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    माहवारी से गांव अशुध्द हो जाएगा इसलिए गांव बाहर डिलेवरी

    अधिकारो से बेखबर अंधविश्वास के अंधेरे में जकड़ी महिलाएं

    मातृत्व सुरक्षा के संविधान में मिले अधिकार. सरकारी योजनाओं के दावे और हकीकत के बीच अंधविश्वास की ज़मीन पर खड़ा एक ऐसा गांव जिसकी पहचान ये है कि इस गांव में आज़ादी के पहले से आज तक किसी नवजात की रुलाई नहीं सुनी. नरसिंहगढ़ जिले का सांका श्याम ऐसा अनोखा गांव है. जहां डिलेवरी पर बैन है. कोई सरकारी आदेश नहीं। पंचायत का फैसला भी नहीं. लेकिन पूरा गांव इस पर आंख मूंदकर अमल करता है.

    सांका श्याम जी के एतिहासिक मंदिर के नाम से मशहूर इस गांव में ज्यादातर सैलानी, सदियों पुराने सांका श्याम जी के मंदिर को देखने यहां आते हैं। मुमकिन है कि आपने भी  इस गांव का जिक्र इसी मंदिर के चलते सुना हो, लेकिन मेरी दिलचस्पी तो मंदिर और देवताओं से ज्यादा, उस गांव को देखने और जानने की थी, जहां सदियों से मंदिर और भगवान की आड़ लेकर गांव की औरतों को मां बनते ही गांव की सरहद पार किया जा रहा है.  एक अजीबो गरीब आदेश जिसने सांका गांव की गर्भवती महिलाओँ को जंगलों में अपने बच्चों को जन्म देने मजबूर कर दिया। 

    नरसिंहगढ पहुंचने के बाद हाइवे पर दांयी तरफ से रास्ता सीधा सांका गांव ही जाता है। गांव की पिछड़ी हुई सोच की तरह ही कच्चा और ऊबड़ खाबड़ रास्ता। जिस तरह से इस गांव में इल्म की रोशनी नहीं पहुंची, हालात देखकर लगता है कि सरकार ने भी  कभी  गांव का रूख नहीं किया। खैर बदहाल रास्ता खत्म होता है और जब दूर से दिखाई दे रहा सांका श्याम जी का मंदिर और नजदीक आ जाता है तो यकीन हो जाता है कि मुकाम पर पहुंच गए हैं। 

    एक हजार की आबादी वाला सांका गांव। देखने सुनने में जो हिंदुस्तान के किसी भी दूसरे गांव की तरह ही है। सड़क बिजली पानी के साथ जिंदगी की हर जरूरत पर यहां  भी  संकट है। सबकुछ वैसा ही जैसा भारत के किसी भी  गांव में होता है फिर भी अपनी तरह का इकलौता गांव।

    ये पूरा गांव जिनकी आवाज पर चलता है गांव में पहुंचते है सबसे पहले उन्ही से मुलाकात होती है, गांव के जमीदार मांगीलाल सुस्ता रहे हैं। 75 बरस के मांगीलाल खुद भी गांव के बाहर की पैदाइश हैं, उनकी मां बरसो पहलें सिधार चुकी। अब भी जब कभी मां की याद होती है तो मांगीलाल के जन्म के उस जिक्र के साथ कि किस तरह उनकी मां ने झूराझूर पानी में गांव के बाहर जंगल में अपने इस बेटे को जन्म दिया था। 

    मांगीलाल कहते हैं,, हम अकेले नहीं हमारे बाप दादा भी हमाई तरह गांव के बाहर जंगल में ही पैदा हुए हैं। साथ ये जोड़ना भी नहीं भूलते कि श्याम बाबा का शाप है इस गांव को। मांगीलाल से कई बार पूछा कि ये कौन सा रिवाज है? ये कैसी परंपरा जो किसी मां को उसकी जिंदगी के सबसे मुश्किल वक्त में गांव से बाहर निकाल देती है, अंधविश्वास में जीने वाले मांगीलाल का बस एक ही जवाब, सदियों से जो चला आ रहा है, उसे बदलने वाले कौन होते हैं हम और आप। मांगीलाल के पिता और दादा से शुरु हुआ ये सिलसिला पचास साल के हरज्ञान से लेकर अब तक बदस्तूर जारी है. गांव में एक बच्चा ऐसा नहीं जो इसी गांव की पैदाइश हो.

