भारत में बाल तस्करी की समस्या


-अनिल अनूप

बाल तस्करी अर्थात बच्चों का अवैध व्यापार, वर्तमान समय में भारत की सबसे प्रमुख समस्याओं में से एक है। भारत में बाल तस्करी होना अब एक आम बात हो गई है आए दिन हमें बच्चों के गायब होने की सूचना मिलती रहती है। भारत सरकार ने इस ओर अपना ध्यान आकर्षित करते हुए, बहुत सारे कड़े कदम उठाएं हैं, लेंकिन सरकार द्वारा की गई सारी कोशिशें असफल रही हैं। अक्सर ऐसा कहा जाता है कि बच्चें देश का भविष्य होते हैं। लेंकिन इस वाक्य को शायद ही कोई गभीरता से लेता होगा। शायद यही वजह है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान बाल-तस्करी के लगातार बढ़ते मामलों की हकीकत एक बार नहीं, बार-बार सामने आने के बावजूद भी हमारी सरकारें इस मुद्दे को संजीदगी से नहीं ले रही हैं।
हमारे देश में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता होता है। वर्ष 2011 में लगभग 35,000 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई थी, जिसमें से 11,000 से ज्यादा बच्चें तो सिर्फ पश्चिम बंगाल से थे। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल औसतन 44,500 बच्चे गुम हो जाते हैं। उनमें से कई बच्चों को यौन-शोषण के लिए, कई को बस अड्डों या रेलवे स्टेशनों पर भीख मंगवाने के लिए और कई को मानव अंगों की तस्करी करने वाले गिरोहों के पास पहुँचा दिया जाता है। इसके अलावा यह माना जाता है कि ऐसे मामलों में से केवल 30 प्रतिशत मामलों की ही रिपार्ट दर्ज करवाई जाती है जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। बाल-तस्करी का मुख्य केंद्रबिंदु तीन स्तंभों पर टिका है। पहला, पैसे के लिए यौन शोषण, दूसरा, मजदूरी कराने के लिए शोषण और तीसरा, अंगों की तस्करी। भारत में बच्चों की तस्करी के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण ही मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।
बाल तस्करी के कारण
बाल-तस्करी भारत में एक बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है। बाल तस्‍करी के पनपने के पीछे का सबसे प्रमुख कारण गरीबी है। हमारे देश में भारी आर्थिक विषमता के कारण भारत में आधी से अधिक आबादी गरीबी का शिकार हैं। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी का अभाव और भविष्य के लिए सुरक्षा व्यवस्था का न होना आदि कारकों से ही बच्चे कई बार स्वयं मजबूर होकर निकलते हैं या फिर उनके अभिभावक उन्हें बाहर भेजते हैं और वे किसी ना किसी तरह से वह तस्करों के जाल में फंस जाते हैं।
बंधुआ मजदूर
भारत में आज भी बंधुआ मजदूरी एक बड़ी समस्या बनी हुई है जिसके सबसे ज्यादा शिकार बच्चें हो रहे हैं। बाल श्रम आमतौर पर मजदूरी के भुगतान के बिना या भुगतान के साथ बच्चों से शारीरिक कार्य कराना है। बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, ये एक वैश्विक समस्या है। बंधुआ मजदूरी भारत में गैर कानूनी है, लेकिन इसके बाबजूद यह आज भी समाज में प्रचलित है। पैसों से तंगी झेल रहे लोग पैसों के बदले में अक्सर अपने बच्चों को बेच देते हैं। बाल मजदूर बनाने के बाद उनसे हर तरह का काम करवाया जाता है। उन्हें ना तो सही से खाने को दिया जाता है और ना ही पहनने को कपड़े और ना ही रहने को कोई अच्छी जगह। इन बच्चों को चाय की दुकानों, ढाबों, होटलों में काम करने के लिए तथा सड़क किनारे खान-पान के ठिकानों और घरों में किए जाने वाले कामों के अलावा कई अन्य खतरनाक व्यवसायों में भी लगाया जाता है, घरेलू नौकरियों के साथ-साथ इन बच्चों के साथ मारपीट, खाना न देना, बंद करके रखना और शारीरिक शोषण करना आदि सब भी किया जाता है। इस प्रकार बंधुआ मजदूरी के माध्यम से बच्चों का शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है।
बच्चों के अधिकार
हर बच्चे को एक अच्छा जीवन व शिक्षा पाने का अधिकार है। जिसमें उसका पर्याप्त मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास हो सके।
सभी बच्चों के लिए बेहतर जरुरी मेडिकल सुविधा, साफ पानी, पौष्टिक आहार साफ वातावरण आवश्यक है।
सभी बच्चों को 14 वर्ष की उम्र तक प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध हो।
स्कूलों में बच्चों का शारीरिक व बौद्धिक विकास करने के अलावा ऐसा कुछ न किया जाए जिससे उनकी गरिमा को ठेस पहुंचे।
14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को फैक्ट्री, माइंस और अन्य किसी भी खतरनाक काम में नहीं लगाया जा सकता है।
अधिकार संरक्षण के लिए हर तरह की हिंसा से उनकी रक्षा हो।
विकास का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, जानने का अधिकार, आराम करने और खेलने का अधिकार, आदि ये सब मिलना चाहिए।
सरकार द्वारा की गई कारवाई
सरकार द्वारा बच्चों का अवैध व्यापार करने वालों के लिए सात साल की सजा से लेकर आजीवन कारावास की सजा तय की गई है। भारत में बंधुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम, बाल श्रम अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम, बंधुआ और जबरन मजदूरी को रोकने के लिए बनाए गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि लापता बच्चों के संबंध में एफआइआर पंजीकरण के साथ ही साथ राज्य में विशेष किशोर पुलिस इकाई स्थापित की जाए। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि कम से कम पुलिस स्टेशन में तैनात एक अधिकारी को यह शक्ति दी जाए कि वह विशेष किशोर इकाई के रूप में कार्य करे। इस सबंध में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से आग्रह किया गया कि वह देखे कि इस संबंध में क्या कार्रवाई हो रही है। इस दिशा में सोशल मीडिया का उपयोग भी एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। बच्चे किसी देश और समाज की बुनियाद होते हैं और उनके प्रति संवेदनहीनता, देश के भविष्य के लिए घातक है। इसलिए यह जरूरी है कि बच्चों के संरक्षण व उनके अधिकारों की रक्षा को पहली प्राथमिकता दें।

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