लेखक परिचय

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

जन्म 18 जून 1968 में वाराणसी के भटपुरवां कलां गांव में हुआ। 1970 से लखनऊ में ही निवास कर रहे हैं। शिक्षा- स्नातक लखनऊ विश्‍वविद्यालय से एवं एमए कानपुर विश्‍वविद्यालय से उत्तीर्ण। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण पर लेख प्रकाशित। मातृवन्दना, माडल टाइम्स, राहत टाइम्स, सहारा परिवार की मासिक पत्रिका 'अपना परिवार', एवं हिन्दुस्थान समाचार आदि। प्रकाशित पुस्तक- ''करवट'' : एक ग्रामीण परिवेष के बालक की डाक्टर बनने की कहानी है जिसमें उसको मदद करने वाले हाथों की मदद न कर पाने का पश्‍चाताप और समाजोत्थान पर आधारित है।

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– मनोज श्रीवास्तव ”मौन’

धरती पर भूकम्प के अध्ययन कार्य में हजारों वैज्ञानिक लगे हुए हैं जो इस बात पर विचार कर रहे हैं कि भूकम्प जैसी प्राकृतिक घटनाएं जान माल का नुकसान करने के अतिरिक्त और किस-किस तरह से धरती को प्रभावित कर सकती हैं। आने वाले भूकम्पों में संख्यात्मक दृष्टि से गुणात्मक वृद्धि दर्ज की जा रही है। भूकम्प के केन्द्र (सिस्मिक स्टेशन) जिसकी संख्या 1931 में 350 थी जो अब बढ़कर एक हजार हो गयी है। भूकम्प से उत्पन्न होने वाले झटके सुनामी, भूस्खलन व ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक विनाशक गतिविधियों को जन्म देते हैं।

यूएसज़ीएम के वैज्ञानिकों के अनुमान के आधार पर 1990 से अब तक लगभग 20 बड़े भूकम्प आये हैं, जिनमें से कुछ की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 70 से 71 तक रही। कुछ बहुत बड़े भूकम्पों की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 80 से 91 तक रही है। इतनी तीव्रता का भूकम्प प्रत्येक साल एक बार अवश्य ही आ जाता है। पिछले 4 माह पर ही गौर करें तो पृथ्वी पर चार भूकम्पों की एक शृंखला भी प्रकाश में आयी है, जिसमें फरवरी में हैती, मार्च में चिली और अप्रैल में इंडोनेशिया और चीन के गोलमुड शहर में भूकम्प आ चुके हैं। धरती को झकझोर देने वाले भूकम्पों के कारणों के अध्ययन को आधार बनाकर नासा के वैज्ञानिकों ने आशंका व्यक्त करते हुए माना है कि रिक्टर पैमाने पर 70 से 91 तक की तीव्रता वाले सभी भूकम्पों ने पृथ्वी को अपनी धुरी के नियत स्थान से भी खिसकाया है।

धुरी परिवर्तन के परिणामस्वरुप दिन की लम्बाई कम हो गयी है। यह बदलाव भले ही लगभग न के बराबर हो लेकिन स्थायी है और यह बदलाव शुरुआती आकलन के अनुसार 126 माइक्रोसेकेण्ड से भी छोटा है। माइक्रोसेकेण्ड सेकेण्ड का दस लाखवां हिस्सा है। इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में सुनामी पैदा करने वाले 91 तीव्रता के भूकम्प के कारण भी दिन की लम्बाई 68 माइक्रोसेकेण्ड कम हुई नासा के वैज्ञानिक बेंजामिन फोंग चाओ की बात मानी जाए तो दिन की लंबाई घटाई और बढाई भी जा सकती है। यदि मध्‍य चीन में यंगिज नदी पर 3 ट्रीटेलियन गैलन पानी जमा किया जाता है, तो इससे दिन की लंबाई 0.06 माक्रोसेकेण्‍ड बढ जाएगी। वैज्ञानिक बेंजामिन फोंग चाओ यह भी कहा है कि विश्‍व स्‍तर पर सघनता के साथ होने वाला कोई भी परिवर्तन पृथ्‍वी की गति को प्रभावित करता है, वह चाहे किसी स्‍थान पर अधिक पानी को एकत्र किया जाना हो, अथवा एकत्रित पानी को विस्‍थापित करना हो। इस परिवर्तन का माध्‍यम चाहे प्राकृतिक हो या मानव द्वारा किया गया हो।

