लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

भारत में चुनाव सुधारों को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगीं नहीं है। ऐसे में गांधीवादी अन्ना हजारे का यह सुजाव कि मतदाताओं को प्रत्याशी को खारिज करने का हक और उम्मीद पर खरा नहीं उतरने पर बीच मे वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए, तमाम राजनीतिकों को ये मांगें रास नहीं आ रही हैं। इसलिए इन मांगों के बजाए राजनीतिक दलों की दलील है कि पहले मतदान को अनिवार्य किया जाए। क्योंकि हमारे देश में मतदान का औसत प्रतिशत बेहद कम है। जहां ज्यादातर पचास फीसदी मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हों, वहां किसी क्षेत्र के उम्मीदवारों को नकारने अथवा वापस बुलाने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है। ये अधिकार बड़े स्तर पर धनराशि की फिजूलखर्ची का भी कारण बनेगें। लिहाजा पहले मतदान की अनिवार्यता के प्रति मतदाताओं को जागरूक किया जाए, ताकि विकल्प की सार्थकता साबित हो सके।

मतदान की अनिवार्यता कोई नया मुद्दा नहीं हैं, गुजरात सरकार ने देश मे पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत करने की दृष्टि से मतदान की अनिवार्यता संबंधी विधेयक लाकर एक साहसिक व प्रशंसनीय कदम 2010 में उठाया था। विधेयक के कानून में तब्दील होते ही यहां नगरीय निकाय और ग्राम पंचायतों में प्रत्येक मतदाता को मतदान करना बाध्यकारी बना दिया गया था। वोट न डालने की स्थिति में जब मतदाता को दण्डित करने का प्रावधान इस विधेयक में है तो उसे उन उम्मीदवारों को नकारने का भी अधिकार मिलना चाहिए था जो लोक हितकारी साबित नहीं हो पाते। किंतु इस दृष्टि से इस विधेयक में कोई उपाय लागू नहीं किए गए थे। कांग्रेस इस विधेयक का सिर्फ इसलिए विरोध कर रही है क्योंकि यह विधेयक उस सरकार ने पारित किया है जो भाजपा शासित है।

किसी भी देश के लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब शत-प्रतिशत मतदान से जनप्रतिनिधि चुने जाएं। मौजूदा दौर में हमारे यहां मत-प्रतिशत 35-40 से 65-70 तक रहता है। आतंकवाद की छाया से ग्रसित रहे पंजाब और जम्मू-कश्मीर में यह प्रतिशत 20 तक भी रहा है। लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के साथ इन प्रदेशों में भी मतदान में उम्मीद से ज्यादा इजाफा भी हुआ।

फिलहाल दुनिया के 32 प्रजांतात्रिक देशों में अनिवार्य मतदान की पद्धति प्रचलन में है। इनमें से 19 ही ऐसे देश हैं जहां सभी चुनावों में यह पद्धति अपनाई जाती है। आस्टेªलिया, अर्जेटीना, ब्राजील, सिंगापुर, तुर्की और बेल्जियम इन देशों में प्रमुख हैं। बेल्जियम व कुछ अन्य देशों में मतदान न करने पर ‘सजा’ की भी प्रावधान है। अलबत्ता इतना जरूर है कि कुछ देशों में 70 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गा को अनिवार्य रूप से मतदान न करने की छूट मिली हुई है।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए आदर्श स्थिति यही है कि हरेक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करे। इस नाते 2005 में भाजपा के एक सांसद लोकसभा में ‘अनिवार्य मतदान’ संबंधी विधेयक लाए भी थे। लेकिन बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। कांग्रेस व अन्य दलों ने इस विधेयक का उस समय विरोध का कारण बताया था कि दबाव डालकर मतदान कराना संविधान की अवेहलना है। क्योंकि भारतीय संविधान में अब तक मतदान करना मतदाता का स्वैच्छिक अधिकार तो है, लेकिन वह इस कर्त्तव्य-पालन के लिए बाध्यकारी नहीं है। लिहाजा वह इस राष्ट्रीय दायित्व को गंभीरता से न लेते हुए उदासीनता बरतता है। हमारे यहां आर्थिक रूप से संपन्न सुविधा भोगी जो तबका है वह अनिवार्य मतदान को संविधान में दी निजी स्वतंत्रता में बाधा मानते हुए इसका मखौल उड़ाता है।

