आतंक के खिलाफ दुनिया को संगठित होना होगा

-ललित गर्ग-

अफगानिस्तान को आतंकवाद के लिये इस्तेमाल किये जाने की घटनाओं को लेकर भारत और अमेरिका का चिन्तित होना स्वाभाविक है। हकीकत यह है कि अफगानिस्तान लंबे समय से आतंकी संगठनों एवं आतंकवादी गतिविधियों का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जो समूची दुनिया के लिये एक गंभीर खतरा है। अब अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद यह खतरा और बढ़ गया। यह खतरा सिर्फ भारत और अमेरिका के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात है। भारत के लिये यह अधिक चिन्ताजनक इसलिये है कि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल कश्मीर में आतंकवाद को उग्र करने में करेंगा। इसलिए दुनिया की बड़ी शक्तियों को मिल कर इससे निपटने की जरूरत है। आतंकवाद के खतरे को लेकर भारत और अमेरिका के बीच दो दिन की रणनीतिक स्तर की वार्ता में इस बात पर सहमति बनी कि आतंकी गतिविधियों पर लगाम के लिए अफगानिस्तान पर लगातार दबाव बनाया जाना बड़ी आवश्यकता है।
अफगानिस्तान में आतंक का नंगा नाच होने लगा है, हो रहा है। वहां अराजकता एवं बर्बरता की कालिमा छा गयी है, अब वहां मजहब के चश्मे से विभिन्न देशों के साथ अपने संबंध तय करने की कोशिशें होने लगी है, महिलायें-बच्चे तालिबानी क्रूरता के शिकार हो रहे हैं, इन विडम्बनापूर्ण स्थितियों के आभास मात्र से  भारतीय ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों के लोग भी चिन्तित हैं। भारत की चिन्ता इसलिये बड़ी है कि अफगानिस्तान की जमीन का उपयोग अब कश्मीर को अशांत एवं आतंकित करने में होगा। भारत को अधिक सावधान एव सतर्क होने की जरूरत है। आतंकवाद के खतरे की संभावनाओं को देखते हुए भारत ने अफगानिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत ने अफगानिस्तान से साफ कहा है कि उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए न होने दे। साथ ही, अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई भी करे। दरअसल, आतंकवाद को लेकर भारत की चिंता बेवजह नहीं हैं। भारत ने लंबे समय से आतंकवाद के खतरे को झेला है एवं कश्मीर की मनोरम वादियां सहित भारत के भीतरी हिस्सों ने तीन दशक से भी ज्यादा समय तक सीमा पार आतंकवाद झेला है।
मानवता की रक्षा एवं आतंकवाद मुक्त अफगानिस्तान की संरचना की कोशिश होनी चाहिए। यह इसलिये अपेक्षित है कि अफगानी युवाओं को बंदूकों के सहारे ही जिंदगी न काटनी पडे़। महिलाओं की तौहीन एवं अस्मत न लुटी जाये। अफगानिस्तान दुनिया में नफरत और हिंसा बढ़ाने की वजह न बने। कुल मिलाकर, मानवीयता, उदारता और समझ की खिड़की खुली रहनी चाहिए, ताकि इंसानियत शर्मसार न हो, इसके लिये समूची दुनिया को व्यापक प्रयत्न करने होंगे। इसके साथ अफगानिस्तान की ऐसी शक्तियां जो आतंकवाद के खिलाफ है, उनको भी सक्रिय होना होगा। क्योंकि उनकी जमीन को कलंकित एवं शर्मसार करने का षडयंत्र हो रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ही यह आशंका बढ़ती जा रही है कि यह मुल्क अब आतंकियों का गढ़ बन जाएगा। ये आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं। तालिबान का उदय एक मजहबी संगठन के तौर पर हुआ था, लेकिन इसकी बुनियाद तो आतंकी संगठनों पर ही टिकी है। अमेरिका तो तालिबान को आतंकी संगठन कहता भी है। दो दशक पहले भी जब अफगानिस्तान में तालिबान का राज कायम हुआ था, तो इसके पीछे अलकायदा की ताकत थी। तालिबान भारत-विरोधी है, पाकिस्तान अपने मनसूंबों को पूरा करने के लिये तालिबान की इस विरोधी मानसिकता का उपयोग करते हुए अफगानिस्तान की भूमि से भारत पर निशाने साधेगा। तालिबान ने विगत दशकों में एकाधिक आतंकी हमले सीधे भारतीय दूतावास पर किए हैं। कंधार विमान अपहरण के समय तालिबान की भूमिका भारत देख चुका है। इन स्थितियों को देखते हुए आतंकवाद को पनपने की आशंकाएं बेबुनियाद नहीं है। बड़ा प्रश्न है कि क्या दुनिया के आतंकवादियों को अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकाना मिल जाएगा? क्या ये पैसे लेकर सभ्य देशों को परेशान करने और निशाना बनाने का ही काम करेंगे? जो देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तालिबान की पीठ पीछे खड़े हैं, उनकी भी मानवीय जिम्मेदारी बनती है कि वे दुनिया को अशांति, हिंसा, साम्प्रदायिक कट्टरता एवं आतंकवाद की ओर अग्रसर करने वाली इस कालिमा को धोये।
