भारत की सही पहचान (भाग १.)

विश्व मोहन तिवारी

मुझे यह बहुधा सुनने में आता है कि भारत, अर्थात इंडिया, कभी एक देश नहीं था; वे इतने आत्मविश्वास से यह कहते हैं कि उऩ्हें यह नहीं सूझता कि इसे एक प्रश्न के रूप में रखना विनम्रता का सूचक होगा। यह कथन एक तो अंग्रेज़ी पढ़े लिखे लोग करते हैं, और दूसरे वे जो एक अजीब तरह के आत्म विश्वास से भरे होते हैं। यही तो मैकाले का प्रताप है जो अंग्रेजों के कथन को अडिग विश्वास दिला देता है। अंग्रेजों ने कहा कि आर्य बाहर से आए थे, हमने मान लिया। उऩ्होंने कहा कि आर्यों ने भारत के मूल निवासी द्रविड़ों के मार कर दक्षिण में भगा दिया। यह भी हमने मान लिया, यह जानते हुए भी किअंग्रेज़ ”बाँटो और राज्य करो” की नीति अपनाता है। उऩ्होंने कहा कि वेद तो चरवाहों के गान थे, हमने यह भी मान लिया। उऩ्होंने कहा कि भारत की‌जाति प्रथा बहुत ही‌ अमानवीय है। हमने बिना सोचे कि वर्ण अलग हैं और जातियां अलग, उनकी‌ बात को मान लिया।उऩ्होंने कहा कि भारत की जलवायु गरम होती‌है और इसलिये भारतीय कड़ी मिहनत नहीं कर सकते, और बिना देखे कि जेठ की भयंकर गर्मी में हमारे मजदूर कितनी कड़ी मिहनत करते हैं, हमने गोरों का कहना मान लिया। उऩ्होंने कहा कि पश्चिम बहुत आगे है और भारत बहुत पीछे, इसलिये भारतीयों को पश्चिम की‌ नकल करना पड़ेगी, और हमने मान लिया और हमलगे करने उनकी फ़ैशन की, जंकफ़ूड खाने की और जंकड्रिंक पीने की, उनके खंडित परिवार की । उऩ्होंने कहा. . . और हमने मान लिया। गुलामों कि यह विश्वसनीय निशानी है। और जो अब समझाने के बाद भी नहीं मानेगा, वह चरम गुलाम है और तब भी ’स्टाकहोम सिंड्रोम’ के अनुसार अपने को स्वतंत्र मानता है। यह विषय बहुत विस्तृत है। हम यहां ’वैदिक काल से भारत सदा ही एक राष्ट्र रहा है,’ पर चर्चा करेंगे ।

जो लोग यह मानते हैं कि भारत कभी भी एक राष्ट्र नहीं रहा है, उसे तो अंग्रेजों ने एक राष्ट्र बनाया है, वे सोचें कि क्या वे अंग्रेज़ी के गुलाम हैं ! उऩ्होंने मान लिया, बिना सोचे समझे, कि एक राष्ट्र होने के लिये एक राजनैतिक शासन का होना अनिवार्य है। क्योंकि उन अंग्रेज़ी पढ़ने वालों ने नहीं सोचा कि राष्ट्र की अंग्रेज़ी के अतिरिक्त और भी, शायद बेहतर, परिभाषाएं हो सकती हैं, और उनका कथन मान लिया। ’शार्टर आक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार – “ ’नेशन’ वह निश्चित जाति या वंशपरंपरा वाला जन समुदाय होता है जिनकी‌ भाषा, जिनका इतिहास एक समान है, और जो सामान्यत: एक अलग राजनैतिक शासन में संगठित तथा एक निश्चित भूभाग वाले होते हैं। इस परिभाषा से तो ब्रिटैन भी एक राष्ट्र नहीं है क्योंकि उसमें चार भाषाएं‌ हैं। और हमारे वेदों‌ में‌ भी राष्ट्र की परिभाषा दी है, जो बहुत ही‌ मानवीय है। इस परिभाषा से कुछ भ्रम दूर हो सकते हैं : १. राष्ट्र सर्वप्रथम एक समान इतिहास और वंश परंपरा वाला मानव समुदाय है, जिसके लिये एक राजनैतिक शासन होना अनिवार्य नहीं है, और न एक निश्चित भू भाग। २. भाषा में समानता होना भी इस परिभाषा के लिये आवश्यक है। हमारे राष्ट्र की भाषाएं अधिक या कम सम्स्कृत स्रोत की हैं‌ या उनसे संबन्धित हैं। वेदों की राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार, जैसा कि हम बाद में देखेंगे, एक संस्कृति होना आवश्यक है। यदि सस्कृति एक समान है तब भाषा की विभिन्नता गौड़ हो जाती है, क्योंकि संस्कृति का स्थान भाषा से ऊँचा है; यद्यपि दोनों में अटूट सम्बन्ध है। हमारी परिभाषा के अनुसार जो एक बहुत ही समृद्ध संस्कृति तथा सभ्यता की परिभाषा है भारत की संस्कृति एक समान रही है, हम लगातार एक राष्ट्र रहे हैं। अंग्रेजों ने हममें अवश्य फ़ूट डालने की कोशिश की‌ है जो कुछ सफ़ल हुई है। इस पर हम और विचार करेंगे ।

भारत के प्रति हमारा जितना अधिक प्रेम है, उतना ही अधिक हमारा उसके प्रति अज्ञान है ! क्या हमें अपने देश को जानने की आवश्यकता नहीं है? क्या हम किसी षड़यंत्र के शिकार हैं ? क्या इस अज्ञान में तथा हमारे भ्रष्ट आचरण में कोई समबन्ध है? यदि हम आज के भारत को देखें, तब हमें दिखाई पड़ता है कि इस देश में चरित्र ही‌ नहीं है, यह दयनीय रूप से भ्रष्ट है। यदि शासन को उसका भ्रष्टाचार बतलाया जाए, तब वह बतलाने वाले को ही‌ भ्रष्ट सिद्ध करने में लग जाता है। इसका अर्थ है कि वह अर्थात शासन तो भ्रष्ट है किन्तु बतलाने वाला भी‌ भ्रष्ट है, और इसलिये उसे भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का कोई अधिकार नहीं‌ है। लगता है कि चर्चिल की भविष्य वाणी हम सही सिद्ध कर रहे हैं ( ब्रिटिश संसद की कार्यवाही से उद्धृत) ;-

.“३ जून १९४७ को ब्रिटैन के प्रधान मंत्री क्लैमैन्ट एटली ने ’हाउस आफ़ कामन्स’ के समक्ष एक विधेयक – जो ’भारत का स्वतंत्रता विधेयक’ कहलाता है – उनके विमर्श के लिये प्रस्तुत किया। विरोधी पक्ष के नेता विन्स्टन चर्चिल ने एटली पर आक्रमण करते हुए कहा, “ . . भारत की सत्ता धूर्तों, बदमाशों और लुटेरों के पास जाएगी। पानी की एक बोतल, रोटी‌ का एक टुकड़ा शासकीय कर से नहीं बचेगा। केवल हवा मुफ़्त रहेगी और करोड़ों के खून के लिये एटली जिम्मेदार होंगे । यह लोग (भारतीय) घासफ़ूस के बने हैं, जिनका कुछ ही वर्षों में कोई नामोनिशां भी‌ नहीं बचेगा।”

