More
    Homeसाहित्‍यकवितापीड़ा के दो छोर

    पीड़ा के दो छोर


    ज़िंदगी समय में
    घुलती जा रही है।
    समय में घुलने की
    अनंत पीड़ा है।
    पीड़ा से बचने के लिये,
    शब्दों और सुर ताल
    का सहारा है।
    संगीत में डूब जाऊं या
    काव्य में बिखर जाऊँ,
    घुलने के कष्ट को
    थोड़ा सा बिसराऊँ
    फिर उठकर पीड़ा को
    थोड़ा सा सहलाऊँ,
    फिर अपनी जीत पर
    यूँ मुस्किराऊं…
    जानती हूँ
    वो दरवाज़े की ओट मेेें
    खड़ी है
    अभी ज़रा
    किसी दवा से डरी है
    अब तो ये लड़ाई
    जीवन का मक़सद है
    इसके सिवा अब कहाँ
    कोई फ़ुर्सत है।


    तुम्हारे चेहरे को पढ़ना
    कभी इतना आसान था
    ही नहीं,
    इतनी आसानी से
    अपनी सारी पीड़ा
    अपने भीतर छुपा लेते हो!
    अपनों की पीड़ा
    तुम्हें सोने नहीं देती
    और ख़ुद की पीड़ा
    अपने काँधों पर
    उठाये रहते हो।
    तुमने अपनों को संभाला,
    संबल बने,
    हम सुरक्षित रहे।
    तुम छत भी बने
    तुम नीव भी बने।
    हम दीवारों की तरह
    तुममें चिपके रहे
    मकान की छत में ही
    दरारें अब आने लगी हैं…
    पर ये दीवारें बहुत
    मज़बूत हो चुकी हैं
    अपने दम पर ही
    छत को संभाल लेंगी
    सारी दरारें जल्द
    भर जायेंगी।
    बस कुछ वक़्त लगेगा।

    बीनू भटनागर
    बीनू भटनागर
    मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Must Read

    spot_img