लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

devyani                अमेरिका के विरुद्ध भारत ने जिस तरह से आंखे तरेरी हैं, यह अनहोनी स्थिति हैरतअंगेज है। जिस भारत का राष्ट्रीय स्वाभिमान पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद के अपमान पर नहीं जागता, आतंकी भेष में पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों के सिर कलम करने पर अंगड़ार्इ नहीं लेता, चीनी सैनिकों की भारतीय सीमा में घुसपैठ को दरकिनार कर देता है, यहां तक की नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका द्वारा हड़काए जाने पर भी आपराधिक चुप्पी साध लेता है, उस देश और उसकी सरकार का स्वाभिमान विदेश सेवा की एक अधिकारी के अपमान व प्रताड़ना पर जाग रहा है, तो यह देश के लिए एक शुभ संदेश देने वाली खबर है। लेकिन कहीं ज्यादा बेहतर होता यदि सरकार राष्ट्रीय असिमता से जुड़े मुददों के परिप्रेक्ष्य में ऐसा गुस्सा जताती ?

क्योंकि न्यूयार्क स्थित उप-महावाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े को लेकर भारत जो गुस्सा जता रहा है, उस परिप्रेक्ष्य में उनके अपराध को राष्ट्रीय स्वाभिमान के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए ?  उन्होंने न केवल वीजा नियमों में धोखाधड़ी की है, बलिक घूरेलू नौकरानी को अमेरिकी नियमों के मुताबिक न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया। इसलिए यह अपराध दस्तावेजों की कूट रचना और चार सौबीसी की श्रेणी में आता है। इसे राष्ट्रीय गरिमा को आहत करना नहीं माना जा सकता है ? देवयानी इससे पहले कदाचरण से जुड़े विवादास्पद आदर्श हाउसिंग सोसायटी में गलत तरीके से फलेट हथियाने को लेकर भी चर्चित हो चुकी हैं। बावजूद अमेरिकी पुलिस ने देवयानी के साथ जो बेहूदा बर्ताव किया उसका जरुर प्रतिरोध करने की जरुरत है। क्योंकि वे एक देश की राजनयिक होने के साथ महिला भी थीं, इसलिए पुलिस का आचरण अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मर्यादित व संवेदनशील होना जरुरी था।

देवयानी के विरुद्ध कानूनी कार्रवार्इ कुछ ठोस कानूनी वजहों को लेकर हुर्इ है, इसलिए इस कार्रवार्इ को एकाएक नकारा नहीं जा सकता। देवयानी चूंकि खुद राजनयिक हैं, इस नाते वह वीजा नियमों को भलीभांति जानती होंगी ? अमेरिका जैसे देश में इन नियमों का पालन न करने पर क्या हानि उठानी पड़ सकती है, इन हालातों से भी वे बेहतर ढंग से परिचित होंगी ? उन्हें यह भी अच्छी तरह जानकारी होगी कि अमेरिका, बि्रटेन, कनाडा, इटली, फ्रांस और आस्टेलिया जैसे विकसित देशों में घरेलू कामकाज से जुड़े लोगों के न्यूनतम वेतन के अधिकारों पर सख्ती से अमल कराया जाता है। भारत सरकार देश के स्वाभिमान को लेकर जिस तरह से तल्ख तेवर दिखा रही है, तो उसे इसी परिप्रेक्ष्य में नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी दंड की कड़ी कर्मचारी आचार संहिता का पालन करने की हिदायत देना चाहिए। क्योंकि हमारे देश के नौकरशाह अकसर कायदे-कानूनों का इस्तेमाल तोड़-मरोड़कर करने को अपना मौलिक अधिकार समझते हैं। सुविधा और मनमानी की यही मानसिकता वे दूसरे देशों में भी चलाए रखना चाहते हैं। और जब विदेशी धरती पर उलझ जाते हैं, तो राष्ट्रीय गौरव की दुहार्इ देकर अपनी सुरक्षा की मांग करने लगते हैं। भूल से हुर्इ गलती को तो माफ करना उचित है, लेकिन देवयानी जैसी गलतियां, लालफीताशाही की चालाकियों का प्रतीक हैं, लिहाजा ऐसी हरकतों को नजरअंदाज करने की बजाए कार्यरत देश के कायदे-कानूनों के परिप्रेक्ष्य में ही देखने की जरुरत है।

