अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में स्वदेशी चिंतन

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प्रमोद भार्गव

शाह खर्च, गिरती औधोगिक उत्पादन दर, बढ़ती बेरोजगारी और विदेशी सामान से पटे अमेरिकी बाजार ने यहां कि अर्थव्यवस्था को डांवाडोल किया हुआ है। इसमें सिथरता लाने और मंदी से उबरने के उपाय अब अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओवामा महात्मा गांधी के स्वदेशी चिंतन में तालाश रहे है। अमेरिका में इस समय वहां के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के चुनाव चल रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी ने एक बार फिर से ओवामा को उम्मीदवार बनाया हुआ है। ओवामा के साथ दिक्कत यह रही कि वे बीते चार साल सिर्फ वादा निभाने का भरोसा देते रहे, निभा नहीं पाए। लिहाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक ऐसे जंजाल में फंस गर्इ, जिससे चौरतफा निराशा का माहौल बना हुआ है। दूसरी तरफ रिपबिलकलन पार्टी के उम्मीदवार मिट रोमनी हैं, जो ओवामा के राष्ट्रपति बनने से पहले चली आ रही नीतियों को अमल में लाने का ढिंढोरा पीटकर चुनाव में बाजी मार लेना चाहते हैं। ऐसे में ओवामा गांधी के स्वदेशी चिंतन और कुटीर उधोग के मंत्र को अपने चुनावी भाषण में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह जानकर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत उन तमाम अर्थशासित्रयों को हैरानी हो सकती है, जो भारत की हर समस्या का हल विदेशी पूंजी निवेष में देख रहे है।

अमेरिकी के विलासी वैभव को इस समय नजर लगी हुर्इ है। शाह खर्च, विदेशी वस्तुओं के प्रति रूझान, बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के चलते अमेरिका में घरेलू स्तर पर अनेक संकट गहराए हुए हैं। जिनसे निजात पाने का हरेक आर्थिक उपाय नाकाम साबित हो रहा है। इन विपरीत हालातों को बदलने के उपायों में ओवामा को अब केवल गांधी की स्वदेशी अवधारणा दिखार्इ दे रही है। इसलिए अमेरिका के जो बाजार चीन के समान से भरे पड़े हैं, ओवामा इस बावत जनता से अपील कर रहे है कि अमेरिका में बनी वस्तुओं को ही उपभोक्ता तवज्जो दे, जिससे देश के कुटीर उधोगों को संजीवनी मिलती रहे और बेरोजगारी थमी रहे। अमेरिका के खुदरा बाजार में 60 फीसदी केवल चीन से आयात किया हुआ सामान मिलता है, जिसकी आपूर्ति वाल्मार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी कर रही है। इसी वाल्मार्ट की काली नजर भारत के खुदरा व्यापार पर है। यहां कबिले गौर यह हैं कि जो कंपनी अपने ही देश में निजी आर्थिक हित पूर्ति के चलते बेरोजगारी बढ़ाने का काम कर रही है, वह भारत के हित कैसे साध सकती है ? अपने नए चुनावी घोशणा पत्र में बराक ओवामा के कदम समावेषी विकास की ओर भी बढ़ते दिखार्इ दे रहे है। वे कह रहे है कि वे सता में लौटते है तो मध्यवर्गीय परिवारों और छोटे उधोगपतियों के लिए करों में छुट देंगे। जिससे बड़े उधोगां से उत्पादित उपभोक्ता मूल्यों से वे मुकाबला कर सकें। क्योंकि पिछले कार्यकाल ने यह साबित कर दिया है कि अरबपतियों को करो में छूट देने से न तो मंदी से उबर पाए और न ही बेरोजगारी की समस्या का हल कर पाए। जाहिर है लघु व मझोले उधोगों को संरक्षण देने से ही नए रोजगारों का सरंक्षण होगा और लाखों हाथों को काम मिलेगा। उर्जा समस्या के हल के लिए भी लघु इकार्इयों के वजूद को खड़ा करने की जरूरत पर ओवामा जोर दे रहे हैं।

