दूसरी लहर से ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था की चिन्ता

-ललित गर्ग –

कोरोना महाव्याधि एवं प्रकोप की दूसरी लहर जन-जीवन के लिये बहुत घातक साबित हो रही है और इसका न केवल स्वास्थ्य, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन पर बल्कि अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ रहा है। जीवन पर अनेक तरह के अंधेरे व्याप्त हुए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावित बाजार हुआ, बाजार के सन्नाटे ने अर्थव्यवस्था को चैपट किया। बाजार में मांग, खपत, उत्पादन, निवेश जैसे अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हिल गये हैं। अर्थव्यवस्था पटरी पर कब लौटेगी, यह अनिश्चिय में है। पूरी तरह से लॉकडाउन नहीं लगा है, फिर भी असंगठित क्षेत्र की कंपनियों पर कुछ ज्यादा ही असर पड़ रहा है। ऑटोमोबाइल व अन्य कुछ क्षेत्रों में अनेक छोटी कंपनियों ने अपने काम बंद कर दिए हैं। असर सभी पर है, लेकिन असंगठित क्षेत्र पर ज्यादा है और इसीलिए पलायन भी दिख रहा है। पिछले साल मार्च में देश में संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दूसरी लहर पर जोर देकर कहा कि देश को लॉकडाउन से बचाना जरूरी है, संभवतः वे भविष्य मंे संभावित आर्थिक परिदृश्यों की स्थितियों को देखकर ही ऐसा कहा था। उनके ऐसा कहने के पीछे ठोस वजहें हैं, मार्च 2020 से अप्रैल 2021 के तेरह महीनों में कोविड संक्रमण की वजह से पूरा देश भारी मुश्किलों और चुनौतियों के दौर से गुजरा है। लॉकडाउन के बाद अनलॉक की प्रक्रिया शुरू करके देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशें की गईं। लेकिन दूसरी लहर ने उन कोशिशों पर पानी फेर दिया।
अप्रैल-2021 में कोरोना वायरस की दूसरी भयावह लहर के कारण न केवल इस पटरी पर लौट रही अर्थव्यवस्था पर ब्रेक लगा है बल्कि रेटिंग एजेंसियों ने अपनी भविष्यवाणी में बदलाव करते हुए भारत की विकास दर को दो प्रतिशत घटा दिया है। निश्चित ही पहली एवं दूसरी लहर के बीच के छह महीने में आए आर्थिक उछाल पर पानी फिर गया है। पिछले दो माह में राज्य सरकारें लगभग रोज नए प्रतिबंधों की घोषणाएं करती रही हैं तो अर्थव्यवस्था के विकास में बाधाएं आना स्वाभाविक है। बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई के बढ़ने के पूरे संकेत मिल रहे हैं, उत्पाद अवरुद्ध हुआ और मजदूरों का बड़े शहरों से पलायन जारी है। इस बार अस्तव्यस्त होती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने एवं जनजीवन की आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिये सरकार ने किसी तरह के आर्थिक पैकेज नहीं दिये गये हंै। इसका असर ये होगा कि अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी, उत्पादन कम होगा और उपभोग नीचे जाएगा। अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर दूसरी लहर का असर पड़ेगा, चाहे वो ऑटो सेक्टर हो, या रियल एस्टेट, या बैंकिंग, एयरलाइंस, पर्यटन या फिर मनोरंजन।
‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ के आंकड़ों से पता चलता है कि 31 मार्च तक बेरोजगारी 6.5 प्रतिशत थी, यह 18 अप्रैल तक 8.4 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसके अलावा, कई ऐसे प्रभाव होंगे जिसे आसानी से मापा नहीं जा सकता, सरकार के कर संग्रह में कमी आएगी। कंपनियां नुकसान कम करने के लिए खर्च को कम करेंगी या चीजों के दाम बढ़ाएँगीं, यह अनिश्चिय में हैं। दिल्ली और मुंबई में लॉकडाउन लगाए जाने के बाद से इन शहरों से मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। बड़ी संख्या में मजदूर अपने घरों को लौट गए हैं। इससे खुदरा व्यापार, कंस्ट्रक्शन के कामों, मॉल और दुकानों पर फर्क पड़ना स्वाभाविक है। उदाहरण के तौर पर शॉपिंग सेंटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने एक बयान में कहा है कि देश भर के मॉल अपने व्यवसाय का 90 प्रतिशत तक दोबारा हासिल चुके थे, लेकिन अप्रैल-2021 के बाद से एक बार फिर स्थिति बदलने लगी है। उद्योग प्रति माह राजस्व में 15 हजार करोड़ रुपये कमा रहा था, लेकिन स्थानीय प्रतिबंधों के साथ लगभग 50 प्रतिशत राजस्व में गिरावट आई है। महाराष्ट्र में सरकारी प्रबंधों के कारण वाहनों के कारखानों में उत्पादन 50-60 प्रतिशत कम हो गया है। देश में वाहनों का सबसे अधिक प्रोडक्शन महाराष्ट्र में है। इकनोमिक टाइम्स अखबार के मुताबिक वाहन उत्पादन में इस कमी से रोजाना 100 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हो रहा है।