यह मामला इसलिए भी राष्ट्र को आहत करने की भावना से नहीं जुड़ा, क्यूँकि देवयानी द्वारा अपनी भारतीय नौकरानी को न्यूनतम वेतन नहीं देने और उसका वीजा बनवाने में की धोखाधड़ी का मामला किसी अमेरिकी नागरिक ने नहीं बलिक प्रवासी भारतीय और स्थानीय अटार्नी प्रीत भरारा ने न्यूयार्क की एक अदालत में दायर किया हुआ है। यहां गौरतलब है कि जिस नौकरानी के बुनियादी और मानवाधिकार हनन का मामला अदालत में विचाराधीन है, वह नौकरानी देवयानी के घर से जून 2013 से लापता है। भारतीय दूतावास को भी इसकी कोर्इ खबर नहीं है। अमेरिका यदि इस खोर्इ हुर्इ वंचित व लाचार बालिका की पड़ताल व उसके साथ किए शोषण की तफतीश कर रहा है, तो इसमें गलत क्या है ? अलबत्ता अमेरिकी कानून व उसके पालनहारों से सबक लेने की जरुरत है कि वहां कानून का अमल व्यक्ति की हैसियत के आधार पर नहीं, बलिक दोषी के दोष के आधार पर होता है। हमारे देश में तो शोषण की शिकार इस वर्ग से आने वाली लड़की द्वारा एफआर्इआर दर्ज कराना भी मुश्किल है ? वह तब और भी कठिन है, जब वह किसी आर्इएएस, आर्इपीएस या आर्इएफएस अधिकारी के यहां काम कर रही होती हो। क्योंकि इन्हें तो हम कानून से उपर और नैतिक तकाजों का निष्ठावान अनुयायी मानने की मानसिकता पाले हुए हैं।

यही वजह है कि अमेरिका और ब्रीटेन की धरती पर जब 2003 में देश के तात्कालिक रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिस उतरते हैं, तो उनकी कपड़े उतरवाकर तलाशी की जाती है। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की जैकेट और जूते उतरवा लिए जाते हैं। एक वस्त्रधारी बाबा रामदेव की तलाशी ली जाती है। फिल्म अभिनेताओं के साथ भी कर्इ मर्तबा यह दुव्र्यवहार दोहराया जाता रहा है। लेकिन केंद्र सरकारें संप्रग गठबंधन की रही हों या राजग गठबंधन की अमेरिका या अन्य देश के खिलाफ आक्रोश जताने की ऐसी प्रतिकि्रया देखने में नहीं आर्इ ? इससे तो यह अहसास होता है कि भारत में देश की गरिमा और जनता के जो वास्तविक नायक हैं, उनसे कहीं ज्यादा हैसियत एक ऐसे नौकरशाह की है, जिसका आचरण कानूनी-अवज्ञा से जुड़ा है ? अन्यथा क्या ऐसा पहली मर्तबा होता कि दुनिया की महाशक्ति माने जाने वाले देश अमेरिका के भारत आए संसदीय दल से मुलाकात करने से इनकार लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और भाजपा के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने भी कर दिया। इस घटना पर विदेश सचिव सुजाता सिंह ने भारत में अमेरिकी राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध जताया। दिल्ली, मुंबर्इ, कोलकाता और चेन्नर्इ स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावासों के सभी कर्मचारियों से उनके पहचान-पत्र वापिस मांगे गए हैं। अमेरिकी राजनयिकों के विशेशाधिकारों की समीक्षा नए सिरे से किए जाने की बात भी उठी है। जिससे स्थानीय आपराधिक कानूनों के तहत किसी राजनयिक का आपराधिक कृत्य सामने आने पर देवयानी की तरह सामान्य अपराधी मानते हुए कार्रवार्इ की जा सके। भारत की इस कठोर पहल को देर आए,दुरुस्त आए की तर्ज पर ठीक माना जा सकता है। लेकिन भारत जैसे को तैसा बर्ताव दिखाने का आदी पहले से ही हो चुका होता तो चीन और पाकिस्तान अपनी दुष्प्रवृतितयों को सरहद पर दोहराने से बाज आ गए होते ?