तब क्या चर्चिल ने हमें सही पहचाना था? किन्तु हम यह भी‌ जानते हैं कि वह भारतीयों से घृणा करता था, उऩ्हें हीन समझता था और स्वयं को तथा श्वेतों को श्रेष्ठतम। और उसकी भविष्य वाणी सही सिद्ध होती- सी लग रही‌ है ! क्योंकि वह जानता था कि वास्तव में ब्रिटिश राज्य ने हमें अपनी‌ जड़ों से काटकर करीब करीब अपना भाषाई गुलाम बना लिया था; इसे मैकाले की शिक्षा-नीतियों द्वारा समझा जा सकता है। मैं मैकाले के २ फ़रवरी १८३५ की ’कमैटी आफ़ पब्लिक इंस्ट्र्क्शन’ के मिनिट के कुछ उपयोगी अंश उद्धृत करना चाहूंगा (रेखांकन मेरे हैं) : –

“ १९.५ उपस्थित सभी सदस्य सहमत हैं कि भारतीय बोलियों में न तो साहित्यिक और न वैज्ञानिक जानकारी है, तथा वे इतनी अविकसित तथा भोंड़ी हैं कि जब तक उऩ्हें बाहरी स्रोतों से समृद्ध न किया जाए, उनमें कुछ भी उत्तम जानकारी का अनुवाद करना सरल नहीं होगा। सभी सहमत से लगते हैं कि उन व्यक्तियों को जो उच्च शिक्षा के लिये समर्थ हैं, वे इस समय, उसी‌ भाषा में शिक्षा ले सकते हैं जो ’देशी’ नहीं है।

१९.६ मुझे संस्कृत का कोई ज्ञान नहीं है;. . . .मुझे आज तक ऐसा प्राच्यभाषाविद नहीं मिला है जिसने नकारा हो कि यूरोपीय पुस्तकों की मात्र एक अल्मारी भारत के समग्र ज्ञान से श्रेष्ठ है।. . . पाश्चात्य साहित्य की आंतरिक श्रेष्ठता वे सभी सदस्य पूर्णत: स्वीकार करते हैं जो . . .प्राच्य शिक्षा योजना का समर्थन करते हैं।

१९.७ . . . . अंग्रेज़ी‌ भाषा ही हमारी देशी प्रजा (नेटिव्ज़) के लिये सर्वाधिक उपयोगी होगी।

१९.१० सीखने वाले लोग शिक्षक को नहीं बतला सकते कि उऩ्हें क्या सीखना है : वास्तव में‌ भारतीय जन अंग्रेज़ी तथा पाश्चात्य विज्ञान सीखना चाहते हैं।

१९.१३ संस्कृत तथा अरबी पर व्यय करना बंजर रेत को सींचना है। इस समय हमें पूरा प्रयास करना चाहिये कि हम एक ऐसा वर्ग तैयार करें जो हमारे तथा उन लाखों, जिन पर हमारा शासन है, के बीच दुभाषिये का कार्य कर सकें, . . . ऐसा वर्ग जो खून तथा रंग में भारतीय हो, किन्तु पसंद में, राय में, नैतिकता में तथा बुद्धि में अंग्रेज़ हो। ऐसे वर्ग को देशी‌ बोलियों को परिमार्जित करने का कार्य, उन बोलियों को पाश्चात्य वैज्ञानिक पदों से समृद्ध करने का कार्य सौंप दें; और उऩ्हें इस विशाल जन समुदाय को ज्ञान देने के लिये क्रमश: योग्य बनाया जाए।