    मेरी उत्सुकता ये जानने में थी कि वो कौन सी किवंदती, कौन सा खौफ थां जो अब इन गांव वालों के लिए पत्थर की लकीर बन गया है. जो गांव वालों ने बढ़े बूढों से सुना है तो उसके मुताबिक श्याम जी का ये मंदिर पूरी एक रात में बन रहा था, जब ये मंदिर बन रहा था, उसी वक्त एक बच्चे के रोने की आवाज आई, और मंदिर अधूरा रह गया। तभी से इस से गांव को देवताओ का शाप मिला कि अब इस अभिशप्त गांव में कोई बच्चा नहीं जन्मेगाऔर अगर जन्मा तो विकलांग पैदा होगा। वक्त के साथ यकीन और गहरा होता गया, और देवताओं का शाप अब इस गांव की परंपरा बन गया। सांका श्याम मंदिर के बाहर ही राजकिशोर से मुलाकात हुई राजकिशोर इसी गांव का है, सात पुश्तों से यहीं है उसका परिवार, लेकिन वो अपने गांव को अपनी जन्मभूमि नहीं कह सकता। क्योंकि उसके साथ उसके पिता और उसके दादा का जन्म भी गांव के बाहर ही हुआ।

    पूरे गांव में अस्पताल तो दूर, प्राइमरी हेल्थ सेंटर भी नहीं है, छोटी मोटी बीमारी के इलाज के लिए भी गांव वालों को कोठरा या फिर नरसिंगढ तक की दुर्गम यात्रा करनी पड़ती है। गर्भवती महिलाओँ का जाने यहां की खस्ताहाल   सड़कों पर क्या हाल होता होगा। सरकार की सहानुभूति तो इस गांव को कभी मिली नहीं, लेकिन पंचायत ने मांओ की खातिर इतना जरूर किया कि गांव की सरहद के बाहर एक कमरा बनवा दिया। जिसे टेम्परेरी लेबर रूम कह सकते हैं। कमरा बन तो गया लेकिन बदइंतजामियों के चलते कभी किसी नवजात की रुलाई इस कमरे में सुनाई नहीं दी। 

    गांव की मांओ से मुलाकात करना मेरे लिए अब सबसे जरूरी था। अपनी संतान की सलामती के लिए सांका की सरहद से बाहर अपने बच्चे को जन्म देने इन मांओ की मजबूरी है. पहले मुलाकात हुई सावित्री बाई से, अब तो बहू बेटे वाली हैं लेकिन हंसते हुए बताती हैं इस गांव में तो ज्यादातर छोरा छोरी जंगल में ही पैदा हुआ. कईं नई तब तो जमादारिन भी नईं मिले, बस मजूरी करने वाली बाई होन चली जाएं संग, पर स्याम बाबा की किरपा से सब बच्चे अच्छे से आग्यो दुनिया मा। अब यहां तो हर माय को जचके के बखत गांव के बाहर ही जानो पड़े।

    देवताओं का शाप पूरे गांव को मिला, लेकिन उसे भुगतती है सिर्फ एक मां, जो मां बनने के आखिरी  और सबसे मुश्किल दिनों में गांव छोड़कर जाने को मजबूर होती है, कमला के बच्चे गांव से बाहर पैदा हुए हैं, गांव के बाहर एक झोपड़े में, जिसे गांव के लोग टोपला कहते हैं, कमला कहती है तीसरी छोरी की जचकी के बखत मैं बहुत बीमार हो गई थी, कोई इईलाज भी  नई मिलो बस अपनी हिम्मत से जी गई। ये हिम्मत ही तो है, जो गांव की सरहद के बाहर बच्चे को जन्म देते वक्त भी बच्चे को जिलाए रखती है, अंधविश्वास अपनी जगह है, पर गांव में स्वास्थ्य सेवाओँ का हाल ये है कि डिलीवरी के वक्त डॉक्टर तो दूर गर्भवती को भी दाई नसीब नहीं होती। नौ महीने पेट में बच्चा •भगवान भरोसे रहता है  

    वक्त की रफ्तार में देखिए तो शहरों के साथ उनके किनारे खड़े गाव में भी कितना कुछ बदल रहा है, आस्थाएं बदली, परंपराएँ बदली, ऐसा नहीं है कि बदलाव की बयार सांका गांव तक पहुंची ही नहीं, इस गांव ने  भी दुनिया के नए रंग ढंग के साथ खुद को बदला है, लेकिन सांका गांव का ये यकीन, सदयिों बाद भी कायम है कि कि भगवान खुद ही नहीं चाहते कि ये गांव किसी बच्चे की रुलाई सुने.

