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    बदलते सामाजिक संबंधों की त्रासदी

    किस कदर आप्रासंगिक हो रही है बुजुर्ग पीढ़ी

    -राजेश त्रिपाठी

    परिवार यह चार अक्षरों का महज एक शब्द नहीं अपितु एक सुखद एहसास है। एहसास प्रेम का, विश्वास का और आश्रय का। परिवार समाज व्यवस्था का एक अभिन्न और अनिवार्य अंग। जिसे परिवार का सुख प्राप्त है, मानो उसके लिए जमीन में ही जन्नत का सुक नसीब है। और जो एकाकी है उसका पल-पल उसे काटने दौड़ता है। किसी अपने की कमी उसे हरदम सालती है। कुछ लोग कह सकते हैं कि उन्हें तो एकाकी जीवन ही अधिक भाता है, न किसी तरह का बंधन, न भीड़-भड़क्का और न एक साथ कई लोगों की जिम्मेदारी ढोने का लफड़ा। कई ऐसे हैं तो अपने को प्रगतिशील और सिद्धांतवान दिखाने के लिए शादी नहीं करते। न करें यह उनकी व्यक्तिगत पसंद जिसमें दूसरे की कोई दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह सिद्धांत कम और पलायनवाद ज्यादा है। आप अधूरे हैं क्योंकि आप जिंदगी की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। ऐसे तमाम एकाकी व्यक्ति अपने दिल में हाथ रख कर सच-सच कहें क्या उन्हें कभी अपने किसी की जरूरत नहीं महसूस हुई। एकाकी रहने का सुख क्या और कैसा है नहीं पता क्योंकि बचपन से ही परिवार और संयुक्त परिवार के बीच पले हैं लेकिन साधारण सी बुद्धि में इतनी तो समझ है कि एकाकी जीवन घुटन और कुंठा का होता है।

    परिवार की एक अपनी विशेषता है। संयुक्त परिवार भारत की एक खूबी रहे हैं और किसी-किसी परिवार के सदस्यों की संख्या तो 100 को भी पार कर गयी लेकिन उनके बीच का आपसी तालमेल और बंधन शिथिल नहीं हुआ। हमारे देश की जिसे विश्व गुरु माना जाता है यह अद्भुत विशेषता है। विदेशों में अक्सर देखा यह जाता है कि बेटा शादी तक तो माता-पिता के साथ रहता है उसके बाद अपनी अलग दुनिया बसा लेता है। इसके बाद माता-पिता एकाकी जीवन जीने के अभिशप्त हो जाते हैं। जब हाथ-पांव थकते हैं तो उनके साथ उनका सहारा बनने के लिए कोई नहीं होता। संयुक्त परिवार जिस देश भारत की शान रहे हैं, जहां घर के बड़े बुजुर्गों को भगवान की तरह पूजा जाता रहा है, वहां भी अब संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहे हैं। आपसी सौहार्द के बीच दौलत और ईर्ष्या व्याप रही है। ऐसे में परिवार बिखर रहे हैं और बिखर रहे हैं बड़े बुजुर्गों के सपने जो उन्होंने अपनी नयी पीढ़ी को लेकर देखे थे। आज बुजुर्ग पीढ़ी आप्रासंगिक हो गयी है और घर के कोने-कुतरे तक सिमट गयी है उसकी दुनिया। परिवार की युवापीढ़ी के पास आईनेक्स में फिल्मों का लुत्फ उठाने या क्लबों में कूल्हे मटकाने में जिंदगी का सुख पाने की आपाधापी, कंप्टीशन की दुनिया में वक्त से पहले आगे बढ़ जाने की दौड़ में बुजुर्गों के लिए वक्त नहीं है। वैसे भी रामराम या प्रणाम के युग वाली यह आउटेडेटेड पीढ़ी आज के ‘हाय’ ‘हेलो’ वाली पीढ़ी के किस काम की। इसकी बिरादरी में तो यह कहीं खपती नहीं दिखती। ऐसे में यह घर के एक कोने में सिमटी-दुबकी रहने को अभिशप्त है। इसके पास रोने बिसूरने को अपना अतीत है जहां घर के बुजुर्गों को भगवान मानने के भाव थे। सुबह उठ कर माता-पिता के चरण बंदन को जहां सबसे बड़ी पूजा माना जाता था। माता-पिता के चरणों में ही स्वर्ग माना जाता था। आज की पीढ़ी को सर्वप्रथम पूज्य श्रीगणेश जी की कहानी सुनायी जाये तो वह हंसेगी और उसे यह महत्ता नहीं समझ आयेगी कि गणेश ने माता-पिता को इतना महत्व क्यों दिया।

    आज की युवापीढ़ी जिस चाकचिक्य और चौंधिया देने वाली रोशनी के पीछे भाग रही है, अक्सर देखा यह जाता है कि उसके आखिरी छोर में अंधेरा ही अंधेरा होता है। आगे बढ़ने की आपाधापी में यह पीढ़ी ऊंच-नीच सोचती नहीं, बुजुर्गों का कहा मानती नहीं और यह सोचती है कि वह सोच में इनसे कहीं बहुत-बहुत आगे है। ऐसे में वह यह नहीं सोचती कि इस पीढ़ी ने दुनिया देखी है और यों ही अपने बाल नहीं सफेद किये। दुनिया के ऊंच-नीच का जो माद्दा बुजुर्गों में है वह आज की इस जेट एज की पीढ़ी में नहीं। लेकिन यह पीढ़ी अपने बुजुर्गों से कट रही है और बुजुर्गों से उन युवा हाथों का सहारा छूट रहा है जिन्हें वे अपनी बुढ़ापे की लाठी समझे बैठे थे। बहुत ही एकाकी हो गयी है पूज्य बुजुर्गों की पीढ़ी। शहरों में हैं तो अपने रिटायर्ड साथियों से मिलने, दुख बांटने में इनका समय कट रहा है या फिर घर के बच्चे संभालने या सौदा-सुलुफ लाने में इनका इस्तेमाल हो रहा है। जो इस काम के भी नहीं रह जाते उन्हें ओल्ड एज होम में डंप कर दिया जाता है जहां वे अपने आखिरी दिनों की उलटी गिनती शुरू कर देते हैं। हैं, वहां अपने जैसे कुछ लोग जरूर मिल जाते हैं जो उनका एक नया परिवार बन जाते हैं। पहले जमाने में अक्सर बड़े-बुजुर्गों को यह कहते सुना करते थे कि परिवार में बुजुर्गों का होना एक वरदान है। सिर पर उनका हाथ कई अला-बला से तो बच्चों या घर वालों को तो बचाता ही है, कई बार मुश्किल में उनकी अक्ल वह ताला भी खोल देती है जिसकी चाभी किसी के पास नहीं होती। इसे दकियानूसी या दब्बूपन कहें हमें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन हम अपने बुजुर्गों के सामने सिर नीचा कर के अदब से ही बातें करते रहे हैं और यह सिलसिला आज भी कायम है। इसे कोई कुछ भी नाम दे हमें इससे क्या हम तो बड़ों के सम्मान को अपना परम कर्तव्य मानते हैं।

    धन कमाना और प्रगति के शिखर पर चढ़ना अच्छी बात है। हर एक को इसका प्रयास करना चाहिए लेकिन शिखर तक पहुंचने में जिन सीढ़ियों ने सहारा दिया है वे उचित सम्मान की हकदार हैं। कारण, ये न होतीं तो आप शिखर तो हसरत से ताकते रह जाते वहां तक पहुंचने का सपना कभी पूरा न होता। यह भी है कि कोई हमेशा शिखर पर रहे यह जरूरी नहीं। ऐसे में सीढ़ियों से संबंध बनाये रखना समझदारी है। क्योंकि कल को वापस लौटना पड़े तो कहीं ऐसा न हो कि आपके पैर के तले आधार ही न हो और आप धम्म से जमीन पर आ गिरें। यों तो पूरे कुएं में अभी भांग नहीं घुली आज भी ऐसे कई परिवार हैं जहां बुजुर्गों का मान है और उनकी बात सुनी जाती है। लेकिन ज्यादातर घरों में गुण और गरिमा के ये प्रतीक उपेक्षित हो चुके हैं। एक पूरी नयी पीढ़ी इनके प्रति उदासीन हो गयी है और कट भी गयी है। कभी छोटे बच्चे दादी, दादा की गोद में परीकथाओं के बीच सुख के सपनों में खो जाते थे लेकिन आज उनके साथी भयानक और हिंसक कार्टून या वीडियो हैं जो उनका वैसा ही चरित्र बना रहे हैं। बच्चे तो बच्चे आप युवाओं से भी धार्मिक चरित्रों के बारे में पूछिए तो वे बगलें झांकने लगेंगे लेकिन उनसे कार्टून कथा या वीडियो गेम्स अथवा कंप्यूटर गेम्स के चरित्रों के बारे में पूछिए तो वे धड़ाधड़ बताते चले जायेंगे। हाय हलो वाली यह पीढ़ी इस तरह से प्रगति की सीढ़ियां चढ़ रही है अपने सारे मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं व गरिमा को तिलांजलि देकर।

    युवा पीढ़ी आगे बढ़े, तरक्की करे यह हर समाज का काम्य होता है लेकिन यह पीढ़ी अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों और बड़े-बूढ़ों के दिये संस्कारों को लेकर चले तो क्या बुरा है? हम यह नहीं कहते कि बुजुर्ग पीढ़ी अगर रूढियां ढो रही है तो नयी पीढ़ी भी वैसा करे। उसका दायित्व है कि वह बड़े बूढ़ों को समझाये कि बदलते जमाने में इन रूढ़ियों से मुक्त होना क्यों जरूरी है। मुझे पूरा यकीन है कि कुछ दकियानूसी लोगों को छोड़ बाकी अवश्य ही नयी पीढ़ी की बात सुनेंगे। बुजुर्ग पीढ़ी के लिए भी यह जरूरी है कि वह बदलते वक्त की दस्त को पहचाने और उसके अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करे वरना वह परिवार के बीच रहते हुए भी अकेली हो जायेगी जहां उसका गम बांटने वाला कोई नहीं होगा। नयी पीढ़ी को भी अपने इन परमादरणीय सदस्यों को ससम्मान अपने साथ ले चलने की बात पर चलना चाहिए क्योंकि इनकी उपेक्षा कहीं उनके लिए अभिशाप न बन जाये। बड़ों की दुआएं बड़ी-बड़ी बलाएं टाल देती हैं लेकिन अगर उनकी आह लगी तो कयामत तक आ सकती है। हम यह नहीं कहते कि हर घर में बुजुर्गों की उपेक्षा होती होगी। भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि अभी भी अधिकांश परिवार ऐसे हैं जहां बुजुर्गों का सम्मान होता है। शायद इसीलिए मेरा भारत महान है वरना यह देश हर पल जाने कितने झंझावातों को झेल रहा है फिर भी अड़िग है। किसी की दुआएं तो हैं जो जिसके सामने ढाल बन कर खड़ी हैं। आपके घर-परिवार के बुजुर्गों के मुंह से ऐसी दुआएं हर पल बरसती हैं। उन्हें जितना ले सकें लीजिए, अपनी जीवन धन्य कीजिए, उनके जीवन का सबल सहारा बनिए। ईश्वर भी आपका साथ देंगे।

    राजेश त्रिपाठी
    राजेश त्रिपाठीhttps://www.pravakta.com/author/rajeshtripathi
    राजेशजी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इन दिनों हिंदी दैनिक सन्मार्ग में कार्यरत हैं। वे ब्लागर भी हैं और अपने ब्लाग-rajeshtripathi4u.blogspot.com में समसामयिक विषयों पर अक्सर लिखते रहते हैं।

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