देवयानी ने यदि वाकर्इ वीजा धोखाधड़ी और नौकरानी को न्यूनतम वेतन देने में गड़बड़ी की है तो अमेरिका द्वारा उनके खिलाफ की गर्इ कानूनी कार्रवार्इ को गलत नहीं माना जा सकता ? लेकिन राजनयिक होने के नाते अमेरिका ने जिस जल्दबाजी में उन्हें गिरफतार किया, हथकड़ी लगार्इ, निर्वस्त्र करके जांच की और नशेड़ी अपराधियों व वैश्याओं के साथ हवालात में बंद रखा, यह व्यवहार किसी भी देश के दूत की प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। इस लिहाज से इसे राष्ट्रीय अपमान बोध की दृष्टि से देखा जा सकता है ? क्योंकि देवयानी राजनयिक होने के साथ एक महिला भी थीं और वे एकाएक कहीं भागने वाली नहीं थी ? इसलिए उन्हें हथकड़ी लगाकर जेल में बंद करना, कतर्इ उचित नहीं है। कपड़े उतरवाकर आखिर किस चीज की तलाशी ली जा रही थी ? क्या उन्होंने कोर्इ वस्तु चुराकर अतंर्वस्त्रों में छिपा ली थी, जो वस्त्र उतरवाये ? यह अमेरिकी पुलिस की शर्मनाक ज्यादती है। वे कोर्इ महिला आतंकी या पेशेवर अपराधी नहीं थी, जो उनके साथ ऐसा अमानुशिक बर्ताव किया जाता ? , लिहाजा उन्हें एक महिला के साथ किए इस कृत्य के लिए माफी मांगनी चाहिए ?  अमेरिका ने जिस तरह से राजनयिकों के अधिकारों के संदर्भ में वियना समझौते की शर्तों को ठेंगा दिखाया है, उसे भी गंभीरता से लेने की जरुरत है। यह समझौता किसी राजनयिक के साथ आम अपराधियों जैसा सलूक करने की इजाजत नहीं देता। बहरहाल अमेरिका के इस पैगाम से दो अर्थ निकलते हैं।

5 Responses to “अमेरिका को पैगाम”

  1. kailash

    जो कुछ भी हुवा वह स्वीकार नहीं है यदिप कि ह मानला राजनियक हेने के साथ महिला से जुड़ा है जिसकी कोई मर्यादा होती है. रहा सवाल मुद्दा उठाने के तो मी समझ से यह एक नौकरशाही मुद्दा है और साशन तंत्र में जो बैठे हैं वे इस बात को पचा नहीं प् रहे है कि नोकरशाह से कोई ऐसा बर्ताव करे.
    फिर भी हमारे आकवो द्वारा उठाये कदम सरहनीय है जब जगे तब सबेरा भले ये आहट आगामी चुनाव के मद्देनज़र ही किवो न हो.

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  2. mahendra gupta

    अमेरिका भी इतना दूध का धुला नहीं जैसा वह अपने आप को दिखा रहा है.इसके पीछे कुछ राजनितिक खेल है जिसे ढूंढा जाना चाहिए. रही भारत सरकार के इतनी जल्दी सक्रिय होने की, तो सर पर आ रहे चुनाव सरकार को परेशां कर रहे हैं.इस समय सरकार किसी भी छोटे से छोटे मुद्दे को सस्ते में नहीं लेना चाहती.पहले ही महंगाई भ्रस्टाचार घोटाले आदि विषय हैं जो चुनाव में हावी होने हैं.मोदी को भी इतना हल्का लेने वाले कांग्रेसी नेता अब दबी जवान से उनका लोहा मानने लगे हैं.रहीसही कसार मायावती ने जबरन ही दलित मुद्दे को खड़ा करने का प्रयास कर पूरी कर दी है.अब सर्कार चेते नहीं तो क्या करे. अपने अधिकारी की गलतियां होने के बावजूद देश की जनता के सामने अपने कमजोरीपन को नहीं दिखाना चाहती.

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  3. Binu Bhatnagar

    न्यूनतम वेतन की बातों पर ये बड़े देश झूठी दुहाई देते हैं। देवियानी की ग़लती कितनी बड़ी थी ये कहना मुश्किल है, पर अमरीका मे हज़ारों की संख्या मे क़ानूनी और ग़ैर कानूनी तरीके से होन्डूरस, निकारगुआ पनामा, कोस्टारिका तथा अन्य छोटे छोटे लैटिन अमरीकी देशों से आये स्पैनिश बोलने वाले लोग रहते हैं जो घरेलू पार्ट टाइम नौकरियां करते हैं, निश्चय ही अमरीकी मापदण्ड से बहुत कम धन तनख्वाह पाने वाले इन लोगों के बारे मे वहाँ की सरकार को मालूम होगा। अन्य एशियाई देशों मे अमरीकी दूतावास मे काम करने वाले स्थानीय कर्मचारियों को भी तनख़्वाह बहुत कम मिलती है।
    सबसे बडी बात कि संगीता रिचर्ड के परिवार को जो कि भारतीय नागरिक है यहाँ से ‘इवेक्युएट’ कराने का क्या उचित कारण था , ये सिर्फ अमरीका की दादागिरी है और कुछ नहीं।

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  4. Abdul Karim

    दूतावास के आगे से बैरिकेड हटाना कोई बड़ी बात नहीं. भारत को चाहिए था की वे किसी अमरीकी राजनयिक को भी किसी कानूनी मामले में फंसा कर गिरफ्तार करते. अनावश्यक हो हल्ला से लाठी भी टूट गई सांप भी नहीं मरा. वैसे भारत-अमेरिका आज की भू-राजनीति में महत्वपूर्ण सहयोगी है, हम अपने सामरिक हितो की अनदेखी नहीं कर सकते.

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