घृणा की राजनीति और देश के कलाकार

राकेश कुमार आर्य

भारत को कोई तब तक नहीं समझ सकता जब तक कि भारत के वेद को या भारत के वैदिक साहित्य को वह नहीं समझ लेता है । भारत का वेद ही है जो संसार के लोगों को केवल एक ही शिक्षा देता है कि यदि संसार में आकर सुख – शांति के साथ रहना चाहते हो और सांसारिक अर्थात इहलौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की उन्नति चाहते हो तो सबसे पहले मनुष्य बनो । मनुष्य से देवत्व की ओर चलने और बढ़ने की प्रेरणा केवल और केवल भारतीय संस्कृति देती है । इस प्रकार की संस्कृति में कहीं पर भी किसी भी व्यक्ति के लिए किसी भी जाति ,संप्रदाय ,समुदाय या वर्ग विशेष के लोगों के लिए घृणा की बात नहीं हो सकती । भारत का शासन और शासक वर्ग इसी नीति पर चलते हुए जब शासन करता है तो वह भी संसार के लिए बहुत ही आदरणीय हो जाता है । भारत विश्वगुरु इसीलिए रह पाया कि उसने मनुष्य को मनुष्य बना कर उसे देवत्व की साधना में लगाने का सराहनीय और प्रशंसनीय कार्य किया । 
कांग्रेस और उसके समर्थक दलों सहित संपूर्ण विपक्ष की ओर से ही नहीं , अपितु देश के कुछ नामचीन कलाकारों और लेखकों की ओर से भी इस समय नरेंद्र मोदी सरकार पर यह कहकर प्रहार किया जा रहा है कि यह सरकार घृणा की राजनीति करती है । इसलिए देश की जनता को चाहिए कि इसे इस बार सत्ताच्युत कर दे। देश के राजनीतिक दल यदि ऐसी बात कहते करते हैं तो बात समझ में आ सकती है । क्योंकि वह इस समय अपने लिए जनता से वोट मांग रहे हैं । अतः वह अपने प्रतिपक्ष के व्यक्ति या प्रतिद्वंद्वी पर इस प्रकार का प्रहार कर सकते हैं । परंतु जब यह बात कुछ लेखकों और कलाकारों तक पहुंच जाती है तो इसके कुछ गंभीर अर्थ होते हैं , जिन पर हमें विचार करना ही चाहिए ।
इसी क्रम में अब देश भर के 650 से अधिक थिएटर कलाकारों ने लोगों से अपील की है कि वे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी दलों को वोट न दें। गुरुवार (चार अप्रैल, 2019) को इस सम्बन्ध में उन सभी के हस्ताक्षर किया हुआ संयुक्त वक्तव्य भी जारी किया गया। थिएटर प्रैक्टिशनर्स ऑफ इंडिया के बैनर तले यह अपील की गई, जिसमें जनता से स्पष्ट रूप से कहा गया कि वे लोकतंत्र बचाएं और प्रेम और सौहार्द के लिए वोट दें।
संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने वालों में बॉलीवुड के कुछ नामचीन चेहरे भी सम्मिलित हैं। जैसे कि नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक शाह, अनुराग कश्यप, कोंकणा सेना शर्मा, लिलेट दुबे और मानव कौल ।
वास्तव में यह संयुक्त वक्तव्य आने से पहले लगभग 103 फिल्मकारों ने एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जो आर्टिस्ट यूनाइट इंडिया (देश के कलाकार एक हों) नाम की वेबसाइट पर अपलोड की गई थी। उस पत्र में उन सभी ने लोगों से बीजेपी को वोट न देने के लिए कहा था।
103 कलाकार अपने संयुक्त वक्तव्य के माध्यम से बोले थे, “लोगों को प्यार, बराबरी और सामाजिक न्याय के लिए वोट देना चाहिए, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी में फैलाई जा रही नफरत खत्म की जा सकेगी।” उनके अनुसार बीजेपी ने हिंदुत्व के गुंडों को खुली छूट दी है, जो कि घृणा और हिंसा की राजनीति में लिप्त रहते हैं।संयुक्त वक्तव्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा गया। कहा गया, “पांच वर्ष पूर्व जिस व्यक्ति को देश के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उसी ने अपनी नीतियों के माध्यम से लोगों का जीवन नष्ट कर दिया है । लोकतंत्र बिना प्रश्नों , बहस और मुखर विपक्ष के नहीं काम कर सकता है।”
इससे पहले, अरुंधति रॉय, आनंद तेलतुंबड़े, नैनतारा सहगल और रोमिला थापर समेत लगभग 210 लेखकों ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया था। उन्होंने उसके माध्यम से जनता से ‘हेट पॉलिटिक्स’ ( घृणा फैलाने वाली राजनीति ) के विरुद्ध वोट देने के लिए कहा था।