रियल एस्टेट पहले से ही संकट में है लेकिन इसका संकट और बढ़ गया है। रियल एस्टेट की एक कंसल्टिंग कंपनी कुशमैन एंड वेकफील्ड के अनुसार इस साल जनवरी से मार्च तक किराए पर दिए गए ऑफिस स्पेस का कारोबार 48 प्रतिशत घटा है। सर्विसेज उद्योग और पर्यटन क्षेत्र को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई देशों ने अपने नागरिकों को भारत जाने से बचने की सलाह दी है जबकि घरेलू पर्यटन भी कोरोना के डर से घटने लगा है। कहा जा रहा है कि कोरोना की पहली लहर के लपेट में सबसे अधिक आने वाले हॉस्पिटैलिटी, पर्यटन और एयरलाइंस पर दूसरी लहर का भी सबसे बुरा असर पड़ रहा है। 90 प्रतिशत रेस्टोरेंट बंद है। हॉस्पिटैलिटी उद्योग में पिछले साल से अब तक अगर किसी की कमाई बढ़ी है तो वो घर पर खाना डिलिवर करने वाले लोग हैं। इनमें जोमैटो और स्विगी सब से आगे हैं।
आम तौर से उद्योग जगत पूर्ण लॉकडाउन के खिलाफ रहा है लेकिन महाराष्ट्र और दिल्ली की सरकारों के पास कोरोना की रोकथाम के लिए लॉकडाउन का सहारा लेना पड़ा, हालाँकि ये लॉकडाउन पिछले साल की तरह सख्त नहीं हैं। कई और राज्य सरकारें अब इस उधेड़बुन में हैं कि जान और जहान, दोनों को मिल रही चुनौती के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस संतुलन के साथ अर्थव्यवस्था का नियोजित करना भी जरूरी है। भारतीय रिजर्व बैंक ऋण के मोर्चे पर कोशिश कर रहा है कि असंगठित क्षेत्र को कारोबार जारी रखने के लिए पैसा मिले, जिससे असंगठित क्षेत्र की इकाइयों की स्थिति और न बिगडे़। जो छोटे कारोबारी होते हैं, उनके पास पूंजी बहुत कम होती है और वह जल्दी खत्म हो जाती है। जब ऐसी इकाइयों में काम बंद होता है, तब इनके लिए खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसी कंपनियों को फिर शुरू करना भी कठिन होता है। इसीलिए छोटे कारोबारियों को पैकेज दिया गया है कि वे बैंक से ऋण ले सकें, लेकिन इससे स्थिति नहीं सुधरेगी।
अर्थ-व्यवस्था की चिन्ता में हम कोरोना संक्रमण बढ़ने के कारण से आंख भी नहीं मूंद सकते। मामले बढ़ते ही इसलिए हैं कि लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। जब लॉकडाउन लगा दिया जाता है, तब दो सप्ताह बाद मामले घटने लगते हैं। हमारे यहां फरवरी में दूसरी लहर शुरू हो गई थी, तीन महीने होने जा रहे हैं। लॉकडाउन न लगाने का खामियाजा यह है कि हमारे यहां रिकॉर्ड संख्या में मामले बढ़े हैं और लोगों की जान भी जा रही है। एक दिक्कत यह भी है कि आंकड़े पूरे आते नहीं हैं या उपलब्ध नहीं कराए जाते। आज चिकित्सा व्यवस्था को बहुत तेजी से सुधारने की जरूरत है। इसके लिए भी रिजर्व बैंक ने एक पैकेज दिया है। मेडिकल ढांचा विकसित करने के लिए विशेष ऋण की जरूरत पड़ेगी, उसे इस विशेष पैकेज के जरिए मुहैया कराया जाएगा। अभी विदेश से काफी सहायता आ रही है, जैसे कोई दवा दे रहा है, तो कोई ऑक्सीजन टैंक दे रहा है। तीसरी लहर एवं भविष्य की चिन्ताआंे को देखते हुए चिकित्सा क्षेत्र में आयात बढ़ाने के लिए हमें अपनी कोशिशों का विस्तार करना चाहिए। रिजर्व बैंक ने जो पैकेज घोषित किया है, वह अच्छा है, लेकिन तत्काल उससे फायदा नहीं होगा। सेना और आयात, दोनों से मदद लेनी पड़ेगी।
संक्रमण गांव-गांव पहुंच गया है, नदियों में लाशें गांवों से ही आ रही है। गांवों में चिकित्सा ढांचा मजबूत करना होगा। यह साल खतरे से खाली नहीं है। अब सरकार को आगे आकर इसमें जहां-जहां काम रुक गया, बेरोजगारी बढ़ी है, वहां-वहां मदद करनी चाहिए। गरीब लोगों को इस वक्त मदद की बहुत जरूरत है। मुफ्त अनाज, इलाज एवं जीवन निर्वाह के अन्य साधन जरूरी है। लोगों की हताशा-निराशा को दूर करने के लिए केन्द्र सरकार को ही कदम उठाने पड़ेंगे।

Leave a Reply

34 queries in 0.495
%d bloggers like this: