पूरी दुनिया को है कोरोना वैक्सीन का इंतजार

योगेश कुमार गोयल

            कोरोना (कोविड-19) का संक्रमण लगातार घातक होता जा रहा है। इससे अभी तक दुनियाभर में करीब दस लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से पचास हजार से अधिक की मौत हो चुकी है। इसका संक्रमण कितनी तेजी से फैला है, उसका अनुमान इसी से सहज रूप से लगाया सकता है कि एक ओर जहां 22 जनवरी को केवल चीन में इसके कुल सात मरीज थे, वहीं करीब ढ़ाई माह बाद ही पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमितों की संख्या डेढ़ लाख गुना बढ़कर दस लाख के आंकड़े को पार कर गई है। भारत में कोरोना संक्रमण का खतरा अब जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसी को देखते हुए 22 मार्च को ‘जनता कर्फ्यू’ के बाद सामुदायिक तौर पर इसके संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश के अधिकांश राज्यों में लॉकडाउन या कर्फ्यू लगाने का फैसला लिया गया था लेकिन लोगों के न समझने पर अंततः प्रधानमंत्री के निर्देशों पर 24 मार्च की रात से पूरे देश में सम्पूर्ण लॉकडाउन घोषित किया गया। हालांकि जगह-जगह से लॉकडाउन के उल्लंघन के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं, जो चिंता का विषय है। भारत में कोरोना का पहला मामला 25 जनवरी 2020 को चीन के वुहान शहर से केरल लौटी एक युवती में मिला था और उसके कई दिनों बाद तक देश में कोरोना मरीजों की संख्या तीन तक ही सीमित रही थी, जिन्हें उपचार के बाद ठीक करने में सफलता भी मिली थी। 10 मार्च को देश में कोरोना मरीजों की संख्या 50 तक पहुंच गई थी। उसके बाद के चंद दिनों में यह आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ा, उससे भारत की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। 3 अप्रैल तक की तीन सप्ताह की इस अवधि में ही भारत में कोरोना मरीजों की संख्या 50 गुना बढ़कर 2500 के आंकड़े तक पहुंच गई है।

            एक ओर जहां पूरी दुनिया में कोरोना का खात्मा करने के लिए वैक्सीन की खोज पर तेजी से कार्य हो रहे हैं, वहीं विश्वभर में विशेषज्ञ यह आकलन करने में भी जुटे हैं कि कोरोना का दायरा अभी और कितना भयावह हो सकता है। कोरोना से जहां पूरी दुनिया दहशत के साये में जी रही है और हजारों लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं, वहीं दुनियाभर की अर्थव्यवस्था भी चौपट हो चुकी है। पुरानी महामारियों के आंकड़ों तथा गणितीय मॉडल के आधार पर यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के शोधकर्ताओं ने तो यह निष्कर्ष भी निकाला है कि आने वाले दिनों में कोरोना संक्रमितों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ने वाली है। कोरोना संक्रमण के मामले में प्रत्येक व्यक्ति इसका वाहक बन सकता है और इस गणितीय मॉडल के मुताबिक ऐसी महामारी के प्रसार में सबसे बड़ी भूमिका उन लोगों की ही होती है, जिनसे यह बीमारी फैलती है। पूरी दुनिया भली-भांति अब यह समझ भी चुकी है कि कोरोना संक्रमण के फैलाव को रोकने का एकमात्र उपाय तमाम शहरों में लॉकडाउन किया जाना ही है ताकि लोग घरों से बाहर निकलकर एक-दूसरे के सम्पर्क में न आएं और इस फैलाव को रोका जा सके।

            कोरोना वायरस को लेकर राहत देने वाली बात यह सामने आई है कि यह वायरस इंफ्लुएंजा की भांति अपनी जेनेटिक संरचना तेजी से नहीं बदल रहा। यानी चार महीने पहले चीन के वुहान में उसकी संरचना जैसी थी, अब भी लगभग वैसी ही है। दरअसल सामान्य रूप से वायरस एक से दूसरे मानव शरीर के भीतर गुजरते समय अपनी संरचना बदलते रहते हैं, जिसे म्युटेशन कहते हैं लेकिन कोरोना वायरस में म्युटेशन की यह प्रक्रिया नहीं देखी जा रही है। भारत में इस वायरस के स्वरूप पर नजर रख रहे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के वैज्ञानिकों के मुताबिक भारत में पाए गए कोरोना वायरस काफी हद तक एक समान हैं जबकि ये कई देशों में रहने वाले लोगों के माध्यम से भारत में पहुंचे हैं। आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने पाया है कि भारत में मिले कोरोना वायरस की जेनेटिक संरचना 99.9 फीसदी वुहान शहर में मिले वायरस के समान ही है। भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी कोरोना वायरस की जेनेटिक संरचना काफी हद तक एक जैसी ही पाई जा रही है। हालांकि आईसीएमआर के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वायरस के बारे में अभी निश्चित रूप से कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि लंबे समय तक कोरोना वायरस पर नजर रखने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।