इन कलाकारों और लेखकों की भावनाओं का पूरा सम्मान करते हुए हम यहां पर यह कहना चाहेंगे कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसमें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबको अपना मौलिक अधिकार प्राप्त है । परंतु इस समय के उपरांत भी देश की एकता और अखंडता के लिए जो लोग कार्य कर रहे हैं उनकी भी भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अपनी सीमाएं हैं । इसी प्रकार भारत के धर्म , इतिहास और संस्कृति पर प्रहार करने वाले लेखकों ,कवियों ,कलाकारों की भी अपनी सीमाएं हैं ।जिन लोगों ने देश के इतिहास की मनमानी व्याख्या की है और देश के इतिहासनायकों को अपमानित करने का कार्य किया है , वास्तव में उन लोगों ने इस देश के भीतर रहकर और इसी देश का अन्न खाकर इसी के विरुद्ध घृणा उत्पन्न करने का कार्य किया है । ऐसा घृणास्पद कार्य संसार के किसी अन्य देश में अपने ही देश के विरुद्ध नहीं किया सकता । देश को ऐसे लोगों से इस समय सचमुच सावधान रहने की आवश्यकता है। इन लोगों ने ना तो अपनी कला के साथ न्याय किया और ना ही अपनी लेखनी के साथ न्याय किया । 
भारत के गौरवपूर्ण अतीत पर बड़े-बड़े प्रश्नचिन्ह लगाने वाले यह तथाकथित इतिहासकार ,लेखक ,कवि और कलाकार देश की जिस गंगा – जमुनी संस्कृति की नई परिकल्पना में व्यस्त हैं , वह इस देश की मौलिक संस्कृति नहीं हो सकती । इस देश की मौलिक संस्कृति वैदिक संस्कृति है ,जो सबको साथ लेकर चलने और सब का सम्मान करने में विश्वास करती हैं । वह सबके विचारों का सम्मान करती है और किसी के विरुद्ध भी किसी प्रकार की हिंसा में विश्वास नहीं रखती । यदि गंगा जमुनी संस्कृति इस देश की संस्कृति बनाई जा रही है और उसका उद्देश्य केवल किसी संप्रदाय विशेष की मान्यताओं को बढ़ावा देना और इस देश के बहुसंख्यक को अपमानित या तिरस्कारपूर्ण दृष्टिकोण से देखना उसका उद्देश्य है तो यह संस्कृति कभी भी इस देश के लिए उचित नहीं हो सकती ।यह एक लज्जास्पद तथ्य है कि हमारे आज के अधिकांश कलाकार ,लेखक और कवि या इतिहासकार इसी प्रकार की अतार्किक बातों में लगे हुए हैं।
जिस देश की संस्कृति या जिस देश का धर्म या जिस देश का इतिहास का एक – एक पन्ना यह उद्घोष कर रहा हो कि हम सर्वे भवंतु सुखिनः की भावना में विश्वास रखते हैं और हम विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ लोगों का परिवार बनाना चाहते हैं , साथ ही हम सारी वसुधा को ही अपना परिवार मानते हैं , वह संस्कृति और उस संस्कृति का कोई भी ध्वजवाहक नायक कभी भी घृणा की राजनीति नहीं कर सकता । प्रधानमंत्री मोदी के बारे में निस्संदेह यह बात कही जा सकती है कि उनके शासनकाल में पिछले 5 वर्ष में कहीं पर भी कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। इस देश को वह दिन याद है जब यूपीए की सरकार के समय नित्य प्रति कहीं ना कहीं बम विस्फोट हुआ करते थे , चारों ओर घृणा की राजनीति हो रही थी और समाज में उपद्रवकारी लोग कहीं ना कहीं सांप्रदायिक दंगे कराते रहते थे । आज वे दंगे कहां गए ? देश की जनता सब कुछ जानती है । ऐसे कलाकारों ,इतिहासकारों व साहित्यकारों से सावधान रहने की आवश्यकता है। बड़ी कठिनता से देश ने पिछले 5 वर्ष का अच्छे दिनों का यह समय देखा है ,जब हम शांतिपूर्वक अपने घरों में रहे हैं ।
देश के मतदाताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि जो लोग इस समय अपनी दाल गलती नहीं देख रहे हैं , उनके लिए मोदी सरकार खतरे की घंटी है। जिन लोगों के लिए प्रधानमंत्री मोदी किसी प्रकार से भी आर्थिक सहयोग नहीं कर रहे हैं या उन्हें लूट मचाने नहीं दे रहे हैं ,उनके लिए भी यह सरकार खतरे की घंटी है। उन पत्रकारों ,लेखकों, कवियों ,संपादकों या पत्रकार बंधुओं के लिए भी यह सरकार खतरे की घंटी है जो पिछली सरकारों में प्रधानमंत्री के साथ विदेशी दौरे करते थे और वहां पर देश के पैसा को पानी की भांति लुटा कर चले आते थे । आज उन लोगों के लिए मोदी सरकार घृणा की राजनीति करने वाली सरकार बन कर रह गई है जो देश में जातीय या सांप्रदायिक दंगे करवाने में व्यस्त रहते थे और फिर सरकार से बड़ी धनराशि लेकर मौज मस्ती करते थे । जैसा कि कश्मीर में आतंकवादी दलों या देशविरोधी संगठनों के नेता पिछली सरकारों के समय में करते रहे थे । संकट को पहचानने के लिए समय को पहचानने की आवश्यकता है । देश के मतदाताओं के विवेक पर हमें पूर्ण विश्वास है कि वह समझदारी के साथ अपना मतदान करेंगे और देश को सुरक्षित हाथों में दिए रखने के अपने दायित्व का पूर्ण निष्ठा से पालन करेंगे।

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