लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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-एम. अफसर खां सागर-   republic

हर साल 26 जनवरी को मुल्क गणतंत्र दिवस पूरी अकीदत और शान से मनाता है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को मंजूरी मिलने के बाद मुल्क के आम नागरिकों को खुली हवा में जीने का हक हासिल हुआ। आजाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना ने गणतंत्र की भावना को प्रबल बनाया। अगर देखा जाए तो 60 साल से ज्यादा का अरसा गुजर जाने के बाद भी हम आजतक गणतंत्र की मूल भावना को समझ पाने में नाकाम रहे हैं! गणतंत्र का असल मतलब शासन या सरकार में जनता की हिस्सेदार से है। मुल्क में लोकतंत्र की स्थापना के बाद सत्ता में नागरिकों को भागीदारी तो मिली मगर आम आदमी को शासन में हिस्सेदारी मिली की नहीं ये कह पाना बेमानी होगा। अगर गणतंत्र में नागरिकों को कुछ अधिकार मिला है तो महज वोट देने का ना कि सत्त में पूर्ण हिस्सेदारी का या यूं कह लें कि गांधी जी के पूर्ण स्वराज की स्थापना का सपना आजादी के साठ साल के बाद भी किसी मृगमरिचीका से कम नहीं।

गणतंत्र ने भारतीय लोकतंत्र को हर पांच साल में चुनावी त्यौहार का सौगात तो दिया मगर इस त्यौहार में गण को जो हासिल होना चाहिए शायद उसपर आज भी तंत्र हाबी दिखता है। संसद हो या विधानसभाऐं वहां पहुंचने वाले सदस्यों को गण की आवाज बुलन्द करनी चाहिए मगर आज हालात ये हैं कि तंत्र की शोर में गण मौन नजर आता है। आखिर गण क्या करे पांच साल तक उसे जो मौन रहना पड़ता है? संसद या विधनसभओं में इस बात पे तो चर्चा होती है कि फलां की सरकार में भुखमरी, मंगाई व बेरोजगारी है मगर इस बात पर ईमानदार चर्चा कभी नहीं होती कि इन समस्याओं का निस्तारण कैसे किया जाए। इसका एक खास वजह है कि सदन में जाने के बाद ये लोग गण से माननीय हो जाते हैं तथा इन्हें आराम तलब व एश्वर्य भरे जीवन की लत लग जाती है। माननीय बनने के बाद इनका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक हो जाता है कि किसी जुगत से अपना आगामी जिन्दगी को सुख-सुविधाओं के अम्बार से भर लिया जाए। यही भावना तंत्र को गण से अलग कर देता है तथा ऐसे में गण बदहाल जिन्दगी जीने को बाध्य होता है। स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु राजनैतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक आजादी का होना भी लाजमी है। आर्थिक आजादी का मूल मंत्र आर्थिक विकेन्द्रीकरण तथा आत्मनिर्भरता है। सरकारी आंकड़ेबाजी से हट कर देखें तो आज भी हमारे समाज में 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग मूलभूत जरूरतों से वंचित है। अर्थव्यवस्था का विशाल भण्डार चन्द लोगों के हाथों में है, जिसकी वजह से अनेक गम्भीर समस्याओं मसलन गरीबी, बेकारी, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति आदि बढ़ी है। इसलिए लोग गणतंत्र के जश्न से ज्यादा भूख के ताण्डव से जूझने में मशगूल हैं।

सियासत का हालिया चेहरा लोगों के जख्मों पर मरहम की जगह नमक लगाता दिख रहा है। आमजन के विकास के लिए बनने वाली सैकड़ों, अरबों करोड़ों की योजनाओं में भ्रष्टाचार का पलीता यही नुमाइंदे लगाते नजर आ रहे हैं! एक तरफ जहां लोग भूख की आग में जल रहे हैं तो दूसरी तरफ कमीशन की काली कमाई से इन राजनेताओं के आलीशान महल और कोठियां आबाद हैं। गरीबी, भुखमारी का नारा देकर ये जनता को साल दर साल ठगते आ रहे हैं मगर विकास के नाम पर ढाक के तीन पात के सिवा आज तक कुछ नहीं नजर आता। जिस मुल्क में नागरिकों की हिस्सेदार चुनाव में सिर्फ वोट डालने तक महदूद हो, वहां गणतंत्र के मायने व मतलब निकालना कितना अहम माना जाएगा? सफेदपोश राजनेताओं की राजसी ठाठ के बाद आज नौकरशाहों की हालत भी किसी रसूखदारों से कम नहीं। इनके दरबारों की चक्कर लगाकर देश का गण खुद को बौना समझने लगा है। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उन्ही की सुनी जाती है जो आम नहीं खास माने जाते हैं! आम को तो यहां से तसल्लीकुन बातों से टरका दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों की चक्कर लगाते लगाते ये लोग घनचक्कर हो जाते हैं। इंसाफ के लिए सालों-साल दर-दर की ठोकरें खाकर गण मौन साधने पर मजबूर हो जाता है।