दरअसल अमेरिका मे बड़े उधोगों के संरक्षण और प्राकृतिक संपदा के अटाटूट दोहन की जो नीतियां अमल में लार्इ जा रही हैं, उसने देश की अर्थव्यवस्था को तो चौपट किया ही असमान आधुनिक विकास ने अमीरी – गरीबी की खार्इ को भी और चौड़ा कर दिया। यह दूरी वर्तमान में इतनी ज्यादा हो गर्इ है कि इसको कम करना एक मुश्किलहो गया है। कांगे्रसनल बजट की 2011 मे जारी रिपोर्ट के मुताबिक 1979 और 2007 के बीच एक फीसदी अमीर अमेरिकी उधोगपतियों की आमदनी जहां 275 फीसदी बढ़ी है वही गरीबी के दायरे में रहने वाले कमजोर 20 फीसदी परिवारों की आय में बढ़ोत्तरी महज 18 फीसदी हुर्इ है। विकसित अर्थव्यस्था का दावा करने वाले अमेरिका में रोजगार के हलात बद से बदतर है। इसी साल जुलार्इ में जारी ब्यूरो आंफ लेबर स्टैटिसिटक्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में बेरोजगारी की दर 8.3 फीसदी पर अटकी है। आर्थिक मंदी के चलते यहां 2.1 मिलियन लोगों को नौकरी से हाथ धोने पड़े थे, इस सिथति में भी पिछले तीन सालों में कोर्इ बेहतर सुधार देखने में नहीं आए। अब यह आकड़ा थोड़ा सुधार की दिशा में बढ़कर 1.8 मिलियन पर अटका हुआ है।

शाह खर्च और अमेरिका में कर्इ बड़े बैंको का दिवाला निकलने से वहां बेघरवारों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 2009 और 2010 के बीच 50 हजार से ज्यादा परिवार बैंको का कर्ज समय पर न चुका पाने के कारण बेघर हुए है। यही नहीं यह सूरत इस मायने में भी बेरंग हुर्इ कि अमेरिका में इसी दौरान फुटपाथों और कारों में गुजर – बसर करने वाले परिवार व लोगों की संख्या में 2 प्रतित की वृद्धि हुर्इ है। इन बदतर हालातों से उबरने के उपायों में ओवामा के पास तो कम से कम गांधी का दर्शन है लेकिन प्रतिद्वंदी उम्मीदवार मिट रोमनी को तो कोर्इ उपाय ही नहीं सूझ रहा है। तय है यदि अमेरिका सत्ता में डेमोके्रटिक पार्टी लौटती है तो उसका नया अर्थशास्त्र अब गांधी की अवधारणा रचेगी और मेड इन अमेरिका का दबदबा अमेरिकी बाजारों में बढ़ेगा। यदि ऐसा संभव होता है तो दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं धरेलू उत्पादन और उपभोक्ता केंद्रित हो जाएगीं। अमेरिकी अर्थशास्त्री एडम सिमथ ने वैषिवक परिद्रष्य में भूमण्डलीयकरण के बहाने जो उदारवादी बाजारबाद की आवधारणा रची थी, वह अपने अपने दायरों में सिकुड़ने लग जाएगी। इससे सबसे ज्यादा लाभ भारत जैसे उन देशो को होगा जिनके पास विविध किस्म की प्राकृतिक संपदा है और जिसे देश – दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनिया लूटने में लगी हैं। इस उधार के दर्शन से अब भारत को सबक लेने की जरूरत है। उसे समझाना चाहिए कि पश्चिमी दर्शन में ऐसा कोर्इ नयापन नहीं है जिसके अमल में लाने से एक बड़ी आबादी के हाथों में आजीविका के संसाधन सौपें जा सकें। बलिक बाजारवादी सोच ने हमारे अर्थ के मूल स्त्रोतों में सेंध लगाकर उन्हें लूटने का ही काम किया है। कोल खण्डो का आवंटन इस बाबत एक ऐसी अनूठी मिसाल है जिससे साबित होता है कि हमारी सकल घरेलू उत्पादन दर, आर्थिक व औधोगिक विकास दरें किन्हीं विलक्षण नीतियों के चलते परवान नहीं चढ़ रही थीं, बलिक प्रकृतिक संपदा के अकूत दोहन के चलते आसमान में उड़ान भर रही थीं। आज अमेरिका जिस भोग – विलासी जीवन षैली के चलते संकटग्रस्त हुआ है यदि इसका हम अभी भी अनुकरण करते रहे तो यह षैली हमें बरबादी के रास्ते पर डाल देगी। इसलिए वक्त आ गया है कि हम उस गांधी दर्शन को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ें, जिसमें भारतीय, भौगौलिक, सामाजिक, आर्थिक और सास्ंकृतिक प्रवृतियों की समझ है। और जिसे आचरण में ढालने से वर्तमान व भविश्य न केवल संवरता है, बलिक उसे गरिमा व आत्मसम्मान से जीने का आधार भी मिलता है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अकेली ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस को छोड़, देश के सभी राष्ट्रीयय व क्षेत्रीय राजनीतिक दल प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेष के हिमायती बने हुए हैं और आर्थिक उपनिवेषवाद को आहूत करते हुए अपनी देशज अर्थव्यस्था को पकीता लगाने के काम में जुटे हैं। क्या ओवामा से हमारे राजनीतिक दल और उनके मुखिया कोर्इ सीख लेंगे ? बहरहाल गांधी दर्शन की व्यापक्ता ने यह सिद्ध कर दिया है कि दुनिया के आम आदमी के सशक्तीकरण की कुंजी गांधीवाद में ही अंतर्निहित है।