गुजरात विधानसभा में अनिवार्य मतदान का जो विधेयक पारित हुआ था, उसमें यह स्पष्ट नहीं था कि मतदान न करने पर मतदाता को किस रूप में दडिण्त किया जाएगा ? जबकि इस तथ्य का खुलासा होना जरूरी है। दण्ड का प्रावधान केवल उन मतदाताओं के लिए सुनिश्चित होना चाहिए जो जान-बूझकर मतदान में हिस्सा नहीं लेते। लोकतंत्र के इस महाकुंभ में ऐसे लोग भी भागीदारी नहीं करते जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से स्वयं को ऊपर मानते हुए इस ऐंठ और अहंम में रहते हैं कि कोई भी प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाए अथवा किसी भी दल की सरकार बन जाए, हमें क्या फर्क पड़ने वाला है। इन अहंकारियों की नकेल जरूर दण्ड के प्रावधानों से कसी जानी चाहिए।

अनिवार्य मतदान के सिलसिले में सवाल यह भी खड़ा होता है कि हमारे देश में लाखों लोग केवल मतदाता सूचियों की खामियों के चलते मतदान नहीं कर पाते। मतदान के लिए अनिवार्य पहचान पत्र के अभाव में भी लाखों लोग मतदाता सूची में नाम होने के बावजूद मतदान से वंचित रह जाते हैं। ऐसे मतदाताओं को संबंधित मतदान केन्द्र प्रभारी मतदाताओं को केन्द्र पर मतदान की इच्छा से उपस्थित होने का प्रमाणीकरण दें। जिससे मतदाता दोष मुक्त रहे। 75 साल से ज्यादा उम्र के मतदाता को स्वेच्छा से मतदान की छूट मिले। बीमारी से लाचार मतदाता को चिकित्सक, ग्रामसेवक और सरपंच द्वारा जारी प्रमाणीकरण के मार्फत मतदान की छूट मिले। सजा के प्रावधान ऐसे हों, जिसकी भरपाई गरीब से गरीब मतदाता सरलता से कर पाये।

मतदान की अनिवार्यता अल्पसंख्यक व जातीय समूहों को ‘वोट बैंक’ की लाचारगी से भी छुटकारा दिलाएगी। राजनीतिक दलों को भी तुष्टिकरण की राजनीति से निजात मिलेगी। क्योंकि जब मतदान करना जरूरी हो जाएगा तो किसी धर्म, जाति या क्षेत्र विशेष से जुड़े मतदाताओं की अहंमियत खत्म हो जाएगी। नतीजतन उनका संख्याबल जीत अथवा हार को प्रभावित नहीं कर पायेगा। लिहाजा सांप्रदायिक व जातीय आधार पर ध्रुवीकरण की जरूरत नगण्य हो जाएगी। ऐसे हालात यदि निर्मित होते हैं तो भारतीय राजनीति संविधान के उस सिद्धांत का पालन करने को विवश होगी जो सामाजिक न्याय और समान अवसर की वकालात करता है।

इस विधेयक का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह विधेयक मतदाता को सभी प्रत्याशियों को नकारने का भी अधिकार देता है। लेकिन इसमें दोष यह है कि यह निर्वाचन की उस व्यवस्था को चुनौती नहीं देता जिसका आधार ‘बहुमत’ है। मसलन 60 प्रतिशत मतदाता उम्मीदवारों को खारिज करने के पक्ष में मतदान करते हैं, तब शेष रहे 40 प्रतिशत मतदान से उस प्रत्याशी को चुन लिया जाएगा, जिसको ज्यादा वोट मिले हों। लेकिन अभी तो शुरूआत है, भविष्य में संशोधित विधेयक लाकर इन कमियों को दूर भी किया जा सकता है।

हालांकि मतदाता को मिले सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के मताधिकार के साथ निर्वाचित प्रतिनिधि की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिहाज से उसे बीच में ही बुलाए जाने और खारिज का अधिकार भी मिलना चाहिए। ऐसा सम्भव होने पर राजनीति में वंशवाद, अपराधीकरण, बाहुबलि और भ्रष्ट प्रत्याशियों को टिकट दिए जाने पर अंकुश लगेगा। जवाबदेही से निश्ंिचत रहने वाले और सरकारी सुविधाओं का उपभोग करने वाले प्रतिनिधि भी प्रभावित होंगे। इससे राजनीतिक दलों को सबक मिलेगा। परिणामस्वरूप देश में एक नये युग के सूत्रपात्र होने की उम्मीद बढ़ेगी।

 

 

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