विनीत कुमार शर्मा

मुश्किल थी तब बढ़ती जाती चिंता चारो ओर, गली गली में बैठे थे कुछ ऐसे समाज के चोर
कुछ ऐसे चोर जो खाते जनता का पैसा, करते थे अय्यासी पता नहीं कैसा कैसा II
बहकाते बरगलाते रोज जनता को ऐसे, देश की दौलत हो जैसे उनके बाप के पैसे,
जनता का विस्वास तो कबका तोड़ दिया, प्रगति पथ से उनको आधे रस्ते ही मोड़ दिया II
आधे रस्ते मोड़ के दिखाते सहानुभूति, कहते थे उनको है जनता से अनुभूति,
कौन इन्हे समझाए जनता अब नहीं बेचारी, अब समझती है सबकी चालाकी और पैंजाम्दारी II
अब तो ये बस सुनेगी उनको जो करे विकास और विकास पे ही खर्चे, जो करे भविष्य की बात और उसी के चर्चे
अब नहीं कोई समाज, जाती पाँती को देखेगा, वोट देगा उसको जो सिर्फ विकास को देखेगा II
दारू, नोट और मुर्गे का अब गया जमाना जनता को है अब फ़िक्र बस देश समाज बचाना
जनता भी अब लगाम कसने लगी है, तभी तो हर तरफ नदी विकास की दिखने लगी है II
जनता के रहनुमा जो पहले थे जनता के राजा, अब तो रोज गली गली में घूमे लगाके गाजा बाजा
अब रातो को नींद न आये आसानी से, सोच रहे है कैसे निकाले जनता को परेशानी से II
जनता के विस्वास को तोड़ने की अब हिम्मत कोई नही कर पायेगा
सत्ता में वही अब आएगा जो जनता को विकास दिखायेगा II

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