इस बार आतंकवाद के अधिक उग्र एवं घातक होने आशंका इसलिये भी है कि तालिबान लड़ाकों के साथ अलकायदा, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे कई आतंकी संगठन हैं। पाकिस्तान ने तालिबान की जड़ें जमाने के लिए कितने आतंकी तैयार किए और अफगानिस्तान भेजे, यह जगजाहिर है। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान अब भी पूरी तरह से तालिबान के साथ खड़ा है, सहयोग कर रहा है। बल्कि अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार एक तरह से पाकिस्तान की ही सरकार है। हैरत की बात यह कि जिस हक्कानी नेटवर्क ने मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी को अमेरिका ने बड़ा इनामी आतंकी घोषित कर रखा है, वही अफगानिस्तान का गृहमंत्री है। ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जाए की जाए कि तालिबान अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा?
अफगान में हिंसा, आतंक, स्वार्थ, साम्प्रदायिकता, व्यभिचार, शोषण और क्रूरता आदि के दंश मानवता को मूर्च्छित कर रहे हैं एवं आतंकवाद की जमीन को उर्वरा बना रहे हैं। इस मूर्च्छा को तोड़ने के लिए एवं जटिल-आतंकग्रस्त होती विश्व-संरचना को मोड़ देना होगा। इसके लिये न केवल अफगानिस्तान-तालिबान बल्कि पाकिस्तान पर दबाव बनाना होगा। हमने तालिबानियों को इतने संवेदनशून्य होते हुए देखा हैं कि उन्हें औरों का दुःख-दर्द, अभाव, पीड़ा, औरों की आहें कहीं भी पिघलाती नहीं। वहां निर्दोष लोगों की हत्याएं, हिंसक वारदातें, आतंकी हमले, अपहरण, जिन्दा जला देने की रक्तरंजित सूचनाएं, महिलाओं के साथ व्यभिचार-बलात्कार की वारदातें पढ़ते-देखते रहे हैं, पर तालिबानियों का मन इतना आतंकी बन गया कि यूं लगता है कि यह सब तो रोजमर्रा का काम है। न आंखों में आंसू छलकें, न पीड़ित मानवता के साथ सहानुभूति जुड़ी। न सहयोग की भावना जागी और न नृशंस क्रूरता पर खून खौला। दुनिया की बड़ी शक्तियां सिर्फ स्वयं के वर्चस्व को स्थापित करने की चिन्ता करती रही है। तभी औरों का शोषण करते हुए नहीं सकुचाते। दुनिया में संवेदना को जगाना होगा।
दुनिया में मानवीयता, अहिंसा, शांति और सह-अस्तित्व का मूल्य बढ़ाना होगा तथा सहयोग एवं संवेदना की पृष्ठभूमि पर स्वस्थ विश्व-संरचना की परिकल्पना को आकार देना होगा। दूसरों के अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता मानवता का आधार तत्व है। जब तक व्यक्ति अपने अस्तित्व की तरह दूसरे के अस्तित्व को अपनी सहमति नहीं देगा, तब तक वह उसके प्रति संवेदनशील नहीं बन पाएगा। जिस देश और संस्कृति में संवेदनशीलता का स्रोत सूख जाता है, वहाँ मानवीय रिश्तों में लिजलिजापन आने लगता है। अपने अंग-प्रत्यंग पर कहीं प्रहार होता है तो आत्मा आहत होती है। किंतु दूसरों के साथ ऐसी घटना घटित होने पर मन का एक कोना भी प्रभावित नहीं होता, यह संवेदनहीनता की निष्पत्ति है। इस संवेदनहीन मन की एक वजह सह-अस्तित्व का अभाव एवं कट्टर मजहबी भावना भी है। यह संवेदनहीनता ही है कि पाकिस्तान दिनोंदिन बद से बदतर होती अपने देश की स्थितियों के बादजूद आतंकवाद को पोषित एवं पल्लवित करने में अपनी शक्तियों को उपयोग कर रहा है। अब पाकिस्तान तालिबानी अफगानिस्तान के माध्यम से भारत में भी अशांति एवं आतंक फैलाने की कुचेष्ठा करेगा, उससे भारत को सावधान रहने की जरूरत है।

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