कोरोना महामारी की दूसरी लहर का प्रभाव अर्थव्यवस्था पर कम ही होगा

देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर जारी है। जिसके कारण देश के कई राज्यों में लॉकडाउन भी घोषित किए गए हैं और इन लॉकडाउन का कड़ाई से पालन भी कराया जा रहा है, इसके कारण इन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर कुछ असर पड़ा है। इस सम्बंध में हाल ही में केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने एक आकलन जारी किया है जिसके अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान देश की अर्थव्यवस्था पर कोई बहुत बड़ा अंतर पड़ने वाला नहीं हैं। हां, एमएसएमई क्षेत्र, छोटे दुकानदार, श्रमिक वर्ग, होटल उद्योग, यातायात उद्योग, पर्यटन उद्योग आदि क्षेत्रों पर कुछ समय के लिए जरूर विपरीत प्रभाव पड़ा है।

वित्तीय वर्ष 2020-21 की दूसरी छमाही में देश की अर्थव्यवस्था में सुधार होना शुरू हुआ था। जिसके चलते देश के कर संग्रहण में भी सुधार दृष्टिगोचर हुआ है। शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रहण 2020-21 के लिए संशोधित अनुमानों से 4.5 प्रतिशत अधिक रहा है एवं वित्तीय वर्ष 2019-20 के प्रत्यक्ष कर संग्रहण की तुलना में 5 प्रतिशत अधिक रहा है। इसी दौरान वस्तु एवं सेवा कर (GST) के संग्रहण में भी अच्छी वृद्धि देखने में आई है। पिछले लगातार 6 माह के दौरान यह एक लाख करोड़ रुपए से अधिक ही रहा है। अप्रेल 2021 में तो 1.41 लाख करोड़ रुपए के संग्रहण के साथ यह रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह दर्शाता है कि देश में आर्थिक गतिविधियों में लगातार सुधार हो रहा है।

फिर भी, कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने बाजार में भावनाओं को जरूर प्रभावित किया है। जिसके चलते अप्रेल 2021 माह में शेयर बाजार में निफ़्टी सूचकांक एवं सेंसेक्स सूचकांक में क्रमशः 0.4 प्रतिशत एवं 1.5 प्रतिशत की कमी दर्शायी गई है। भारतीय रुपए का भी मार्च 2021 माह के दौरान 2.3 प्रतिशत से अवमूल्यन हुआ है। परंतु भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किए गए प्रयासों के कारण सिस्टम में पर्याप्त तरलता बनी हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष 2020-21 के दौरान 3.17 लाख करोड़ रुपए के खुले बाजार परिचालन (OMO) किए हैं ताकि सिस्टम में पर्याप्त तरलता बनी रहे।

अभी तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में वृहद स्तर के आर्थिक संकेतकों पर दूसरी लहर का विपरीत प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है। उच्च आवृति आर्थिक संकेतक भी बहुत उत्साहवर्धक परिणाम दर्शा रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2020-21 की चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था में पिछले 2 तिमाहियों की तुलना में अच्छी वृद्धि देखी गई है। परंतु बाजार में, भावनाओं में जरूर कुछ निराशावाद देखा जा रहा है। साथ ही, एमएसएमई क्षेत्र द्वारा बैंकों से ऋण के उपयोग में उत्साहजनक वृद्धि दिखाई नहीं दी है। कोरोना महामारी की प्रथम लहर के दौरान पूरे राष्ट्र में लॉकडाउन लगाया गया था जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां पूर्णतः बंद हो गई थीं एवं इसका सबसे अधिक विपरीत प्रभाव गरीब तबके के लोगों पर पड़ा था। जबकि, देश में फैली दूसरी लहर के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन नहीं लगाया गया है केवल कुछ राज्यों ने कड़ा लॉकडाउन लगाया है। इस प्रकार, इस लॉकडाउन का असर केवल इन प्रदेशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने की सम्भावना है। जिन राज्यों ने लॉक डाउन नहीं लगाया है, उन राज्यों में आर्थिक गतिविधियां पूर्णतः जारी रही हैं। इसी कारण से यह कहा जा सकता है कि दूसरी लहर के दौरान देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ने की सम्भावना कम ही है।

वित्त मंत्रालय के अनुसार आगे आने वाले समय में दबी हुई मांग के कारण वित्तीय वर्ष 2021-22 के द्वितीय छमाही में देश की आर्थिक गतिविधियों में उछाल देखने में आ सकता है। वित्तीय वर्ष 2020-21 के नवम्बर, दिसम्बर एवं चौथी तिमाही में भी दबी हुई मांग के पुनः उत्पन्न होने के कारण ही उपभोक्ता वस्तुओं एवं वाहन क्षेत्र में मजबूत रिकवरी देखने में आई थी। इसका प्रभाव वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में अक्टोबर 2020 के बाद से लगातार देखने में आया है जब यह संग्रहण एक लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है।

