नेताजी सुभाष को तोजो का कुत्ता कहने वाले कम्युनिस्टों का असली चेहरा और भारत की एकता व अखंडता

वर्त्तमान विश्व का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आजकल जितनी भी राजनीतिक विचारधाराएं हैं , वह सब की सब ‘येन केन प्रकारेण’ अपने – अपने देश की सत्ता पर कब्जा करने की युक्तियां खोजती रहती हैं । तर्क यह दिया जाता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसा कुछ भी करने का किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण अधिकार है । इन राजनीतिक दलों का चेहरा , चाल व चरित्र कैसा है ? और जनहित के बारे में उनके क्या विचार हैं ? – विश्व के अधिकांश देशों में इस बात पर कोई चिंतन नहीं किया जाता । फलस्वरूप ये राजनीतिक दल अपने देश के प्रचलित संविधान की लचर व्यवस्थाओं का लाभ उठाकर सत्ता तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं । वर्तमान लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में इस प्रकार के राजनीतिक दलों के सत्ता में पहुंचकर सत्ता का दुरुपयोग करने और लोगों के अधिकारों का शोषण करने की बहुत अधिक संभावनाएं रहती हैं । क्योंकि लोकतंत्र में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई भी कुछ भी कर सकता है ।
जहाँ तक भारत की बात है तो भारत में स्थिति और भी अधिक दयनीय है । यहाँ पर कई राजनीतिक दल ऐसे हैं जिनका देश की एकता और अखंडता से कोई लेना देना नहीं है । साथ ही उनका चिंतन भी राष्ट्र विरोधी है । इस प्रकार के राजनीतिक दलों में देश के कम्युनिस्ट सबसे ऊपर हैं । पश्चिम बंगाल में अपने शासनकाल के दौरान कम्युनिस्टों ने इस प्रदेश के हिंदू स्वरूप को नष्ट कर वहां पर तथाकथित ‘गंगा जमुनी संस्कृति’ के माध्यम से इस्लाम को प्रोत्साहित करने का हरसंभव प्रयास किया । इसी प्रकार केरल में भी इन्होंने वहां के मूल हिंदू स्वरूप को विकृत कर वहां पर इस्लाम की मान्यताओं को प्रोत्साहित करने का काम किया। इतना ही नहीं , इन प्रदेशों में अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को हिंसा के माध्यम से समाप्त करने – कराने की भी कम्युनिस्टों की एक लंबी सूची है। कम्युनिस्टों के आचरण का ही अनुकरण करते हुए पश्चिम बंगाल में आजकल ममता बनर्जी इसी प्रकार की राजनीतिक कार्यशैली से शासन चला रही हैं।
कम्युनिस्ट भय , भूख ,भ्रष्टाचार की बात करते हुए कहते हैं कि जब तक समाज में ये तीनों मौजूद हैं तब तक मनुष्य सुख शांति से नहीं रह सकता । परंतु भारतवर्ष में जिन – जिन प्रांतों में जब-जब भी इनका शासन रहा है तब – तब ही वहां पर भय , भूख और भ्रष्टाचार बढ़े हैं । यह गांधीजी की अहिंसा के गीत आजकल गाते दिखाई देते हैं , परंतु सच यह है कि जिस समय गांधीजी अपना शांतिपूर्ण आंदोलन लड़ रहे थे , उस समय गांधीजी भी इनकी तीखी आलोचना के पात्र बनते थे। यही कारण था कि गांधीजी के “भारत छोड़ो आंदोलन” – का भी कम्युनिस्टों ने विरोध किया था । गांधी जी के “भारत छोड़ो आंदोलन” का कम्युनिस्ट किस आधार पर विरोध कर रहे थे ? – इसका उत्तर ये लोग आज तक नहीं दे पाए हैं।
गांधीजी दीन – हीन भारत की बात करते थे , जिसके लिए वे लँगोटी धारण करते थे , परंतु उस लँगोटी में भी कम्युनिस्टों को कभी समाजवाद या साम्यवाद के दर्शन नहीं हुए । उसको भी ये लोग साम्राज्यवाद की प्रेरक लंगोटी कहते रहे थे। इतना ही नहीं कम्युनिस्ट गांधीजी को अंग्रेजों का दलाल या एजेंट कहकर भी पुकारते रहे थे । इसके उपरांत भी आज की राजनीति का चमत्कार देखिए कि कांग्रेस गांधी के प्रति ऐसी सोच रखने वाले कम्युनिस्टों के साथ ही गलबहियां हैं । देश तोड़ने की सोच रखने वालों के साथ कांग्रेस प्रारंभ से ही इसी प्रकार गलबहियां करती आ रही है ।
इतिहास का यह भी एक सच है कि वीर सावरकरजी राजनीतिक मतभेदों के उपरांत भी गांधीजी के प्रति अपशब्दों का प्रयोग नहीं करते थे , परंतु कांग्रेस के लिए वह महान देशभक्त आज भी उपेक्षा और घृणा का पात्र है। जबकि राजनीति का यह भी एक सिद्धांत है कि राजनीतिज्ञ को देशहित में स्पष्ट वादी होना चाहिए । उसे अपने राजा को या बड़ों को स्पष्ट सलाह देनी चाहिए और यदि वह कहीं भी कुछ गलत कर रहा है तो उसे कठोर शब्दों में टोकना भी चाहिए । सावरकर जी राजनीति के इसी सिद्धांत को अपनाकर अपने आप को तत्कालीन धृतराष्ट्र का मार्गदर्शन विदुर के रूप में कर रहे थे । उस विदुर को यह कांग्रेसी और सेकुलर नेता आज तक बुरा समझते हैं और जो साथ रहकर देश के साथ घात कर रहे थे उन्हें यह उसी प्रकार छाती से लगाए घूम रहे हैं जैसे एक बंदरिया अपने मृत बच्चे को छाती से लगाई घूमती रहती है । वाह री राजनीति !!
नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी महानायक के प्रति तो इनका दृष्टिकोण और भी अधिक निंदनीय था । नेताजी को ये लोग उस समय ” तोजो का कुत्ता” कहकर पुकारा करते थे । नेताजी सुभाष चंद्र बोस विदेशी आततायी शासकों का प्रतिरोध कर रहे थे और इसके लिए वह क्रांति के माध्यम से खून बहाकर सत्ता प्राप्त करना चाहते थे तो इसमें इन कम्युनिस्टों को एक हिंसक सुभाष दिखाई देता था , परंतु आज जब अफजल गुरु या उस जैसे अन्य इस्लामिक आतंकवादी देश तोड़ने की बात करते हैं या निर्दोष लोगों का खून बहाते हैं तो उनको ये स्वतंत्रता सैनिक या ऐसा ही कोई सम्मानजनक संबोधन देकर पुकारते हैं । हम सभी यह भली प्रकार जानते हैं कि इस्लामिक आतंकवाद का सबसे बड़ा समर्थक यदि भारतवर्ष में कोई राजनीतिक दल है तो वे साम्यवादी पार्टी ही हैं।
व्यक्ति राष्ट्र और समाज जिन इतिहासनायकों को अपना आदर्श या प्रेरणा स्त्रोत मानता है , उनकी राजनीतिक व सामाजिक सोच का उस व्यक्ति , समाज और राष्ट्र पर व्यापक प्रभाव पड़ता है । यदि इस दृष्टिकोण से कम्युनिस्टों के बारे में चिंतन किया जाए तो उनके आदर्श चीन के माओ त्से तुंग जैसे लोग हैं । जिन्होंने करोड़ों लोगों का नरसंहार कराया था । तिब्बत जैसे बड़े देश पर जबरन अपना कब्जा कर उसे हजम कर जाने वाला माओ त्से तुंग ही था। ज्ञात रहे कि तिब्बत का अपना क्षेत्रफल लगभग 2800000 वर्ग किलोमीटर का है । कहने का अभिप्राय है कि तिब्बत भारत से थोड़ा ही छोटा देश है ।इतने बड़े देश को अपने भीतर सचमुच ड्रैगन ही पचा सकता है । तिब्बत के साथ यह घोर अन्याय तब हुआ है जब चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है और सुरक्षा परिषद में बैठकर विश्व के सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने का वचन सारे संसार को देता है , परंतु न तो संयुक्त राष्ट्र ही तिब्बत की रक्षा कर पाया और न सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्य ही चीन पर तिब्बत के साथ न्याय करने का दबाव बना सके।
हम सभी भली प्रकार यह जानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने 1962 में चीन के तानाशाह माओत्से तुंग द्वारा भारत पर किए गए हमले का पूर्ण मनोयोग से समर्थन किया था। उस समय चीन की उपनिवेशवादी, साम्राज्यवादी सेना द्वारा हमारे छह हजार सैनिकों की हत्या की गई थी । इसके अतिरिक्त चीन ने हमारे अरुणाचल प्रदेश के लगभग सवा लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल पर अपना अवैध अधिकार कर लिया था । इन दोनों घटनाओं पर कम्युनिस्टों ने उस समय मिठाईयां बांटी थी और अपनी प्रसन्नता खुलकर प्रकट की थी । उन्हें लगा था कि ऐसा करके चीन बहुत शीघ्रता से भारत पर अपना कब्जा करके इसकी चाबी इनके हाथों में दे देगा । यही कारण था कि देश के इन छुपे जयचंदों को उस समय चीनी सेना जहां-जहां भी दिखाई दी थी , वहीं – वहीं उन्होंने भागकर उसका स्वागत सत्कार ऐसे किया था जैसे राम वन से लौट आए हों और अयोध्या की जनता उनके आगमन पर प्रसन्नता व्यक्त कर रही हो।