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  1. क्षमा कीजियेगा प्रमोद जी आपका लेख बहुत सतही है. ओबामा का स्वदेशी प्रलाप गांधीवाद से नहीं बल्कि नवसंरक्षणवाद से अभिप्रेरित है. अपनी अर्थ व्यवस्था को सँभालने में नाकामयाब रहने पर अब वो विदेशी वस्तुओं के बजाय अमेरिकी माल की खपत करने का राग आलाप रहे हैं. याद कीजिये अपने शाशन की समाप्ति से कुछ वर्ष पूर्व जब बिल क्लिंटन सिलिकोन वैली गए थे और उन्होंने वहां पर बड़ी संख्या में भारतियों को काम करते देखा था तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?उन्होंने कहा था की “आई वाज शौक्ड टु सी सो मेनी इंडियंस देयर”. वो ‘सरप्राइज्ड’ नहीं हुए थे बल्कि ‘शौक्ड’ हुए थे. आज भी वो केवल अपने देश में अमेरिकी माल के प्रयोग का आवाहन कर रहे हैं जबकि अन्य देशों के बाजारों को मुक्त करने और विदेशियों के लिए खोलने का आग्रह बल्कि कभी कभी तो जबरदस्ती करते हैं. समस्या ये है की गाँधी की बात करते हैं लेकिन क्या गाँधी के आर्थिक चिंतन के मर्म अर्थात ‘इशावास्यम इदं सर्वं यात्किंचम जगत्यां जगत,तेन त्यक्तेन भुंजीथा माँ गृध कस्यस्विधानाम’ का उन्हें कोई ज्ञान नहीं है. वास्तव में भारत के सनातन चिंतन को समझे बिना गाँधी को नहीं समझा जा सकता. उनके लिए गाँधी का अर्थ केवल ‘अहिंसात्मक आन्दोलन’ मात्र है. इससे आगे गाँधी के बहु आयामी व्यक्तित्व को समझने की दृष्टि उन्हें नहीं है.अर्थशास्त्र के भारतीय विद्यार्थी जानते हैं कि ‘अर्थशास्त्र’ कि पश्चिमी परिभाषा के अनुसार ‘ अर्थशास्त्र इक्षाओं के संतुष्टीकरण का ज्ञान देने वाला विज्ञानं है”. लेकिन भारतीय चिंतन ऐसा नहीं नहीं कहता है.इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर जे के मेहता के अनुसार ‘अर्थशास्त्र मनुष्य को अपनी इक्षाओं के न्यूनीकरण का ज्ञान देने वाला विज्ञानं है.( इकोनोमिक्स इज द साईंस देट टीचेज द आर्ट ऑफ़ वांट्स मिनिमयिजेशन).भारत का ये चिंतन इशावास्यौपनिषद पर आधारित है.जो कहता है कि केवल उतने अपर ही तुम्हारा अधिकार है जो तुम्हारे लिए आवश्यक हैं.