सीएनएन क़े अनुसार नासा की जेट प्रोपेंसन लैब में भूगर्भ वैज्ञानिक रिचर्ड ग्रास के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया है कि चिली में 27 फरवरी को आये भूकम्प ने भी पृथ्वी को प्रभावित किया और इसी आधार पर नासा के वैज्ञानिक ग्रास ने अनुमान लगाया है कि इस भूकम्प ने पृथ्वी की धुरी को लगभग 80 सेंटीमीटर तक विस्थापित भी किया होगा। इस सच्चाई से मुँह नहीं फेरा जा सकता कि भारत में गुजरात के भुज, महाराष्ट्र के लातूर, उस्मानाबाद, हिन्दूकुश पर्वत का भूकम्प, भारतीय उपमहाद्वीप का सुनामी, चिली गणराज्य का भूकम्प, हैती का भूकम्प, इंडोनेशिया का भूकम्प, चीन का भूकम्प आदि सभी ने मिलकर इस धरती को अपनी धुरी से खिसकाया हो। यहां एक चिन्ता का विषय यह भी है कि इन भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण ही आज धरती के मौसम भी प्रभावित हुए हैं, जिनके कारण ग्रीष्म काल की अवधि बढ़ी है, शरद का काल सिमट गया है और वर्षा तो जैसे काल के गाल में समा गयी है।

सामाजिक परिवर्तनों की ओर गौर करें तो यही बात सामने आ रही है कि हम धरती के निवासी समुद्र को पाट करके अपना निवास बनाकर कहीं भूकम्पों को दावत तो नहीं दे रहे हैं, क्योंकि अथाह जलराशि के विस्थापन से भी अवश्य ही प्रभाव पड़ेगा। अभी एक नया खतरा ज्वालामुखी के विस्फोट से उत्पन्न हो गया है। यह ज्वालामुखी आइसलैंड की राजधानी ओस्लो से 120 किलोमीटर पूर्व में इजाफाजोएकुल ग्लेशियर (हिमखण्ड) के पास सक्रिहुआ है, जिससे हिम का पिघलना शुरू हो गया है और जो समुद्र तटीय तथा स्थलीय क्षेत्रों को अपनी अथाह जलराशि से डुबाने की ओर अग्रसर हो गया है। दोनों ही कारणों से विशाल जलराशि का विस्तार हो रहा है।

आज यह आवश्यक हो गया है कि हम लोग पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ धरती की धुरी परिवर्तन के प्रभावों पर भी ध्यान दें, अन्यथा एक दिन भूकम्प प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग, चक्रवात, ज्वालामुखी और सुनामी आदि सभप्राकृतिक आपदायें मिलकर हमारी सृष्टि को मिटाने में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे। हमें इस पर भी गौर करना होगा कि दिन की लम्बाई घटने-बढ़ने का एक बड़ा कारक भूकम्प है, तो वही भूकम्प हमारी धरती माँ को अपनधुरी से इधर-उधर खिसकाने का भी पुरजोर प्रयास कर रहा है। यह प्रयास दिन की लम्बाई कम होने के रूप में सामने आ रहा है। इस ग्लोबल समस्या को ध्यान में रखते हुए समुद्र में शहरों को बसाने से रोकना होगा अन्यथा यह 1 अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हजार 112 साल पुरानी धरती एक जीवन-शून्य खगोलीय पिण्ड मात्र बन कर रह जायेगी।

5 Responses to “भूगर्भीय घटनाएं व भूकम्प से दिन की लम्बाई में कमी तथा धुरी छोड़ने पर विवश धरती”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    ई.पी. तरंगों के बारे में भी सविस्तार बतलाने वाला कोई लेख लिखें तो अछा है. उत्तम सामग्री हेतु आभार व शुभकामनाएं.

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  2. amarnath

    आप ने भारतीय काल आधारित पृथ्वी की आयु बताई है जानकर ख़ुशी हुई

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