१९.१८ सारांश

कि हम अपनी निधि अपनी रुचि के अनुसार व्यय करने के लिये स्वतंत्र हैं; कि हम उसे उस शिक्षा में लगाएं जिससे सर्वोचित जानकारी प्राप्त हो; कि संस्कृत तथा अरबी से अंग्रेज़ी अधिक जानने योग्य है; कि दास (नेटिव्ज़, देशी) लोग अंग्रेज़ी सीखना चाहते हैं, संस्कृत या अरबी नहीं; कि हमारे ध्येय के लिये संस्कृत और अरबी न तो विधि की‌ भाषा और न धर्म की‌ भाषा के लिये विशेष योग्य हैं; कि इस देश के दासों को अंग्रेज़ी का उत्तम विद्वान बनाना संभव है, और हमारे प्रयास इसी‌ दिशा में होना चाहिये। एक बिन्दु पर मैं उन भद्र व्यक्तियों से पूर्णत: सहमत हूं, जिनके सामान्य विचारों का मैं विरोध करता हूं; मैं उनकी इस भावना से सहमत हूं कि हमें अपने सीमित संसाधनों से इस विशाल जन समुदाय को शिक्षित करना असंभव है। इस समय तो हमें उस वर्ग के निर्माण में पूरी शक्ति लगाना चाहिये जो हमारे तथा हमारे करोड़ो शासितों के बीच दुभाषिये का कार्य कर सकें; ऐसा वर्ग जो खून तथा रंग में भारतीय हो, किन्तु पसंद में, राय में, नैतिकता में तथा बुद्धि में अंग्रेज़ हो। ऐसे वर्ग को देशी‌ बोलियों को परिमार्जित करने का कार्य, उन बोलियों को पाश्चात्य वैज्ञानिक पदों से समृद्ध करने का कार्य सौंप दें; और उऩ्हें इस विशाल जन समुदाय को ज्ञान देने के लिये क्रमश: योग्य बनाया जाए।”

आज की हालत को देखते हुए – जहां चपरासी की नौकरी के लिये भी अंग्रेज़ी अनिवार्य है, जहां प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है – मुझे तो लगता है कि मैकाले अपने ध्येय में पूर्णत: सफ़ल हो गया है। और मैकाले विश्व का सर्वाधिक सफ़ल उपनिवेश बनाने वाला मनीषी सिद्ध हुआ है। यह विशाल देश अब अंग्रेज़ी‌ भाषा का मुहताज है, और मैकाले प्रेरित इतना निष्ठावान दास है कि अंग्रेज़ी के विरोध में एक भी तथ्य सुनने को तैयार नहीं है।

भाषा संस्कृति की शान्त वाहिनी‌ होती है, अंग्रेज़ी अपने साथ पाश्चात्य संस्कृति अर्थात भोगवादी संस्कृति लाई है, जो हमारे लिये ’विदेशी’ है, जिसे यहां सही रूप से जमने के लिये बहुत कठिनाई हुई, क्योंकि इस देश की मिट्टी में त्यागमय भोग रचा बसा था, जो हमारी सही पहचान है।

राष्ट्र की अवधारणा भी वेदों‌ में‌ है, विशेषकर अथर्ववेद में।

6 thoughts on “भारत की सही पहचान (भाग १.)

  1. आज फिर से समय लेकर आलेख पढा। पीडा है, कि अभी तक भारत स्वतन्त्र नहीं हुआ।

    उद्धरण==> “—————- हमारे तथा हमारे करोड़ो शासितों के बीच दुभाषिये का कार्य कर सकें; ऐसा वर्ग जो खून तथा रंग में भारतीय हो, किन्तु पसंद में, राय में, नैतिकता में तथा बुद्धि में अंग्रेज़ हो।”

    प्रतिक्रिया–
    (१)===>संसद में भी दुभाषिये ही बोल रहे हैं, न्यायालयमें भी दुभाषिये ही बोल रहे हैं, दुभाषिये आगे बढ गये हैं, मक्खन भरा चम्मच आगे बढ गया हैं।==इस लिए सभी माता-पिता भी, कोख से दुभाषिया ही जन्म ले ऐसी प्रार्थना कर रहें हैं।==कटु सत्य है।

    सत्य यह भी है (२)==>जिन जिन देशों में पराई भाषा में काम होता है, न्याय पराई भाषा में, शासन पराई भाषा में, और पराई भाषा बोलने में गौरव अनुभव किया जाता है, ऐसे किसी भी देशकी उन्नति नहीं हुयी है। भारत की उन्नति इने गिने दुभाषियों की उन्नति है।

