लेखक परिचय

कन्हैया झा

कन्हैया झा

(शोध छात्र) माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल मध्य प्रदेश

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-कन्हैया झा-
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“सर्वे भवन्तु सुखिनः” लेखों की कड़ी के अंतर्गत धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष-वर्णाश्रम के इन चार पुरुषार्थों में से धर्म एवं अर्थ पर चर्चा की जा चुकी है. इससे पूर्व “राजा एवं प्रजा” लेख द्वारा राज धर्म की चर्चा की थी. इस लेख में ‘प्रजा धर्म” के अंतर्गत काम पुरुषार्थ की चर्चा करेंगे, जो निम्न तालिका के अनुसार क्षत्रिय का पुरुषार्थ माना गया है:

आश्रम वर्ण पुरुषार्थ

ब्रह्मचर्य शूद्र धर्म

गृहस्थ वैश्य अर्थ

वानप्रस्थ क्षत्रिय काम

संन्यास ब्राह्मण मोक्ष

जन्म के समय सभी शूद्र है, क्योंकि अभी ज्ञान नहीं है. धर्म को भली-भांति समझ तथा अर्थोपार्जन कर पारिवारिक जिम्मेवारियों से मुक्त होकर प्रत्येक व्यक्ति का यह “प्रजा धर्म” है कि वह अच्छे गांव, शहर, राष्ट्र अथवा विश्व की कामना करे. स्वामी दयानंद पर लिखी एक पुस्तक से:
क्षत अर्थात दुःख से जो त्राण करे वह क्षत्रिय है. वो केवल राजा ही नहीं, उसका अंश होकर सब जगह पूरी जनता में विद्यमान हो सकता है.
यदि राष्ट्र की बात करें तो 120 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले भारत जैसे बड़े देश में शासन को हर गली-कूचे में सुलभ नहीं कराया जा सकता. परन्तु जनता यदि “प्रजा धर्म” समझे तभी पिछले दो दशकों में संपन्न हुए भारत देश में सुख भी आयेगा.

आज़ादी के 67 वर्ष पश्चात भी देश में अनेक स्थानों पर पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है. गांवों और शहरों में सभी जगह अनेक समस्याएं हैं जिनका समाधान करने में वहां की प्रजा स्वयं सक्षम है. पिछले लेख में अर्थ पुरुषार्थ पर चर्चा करते हुए दानशीलता के बारे ऋग्वेद 10:155 से लिखा था:
स्वार्थ और दान न देने की वृत्ति को सदैव के लिए त्याग दो. कंजूस और स्वार्थी जनों को समाज में दरिद्रता से उत्पन्न गिरावट, कष्ट, दुर्दशा दिखाई नहीं देते. परंतु समाज के एक अंग की दुर्दशा और भुखमरी आक्रोश बनकर महामारी का रूप धारण करके पूरे समाज को नष्ट करने की शक्ति बन जाती है और पूरे समाज को ले डूबती है. अदानशीलता समाज में प्रतिभा एवं विद्वता की भ्रूणहत्या करने वाली सिद्ध होती है. तेजस्वी धर्मानुसार अन्न और धन की व्यवस्था करने वाले राजा इस दान विरोधिनी संवेदनाविहीन वृत्ति का कठोरता से नाश करें.

शासन के विकेंद्रीकरण का केवल इतना ही तात्पर्य है कि वह प्रजा को प्रजा से ही सभी के “सुख की कामना” करने के लिए धन प्राप्त करने में केवल सहायता करे, और इसके लिए जिस भी व्यवस्था की आवश्यकता हो उसे बनाए, परन्तु सीधे कोई धन न दे. चाणक्य सीरियल में राजा धनानंद की दरबार में होने वाली ज्ञानसभा की चर्चा पहले के लेखों में कर चुके हैं. उसी ज्ञानसभा में आचार्य के एक प्रश्न पर कि धन की रक्षा किससे करनी चाहिए, छात्र उत्तर देता है कि धन की रक्षा चोरों एवं राजपुरुषों से करनी चाहिए, इसी विषय पर चाणक्य ने लिखा है:

“जिस प्रकार जल में रहने वाली मछली कब पानी पी जाती है पटा नहीं चलता, उसी प्रकार राज कर्मचारी राजकोष से धन का अपहरण कब कर लेते हैं कोई नहीं जान सकता.”

