लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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-डॉ. दीपक आचार्य-

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इस विषय पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है कि बीमारियों के आदि कारण क्या हैं और वे क्यों होती हैं। शरीर में स्थूल रूप में जो भी अच्छी-बुरी प्रतिक्रियाएं होती हैं उनका मूल कारण हमारी सोच ही है। जैसी हमारी सोच होगी वैसी ही शरीर के अंग-उपांग अपनी प्रतिक्रिया करेंगे और परिवर्तन दिखाएंगे।

बीमारियां शारीरिक हों या मानसिक, इन सभी का प्रादुर्भाव चित्त पर किसी सजातीय या विजातीय वैचारिक बीजारोपण से आरंभ होता है तथा अपनी सोच की अनुकूलताएं पाकर वह अंकुरित होना आरंभ करता है। बीज रूप में यह सूक्ष्म पड़ा रहता है लेकिन जैसे ही अंकुरित होने लगता है तब वह शरीर में ही किसी अंग-प्रत्यंग में अपने लिए स्थान ढूँढ़ता है और उपयुक्त स्थान पाकर वहीं जम जाता है तथा अपनी सत्ता चलाने लगता है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे कि कम्प्यूटर के डेस्कटॉप पर किसी फाईल या फोल्डर का कोई शोर्ट कट पड़ा होता है जो ऑपन करने पर किसी न किसी भीतरी ड्राईव में खुलता है और वहीं स्टोर रहता है। यही स्थिति हमारे समग्र जीवन की है लेकिन इसमें उलटा है। पहले मस्तिष्क के धरातल पर शोर्ट कट पड़ा होता है जो बाद में स्थूल रूप में परिवर्तित होकर शरीर में कहीं स्थान बना लेता है।

अर्थात इसमें होता यह है कि हमारे दिल और दिमाग में जो कुछ पक रहा होता है वह आरंभ में सूक्ष्म रूप में होता है और प्रेरित न होने तक एक सीमा तक यों ही बीज रूप में अर्थात विचार रूप में पड़ा रहता है। जैसे ही कहीं बाहर से इसे अनुकूलताएं प्राप्त होती हैं, कहीं से पुष्टि देने वाला प्रोत्साहन प्राप्त होने लगता है वह आकार पाने लगता है और सीधा शरीर में किसी अंग-उपांग में अपना डेरा जमा लेता है।

जब तक हमारे विचार शुद्ध बने रहते हैं तब तक चित्त का पूरा का पूरा धरातल साफ-सुथरा होता है और ऎसे में शरीर अपनी सभी स्वाभाविक अवस्थाओं के अनुरूप चलता रहता है और मूल इंसानी स्वभाव बने रहने तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहता है। पर जब भी किसी प्रकार के विजातीय या मानव स्वभाव के प्रतिकूल विचार सृजित होते हैं तब अपना ज्ञान और विवेक हमेशा इंसानी स्वभाव के अनुकूल सोचता रहकर प्रतिकूल विचारों का दमन करता है।

पर यह सब एक सीमा तक ही संभव है। जब भी  हमारी स्वार्थपरता और नकारात्मक वृत्तियों का ग्राफ बढ़ने लगता है तब हमारे  ज्ञान, विवेक और शुचिता भरे सारे संकल्प ध्वस्त होने लगते हैं और इनके अवशेषों पर नकारात्मक विचार तथा स्वार्थ की पूर्ति करने वाले बीज अंकुरित होने लगते हैं।

दुर्जनों और स्वार्थियों का संग तथा उनसे प्रोत्साहन पाकर इनका पल्लवन तेजी से होने लगता है। यह वह स्थिति होती है जिसमें मन, मस्तिष्क और शरीर के बीच का मूल स्वभावी संतुलन बिगड़ जाता है और दिमाग तथा दिल में स्वार्थ एवं खुदगर्जी का अंधेरा छाने लगता है।

बस यहीं से इंसान मूल स्वभाव और मानवीय चरित्र भरी प्रवृत्तियों को खोकर ऎषणाओं के जंगल में भटकता हुआ धर्म और सत्य को भुला बैठता है और इनका स्थान ले लेते हैं झूठ, असत्य, अधर्म और अपवित्रता। जितने अधिक मलीन विचार दिल और दिमाग में आते हैं उन सभी के लिए शरीर में कोई न कोई स्थान चाहिए होता है। जैसे-जैसे इंसान पाप कर्मों, स्वार्थों और पैशाचिक कर्मों में लिप्त होता रहता है उस अनुपात में उसके चित्त में शोर्ट कट बन जाते हैें जिनका मूल स्थल शरीर के अंग-प्रत्यंग हो जाते हैं।

यही कारण है कि चित्त के धरातल पर जो लोग दृढ़ संकल्प वाले और शक्तिशाली होते हैं वे लोग अपनी सकारात्मक प्राण शक्ति का उपयोग कर नकारात्मक बीजों को पनपने का कभी मौका नहीं देते बल्कि कई लोगों में यह दैवीय क्षमता होती है कि वे इन बीजों का मन-मस्तिष्क के धरातल पर ही समूल उन्मूलन कर डालते हैं, इससे इन्हें शरीर को संक्रमित करने का कोई मौका नहीं मिलता। यहां तक कि बड़ी से बड़ी भावी समस्याओं तक को वे अपने संकल्प और सकारात्मक विचारों की शक्ति से हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर डालते हैं। इसी को प्राणिक हीलिंग भी कहा गया है।

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हमारी सारी मानसिक और शारीरिक बीमारियों का सीधा संबंध हमारे विचारों और संकल्पों से हैं। यही कारण है कि जिन लोगों के जीवन में पवित्रता और सादगी होती है, जो लोग मानवीय जीवनचर्या के अनुसार जिन्दगी जीते हैं,  मनुष्य जन्म पाने के लक्ष्य को समझते हैं तथा सेवा और परोपकार के माध्यम से समुदाय एवं सृष्टि के  लिए जीने की आदत पाले हुए होते हैं उन लोगों को बीमारियां कम होती हैं जबकि झूठ, पाप और अधर्म को अपनाने वालों, मानवीय जीवनचर्या का व्यतिक्रम करने वालों और आसुरी भावों को प्रधानता देने वाले लोगों में बीमारियां अधिक देखी जाती हैं।

बीमारियों से बचने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपने जीवन में पवित्रता और सादगी लाएं, धर्म और सत्य को अपनाएं तथा औरों के लिए जीने का ज़ज़्बा पैदा करें। मानसिक और शारीरिक बीमारियों के इस मनोविज्ञान को समझ लेना ही आरोग्य प्राप्ति का मूल मंत्र है।

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