि हमारे देश में लाखों लोग केवल मतदाता सूचियों की खामियों के चलते मतदान से वंचित रह जाते हैं। मतदान के लिए अनिवार्य पहचान पत्र के अभाव में भी लाखों लोग मतदाता सूची में नाम होने के बावजूद मतदान नहीं कर पाते हैं। ऐसे मतदाताओं को संबंधित मतदान केंद्र प्रभारी, केंन्द्र पर ही मतदान की इच्छा से उपस्थित होने का प्रमाणीकरण दें, तो बेहतर होगा। जिससे मतदाता दोष मुक्त रहे। लाखों लोग फसलों की कटाई के समय अपने मूल स्थानों से पलायन कर जाते हैं। लिहाजा इन दिनों में यदि मतदान होता है तो वे मतदान से वंचित रह जाते हैं। जबकि यह पलायन आजीविका के लिए जरुरी और अस्थायी होता है। इन मतदाताओं के वोट का उपयोग हो, ऐसे विकल्प तलाशना जरुरी है। 75 साल से ज्यादा उम्र के मतदाता को स्वेच्छा से मतदान की छूट मिले। बीमारी से लाचार मतदाता को चिकित्सक, ग्रामसेवक, पटवारी और सरपंच द्वारा जारी प्रमाणीकरण के मार्फत मतदान की छूट मिले। सजा के प्रावधान ऐसे हों, जिसकी भरपाई गरीब से गरीब मतदाता सरलता से कर पाये।

मतदान की अनिवार्यता अल्पसंख्यक व जातीय समूहों को ‘वोट बैंक’ की लाचारगी से भी छुटकारा दिलाएगी। राजनीतिक दलों को भी तुष्टिकरण की राजनीति से निजात मिलेगी। क्योंकि जब मतदान करना जरुरी हो जाएगा तो किसी धर्म, जाति, भाशा या क्षेत्र विशेष से जुड़े मतदाताओं की अहमियत खत्म हो जाएगी। नतीजतन उनका संख्याबल जीत अथवा हार को प्रभावित नहीं कर पायेगा। लिहाजा सांप्रदायिक व जातीय आधार पर ध्रुवीकरण की जरुरत नगण्य हो जाएगी। संघ और नरेंद्र मोदी की यही बुनियादी मंशा है। फिर भी ऐसे हालात यदि निर्मित होते हैं तो भारतीय राजनीति संविधान के उस सिद्धांत का पालन करने को विवश होगी जो सामाजिक न्याय और समान अवसर की वकालात करता है। चूंकि यह विधेयक नरेंद्र मोदी की मंशा से लागू हुआ है, इसलिए इसे भाजपा शासित अन्य राज्य भी लागू करने के लिए उतावले होंगे। लेकिन जल्दबाजी की बजाए इस दिशा में बहस के जरिये ऐसे तथ्य तलाशने होंगे जो अनिवार्य मतदान की जरुरत पूरी करने के साथ नागरिक अधिकारों के उल्लंघन का कारण न बने? गोया विधेयक में रह गई   कमियों को पूरा करना जरुरी है।

 

प्रमोद भार्गव

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