आज देश में 20 लाख से अधिक गैर-सरकारी संस्थान काम कर रहे हैं, जिन्हें सरकार देश के गांवों तथा शहरों में अनेक प्रकार के सेवा कार्यों के लिए धन देती है. बीबीसी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है. मुख्यतः एक हिन्दू संगठन होते हुए भी संघ की विचारधारा राष्ट्रवादी है. किसी विशेष पूजा पद्धति से उसका आग्रह नहीं है. हां! भारत भूमि को पुण्य मानना आवश्यक है. यह संस्थान अपने सेवा कार्यों के लिए अधिकांश में दान द्वारा खुद ही धन का प्रबंध करता है.

मई 2014 में शासन संभालने वाली नयी सरकार करों से प्राप्त धन को गैर-सरकारी संस्थानों को ग्राम-विकास आदि कार्यों के लिए धन देने की नीति पर पुनः विचार करे. साथ ही मनरेगा एवं खाद्य सुरक्षा जैसी राष्ट्र-व्यापी योजनाओं के बारे में भी सोचें. इन पर केंद्र सरकार हर-वर्ष अपने बजट से लगभग 12 प्रतिशत खर्च करती है और उसके दुगने से अधिक राज्य सरकारें खर्च करती हैं. इन सब खर्चों के कारण देश के विकास योजनाओं के लिए (प्लान खर्च) पर्याप्त नहीं हो पाता. यदि चोट उंगली में लगी है तो दवाई भी वहीँ लगे. पूरे शरीर पर दवाई मलना बुद्धिमानी नहीं है.

इस देश को साधू-सन्यासियों का देश कहा जाता रहा है. अंधविश्वास आदि बहानों से शासन ने इन्हें राष्ट्र-निर्माण गति-विधियों से दूर रखा. परन्तु गांधीजी ने तो इन्हें भी अपनी सामाजिक गतिविधियों में जोड़ा था. सन 1919 से 1948 के बीच गांधीजी के आन्दोलन तो कभी-कभी चले, परंतु देश-निर्माण कार्य, जैसे हिन्दु-मुस्लिम एकता, छुआ-छूत आदि से हज़ारों कार्यकर्ता एवं करोड़ों लोग प्रभावित रहते थे. देश भर में दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थित हज़ारों आश्रमों से ये गतिविधियाँ संचालित होती थीं, जिनमें साधू-सन्यासी भी योगदान करते थे. आज़ादी से पूर्व आज की ही तरह उस समय भी लोग कहते थे,” काश! एक बार सत्ता अपने हाथ में आ जाए”. गांधीजी का जवाब आज भी उतना ही प्रासंगिक है:

“इससे बड़ा अंधविश्वास और कोई नहीं हो सकता. जैसे बसंत के समय सभी पेड़-पौधे, फल-फूल युवा नजर आते हैं, वैसे ही जब स्वराज आयेगा तब राष्ट्र के हरेक क्षेत्र में एव युवा ताजगी होगी. किसी भी परदेसी को जन-सेवक अपनी क्षमता के अनुसार जन-सेवा में कार्यरत नज़र आयेंगे.”

स्वराज की कामना के लिए प्रजा अपना क्षत्रिय धर्म निभाये तथा शासन उसे उचित मदद करे.

2 Responses to “स्वराज की कामना और क्षत्रिय धर्म”

  1. कन्हैया झा

    Kanhaiya Jha

    Dr Ranjeet Singh जी प्रणाम अच्छा लगा आपने लेख पढ़ा तथा संदर्भित शब्द के प्रति जिज्ञासा रखी. अपने सीमित ज्ञान से में यह उत्तर दे पा रहा हूँ

    वर्णाश्रम दो शब्दों वर्ण एवं आश्रम से मिल कर बना है. आश्रम व्यक्ति की विभिन्न अवस्थाओं का श्रम अथवा पुरुषार्थ है. आश्रमों का ज्ञान ईश्वरीय अथवा आकाशीय है, क्योंकि यह भारत की प्राचीनतम विद्या ज्योतिष में निहित है. किसी भी जन्मकुंडली में चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष में से प्रत्येक के तीन घर निश्चित हैं. लग्न घर १ से जीवन का आरम्भ होता है. फिर क्रम से अर्थ (घर १०), काम (घर ७) तथा अंत में मोक्ष (घर ४) पुरुषार्थ आते है.