इस बात से कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता कि संविधान के निर्माताओं ने मुल्क के आम नागरिकों को ऐसा लोकतांत्रिक संविधान दिया है, जिसमें सभी सम्प्रदाय, धर्म व समुदाय के लोगों को भेद-भाव रहित बराबरी का हक मिला है। मगर संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से आम नागरिक आज भी महरूम नजर आता है। जबकि सफेदपोश सियासतदां संविधान के लचीलेपन का लाभ लेकर बड़े से बड़े कारनामें अंजाम दे जाते हैं। शायद यही वजह है की लोकतंत्र में अपराधतंत्र का बोलबाला होता जा रहा है। ऐसे लोग ही जनतंत्र की पवित्र मन्दिर में जाकर गणतंत्र का मखौल उड़ाते नजर आते हैं। गणतंत्र की मूल भावना को सभी को समझना बेहद लाजमी है चाहे वो सियासतदां हों, नौकरशाह या आमजन। सर्वाजनिक स्थलों, सरकारी कार्यालयों या स्कूलों में तिरंगा फहराकर व बच्चों में मिठाईयां बांटकर तथा जय हिन्द का नारा लगाने भर से गणतंत्र का हक अदा नहीं हो सकता। ऐसा करके हम गणतंत्र दिवस तो मना सकते हैं मगर गण को तंत्र में शामिल किये बिना गणतंत्र का कोई मतलब नहीं निकलने वाला। नहीं तो यूं ही तंत्र के शोर में गण मौन नजर आयेगा।

4 Responses to “तंत्र के शोर में गण मौन”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    महात्मा गांधी ने कहा था,
    “सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए २० आदमी नहीं चला सकते, वह तो नीचे से हर एक गाँव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए.
    सत्ता के केंद्र बिंदु इस समय दिल्ली,कलकत्ता या बम्बई जैसे बड़े नगरों में हैं,मैं उसे सात लाख गाँवों में ले जाना चाहूंगा.”
    इसके अतिरिक्त महात्मा गांधी ने यह भी कहा था.”सबसे गरीब और सबसे कमजोर आदमी जिसको तुमने देखा है,उसके चेहरे को याद करो और अपने आप से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, क्या वह उसके किसी काम आयेगा? क्या उससे उस गरीब और कमजोर का कोई भला होगा?क्या वह कदम उस गरीब और कमजोर व्यक्ति के जीवन और भविष्य पर उसका नियंत्रण स्थापित कर सकेगा?दूसरे शब्दों में क्या यह करोड़ों असहाय और भूखे लोगों को स्वराज की ओर ले जाएगा?”
    आज भी कहाँ है वह स्वराज?क्या कांग्रेस वह स्वराज दे पायी या क्या भाजपा ने अपने शासन काल में उस सपने को साकार करने की दिशा में कोई कदम उठाया? आज भी जब मोदी के प्रशंसा करने में उनके समर्थकों में होड़ लगी है,क्या किसी ने उनसे यह पूछने की जुर्रत की है कि क्या आपने उस सपने को साकार करने का अपने राज्य में प्रयत्न किया?हो सकता है कि उनको लग रहा हो कि वह महात्मा गांधी के सपने को क्यों साकार करें तो उनको पंडित दीन दयाल उपाध्याय के आर्थिक और प्रशासनिक विचारों को समझना होगा,जो महात्मा गांधी के विचारों से भिन्न नहीं है. हो सकता है कि मैं गलत होऊं,पर मुझे तो लगता है कि महात्मा गांधी की हत्या कांग्रेस ने की ,तो भाजपा भी पीछे नहीं रहा और उसने पंडित दीन दयाल उपाध्याय की हत्या कर दी.

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  2. Abdul h khan

    बहुत ही अच्छा लेख अफसर साहब ,
    ६४साल होगये पर हम वही खड़े है,
    9 दिन में मानो 2.5 कोस चले है।
    आज भी वही अत्यचार वही तंत्र है ,
    वही जनता को बांटना लीडरो का मूल मंत्र है।
    आज भी सच बोलने हक मांगने पर,
    लाठी गोली मिलती है,
    आज भी उन्नति की सरिता,
    इन्ही के घरो में बहती है।
    फर्क हुआ सिर्फ इतना कि शासको के रंग बदल गये है,
    पुराने शासको से सबक ले के अत्याचार के ढंग बदल गये है।
    आज अपराधियों में विश्वाश और जनता में डर है
    देश का शासक चुनने वाला ही बेघर है।

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  3. IMTIYAZ AHMAD

    अफशर भाई सच्ची लोकशाही तभी है जब इसका लाभ एक आम आदमी तक पहॅुचे आज देश की जनता भय भुख भ्रष्टाचार से दो चार है लोग न्याय के लिए वर्षो से बाट जो रहे है लोग लोगो का लोकतंत्र से भरोसा उठता जा रहा है।

    सौ में अस्सी बेइमान है

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  4. pradeep patel

    जी बिलकुल सही बोला आपने आज २६ जनुअरी केवल किताबो में ही सिमट कर रह जायेगा. अफसर भैया आपने ऐसा मुद्दा उठाकर हैम जैसे को इसका अनुभव देते है….बहोत ही अच्छा टॉपिक्स है aapka दिल से सुक्रिया जय हिन्द

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