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    उत्तराखंड में ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सुविधा की दुर्दशा

    नरेन्द्र सिंह बिष्ट
    हल्द्वानी, नैनीताल

    पहाड़ी राज्य उत्तराखंड का गठन हुए 21 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं. परन्तु आज भी यहां के ग्रामीण क्षेत्रों के लोग छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी मैदानी जिलों के अस्पतालों पर निर्भर हैं. राज्य में डॉक्टरों की कमी व आधुनिक सुविधाओं का अभाव 2021-22 के बजट से उजागर हो जाता है. जिसके अनुसार राज्य के स्वास्थ्य विभाग में 24451 राजपत्रित और अराजपत्रित पद स्वीकृत हैं. इनमें 8242 पद रिक्त हैं जो स्वीकृत पदों का 34 प्रतिशत है. रूरल हेल्थ स्टेटिस्टिक्स रिर्पोट 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 1839 उपकेन्द्र हैं, जिनमें 543 उपकेन्द्रों के पास अपनी बिल्डिंग नहीं है. इसके अलावा कुल 257 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में से 30 के पास अपनी बिल्डिंग नहीं है. इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड के मानकों के अनुसार प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में चार विशेषज्ञ सर्जन, प्रसूति, स्त्री रोग विशेषज्ञ के साथ बाल रोग व चिकित्सा विशेषज्ञ होने चाहिए, लेकिन राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों का यह दुर्भाग्य है कि यहां किसी भी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में यह सुविधा नहीं है.

    इस संबंध में नैनीताल स्थित पहाड़पानी के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के डाॅक्टर संजीव अग्रवाल बताते है कि पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकांश स्वास्थ केन्द्र आधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं. जिसका खामियाजा यहां के ग्रामवासियों को भुगतना पड़ता है. सुविधाओं के अभाव के चलते अक्सर मरीजों को मैदानों की ओर रूख करना पड़ता है. एक्सरे, अल्ट्रासाउंड आदि की व्यवस्था व डॉक्टरों की कमी के चलते आर्थिक रूप से कमज़ोर ग्रामीण बड़े शहरों में इलाज का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं होते हैं. ऐसे में वह स्थानीय स्तर पर अप्रशिक्षित और झोला छाप डॉक्टर से इलाज करवाने पर मजबूर हो जाते हैं. यदि ग्राम वासियों को नजदीकी स्तर पर बुनियादी सुविधाएं मिल जायेगी तो वह अधिक व्यय होने से बच पायेगे. वह बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रसव के केस होते हैं, लेकिन सुविधाओं के अभाव में इन्हें रेफर कर दिया जाता है. ऐसे में ग्राम स्तर पर शिविरों के माध्यम से लोगों को बुनियादी उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए.

    इस संबंध में अल्मोड़ा जिला स्थित सिरसोड़ा गांव की ममता देवी बताती हैं कि प्रसव के दौरान गांव में किसी भी प्रकार की सुविधा न होने के कारण उन्हें अत्यधिक पीड़ा का सामना करना पड़ा था और प्रसव के लिए 65 किमी दूर अल्मोड़ा जाना पड़ा, जहां विभाग द्वारा काफी अधिक परेशान भी किया गया. ऐसी कठिनाइयां झेलने वाली वह एकमात्र महिला नहीं हैं बल्कि यह राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों की हर महिला की परेशानी है. सरकार द्वारा ग्राम स्तर पर संचालित प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में इन सुविधाओं को मुहैया करवाना चाहिए जिससे नजदीकी स्तर पर सुविधाओं का लाभ मिल सके व अन्यत्र खर्च से भी बचाव हो सके. वहीं ओखलकांडा ब्लॉक स्थित नाई गांव के महेश नयाल बताते हैं कि स्वास्थ्य केन्द्रों में सामान्य सर्दी, बुखार का इलाज तो मिल जाता है, लेकिन एक्स रे और अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधाओं से लोग वंचित रह जाते हैं. जिसके लिए उन्हें 90 किमी दूर हल्द्वानी का रुख करना पडता है. उनकी पत्नी हंसी देवी के प्रसव पीड़ा होने पर 55 किमी दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, पदमपुरी ले जाया गया जहां डाॅक्टरों द्वारा गंभीर मामला बता कर हल्द्वानी के लिए रेफर कर दिया गया, लेकिन अस्पताल से मुख्य सड़क तक पहुंचने से पहले ही उनकी पत्नी ने बच्चे को जन्म दे दिया.

    दरअसल ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था की इस दुर्दशा के पीछे सबसे बड़ा कारण वहां सरकारी डॉक्टरों का नहीं आना है. राजकीय मेडिकल काॅलेज से उपाधि लेने वाले डाॅक्टर भी पहाड़ों पर पोस्टिंग से कतराते है. भारतीय रिजर्व बैंक की स्टेट फाइनेंस ए स्टडी ऑफ बजट 2020-21 रिपोर्ट के अनुसार हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च किया जाता है. इस दौरान राज्य ने जन स्वास्थ्य पर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का सबसे कम खर्च 1.1 प्रतिशत किया. सरकार द्वारा पहाड़ों में डाॅक्टरों की कमी को पूरा करने हेतु बाॅन्ड सिस्टिम भी शुरू किया गया है जिसमें राजकीय मेडिकल में दाखिला लेने वाले छात्रों की फीस में छूूट दी जाती है साथ ही पांच वर्ष के लिए उन्हें पहाडों में पोस्टिंग का बाॅन्ड किया जाता है.

    पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों की किसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए डाॅक्टरों का सर्वाधिक अभाव है. राज्य में पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं के खस्ताहाल के चलते अक्सर मरीजों को सही समय पर एम्बुलेंस नहीं मिल पाता है, उनका समय पर उचित इलाज नहीं हो पाता है, डाॅक्टरों की सीमित उपलब्धता और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते कई बार मरीज़ों को अपनी जान से हाथ तक धोना पड़ा है. राज्य की स्थापना के 21 वर्ष के बाद भी ग्रामीण स्तर पर यदि स्वास्थ्य के क्षेत्र में इतनी कमियां हैं, तो यह एक गंभीर मसला है. जिसकी तरफ सरकार को विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि इससे न केवल गांव का विकास संभव है बल्कि पलायन को रोकने में भी यह विषय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यदि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराती है तो इसका सीधा प्रभाव शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था और उसके ढांचे पर पड़ेगा जो पहले से ही एक बड़ी आबादी को सुविधाएं प्रदान करते करते हांफ रहा है.

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