लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-नरेन्द्र कुमार सिंह-arvind

अन्ना आन्दोलन के दिनों में अरविन्द केजरीवाल का नाम अचानक सुर्खियों में आया था । उस समय लगता था कि एक महत्वाकांक्षी युवा देश की सत्ता अपने हाथों मे लेने के लिए संघर्ष कर रहा है । जब वे अन्ना का पक्ष लेकर बोलते थे तो लगता था कोई व्यक्ति अधिनायक बनने की तैयारी कर
रहा है । आन्दोलन में मंच से और ख़ासकर केजरीवालों की ओर से जिस प्रकार की भाषा और हाव भाव का प्रदर्शन होता था, उससे अंदेशा होता था कि वर्तमान व्यवस्था को ध्वस्त करके अधिनायकवादी व्यवस्था के लिये जनमत तैयार किया जा रहा है ।  उस आंदोलन में अरविन्द केजरीवाल अपनी टीम को जनता का
स्वघोषित प्रतिनिधि बता रहे थे और अन्ना को संविधान से उपर स्थापित कर रहे थे । जिस प्रकार देश के संविधान , राजनैतिक व्यवस्था और राजनैतिक नेतृत्व को जन विरोधी बताया जा रहा था ,उसी से आभास होने लगा था कि अरविन्द केजरीवाल की निगाह कहीं और है । अरविन्द केजरीवाल के इस प्रयास को कांग्रेस की गिरती हुई साख से बल मिल रहा था । कांग्रेस ने अपने लम्बे शासनकाल में देश की राजनैतिक व्यवस्था, संविधानिक प्रावधानों और यहां तक कि लोकतांत्रिक प्रणाली की साख को कम किया था । नेताओं के भ्रष्ट आचारण और भाई भतीजावाद के कारण आम जनता का स्थापित व्यवस्था से ही विश्वास हटने लगा था । कांग्रेस के इस पाप से व्याप्त शून्य में से ही अरविन्द केजरीवाल का जन्म हुआ । सोनिया कांग्रेस के पास अपना कोई चरित्र बल बचा नहीं था । केवल महात्मा गाधी के नाम को बेचकर और पूर्वकाल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विदेशी सत्ता के खिलाफ किये गये संघर्ष की हुण्डी के बलबूते सत्ता पर काबिज होकर कमा खा रही थी । अरविन्द केजरीवाल के लिए अपनी योजना को आगे बढाने के लिये यह बिल्कुल सही समय था ।
भारतीय जनता पार्टी की बात की जाये तो वह भी अपने लम्बे सफर में कहीं न कहीं जड़ता को प्राप्त होने की ओर जा रही है । एक ओर जड़ता दूसरी ओर नेतृत्व में सामूहिक निर्णय लेने की लोकतांत्रिक प्रणाली को दर किनार कर व्यक्तिगत पसन्द नापसन्द के आधार पर तथाकथित हाईकमांड की अवधारणा को स्थापित किया गया । जनाधार वाले नेताओं को लंगड़ी मार , मैनजमैंट से पार्टी को हांकने की नई शैली विकसित हुई । यही कारण था कि कांग्रेस ने कम साख होने के बावजूद 2009 का लोकसभा चुनाव जीतकर सरकार बना ली थी । एक प्रकार से राजनैतिक पटल पर देश की जनता के मन में निराशा थी । ऐसे में अरविन्द केजरीवाल ने बड़ी चालाकी से अन्ना के आन्दोलन से स्वयं को अलग कर एक राजनैतिक दल बना लिया था जिसका नाम रखा आम आदमी पार्टी । इसे संयोग ही कहना चाहिये की आम आदमी को चुनाव चिन्ह झाडू मिला , जिसका केजरीवाल ने भरपूर उपयोग किया । अरविन्द केजरीवाल दिनरात प्रयास करके दिल्ली के चुनाव में लोगों को समझाने लगे कि अन्य पार्टियों मे जो लोग चुनाव लङ रहे हैं वे नेता हैं और हम लोग आम आदमीं हैं । कांग्रेस जहां आम आदमीं से पहले ही दूर हो चुकी थी और बीजेपी कांग्रेस का प्रतिरूप बनती जा रही थी । वहीं आम आदमी पार्टी ने लोगों को एक विश्वास जगाया कि आम आदमी पार्टी आम लोगों की पार्टी है । यह एक बहुत ही क्रांतिकारी परिवर्तन था । लोगों को लगने लगा कि आम आदमी पार्टी उनकी पार्टी है । इसका कारण था कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जनता के बीच में रहकर उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास कर रहे थे । एक ओर जहां कांग्रेस और बीजेपी के नेता अपने महलों और आलीशान गाङियों से निकलने के लिए तैयार नहीं थे वहीं आम आदमीं पार्टी के कार्यकर्ता सर्वसुलभ थे । अरविन्द केजरीवाल ने अपनी
टोली को कुशल नेतृत्व दिया और चुनाव को जनआंदोलन मे बदल दिया । आम आदमीं पार्टी की ताकत का कोई भी विशेषज्ञ सही-सही आकलन नहीं कर सका । शुरु में राजनीति विशारद आम आदमी पार्टी को पांच से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं थे । शायद अरविन्द केजरीवाल भी परिणाम आने से पूर्व इतनी सीटों की उम्मीद न रख रहे हों । लेकिन जैसे ही दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम आया , लोगों की नब्ज पर सदा हाथ रखने का दावा करने वाले भी सकते में आ गये। बड़े-बड़े नाम वाले मंत्री बेनाम प्रतिद्वंदियों से चुनाव हार चुके थे । दिल्ली चुनाव परिणाम ने निश्चित रुप से बता दिया है कि सदा ही जाति, वर्ग और क्षेत्र के आधार पर चुनाव नहीं जीता जा सकता है । वी आई पी की राजनैतिक संस्कृति अब जनता में वितृष्णा पैदा करती है  । देर से ही सही लेकिन देश की जनता निश्चित मन बना चुकी है कि देश का भविष्य और चरित्र बदलना है । यह भारत के लिए अच्छा संकेत है । अरविंद केजरीवाल की आम आदमीं पार्टी का भविष्य क्या होता है , यह तो समय ही बतायेगा। लेकिन एक बात तय है कि आने वाले समय में देश का नेतृत्व खास लोगों से हटकर आम आदमीं के पास जाने वाला है । अब भारत सही अर्थों में लोकतन्त्र की ओर बढ़ रहा है ।
( लेखक अरुणाचल प्रदेश के रहने वाले सामाजिक सन्दर्भों पर जाने माने टिप्पणीकार हैं)

