लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

संसार में प्रचलित विकासवाद के सिद्धान्त के अनुसार संसार का क्रमिक विकास होता है। उनके अनुसार एक प्रकार के जीवाणु ‘अमीवा’ से मुनष्य व अन्य प्राणी बने हैं। भौतिक जगत व अमीवा किससे बने, इसका समुचित उत्तर उनके पास नहीं है। सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व हमारे ब्रह्माण्ड का विकास नहीं अपितु विकास से ह्रास हो रहा है, अतः इस कारण विकासवाद का सिद्धान्त पिट जाता है। वेदों के ज्ञान व भाषा को देंखे तो यहां भी विकासवाद का सिद्धान्त असफल सिद्ध होता है। विकासवाद ईश्वर के अस्तित्व व उससे सृष्टि व प्राणियों की उत्पत्ति के वैदिक सिद्धान्त को नहीं मानता। अतः प्रश्न उत्पन्न होता है कि फिर सृष्टि के आदि में वेद किससे व कैसे उत्पन्न हो गये। यदि यह मनुष्यों ने उत्पन्न किये तो मनुष्यों को वेद के बाद वेद से अधिक उन्नत ग्रन्थों का निर्माण करना चाहिये था। क्या वेद व इसके ज्ञान से उन्नत कोई ग्रन्थ संसार में अब तक बना है? हमें तो ऐसा कोई ग्रन्थ संसार में दिखाई नहीं देता जो वेद के ज्ञान व भाषा की दृष्टि में इससे अधिक उन्नत व उपयोगी हो। संसार में अनेक भाषायें अस्तित्व में आईं और नष्ट हो गई। अनेक भाषाओं से मिलकर नई भाषायें बनी हैं और आज संसार में प्रचलित हैं। संसार की आज की सभी भाषाओं पर दृष्टि डालें तो यह सभी वेद भाषा संस्कृत का ही एक प्रकार से विकार व विकृतियां सिद्ध होती हैं।

 

वेदों में एक ईश्वर का सिद्धान्त पाया जाता है। उसी ईश्वर को वेदों ने जगत व सृष्टि का आधार बताया है। यह भी कहा है कि दो पैर वाले मनुष्यादि व चार पैर वाले पशुओं आदि का रचयिता भी परमात्मा ही है। वेद मंत्रों में वेद विहित कर्म करने, सौ वर्षों तक जीवित रहने की इच्छा करने सहित पुनर्जन्म व मोक्ष का भी वर्णन है। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का उल्लेख भी अनेक मंत्रों में हुआ है। ज्ञान, कर्म व उपासना सहित विज्ञान वेदों का मुख्य विषय है। यह समस्त ज्ञान सृष्टि की आदि पुस्तक में होने से विकासवाद के सिद्धान्त का खण्डन हो जाता है और इसके साथ ही ईश्वर, जीवात्मा व त्रिगुणात्मक प्रकृति के अनादि स्वरुप पर भी प्रकाश पड़ता है। महाभारत काल के बाद ऋषि दयानन्द वेदों के सबसे बड़े विद्वान हुए हैं। विदेशी विद्वान प्रो. मैक्समूलर तक महर्षि दयानन्द और वेदों के प्रशंसक थे। महर्षि दयानन्द ने अपने समय में पौराणिक सनातनी विद्वानों सहित ईसाई व इस्लाम मत के विद्वानों को वेद की किसी शिक्षा को अज्ञानमूलक व असत्य सिद्ध करने की चुनौती दी थी। किसी मत का कोई विद्वान वेदों की किसी शिक्षा को अज्ञानमूलक व असत्य सिद्ध नहीं कर सका। उसके बाद भी यही स्थिति बनी हुई है। अतः ऋषि दयानन्द द्वारा मान्य व समर्थित वेदों के विषय में उनका यह सिद्धान्त भी सत्य सिद्ध हुआ है कि ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों (सभी श्रेष्ठ मनुष्यों) का परम धर्म है।’ अतः संसार के सभी धर्म व मतों के ग्रन्थों में वेदों का स्थान सर्वोपरि महान है। यदि किसी को शंका हो तो वह वेदों से अपने मत और उसके मुख्य ग्रन्थ की तुलना व समीक्षा कर देख सकता है। हम पाठकों को यह भी अनुरोध करेंगे कि वह वेदों का महत्व जानने के लिए महर्षि दयानन्द जी की ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, सत्यार्थ प्रकाश, आर्याभिविनय सहित ऋग्वेद और यजुर्वेद भाष्यों का सूक्ष्मता से अध्ययन करें। इसके साथ ऋषि दयानन्द के अनुयायी विद्वानों के वेद व वैदिक साहित्य पर सृजित भाष्यों व इतर ग्रन्थों का अध्ययन भी उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुंचा सकता है कि वेदों का ज्ञान सर्वश्रेष्ठ और संसार के प्रत्येक मनुष्य के हितकर व कल्याण करने वाला है।

 