    (३)===> और १०० वर्ष भी भारत अंग्रेज़ी की शिक्षा द्वारा उन्नति का प्रयास करे(,६५ वर्षका अनुभव सीखने के लिए पर्याप्त नहीं है क्या?)——तो भी भारत के अंतिम पंक्ति के नागरिक की उन्नति असंभव लगती है।

    (४)==>अंग्रेज़ी का ज्ञान भ्रमित करता है, कि अंग्रेज़ी जानने के कारण व्यक्ति बहुत मेधावी है।**बहुत से पढत मूर्खॊं को यह भ्रम मृत्यु तक** छोडता नहीं।–हमारी प्रतिभा-प्रज्ञा का इतना दुर्व्यय ?

    (५) ===> इसी अवनति का एक परिणाम “आरक्षण की आवश्यकता”, “असमानता”, देशका “कृषक और श्रमिक “हीन दीन अवस्था में है।

  2. डा. ठाकुर जी,
    विषय का विस्तार करने के लिये धन्यवाद । बात सही दिशा मेन् आगे बढ़ सकती है।
    दूसरा भाग शीघ्र आ रहा है

  3. मधुसूदन जी
    विषय को आगे बढाने के लिए धन्यवाद
    मैं हैदराबाद गया था आज ही आया हूँ.. दूसरा भाग शीघ्र आ रहा है..
    विश्व मोहन तिवारी

  4. श्री नरेन्द्र सिंह जी,
    धन्यवाद ..
    आपने सच ही कहा की अंग्रेजों ने तो देव वाणी संस्क्रृत भाषा का भी मजाक उड़ाया था और उसे मृत भाषा घोधित किया था जिसे काले अंग्रेज़ बहुत ही खुशी से मानते हैं.. जब कि नोबेल सम्मानित अंग्रेजी के कवि टी एस इलियट का कथन है, ” भारतीय दार्शनिकों के सूक्ष्म चिन्तन के सामने अधिकांश महान यूरोपीय दार्शनिक स्कूल के बालक से दिखते हैं। . . . . चार्ल्स लैनमैन के शिष्यत्व मे दो वर्ष संस्कृत की शिक्षा, तथा एक वर्ष जेम्स वुड के मार्ग दर्शन में पतंजलि के योगशास्त्र के अध्ययन ने मुझे आत्मज्ञान के प्रकाश में ला दिया।” (स्रोत :‌ ‘आफ़्टर स्ट्रेन्ज गाड्ज़’ – टी एस इलियट)
    और इसी तरह विलियम जोन्स, मैक्स्मुल्रर आदि विश्व प्रसिद्ध विद्वान संस्कृत तथा साहित्य की प्रशंसा करते थकते नहीं हैं .. और जर्मन तथा फ्रांसीसी विद्वान तो अंग्रेजों से भी अधिक प्रशंसा करते हैं..
    किन्तु जैसा कि डा मधुसूदन जी कहते हैं कि जो घर मेंही गुम गया हो उसे कैसे रास्ता बतलाएं !
    आश्चर्य कि हमें इस देशवासियों को राष्ट्र प्रेम सिखलाना पड़ रहा है..
    पुनः धन्यवाद

