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    रूपहले पर्दे को दरकार है सुधार की तभी इसका स्वर्ण युग वापस लौट सकता है . . .

    सत्तर और अस्सी के दशक तक बंबई का जादू लोगों के सर चढ़कर बोलता था, क्योंकि बंबई वह स्थान था जहां रूपहले पर्दे पर दिखाई देने वाली फिल्मों का निर्माण होता था। उस दौर में हिन्दी में मायापुरी, अंग्रेजी में द सन जैसी पत्रिकाएं वालीवुड की गासिप्स से भरे हुआ करते थे। इन पत्रिकाओं को लोग हाथों हाथ लिया करते थे।

    अखबारों में सिने अभिनेता और अभिनेत्रियों के साक्षात्कार पढ़ने व फोटो देखने लोग लालायित रहा करते थे। प्रौढ़ हो रही पीढ़ी इस बात की गवाह है कि उस दौर में जब दूरदर्शन का आगाज नहीं हुआ था तब मनोरंजन का साधन ट्रांजिस्टर ही हुआ करते थे। बुधवार को बिनाका गीत माला, रविवार को एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा, रोज शाम को फौजी भाईयों की पसंद जैसे कार्यक्रम लोगों को बांध कर रखा करते थे।

    इसके बाद जैसे ही दूरदर्शन का आगाज हुआ वैसे ही रविवार की शाम आने वाली फीचर फिल्म देखने के लिए रविवार को महिलाएं भोजन आदि जल्द ही बना लिया करतीं थीं, क्योंकि शाम छः बजे से ही फीचर फिल्म आया करती थी। उस दौर में टॉकीज के जलजले हुआ करते थे। जिन शहरों में अघोषित बिजली कटौती हुआ करती थी, वहां एक फिल्म को लोग चार पांच दिन तक उसी शो में टुकड़ों में भी देखा करते थे।

    आज सिनेमा की स्थिति क्या है। इस पर मनन करने की जरूरत है। अस्सी के दशक तक समाज को दिशा और दशा देने वाली कहानियां लिखी जाती थीं, जिन पर फिल्में बना करती थीं। इनमें मसाला, मारधाड़, कुछ हद तक उत्तेजना वाले दृश्य भी हुआ करते थे। इस तरह की फिल्में जो व्यस्कों के लिए बना करती थीं उन्हें ए सर्टिफिकेट दिया जाता था। आज के समय में अधिकांश फिल्मों को अगर आप देख लें तो उन्हें ए सर्टिफिकेट दिया जा सकता है।

    सिनेमा के स्वर्णिम युग की अगर बात की जाए तो उस दौर में एक से बढ़कर एक निर्माता और निर्देशक हुआ करते थे। बिमल राय, चेतन आनंद, व्ही. शांताराम, राज कपूर, कमाल अमरोही, महबूब खान न जाने कितने सुलझी सोच वाले निर्माता और निर्देशक हुआ करते थे उस दौर में। फिल्मों के कथानक या कहानी की बात की जाए तो विषयवस्तु, कानों को भाने वाला संगीत, दर्शकों को बांधे रखने वाला अभिनय आदि इसमें भरा होता था।

    उस दौर में संगीतकारों को बहुत मेहनत करना पड़ता था। उस दौर में सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन, सलिल चौधरी, हेमंत कुमार, शंकर जयकिशन, कल्याण जी आनंद जी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, हसरत जयपुरी, सहिर लुधियानवी, मदन मोहन, सी. रामचंद्र, नौशाद आदि जैसे संगीतकार थे जो संगीत में जान भर दिया करते थे। उस दौर में अपने सुरों से महफिल सजाने वाले मोहम्मद रफी, मुकेश, किशोर कुमार, तलत महमूद, हेमन्त कुमार, लता मंगेशकर, सरैया जैसे कलाकार हुआ करते थे। बैजू वावरा के एक गाने ऐ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले को सुनकर श्रोताओं की आंखों में आंसू आ जाते थे। इसी तरह सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के द्वारा गाए गए ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी गीत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखें भी नम कर दी थीं।

    उस दौर के गानों में बोल भी बहुत कुछ कह जाते थे, यही कारण है कि आज भी पुराने गीत ही सुनना लोग पसंद करते हैं, यह अलहदा बात है कि आज के समय में युवा पीढ़ी को बोल से ज्यादा सरोकार नहीं रह गया है आज तो युवा सिर्फ धूम धड़ाम ही सुनना चाहता है। याद है एक बार मशहूर गायक किशोर कुमार का एक साक्षात्कार मायापुरी में छपा था, उन्होंने कहा था कि एक बार वे अपनी खुली कार में मुंबई में चालक के साथ जा रहे थे और एक चौराहे पर यातायात जाम होने की स्थिति में लगातार बजने वाले हार्न को देखकर उन्होंने अपने चालक से कहा था कि यही है भविष्य का संगीत! आज किशोर कुमार की बात सत्य ही साबित होती दिखती है।

    आज के सिने उद्योग की तुलना अगर उस समय के सिने उद्योग से की जाए तो आज सब कुछ बनवाटी एवं खोखला ही प्रतीत होता है। उस दौर की फिल्में साल साल भर टाकीज में लगी रहतीं थीं, जो गोल्डन जुबली मनाया करती थीं। उस दौर में सुपर स्टार के बजाए जुबली स्टार हुआ करते थे। आज फिल्म में न तो प्रेरणादायक कहानी है न ही कर्णप्रिय संगीत। हीरो हीरोईन्स के द्वारा जिस तरह अंग प्रदर्शन कर अपनी फिल्में हिट करवाने का प्रयास किया जाता है वह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है।

    पता नहीं आज के निर्माता निर्देशक, संगीतकार, पटकथा लेखक, अदाकारों आदि को क्या हो गया है। उस दौर में बहुत ही कम पारिश्रमिक पर सभी पूरी मेहनत से काम किया करते थे, पर आज वह चीज नहीं दिखाई देती है। आज की फिल्में जनता के दिलो दिमाग पर प्रभाव नहीं डाल पा रही हैं। उस समय डाकुओं के उन्नमूलन के लिए डकैतों पर फिल्में बनीं और अनेक डकैतों ने आत्म समर्पण किया। आज नशे के अवैध कारोबार पर बनने वाली फिल्में लोगों को इस कारोबार से दूर करने के बजाए उनके व्यापार के लिए नए आईडियाज देने का काम करती दिख रही हैं। इसलिए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सेंसर बोर्ड आदि को चाहिए कि वह इस पर लगाम लगाए और समाज को दिशा और दशा देने वाली फिल्मों को प्रोत्साहित करने के मार्ग प्रशस्त करे।

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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