लेकिन पश्चिमी चिंतन विशेषकर पूंजीवादी चिंतन अधिकतम संग्रहण और अधिकतम उपभोग को प्रोत्साहित करता है. इसी के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अँधाधुंध दोहन किया जा रहा है और जो कुछ प्रकृति ने लाखों करोड़ों वर्षो में दिया था उसको केवल कुछ सौ सालों में ही समाप्त करने का उपक्रम किया जाता है. एक और समस्या है. अमेरिकी और पश्चिमी जगत में उधर कि अर्थनीति को आवश्यक और स्वाभाविक मन जाता है जिसके कारण अधिकांश लोग आज कर्ज के दुश्चक्र में उलझे हैं. लाखों नहीं तो हजारों लोग कर्ज न चूका पाने के कारण पिछले चार वर्षों में अपने सर के ऊपर से छत भी गँवा बैठे हैं. बचत और भविष्य के प्रति चिंतन को ‘सोशियल सिक्योरिटी’ के जिम्मे छोड़ दिया जाता है. चार वर्ष पूर्व मैं हवाई द्वीप गया था वहां के एक स्थानीय समाचार पत्र में एक लेख पढ़ा था जिसमे २००७ में प्रारंभ हुए आर्थिक संकट के बीज सत्तर के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति रीगन के आर्थिक उदार नीतियों और अधिकाधिक कर्ज की नीतियों में बताये गए थे.वो वजहें आज भी मौजूद हैं. ओबामा के शाशन के पिछले लगभग चार वर्षों में अमेरिका का वित्तीय घाटा बेतहाशा बढ़ा है और २०११ में बजट घाटा, ट्रेड घाटा और निवेश घाटा बढ़कर २१ ट्रिलियन डालर पर जा पहुंचा है जिसके अगले दशक में ४१ ट्रिलियन पर पहुँचने कि आशंका है.हर चीज क्रेडिट कार्ड से पाने कि प्रवर्ति घटक है. भारत में हजारों साल पहले मह्रिषी चार्वाक ने भी कर्ज का सिद्धांत दिया था लेकिन देश ने उसे नहीं अपनाया और ये कहा कि उतने ही पाँव पसारो जितनी चादर है. पश्चिमी देशों को अपनी उधर कि जीवन शैली पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा अन्यथा घटे और कर्ज से उबरने के लिए दुनिया के देशों के संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने कि भावना जोर मरती रहेगी जो अमेरिका के प्रति शोषित देशों के आक्रोश को बढ़ावा देगी और पूरे विश्व में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के प्रति नाराजगी में लगातार वृद्धि होती जाएगी जो विश्व शांति को भी खतरे में डालेगी.
    सही अर्थों में गाँधी दर्शन को समझने के लिए भारत के सनातन चिंतन कि और आना होगा. तभी सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद् दुखः भाग भवेत्. का लक्ष्य पूरा हो पायेगा..

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