3 Responses to “आम आदमी पार्टी का भारतीय राजनीति में नया प्रयोग”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    ‘ आपको’ नजर न लग जाए ! बधाई! हमारी शुभकामनाएँ ! !

    अरविन्द केजरीवाल के शपथ गृहण से ठीक पहले एलपीजी कम्पनियों द्वारा दिल्ली में सी एन जी के दाम बढ़ाये जाना , आठ कांग्रेसी विधायकों का ‘बिना शर्त’ समर्थन ‘सशर्त’ हो जाना , ‘आप’ के सत्तारोहण की सादगीपूर्ण प्रस्तुति से बौखलाए भाजपा नेताओं के पेट में ईर्षा का वायु विकार पैदा होना और देश में स्थापित महत्वाकंकांक्षी भ्रष्ट नेताओं के सामने शुचिता और आदर्शवाद की कठिन चुनौती पेश होना इत्यादि सिम्टम्स बताते हैं कि ‘आप’ की सरकार का जीवन लंबा नहीं होगा। चूँकि ‘आप’ का जन्म नागरिक मंच और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्सन ‘ के आन्दोलनों की विफलता और राजनैतिक सत्ता के द्वारा आंदोलनकारियों को अपमानित करने के परिणाम स्वरुप हुआ था। इसलिए जैविक द्वन्दात्मकता उसके अंतस में अवस्थित है। उसकी जीवंतता देश का ‘आम आदमी ‘ ही सुनिश्चित कर सकता है।
    जन-लोकपाल के मार्फ़त भ्रष्टाचार समाप्त करने ,महंगाई कम करने ,सुशासन देने इत्यादि उद्देशों के लिए किये गए हाई टेक प्रचार से ‘आप’ के केजरीवाल ने न केवल शानदार उपस्थिति दर्ज कराई है अपितु पहले ही हल्ले में सत्ता और शासन के सूत्र भी हासिल कर लिए हैं। यह स्थति कांग्रेस और भाजपा के लिए कतई सुखद नहीं है। इसलिए तो गाँव वसा नहीं और श्वान जीमने को लालायित हैं। केजरीवाल की ‘आप’ को गिराने के मंसूबे बनाये जाने लगे हैं। लेकिन जब तक आम आदमी और देशभक्त मीडिया ‘आप’ के साथ है, जब तक केजरीवाल टीम वर्त्तमान व्यवस्था के पाप पंक में नहीं धसती,जब तक प्रजातांत्रिक -धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक-नैतिक मूल्य भ्रष्टाचार के सामने झुकने को तैयार नहीं – तब तक ‘आप’ की सेहत को कोई खतरा नहीं ! वेशक केजरीवाल और ‘आप’ के पास वर्त्तमान पूँजीवादी नीतियों से इतर कोई वैकल्पिक आर्थिक नीति नहीं है. लेकिन यदि वे वामपंथ और तीसरे मोर्चे से जुड़ते हैं तो उनके पास एक बेहतरीन आर्थिक-सामाजिक दर्शन हो सकता है। गैर कांग्रेस और गैर भाजपा दलों को चाहिए कि केजरीवाल और ‘आप’ को खुलकर साथ दें. ताकि आगामी लोक सभा चुनाव में देश को भ्रष्टाचार मुक्त, धर्मनिरपेक्ष ,समाजवादी और वास्तविक लोकतंत्रतातमक शासन सुलभ हो सके।
    लगभग एक साल पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कारगर क़ानून – ‘जन-लोकपाल ‘ की मांग को लेकर समाज सेवी अन्ना हजारे ,अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण , किरण वेदी योगेन्द्र यादव और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’के साथियों ने दिल्ली के रामलीला मैदान में आमरण अनशन किया था। जनता के अप्रत्याशित समर्थन से घबराये कांग्रेस के पुराधाओं ने पहले तो अनशनकारियों के मान-मनौवल का रास्ता अपनाया, किन्तु , जब लोक सभा में भाजपा ने तत्कालीन लोकपाल बिल का समर्थन नहीं किया तो कांग्रेस के नेताओं ने अनशन कर्ताओं को अपनी मजबूरी बताकर मामला शांत करने की कोशिश की। जब आंदोलनकारी नहीं माने तो फिर यूपीए सरकार ने उनके खिलाफ कठोर रुख अपनाया। कांग्रेसियों ने अनाप-शनाप वयानबाजी कर , आंदोलनकारियों को दिल्ली की ठिठुरती रातों में भूंखो मरने को रामलीला मैदान में छोड़ दिया । उस बक्त भाजपा ,वाम मोर्चे और तीसरे मोर्चे की राजनीति के क्षत्रपों ने भी इन गैर राजनैतिक – अहिंसक अनशनकारियों को राजनीति में आकर भ्रष्टाचार खत्म करने का व्यंगात्मक आह्वान किया था।
