आत्मा को सुख प्रभु के चिन्तन से मिलता हैः आचार्य देवप्रकाश

आर्यसमाज प्रेमनगर, देहरादून का वार्षिकोत्सव-

-मनमोहन कुमार आर्य

               आर्यसमाज प्रेमनगर, देहरादून नगर देहरादून का एक महत्वपूर्ण आर्यसमाज है। देहरादून के केन्द्रीय स्थान घण्टाघर से इसकी दूरी 8 किमी. है। यह समाज देहरादून-शिमला-चकराता राजमार्ग पर स्थित है। यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस समाज के दो दिवसीय वार्षिकोत्सव का आज समापन हुआ। प्रातः पं. वेदवसु शास्त्री जी के पौराहित्य में यज्ञ सम्पन्न किया गया। यज्ञ के बाद सभागार में आयोजित कार्यक्रम में आर्य भजनोपदेशक श्री मुकेश कुमार जी के भजन हुए। श्री मुकेश कुमार जी बहुत अच्छे प्रभावशाली भजन गाते हैं। उन्होंने कई भजन प्रस्तुत किये। उनका गाया एक भजन था अपनी ही निगाहों से हमने अपना ही वतन जलते देखा, अपना मधुबन जलते देखा अपना उपवन जलते देखा।। खामोश रहे कुछ कह सके, इन दौलत के दीवानों से। जब भीगी भीगी आंखों से दुलहन का बदन जलते देखा।। तुमने तो रहीसों की अर्थी फूलों से लदी देखी होगी, बेमोल ने अपनी आंखों से लाशों को नग्न जलते देखा।। इस प्रभावशाली भजन के बाद के बाद आचार्य देव प्रकाश का जी व्याख्यान हुआ।

               आचार्य देवप्रकाश जी ने कहा कि आज के संसार में अनेक विडम्बनायें हैं। हमारे पूर्वजों ने अनुसंधान किया और हमारे सुख की कामना की। उन्होंने हमें संविधान बना कर दिया। वह चाहते थे कि प्राणीमात्र सुखी रहें। देश समाज ने पूर्वज ऋषियों की देनों का सदुपयोग संरक्षण नहीं किया। हम उनकी देनों से दूर होते गये। आचार्य जी ने कहा कि ऋषियों की दी हुई सन्ध्या, उपासना, यज्ञ आदि की वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को छोड़ देने के कारण ही मनुष्य दुःखी है। हम अपने शरीर को भोजन कराते हैं उसे स्वस्थ रखने के लिये। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनका उद्देश्य केवल भोजन खाना और सोना है। उन्हें जीवन के उद्देश्य की पूर्ति का ज्ञान नहीं है। खाने व सोने के अतिरिक्त उनके जीवन का कोई प्रयोजन नहीं होता। जीवन के उद्देश्य को नकारने से मनुष्य मानसिक रूप से दुःखी होना आरम्भ हो जाता है। आचार्य जी ने कहा कि मन का स्वभाव संकल्प व विकल्प करना है। मनुष्य की बुद्धि का काम निर्णय करना है। चित्त का काम कार्यों का विश्लेषण करना है। हमारी सब इन्द्रियों व अन्तःकरण का उद्देश्य जीवन को उन्नत बनाना है।