    भारत के संविधान की धारा 15(1) कहती है. भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकार दिए गए हैं. इन अधिकारों का उद्देश्य है कि हर नागरिक सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके और किसी के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव न हो. आर्टिकल 15 (1) कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति धर्म लिंग जन्म स्थान वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता. संविधान की धारा 15 का जिक्र इसलिए कि अब आप संविधान से मिले अधिकार की रोशनी में नरसिंहगढ़ जिले के उस साका श्याम गांव तक पहुंचे जहां महिलाओं के साथ लिंग आधारित भेदभाव तो किया ही जा रहा है. बरसों से उनका सम्मान और उनके जीवन की सुरक्षा भी संकट में आती रही है.

    मध्यप्रदेश के नरसिंगहगढ़ जिले का ये गांव देश का पहला ऐसा गांव होगा. महिलाएं प्रसव पीड़ा के दौरान गांव की सीमा से केवल इसलिए बाहर कर दी जाएँ कि गांव का अंधविश्वास है कि अगर डिलेवरी गांव में ही हो गई तो बच्चे और मां मे से किसी की जान जा सकती है. जान का जोखिम यूं भी है कि क्योंकि गांव की बहुतायत में डिलेवरी सर्दी गर्मी बरसात में खुले आसमान के नीचे होती रही हैं. अंधविश्वास की असल वजह डिलेवरी के बाद होने वाली माहवारी है. गांव में ये मान्यता बना ली गई है कि अगर गांव के भीतर ही महिला ने बच्चे को जन्म दिया और नौ महीने बाद की माहवारी गांव में रहने के दौरान ही हुई तो गांव अपवित्र हो जाएगा.  क्या ये संविधान में मिले महिला के सम्मान, मातृत्व की गरिमा और उसकी सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा नहीं. प्रश्न ये भी है कि सरकारों की ओर से ने इन महिलाओं को उनका सम्मान सुरक्षित मातृत्व दिलाने के लिए समय समय पर क्या और कौन से प्रयास किए गए. बाकी ऐसे ही अंधविश्वासों और मातृत्व सुरक्षा की अनदेखी का नतीजा ये भी कि देश में मातृ मृत्यु अनुपात के ताज़ा आंकड़ों में मध्यप्रदेश  163 से बढ़कर 173 तक पहुंच गया है. मतलब ये कि हर एक लाख महिलाओं की आबादी पर 173 महिलाओँ की गर्भावास्था की समस्याओं की वजह से मध्यप्रदेश में मौत हो जा रही है. जाहिर है इसकी एक वजह ऐसे ही अंधविश्वास और महिलाओं का मातृत्व को लेकर उनके अपने संवैधानिक अधिकारो के लिए जागरुक ना होना भी है.

    अंधे विश्वास में कैसे अंधकार में ढकेली जाती रही पीढ़ी दर पीढ़ी. अपने अधिकारों को लेकर सजग ना रहने की क्या कीमत चुकाई गई. इसकी तस्दीक इस गांव की हर औरत के बयान में है…सावित्री की तरह रानी बाई सांका श्याम गांव की वो महिला. जो अब हंसते हुए ये बताती है कि उसने अपनी बेटी को बैलगाड़ी में जन्म दिया था. आज हंस पा रही है. ळेकिन उस दिन आंसू नहीं थम रहे थे. रानी बताती है तब गाड़ी घोड़े कहां थे. बैलगाड़ी का ही सहारा था. मुझे दर्द उठा तो मैने बोला कि जल्दी गांव बाहर ले चलो. लेकिन आधे रास्ते में ही दर्द बंद हो गए. आधी रात का वक्त कहां जाएंगे. फिर घरवालो से कहा कि वापिस ले चलो. आधा रास्ता भी नहीं निकला की दर्द फिर उठ गया. ये मेरी बेटी बैलगाड़ी में ही पैदा हो गई. रानी हंसती है. लेकिन फिर ये मंजूर भी करती है कि वैसा कष्ट ईश्वर किसी को ना दे. अंधविश्वास इतना गहराहै कि बीए सेकेण्ड इयर की छात्रा पिंकी भी इस परंपरा को वैसे ही मानती है जैसे उसकी दादी. पिंकी कहती है, गांव में ऐसा घटा है. अभी दस साल पहले भी एक बच्चे की मौत हो गई. गलती यही हुई कि उसकी मां ने देर से बताया. गांव से बाहर जा नहीं पाई.