            माना जा रहा है कि कोरोना वायरस में इंफ्लुएंजा तथा दूसरे वायरसों जैसे तेजी से जेनेटिक संचरना बदलने के गुण नहीं होने के चलते अगर इस वायरस को रोकने के लिए कोई वैक्सीन बनती है या इससे प्रभावित मरीजों के लिए कोई कारगर दवा खोजी जाती है तो वह लंबे समय तक कारगर रहेगी। दरअसल इंफ्लुएंजा जैसे कई वायरस लगातार अपनी जेनेटिक संरचना बदलते रहते हैं, जिस कारण उनके लिए हर बार नई वैक्सीन तैयार करनी पड़ती है लेकिन जेनेटिक संरचना नहीं बदलने के कारण कोरोना के खिलाफ लंबे समय तक काम करने वाला वैक्सीन बनाना आसान होगा। हालांकि अभी यह कह पाना मुश्किल है कि यह वैक्सीन कब तक तैयार होकर कोरोना मरीजों के लिए उपलब्ध हो सकती है। वैसे दुनियाभर के वैज्ञानिकों का कहना है कि जब कोरोना रोधी टीका बनकर तैयार हो जाएगा, तब यह इतना प्रभावी होगा कि कोरोना संक्रमण को शरीर में घुसने ही नहीं देगा।

            फिलहाल कोरोना का कारगर इलाज ढूंढ़ने में अमेरिका, चीन, भारत, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, इजरायल सहित दुनियाभर के वैज्ञानिक जुटे हैं और इन प्रयासों में प्रारम्भिक स्तर पर सफलता मिलती भी दिख रही है लेकिन क्लीनिकल परीक्षणों के बाद वैक्सीन तैयार होकर मरीजों के लिए उपलब्ध होने में अभी समय लगेगा। भारतीय दवा निर्माता कम्पनी ‘सिप्ला’ द्वारा अगले छह महीनों में कोरोना रोधी वैक्सीन बनाने का दावा किया जा रहा है। हैदराबाद स्थित सीएसआईआर इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ केमिकल टैक्नोलॉजी द्वारा सिप्ला के साथ मिलकर कोविड-19 की दवा बनाने की पहल शुरू कर दी गई है। अमेरिकी वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि एक साल में कोेरोना रोधी लाखों टीके बाजार में उपलब्ध होंगे लेकिन तब तक कोरोना दुनियाभर में जान-माल का कितना नुकसान कर चुका होगा, कोई नहीं जानता। लंदन स्कूल ऑफ हाईजीन के प्रोफेसर विंडर स्मिथ का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि हम 18 महीने से पहले कोविड-19 का टीका लाने की स्थिति में हैं। दुनिया के जाने-माने वायरोलॉजिस्ट डा. इयान लिपकिन का भी कहना है कि इस वायरस का टीका मिलने में अभी करीब एक साल का समय अवश्य लगेगा। हालांकि दुनिया के किसी हिस्से में किसी नई प्रकार का फ्लू सामने आने पर दूसरी तरह के फ्लू के लिए पहले से ही मौजूद वैक्सीन में नए वायरस की प्रकृति को समझते हुए जरूरी बदलाव कर बहुत जल्दी वैक्सीन तैयार की ली जाती है लेकिन कोविड-19 बिल्कुल नई तरह का वायरस है, इसलिए इसके लिए बनाई जाने वाली वैक्सीन का प्रत्येक चरण में सफल परीक्षण किया जाना अत्यावश्यक है ताकि यह मरीजों को स्वस्थ करने के बजाय उनकी जान को ही जोखिम में न डाल दे।

            कोरोना के इलाज को लेकर एक राहत भरी खबर हाल ही में यह आई है कि अन्य बीमारियों के इलाज में पहले से इस्तेमाल हो रही सात दवाओं को कोरोना के उपचार में कारगर माना जा रहा है। ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एंटीमाइक्रोबियल एजेंट’ में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है, जिसमें मलेरिया की दवा ‘क्लोरोक्वीन’ के साथ एंटीबायोटिक ‘एजिथ्रोमाइसिन’ को अन्य दवाओं के मुकाबले ज्यादा असरकारक माना गया है। इसके अलावा एड्स के इलाज में उपयोग होने वाली दवा को भी लाभकारी माना गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इन दवाओं के प्रभाव के विस्तृत परीक्षण शुरू कर दिए गए हैं तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा भी इन सात दवाओं में से दो दवाओं के प्रयोग की सलाह चिकित्सकों को दी गई है। दूसरी ओर चीन के विज्ञान एवं टैक्नोलॉजी मंत्रालय के अधिकारी झांग झिनमिन ने जापान में सामान्य फ्लू के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ‘फेवीपिरावीर’ नामक दवा को कोरोना से निपटने में काफी हद तक कारगर माना है। उनका कहना है कि कोरोना वायरस से निपटने में अन्य दवाओं के मुकाबले यह दवा ज्यादा कारगर साबित हुई है। झिनमिन के मुताबिक कोरोना संक्रमित मरीजों पर इस दवा का प्रभाव अन्य दवाओं के मुकाबले ज्यादा तेजी से देखा गया। हालांकि जापान का कहना है कि कोरोना के गंभीर मरीजों में इस दवा का उतना असर नहीं है, जितना सामान्य मरीजों पर।

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