               आचार्य देवप्रकाश जी ने कहा कि हम केवल धन कमाने को महत्व देते हैं। उन्होंने कहा कि प्रचुर धन होने पर भी हम सुखी नहीं हो सकते। एकमात्र धन का होना सुख का साधन नहीं है। आत्मा को सुख प्रभु के चिन्तन से मिलता है। आत्मा का स्वभाव शान्ति को प्राप्त होना है। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि ने प्रातः सायं दो घण्टे गायत्री जप सन्ध्या करने का विधान किया है। आचार्य जी ने आत्महत्या का उल्लेख कर आत्महत्या के कारणों पर प्रकाश डाला। ईश्वर से विमुखता ने ही लोगों को सुख से दूर किया है। आचार्य जी ने भौतिक जीवन की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि हमने अपने ऋषियों की वृत्ति को छोड़ दिया है। हमें अपने मन को शान्त रखने के लिये शान्ति के साधन ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय सहित योगाभ्यास आदि का सेवन करना चाहिये। आचार्य जी ने पूना के एक बहुत बड़े धनवान व्यक्ति के साधनों पर विस्तार से प्रकाश डाला और बताया कि वह प्रतिदिन 24 गोलियां खाते थे और तीन दिन में एक बार अपनी नाभि में 36000 हजार मूल्य का टीका लगवाते थे। आचार्य जी ने इसे धन की गति बताया। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए आचार्य देवप्रकाश जी ने स्वाध्याय करने की प्रेरणा की। कार्यक्रम का संचालन कर रहे विद्वान पुरोहित पं. वेदवसु शास्त्री जी ने कार्यक्रम में उपस्थित श्री गौतम कश्यप, श्री जितेन्द्र सिंह तोमर, श्री यशवीर आर्य, श्री गणेशपति जी, श्री केसर सिंह सहित श्री मनमोहन आर्य का परिचय भी दिया। उन्होंने आर्यसमाज को दान देने वाले लोगों की सूची भी पढ़कर सुनाई।

               आर्यसमाज के कोषाध्यक्ष श्री धीरज कुमार की पुत्री त्रिषा ने ऋषि जीवन पर एक मार्मिक गीत सुनाया। श्री धीरज कुमार जी ने भी एक गीत प्रस्तुत किया जिसके बोल थे उठो दयानन्द के सिपाहियों समय पुकार रहा है, देशद्रोह का विषधर फन फैला फुफकार रहा है।। गीत की यह पंक्तियां आर्य कवि सारस्वत मोहन मनीषी जी की लिखी हुई हैं। सभी श्रोताओं ने इस गीत को बहुत पसन्द किया। इस गीत के बाद आर्य निर्मात्री सभा के प्रचारक श्री विजयपाल सिंह जी ने सभा को सम्बोधित किया। अपने सम्बोधन में उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द जी के बलिदान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1902 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी ग्राम में प्रथम गुरुकुल की स्थापना की थी। स्वामी जी स्वयं को आर्यसमाज के प्रचार व शुद्धि के कामों के लिये अपना बलिदान दिया। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपनी समस्त भौतिक सम्पत्ति गुरुकुल को दान दी थी। उन्होंने अपने दो पुत्रों हरिश एवं इन्द्र जी को गुरुकुल में ही पढ़ाया था। श्री विजयपाल सिंह जी ने महापुरुषों का जीवन पढ़ने और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा की। श्री विजयपाल ने बताया कि वह बीएचइएल की सेवा से सेवानिवृत हुए हैं। उन्होंने स्वामी जी से प्रेरणा लेकर सेवानिवृत होने पर गुरुकुल चित्तौड़-झाल को एक लाख रुपये का दान दिया था। उन्होंने एक कन्या गुरुकुल का नाम बताया और कहा कि उसे भी उन्होंने एक लाख रुपये का दान दिया। देहरादून के आर्य विद्वान श्री सुनील शास्त्री जी द्वारा गुरुकुल आरम्भ करने पर उन्होंने उन्हें पच्चीस हजार रुपये प्रदान किये। श्री विजयपाल ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वह श्री सुनील शास्त्री द्वारा संचालित गुरुकुल की और सहायता करने के लिये तत्पर हैं। श्री सुनील शास्त्री जी मण्डप में विद्यमान थे। श्री विजय पाल जी ने आर्य निर्मात्री सभा के दिनांक 28 व 29 दिसम्बर, 2019 को वैदिक साधन आश्रम में आयोजित शिविर की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि उनके एक पुत्र पूना में साफटवेयर इंजीनियर हैं। वह अपने वेतन का आधा भाग आर्यसमाज के प्रचार पर व्यय करते हैं। उनके दूसरे पुत्र देहरादून के मैक्स अस्पताल में कार्यरत हैं।