हालांकि कोरोना के मामले बहुत अधिक बढ़ते जा रहे हैं जिसके कारण केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत अधिक खर्च किया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च, निजी अंतिम उपभोग खर्च के 5 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत हो जाने की सम्भावना है। यह खर्च 66,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि से बढ़ सकता है। अतः इस बढ़े हुए खर्च का भी तो अर्थव्यवस्था पर असर होगा। आज उपभोक्ता बहुत घबराया हुआ है और अपने स्वास्थ्य को लेकर वह बहुत चिंतित है। वर्तमान परिस्थितियों में उसे आर्थिक गतिविधियों से कोई मतलब नहीं है। अतः प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्चे को छोड़कर उपभोक्ता अन्य गतिविधियों पर ख़र्च नहीं के बराबर कर रहा है।

विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना महामारी के फैलने के कारण ग्रामीण इलाकों में लोगों ने अपने ख़र्चों में कटौती करना प्रारम्भ कर दिया है ताकि जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जा सके। इसी कारण से उपभोक्ता वस्तुओं एवं वाहन जैसी मदों की खरीददारी में ग्रामीण इलाकों में मांग में कमी देखने में आई है। इसलिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत अभी हाल ही में 9.5 करोड़ किसानों के खातों रुपए 19,000 करोड़ रुपए की राशि प्रदान कर दी है। ताकि गावों में किसानों को अतिरिक्त राशि ख़र्च के उपलब्ध हो सके। ज्ञातव्य हो कि इस योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार प्रतिवर्ष रुपए 6,000 (2,000 रुपए प्रति चार माह के अंतराल पर) पात्र किसानों के खाते में सम्मान निधि के रूप में यह राशि हस्तांतरित करती है। अभी तक इस मद पर 1.15 लाख करोड़ रुपए की राशि किसानों के खातों में हस्तांतरित की जा चुकी है।

हालांकि अच्छी खबर यह भी आई है कि पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था को बल प्रदान करेगा क्योंकि इस वर्ष भी मानसून के बहुत अच्छे प्रदर्शन की सम्भावना व्यक्त की गई है। हमारा देश विश्व में सबसे अधिक तेज गति से आर्थिक विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अतः अर्थव्यवस्था में अच्छी गति बनी रहेगी ऐसी आशा की जानी चाहिए। अभी कुछ समय के लिए जरूर उपभोग की मात्रा में कुछ कमी देखने में आई है एवं शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ी है, परंतु कोरोना महामारी की दूसरी लहर के निकल जाने के बाद तो भारतीय अर्थव्यवस्था पुनः विश्व में सबसे अधिक तेज गति से आर्थिक विकास करने वाली अर्थव्यस्था बन जाएगी।

केंद्र सरकार, राज्य सरकारें एवं भारतीय रिजर्व बैंक भी अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाए रखने हेतु लगातार प्रयास कर रहे हैं। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को यह अधिकार दिए गए हैं कि वे भारतीय रिज़र्व बैंक से अतिरिक्त ऋण लेकर अपने पूंजीगत ख़र्चों में वृद्धि करें ताकि आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाया जा सके। केंद्र सरकार ने भी वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में पूंजीगत ख़र्चों में अत्यधिक वृद्धि का प्रावधान किया है और इन मदों पर ख़र्च किया भी जा रहा है। इससे सीमेंट, स्टील, आदि उत्पादों की मांग बढ़ेगी। इस समय में वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने की ओर भी ध्यान देना जरूरी होगा ताकि मुद्रा स्फीति पर अंकुश बना रहे।

वर्तमान समय में बेरोजगारी नहीं बढ़े बल्कि रोजगार के नए अवसर निर्मित हों इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत हैं। केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा योजना के अंतर्गत ग्रामीण इलाक़ों में रोजगार निर्मित करने हेतु प्रदान की जाने वाली राशि को भी बढ़ा दिया है। इस दौरान, एक और विशेष बात देखने में आई है कि धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों, सेवा संस्थानों तथा औद्योगिक इकाईयों ने भी आगे आकर समाज में गरीब तबके की बढ़-चढ़कर मदद की है, एवं सहायता राशि में अत्यधिक वृद्धि दर्ज की है।

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