वेदों की भाषा के सम्बन्ध में बात करें तो वेदों की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि संसार की सभी लिपियों से सरलतम व उत्तम है। इसमें जो लिखा जाता है उसे वैसा ही पढ़ा व बोला जाता है। अक्षर व स्वर इस प्रकार के हैं कि एक अक्षर से एक ही ध्वनि प्रस्फुटित होती है जबकि अन्य भाषाओं में एक अक्षर में कई कई अक्षरों की ध्वनियों का समावेश होता है। अंग्रेजी के बी व डब्लू अलफाबेट में ब+ई तथा ड+ब्+ल+ऊ अक्षरों की ध्वनियां व अक्षर समाविष्ट हैं। अंग्रेजी हो, उर्दू व देश-विदेश की अन्य कोई भाषा, यह दोष व विकृति सर्वत्र देखी जाती है। व्याकरण की दृष्टि से भी वेदों का अष्टाध्यायी-महाभाष्य व निरुक्त व्याकरण सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा भी बताया जाता है कि अमेरिका की नासा आदि ने भी संस्कृत को कम्प्यूटर आदि की दृष्टि से सर्वश्रेष्ेठ भाषा स्वीकार किया है।

 

संस्कृत की एक यह भी विशेषता है कि इसमें एक संज्ञा के लिए अनेक पर्यायवाची शब्द होते हैं। सूर्य, जल, वायु आदि के लिए 5 से 25 पर्यायवाची शब्द मिल जायेंगे। अन्य किसी भाषा में इतने अधिक पर्यायवाची शब्द नहीं मिलेंगे, यह भी एक विशेषता नहीं है। वेदों में इसके साथ ही एक शब्द बहु-अर्थी भी होता है। उसका कहां क्या अर्थ होगा उसके लिए प्रकरण के अनुसार उसके अर्थों की संगति लगाई जाती है। एक वेद मंत्र के अनेक अर्थ किये जा सकते हैं। महर्षि दयानन्द ने जब ऋग्वेद का भाष्य आरम्भ किया तो उन्होंने ऋग्वेद के प्रथम सूक्त की व्याख्या कर उसे संस्कृत के विद्वानों को भेजा था। इस व्याख्या में उन्होंने ऋग्वेद के पहले कुछ मन्त्रों के अनेक अर्थ कर यह सिद्ध किया कि एक मन्त्र के अनेक अर्थ किये जा सकते हैं। महर्षि दयानन्द जी के ही एक अनुयायी डा. आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी ने सामवेद का संस्कृत व हिन्दी दो भाषाओं में भाष्य किया है। वहां उन्होंने कुछ मंत्रों के सात अर्थों तक प्रकाशित कर एक चमत्कार ही कर दिया है। इससे वेदों की भाषा व ज्ञान की श्रेष्ठता सिद्ध होती है। यह दुःख का विषय है कि आज उनका यह संस्कृत-हिन्दी भाष्य प्राप्य नहीं है। इसके विकल्प के रूप में उनका सामवेद का केवल हिन्दी भाष्य अवश्य उपलब्ध है जिसे ‘विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, 4408 नई सड़क, दिल्ली-110006’ से प्राप्त किया जा सकता है। अतः वेदों के ज्ञान व भाषा दोनों की ही श्रेष्ठता सिद्ध होती है। वेदों की भाषा की एक विशेषता यह भी है कि यह स्वर व छन्द बद्ध है। यह भी बता दें कि वेदों की उत्पत्ति सृष्टि के आरम्भ में अब से लगभग 1 अरब 96 करोड़ वर्ष पूर्व हुई थी। तब से वेद अपने मूल रूप में सुरक्षित हमें प्राप्त हुए जिसका सबसे अधिक श्रेय महर्षि दयानन्द जी को ही है। यदि वह न आते तो आज वेद, मन्त्र क्रम व उनके यथार्थ अर्थों की दृष्टि से, सुरक्षित न रह पातें। इसके साथ ही उन्होंने वेदों का भाष्य संस्कृत सहित हिन्दी में करके एक महान व अपूर्व कार्य किया है। इससे साधारण हिन्दी भाषी व हिन्दी पठित व्यक्ति का वेद में न केवल प्रवेश ही होता है अपितु वह वेद के मर्म को जानने में भी सफल होता है। सृष्टि की उत्पत्ति के लगभग 2 अरब वर्ष बाद यह स्थिति उत्पन्न हुई है। इससे पूर्व महाभारतकाल तक संस्कृत ही प्रचलित थी और सभी संस्कृत जानते व समझते थे, अतः वेद मन्त्रों के यथार्थ अर्थ सबको रहे होंगे, ऐसा अनुमान कर सकते हैं। सम्पूर्ण चार वेदों का अध्ययन करने में तो बहुत अधिक समय अपेक्षित होता है परन्तु यदि मनुष्य ऋषि दयानन्द लिखित आठ स्तुति-प्रार्थना-उपासना के मन्त्रों के हिन्दी अर्थों को हृदयगंम करने के साथ उनकी आर्याभिविनय पुस्तक को ही कई बार पढ़ ले तो हमें लगता है कि उससे वेदों के स्वाध्याय का उललेखनीय लाभ प्राप्त होता है।

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