  5. सही सही आलेख। वैसे गांधी जी, भी कहा करते थे, कि,
    “(१)==> अंग्रेज़ी दैहिकता की भाषा है, भोगवाद की भाषा है।”
    इसी लिए प्रायः,रट्टामार अंग्रेज़ी पढे लिखे लोग अधिक (प्रबुद्ध अपवादों को छोडकर) दुराचारी, व्यसनी, भ्रष्टाचारी, हीन ग्रन्थि युक्त, भोग में ही डूबे हुए, और पश्चिम का अंधाधुंध अनुकरण करने वाले पाए जाते हैं। भारतीय मातृभाषा, और हिन्दी जानते हुए भी अंग्रेज़ी में वार्तालाप करने वाले यही, धौत बुद्धि (ब्रेन वॉश्ड) लोग हैं।
    (२) वैसे अंग्रेज़ी में संस्कृत की संज्ञाएं, जैसी ==> “चिदाकाश, परमाकाश, महदाकाश”, इत्यादि का कोई पर्याय नहीं मिलता। इसलिए सोच में भी विशालता नहीं है। यहाँ ऐसे अंग्रेज़ी पढे भारतीय जन भी व्यक्ति स्वातंत्र्य की आड में अलग हो कर कुढ रहे हैं।
    (३) धन्य है भारत, भले टूटी फूटी ही सही,==> ’हिन्दी जो राष्ट्रीयता की भाषा है,’
    उसके पास है; उसीको पनपाइए, भारत बच जाएगा। उसी का र्‍हास भारत का र्‍हास सिद्ध होगा।
    (४) ==>’और संस्कृत ब्रह्माण्डीय आध्यात्मिकता की भाषा है।’
    आप को ढूंढने पर भी संस्कृत में गालि नहीं मिलेगी। अधिक से अधिक आप किसी को मूर्ख, महामूर्ख, मूर्ख शिरोमणी कह पाओगे। वेदों में ऋषियों को कहीं डेविल या शयतान, कल्पना में भी न दिखा—न किसी को उन्हों ने जहन्नुम में, या हेल में भेजा।
    आपके अगले भाग की भी प्रतिक्षा रहेगी। मैं मेरे अनेक मित्रों को आपका यह आलेख अवश्य भेजूंगा। सौ सुनार की चोटें मारते रहें।धन्यवाद।

  6. आपने सही कहा है मैंने बहोत तो नहीं पढ़ा है लेकिन जो भी पढ़ा है उससे यह ज्ञात होता है की अगर हम थोडा भी दिमाग लगाके सोचेंग्गे तो मालूम हो जायेगा की हमारे इतिहास का काल सबसे पुराना है ये बात काले अंग्रेज नहीं मानेंगे क्योंकि वो लोग खून तथा रंग में भारतीय हे , किन्तु पसंद में, राय में, नैतिकता में तथा बुद्धि में अंग्रेज़ हे और ये बात समज लेनी चाहिए की गुलाम की कोई स्वतंत्र राय या सोच नहीं होती हमारा दुर्भाग्य है की स्वदेशी सोचने वाले और जीने वालो ने भी इस देश मे इसका न कोई विरोध किया है न ही कोई ठोस कानून या कदम उठाया है , परिणाम वस् आजभी हमारे शासक भी आज जो भी कदम उठा रहे है उससे लगता है की निति और नियम बनाने वाले वेस्ट की और नजर रखकर भारत में निति और नियम बनाते है आज़ादी के ६५ साल के बाद भी हम हमारे देश का कोई विसिष्ठ कानून नहीं बना पाए इसके पीछे हमारे शासको की ग्लामी मानसिकता है क्योंकि वो लोग खून तथा रंग में भारतीय हे , किन्तु पसंद में, राय में, नैतिकता में तथा बुद्धि में अंग्रेज़ हे !
    मरे पढने में ऐसा भी आया थाकि जिस संस्कृत भाषा का उपहास ये गोरे लोग करते थे और आजभी मोका मिलने पर करते है उनकी ज्यादातर संशोधन प्रणाली संस्कृत के जरिये हांसिल की गई है और हम है आज तक अंग्रेजी की की पूजा करते है संस्कृत पढ़नेकी की सोच ये शासक कब करेंगे ये मालूम नहीं पर ऐसा लगता है की इन्होने भारतीय भाषा ओ को ख़तम करने के अंग्रेजो के प्रयासों को जरुर आगे बढ़ा रहे है . ये बात हमारे विद्वान और स्वदेशी सोच वाले भारतीयों को सोचनी चाहिए ? लोगो की पढने में रूचि कम है जिससे ऐसे लेख ज्यादातर लोग पढ़ते नहीं है ये बहोत ही गंभीर बात है . आपका धन्यवाद करता हूँ>

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