    रानी बाई की डिलेवरी की कहानी मिसाल भर है. जिन्हे बैलगाड़ी नहीं मिली उन्होने दर्द में कराहते हुए. गांव की सीमा से बाहर सागौन के पत्ते के बने टोपले में बच्चों को जन्म दिया है. जब खुले आसमान के नीचे सागौन और बांस के टोपले में कोई मां ज़मीन पर पड़ी अपने बच्चे को जन्म देती होगी उस चीख में कहां गुम होते होंगे  सुरक्षित मातृत्व. स्वच्छता और महिलाओँ के सम्मान के सवाल.

    डर को परंपरा बनाकर जीता साढे सात सौ की आबादी बने इस गांव में इस अँधविश्वास की पहली शिकार बनी महिलाएँ. और फिर नवजात बच्चे. बात सिर्फ इतनी नहीं है कि एक गांव में बच्चे की पहली रुलाई पर बैन है. बात सिर्फ इतनी ही नहीं कि  एक गांव में कभी बच्चा नहीं जन सकती मां. बात ये है कि समाज की आंखे खोलने सिस्टम ने भी कुंडी नहीं खटखटाई. कौन बताएगा इन महिलाओँ को संविधान की धारा 15 में उन्हें ये अधिकार देती है कि माहवारी ही नहीं लिंग आधारित कोई भी भेदभाव उनके साथ नहीं किया जा सकता.

    संविधान में मिला कोई भी अधिकार इन तक नहीं पहुंचा. संविधान में मिले सुरक्षित मातृत्व के जिस अधिकार की बदौलत इन तक सरकारी योजनाओं की सुविधा पहुंच पाती. बरसों तक तो ये हुआ कि इस गांव की महिलाओं का नाम ही सुरक्षित मातृत्व के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लाभार्थियों में दर्ज नहीं हो पाया. वजह ये कि इनका संस्थागत प्रसव हुआ ही नहीं. लिहाजा ना सरकारी योजनाओँ का लाभ मिला ना अस्पताल की सुविधा. अंधविश्वास उस पर अपने अधिकारों को लेकर जागरुकता के अभाव ने इन  गर्भवती औरतों का जीवन ही संकट में नहीं डाला. बल्कि इस गांव की महिलाओं को कई सुविधाओँ से महरूम कर दिया. हैरत की बात ये है कि सरकार की तरफ से भी इनके अंधविश्वास को खत्म करने की कोई कोशिश नहीं हुई. ना इस बात का प्रयास कि इस गांव की महिलाओं के स्वास्थ्य की चुनौतियो को जानते समझते यहां स्वासथ्य सेवाएँ बेहतर की जाएं. स्थिति ये है कि गांव में प्राइमरी हैल्थ सेंटर भी नहीं. गांव के जागरुक हो रहे नौजवान खुद ये मंजूर करते हैं कि जननी सुरक्षा योजना जैसी सरकारी सुविधाओँ का लाभ भी कई वर्षों तक इन्हें यूं नहीं मिल पाया कि ज्यादातर महिलाओँ की डिलेवरी अस्पताल के बजाए गांव के बाहर बनाए गए एक कमरे या फिर खुले मैदान में हुई.. गांव की ही सावित्री देवी बताती है, सरकार से ये मांग की थी कि गांव के बाहर जो कमरा है उसमें सरकार सुविधा दे दे. पर वो तो खंडेरा हो चुका है.

    सुरक्षित मातृत्व के लिए चलाई जा रही  सरकार की सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी योजनाओं से कोसों दूर खड़ा है ये गांव. सवाल यहां ये भी है कि योजनाएं के अमल की एक अहम कड़ी क्या ये भी नहीं होना चाहए किकोई भी लाभार्थी बनने से चूक ना जाए. कैसे एक पूरा का पूरा गांव इस सूची से बाहर रहा. . जबकि  सुरक्षित मातृत्व इन महिलाओ को संविधान से मिला अधिकार है. जिस अभियान में प्रसव पूर्व देखभाल के लिए लाभार्थियों को जांच और दवाओ के लिए न्यूनतम  राशि भी दी जाती है. वो कोई लाभ इस गांव की महिलाओँ तक नहीं पहुंच पाया. .. सवाल ये है कि ये किसकी जवाबदारी थी. किसकी जिम्मेदारी कि समय रहते  इस गांव की महिलाओँ तक ये जानकारी पहुंच पाती कि संविधान में मिले अधिकार और उनकी विशेष देखभाल के लिए सरकार योजना चला रहीहै. किसकी जवाबदेही  कि इन महिलाओँ को ये बताए कि एक अंधविश्वास उन्हें कितनी सुविधाओं से वंचित कर गया है.