    इस अपमानजनक व्यवहार से आंदोलनकारियों के मन में कांग्रेस और भाजपा के प्रति घोर वैमनस्य घर कर गया। चूँकि अन्ना हजारे को ‘संघ’ का समर्थन भी प्राप्त था। अतएव वे तो केवल कांग्रेस विरोध का झंडा लेकर ही गैर राजनीती के वियावान में भटकने चले गए। किन्तु जिनका स्वाभिमान बुलंदियों पर था और जिनके जिगर में भृष्टाचार को खत्म करने का जज्वा और जूनून था , जिनका आदर्शवादी सामाजिक आंदोलनो से मोह भंग हो चुका था ,उन्होंने राजनीति में आकर व्यवस्था परिवर्तन की चुनौती को स्वीकार किया । आनन् -फानन ‘आम आदमी पार्टी’ बनाई गई। मुख्य धारा का मीडिया और एन आर आई से लेकर दिल्ली के मध्यवित्त वर्ग ने ‘आप’ को हाथों-हाथ लिया। भरपूर समर्थन भी दिया।
    अरविन्द केजरीवाल के नेत्तव में -मनीस सिसोदिया,योगेन्द्र यादव ,संजयसिंग ,कुमार विश्वाश और प्रशांत भूषण जैसे अनेक दिग्गजों के प्रयाशों को एनआरआई और मीडिया ने भी विश्वाश व्यक्त किया। जब पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव सम्पन्न हुए तो दिल्ली विधान सभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरी नव-गठित ‘ आम आदमी पार्टी’ को अप्रत्याशित सफलत मिली । अरविन्द केजरीवाल के नेत्तव में ‘आप’ की सरकार ने दिल्ली के उसी रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण की है जहाँ अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी अपमानित हुए थे । अहंकारी और भ्रष्ट शासकों को यह दुखांत अनुभव हो सकता है।
    ‘आप’ ने न केवल कांग्रेस को ८ सीट पर समेट दिया है ,न केवल शीला दीक्षित को विधायक भी नहीं बनने दिया बल्कि दिल्ली राज्य में बनने वाली सम्भावित भाजपा की सरकार का रास्ता भी रोक लिया है । भाजपा के ‘सी एम् इन वेटिंग ‘ डॉ हर्षवर्धन यदि मुख्यमंत्री नहीं बन पाये तो उसका श्रेय ‘आप’ को जाता है। ‘आप’ की इस छप्पर-फाड़ सफलता से भारतीय जन- मानस के वैचारिक गर्भ गृह में अनेक प्रकार के कयास गुंजायमान हो रहे हैं। ‘आप’ के नेता अरविन्द केजरीवाल अब केवल दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति में व्यवस्था परिवर्तन के आकाशदीप बन चुके हैं ।उनके गुरुवर अण्णा हजारे इसलिए दुबले हो रहे हैं कि अरविन्द केजरीवाल तथा जिन समर्थकों को उन्होंने ‘नालायक’ मानकर छोड़ दिया था, वे अन्ना के सहयोग के बिना ही सफल होते जा रहे हैं। अण्णा के नकारात्मक ,हठधर्मी आन्दोलनों से केजरीवाल और ‘आप’ की सकारात्मक राजनीती काफी आगे निकल चुकी है। चूँकि ‘आप’ का दृष्टिकोण सकरात्मक और विजन वैज्ञानिक है ,और चूँकि ‘आप ‘ ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही भृष्ट व्यवस्था का उन्नायक माना है इसलिए ‘आप’ की विश्वशनीयता बढ़ी है। ‘आप’की राजनीती का भविष्य उज्जवल है।