    चुंकि वर्णाश्रम एक शब्द है, इसलिए वर्णों का सम्बन्ध आश्रमों से होना चाहिए, न की जन्म से. वर्णों को जन्म से निश्चित करने का विधान महात्मा मनु ने दिया था. उनका उद्देश्य वेदों को कंठस्थ कर सुरक्षित रखने का रहा होगा, जिसका प्रमाण एक कहानी से भी मिलता है. प्रलय के पश्चात महात्मा मनु वेदों को लेकर एक नाव द्वारा सुरक्षित स्थान की तलाश पर निकल पड़े थे. वर्णों को यदि आश्रम, श्रम, पुरुषार्थ से जोड़ेंगे तो निम्नलिखित विधान बनता है:

    आश्रम वर्ण पुरुषार्थ
    ब्रहमचर्य शूद्र धर्म
    गृहस्थ वैश्य अर्थ
    वानप्रस्थ क्षत्रिय काम
    संन्यास ब्राह्मण मोक्ष

    “क्षत” के बारे में निम्नलिखित वाक्य “महर्षि दयानंद के वैदिक स्वराज्य” पुस्तक से लिया गया है: भारत का महाराज दिलीप अपने प्राणों की परवाह न करते हुए यह कहता था कि

    “क्षतात्किल त्रायत-इत्युदग्र: क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूडः! राज्येन किं तद्धिप-रीतवृते: प्राणैरूपक्रोषमलीमसैर्वा”

    अर्थात क्षत से दुख से तो त्राण करे रक्षा करे वह क्षत्र है राजा है। इस प्रकार लोकों में उच्च क्षत्र शब्द प्रसिद्ध हुआ है। मैं क्षत्र होता हुआ यदि नष्ट होती हुई गाय की रक्षा न करू तो मेरे राज्य का क्या लाभ ?

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  2. Dr Ranjeet Singh

    “जन्म से सभी शूद्र हैं क्योंकि अभी ज्ञान नहीं है”; ऐसा आपने लिखा। परन्तु मान्यवर, शूद्र तो चतुर्थ वर्ण का नाम है। अयोग्यता, अज्ञान अथवा शिक्षाभाव का नाम शूद्र नहीं होता अथवा हुआ करता।

    ज्ञानी अज्ञानी तो कोई भी – और किसी भी वर्ण का – व्यक्ति हो सकता है। क्या पूछ सकते हैं कि आपके कथन में क्या कोई शास्त्र वचन भी प्रमाण है? सन्दर्भ सहित उद्धृत कर सकते हैं क्या?

    फिर आपने लिखा – “क्षत अर्थात् दुख से त्राण करे वह क्षत्रिय होता है”। परन्तु वह भी कैसे? ‘क्षत’ पद का अर्थ दुख आपने किया तो किस आधार पर किया? क्या किसी शब्दकोश के? किस के?

    ‘क्षत-विक्षत’ पद-प्रयोग साधारण बोल चाल की भाषा में प्रायश: बहुत देखने में आता है। बहुत देखा जाता है। क्या अर्थ किया करते हैं आप उसका? क्या ‘दुख विदुख’?

    शब्दकोशों के अनुसार

    ‘क्षत’ का अर्थ होता है – स्रवद्रक्तपूयादौ व्रणे। व्रणयुक्ते।
    ‘क्षतज’ का – क्षतात् जायते। रुधिरे।
    ‘क्षत्र’ होता है – क्षत् – ततः त्रायते – क्षतात् त्रायते इति।
    और ‘क्षत्रिय’ होता है – क्षत्रस्यापत्यम् च। क्षत्रजाते राजन्ये।

    उत्तरापेक्षी –

    डा० रणजीत सिंह

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