    कानों कान एक बात रवायत बनकर बढ़ती गई और जड़े पकड़ता गया अंधविश्वास. कुछ घरों में जब मुमकिन है इसी लापरवाही के चलते कुछ बच्चे पैदा होते ही बचे नहीं. या विकलांगता के शिकार हुए तो  गांव वालों का विश्वास और गहरा होता गया. गांव के गोपाल गुर्जर एक दूसरा कारण भी बताते हैं वे कहते हैं  छठवीं शताब्दी का है ये मंदिर. हमारे बाप दादा इस मंदिर में पूजा पाठ करते हैं. मंदिर की शुध्दता के लिए ये मर्यादा ऱखी गई है कि सूतक का समय यानि जचकी के बाद का समय कोई महिला यहां नहीं गुजारेगी. सूतक वो समय जब महिलाएं नौ महीने बाद करीब सवा महीने की अवधि तक माहवारी से होती हैं. भूपेन्द्र गुर्जर नए जमाने के हैं कहते हैं जो मान्यता चली आई उसका खामियाजा ये हुआ कि गांव में अस्पताल की सुविधा नहीं हो पाई. अब भी बारिश में पानी पूर पर आ जाता है और डिलेवरी के लिए महिलाओं को दूर जाना पड़ता है.

    सांका श्याम जैसे गांव के अंधविश्वास , इन गांव की महिलाओँ का जागरुक ना होना. और सिस्टम की तरफ से अंधी अनदेखी. नतीजे मातृ मृत्यु दर के आंकड़े की शक्ल में सामने आते हैं. महिला अधिकारों के लिए संवेदनशील होने का दावा करने वाली मध्यप्रदेश की सरकार में है ये तस्वीर  कि मातृ मृत्यु दर के ताज़ा आंकड़े हैरान कर रहे हैं. निराश कर रहे हैं. वजह ये कि  हम अपने प्रदेश में एक लाख गर्भवती महिलाओं में से 173 महिलाओं को केवल सही देखभाल के अभाव में बचा नहीं पाते.  ये और बात है कि समाज की ओर से और कई बार सिस्टम की तरफ से भी हवाला दे दिया जाता है ,कि इतनी ही उम्र लिखाकर लाई थी बेचारी. या उसकी मौत को खुद उसकी गलतियों का खामियाजा बता दिया जाता है.  एक लिहाज़ से तो मध्यप्रदेश भावी मांओं के लिए देश का दूसरे नंबर का सबसे असुरक्षित राज्य बन चुका है है. वजह ये कि एम पी ने मातृ मृत्युदर के मामले  में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को भी पीछे छोड़ दिया है क्योंकि वहां मातृ मृत्युदर पिछले छै साल से 167 के आंकड़े पर ही टिकी हुई है. लेकिन पूरे भारत में आसाम के बाद मध्यप्रदेश दूसरा राज्य जहां मातृ मृत्यु दर इस रफ्तार से बड़ा है. आसाम में  एक लाख की आबादी पर 195 गर्भवती मांए बच्चे के जन्म से पहले या जन्म देते हुए दम तोड़ देती हैं, मातृ मृत्यु दर के मामले में  टॉप पर है. और दूसरे नंबर पर है मध्यप्रदेश.

    सांका श्याम गांव….गांव का अंधविश्वास….नौ महीने बाद की माहवारी से पूरे गांव के अशुध्द हो जाने का डर…और जान जोखिम में डालकर गांव के बाहर डिलेवरी के लिए मजबूर महिलाएं. जड़ कहां है…वहां कि हज़ारो सुबहें देख चुका ये गांव जागा नहीं है. काश कि घर भर से पहले जाग जाने वाली इस गांव की महिलाएँ जाग जातीं…जान जाती कि सम्मान से जीने का अधिकार संविधान ने उन्हें दिया है. मान पाती कि सुरक्षित मातृत्व  संविधान से मिला हक है उनका.  

     ईटीवी भारत से संबध्द शिफाली विकास संवाद की फेलो पत्रकार हैं. 

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