    ‘आप’का नजरिया प्रगतिशील है ,साधनों की शुचिता और व्यवस्था परिवर्तन की चाहत है,जनता का भारी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस के आठ विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने के सवाल पर भी ‘आप’ ने जनता से ‘परमीशन’ ले ली है. यह एक शानदार लोकतांत्रिक कदम है। ‘आप’ का हर कदम नैतिकता पूर्ण ,आदर्शोन्मुखी और प्रजातांत्रिक है इसलिए भारत में ‘आप’ के उदय से क्रांति की सम्भावनाओं को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। ‘आप’ के उदय से न केवल कांग्रेस बल्कि भाजपा को भी समान रूप से खतरा है इसलिए इन दोनों बड़ी पार्टियों में बैचनी है। कांग्रेस में ‘आप’ को समर्थन के प्रश्न पर घमासान मचा है। भाजपा के पेट में भी दर्द उठ रहा है कि सबसे बड़ी पार्टी [३१-विधायक] होने के वावजूद उसे विपक्ष में बैठना पड़ रहा है। यह सब ‘आप’ कि माया है। भाजपा को डर है कि आगामी लोक सभा चुनाव में भी ‘आप’ की भूमिका कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए संघ परिवार ने ‘आप’ को घेरना शुरू कर दिया है.अण्णा को अरविन्द के खिलाफ भड़काया जा रहा है। संघ परिवार को यह डर भी सता रहा है कि कहीं डॉ हर्षवर्धन की तरह ‘नमो’ भी पीएमएन वेटिंग ‘ ही न रह जाएँ !
    कांग्रेस और राहुल गांधी ने भी ‘आप’ को मान्यता दे दी है । इसलिए आगामी लोक सभा चुनाव के पूर्व ‘आप’ को समर्थन देकर सम्भावनाओं के दरवाजे खुले रखे गये हैं.कांग्रेस को मालूम है कि वेशक भारतीय राजनीति में भ्रस्टाचार और कदाचार का बोलबाला है.महंगाई ,बेकारी और राजकोषीय घाटे की स्थति है। किन्तु इन समस्याओं से ‘आप’ कैसे निपटेगी ?’आप’ के सामने अनेक चुनौतियाँ दर पेश होंगी। नीतियों के अभाव में ‘आप’दिल्ली की जनता से किये गए वादों को पूरा नहीं कर पायेगी। तब ६ माह बाद समर्थन वापिस लेकर उसका बोरिया बिस्तर बाँधना आसान होगा। कांग्रेस ने यदि अतीत की गलतियों से सबक नहीं सीखकर ‘आप’ को निपटाने की गलती की तो वास्तव में उसको लम्बे वनवास के लिए भी तैयार रहना चाहिए ! यदि अपने अजेंडे का ५०% भी ‘आप’ ने पूरा कर दिखया,राजनीति की काजल कोठरी में अपना दामन बेदाग़ रखा तो आइंदा सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरा भारत ‘आप’ का होगा !
    श्रीराम तिवारी

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    संतुलित और विचारणीय आलेख.इस नई अवधारणा का एक नयी पार्टी के रूप में विकास स्थापित पार्टियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर खतरे की घंटी है,क्योंकि अब आम आदमी पार्टी केवल राजधानी तक ही सीमित नहीं रहेगी. मैंने चुनाव परिणाम आने के पहले लिखा था कि अगर आम आदमी पार्टी दिल्ली में पहले या दूसरे स्थान पर आती है,तो भविष्य में दो राष्ट्रीय दल होंगे,बीजेपी और आम आदमी पार्टी. मुझे पूर्ण विशवास है कि मैं कालान्तर में सही साबित हूँगा.

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    • श्रीराम तिवारी

      shriram tiwari

      धन्यवाद आदरणीय ! सिंह साहब – ख्रीस्त नव वर्ष के शुभागमन पर हार्दिक शुभकामनाएं !
      भाई संजीव सिन्हा और समस्त ‘प्रवक्ता परिवार ‘ को अपने -अपने पावन उद्देशों में सफलता की हार्दिक शुभकामनाएं ..!

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