               कार्यक्रम में पधारे हरिद्वार के युवक श्री गौतम कश्यप का ओजस्वी सम्बोधन भी हुआ। श्री गौतम ने स्वामी श्रद्धानन्द जी से जुड़ी उस घटना को प्रस्तुत किया जिसमें उन पर अंग्रेज अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि गुरुकुल में बम बनाये जाते हैं। इसके उत्तर में स्वामी जी ने अधिकारियों को गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को दिखाकर कहा था कि यही ब्रह्मचारी उनके वास्तविक बम हैं। श्री गौतम कश्यप ने कहा कि हमें राम बनकर रण भूमि में कूदना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि हमें स्वंय राम बनना है। श्री कश्यप ने कहा कि अहिंसा-अहिंसा कह कर लोगों को कायर बनाया जा रहा है। उन्होंने हिन्दू-आर्य महिलाओं द्वारा पौराणिक व सनातनी गुरुओं के सत्संगों में सार्वजनिक रूप से नृत्य करने को वैदिक संस्कृति की दृष्टि से अभद्र बताया। श्री गौतम ने अन्तर्राष्ट्रीय कवि श्री सारस्वत मोहन मनीषी जी की अहिंसा पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कविता सदा अहिंसा सर्वोत्तम मन की कस्तूरी है पर दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरूरी है। सोमनाथ का मन्दिर टूटा कहां अहिंसा थी? शक हूणों ने हमको लूटा कहां अहिंसा थी? भिक्षुणियों की छाती काटी कहां अहिंसा थी? लाशों से व्यभिचार किया क्या वहां अहिंसा थी? हिंसक पशु के लिये व्यर्थ में हलवा पूरी है। दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरूी है।। को बहुत ही ओजस्वी शब्दों में पूरा सुनाई। यह कविता काफी लम्बी है। हमारे पास इस कविता की आर्य कवि सारस्वत मोहन मनीषी जी के मुखारविन्द की वीडीयो है। किसी अवसर पर हम इस पूरी कविता को प्रस्तुत करेंगे। एक बार हम वीडीयों को फेसबुक पर प्रस्तुत कर चुके हैं। धर्म की रक्षा में, जैसे कि हमारे सैनिक करते हैं, हिंसा आवश्यक होती है। इसी के साथ श्री गौतम कश्यप ने अपना सम्बोधन समाप्त किया। इनके व्याख्यान की श्रोताओं ने जमकर प्रशंसा की।

               इसके बाद मुख्य वक्ता श्री वीरेन्द्र शास्त्री जी का सम्बोधन हुआ। इनका सम्बोधन लम्बा है। इसे हम एक पृथक लेख के द्वारा प्रस्तुत करेंगे। सभा को जिला आर्य उपप्रतिनिधि सभा, देहरादून के प्रधान श्री शत्रुघ्न मौर्य जी ने भी सम्बोधित किया। अपने सम्बोधन में उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन की कुछ प्रेरणादायक घटनाओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन से प्रेरणा लेने की अपील की। श्री मौर्य ने शराब से होने वाली हानियों की चर्चा भी की। उन्होंने प्रदेश में शराब बन्दी के लिये एक प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित कराया। देहरादून आर्यसमाज का सौभाग्य है कि उसे एक पूर्णकालिक योग्य व ऋषिभक्त प्रधान मिला हुआ है। इनके सहयोगी जिला मंत्री श्री भगवान सिंह राठौर भी उन्हीं के समान ऋषिभक्त एवं वेद प्रचार की भावना से युक्त हैं। शान्तिपाठ के साथ वार्षिकोत्सव का समापन हुआ। इसके बाद सभी ने गरम गरम ऋषि लंगर ग्रहण किया। भोजन बहुत स्वादिष्ट बना हुआ था। वितरण व्यवस्था भी बहुत अच्छी थी जिसका श्रेय गुरुकुल पौंधा के ब्रह्मचारियों को है जिन्होंने भोजन वितरण का कार्य व्यवस्थित ढंग से किया। ओ३म् शम्।

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