यही वह समय था जब कम्युनिस्टों ने देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश का प्रधानमंत्री न मानकर माओ त्से तुंग को देश का प्रधानमंत्री कहना आरंभ कर दिया था। जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया और संविधान की हत्या कर देश के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया तो इंदिरा गांधी की इस प्रकार की कार्यवाही का भी इन क्रूर कम्युनिस्टों ने समर्थन किया था । जब इंदिरा गांधी ने देश के विपक्ष के नेताओं को जेलों में डाला और उन पर अमानवीय अत्याचार करने आरंभ किये तो उस समय तो ये कम्युनिस्ट बल्लियों उछल पड़े थे। उन्हें यह बहुत अच्छा लगा था कि देश के विपक्ष के नेताओं के साथ इंदिरा गांधी किस प्रकार अमानवीय व्यवहार कर रही हैं।
विश्व इतिहास की यह भी एक बहुत ही दर्दनाक और गद्दारी भरी घटना है कि जब चीन के सैनिक 1962 में हमारी सीमाओं में निरंतर प्रवेश कर आगे बढ़ते जा रहे थे , तब अपने देश के सैनिकों को ही युद्ध सामग्री की समय पर आपूर्ति न होने देने के दृष्टिकोण से कम्युनिस्टों ने उन कारखानों में हड़ताल करवा दी थी जिनमें युद्धक सामग्री का निर्माण होता था। उस समय इनका उद्देश्य था कि यदि ऐसा कर भारतीय सैनिकों को गोला बारूद से विहीन कर दिया जाएगा तो उन्हें चीन के सैनिक आराम से मार सकेंगे ।
1947 में देश के बंटवारे और द्विराष्ट्रवाद का समर्थन करने वाले कम्युनिस्ट अपने आदर्श नेता के रूप में स्टालिन और हिटलर को भी मानते हैं । स्टालिन इतिहास का एक ऐसा क्रूर चेहरा है जिसने अपनी सत्ता को बचाए रखने और अपनी विचारधारा का प्रचार प्रसार करने के लिए करोड़ों लोगों को मरवाया था । उसमें हिटलर के साथ अनाक्रमण संधि की थी । स्पष्ट है कि इस प्रकार की संधि करने से स्टालिन ने हिटलर को अपना राज्य विस्तार करने और दूसरे देशों के साथ अन्याय और अत्याचार करने की खुली छूट प्रदान कर दी थी । उसने कह दिया था कि तुम जो चाहो सो करो हम तुम पर कोई आक्रमण नहीं करेंगे । इस प्रकार हिटलर के अमानवीय अत्याचारों को बढ़ाने में स्टालिन जैसे कम्युनिस्ट का विशेष योगदान रहा था । बाद में हिटलर ने ही स्टालिन के साथ की गई इस प्रकार की अनाक्रमण सन्धि को तोड़कर जब रूस पर आक्रमण किया तो वहां से हिटलर कम्युनिस्टों का दुश्मन हो गया । कहने का अभिप्राय है कि जब वह संसार के अन्य देशों या लोगों पर अत्याचार कर रहा था तब हिटलर बहुत अच्छा था और यह कम्युनिस्ट दूध के धुले थे , जो उसे ऐसा करने दे रहे थे , पर जब उसने इन्हीं कम्युनिस्टों को मारना आरंभ किया तो वह मानवता का शत्रु हो गया। हिटलर के साथ ऐसा दोहरा व्यवहार कम्युनिस्ट क्यों करते हैं ? इस पर कोई संतोषजनक उत्तर इनके पास आज तक नहीं है।
सत्ता स्वार्थ के लिए भारत में राजनीति को अत्यंत नीचे गिरा देने का काम यदि भारत में कोई करता है तो वह कम्युनिस्ट ही हैं । यह कन्हैया के साथ “भारत तेरे टुकड़े होंगे” – के नारे लगा सकते हैं और अफजल गुरु को स्वतंत्रता सैनिक कह सकते हैं , चीन को यह अपना नायक मान सकते हैं , जहां जहां इनकी सत्ता होगी – वहां पर यह हिंदुओं का कत्लेआम करा सकते हैं – राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या करा सकते हैं – और क्या क्या कहा जाए ?
अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि भारत के संविधान की उन लचर व्यवस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन या संशोधन किया जाना अपेक्षित है जिनके कारण ऐसी राजनीतिक विचारधारा को भी देश में फलने फूलने का अवसर प्रदान किया जाता है जो पूर्णतया देश विरोधी कार्यों में संलिप्त रहती हो । भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग अब रुकना ही चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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