200 साल रहा था देवगिरि के यादवों का साम्राज्य

ऐतिहासिक दृष्टि से मध्यप्रदेश ओर उसकी संस्कृति का प्राचीन इतिहास कम देखने को मिलता है। भूगोल एवं मानस शास्त्र के अनुसार मध्यभारत का यह मध्यप्रदेश प्रांत देश के मध्य मे होने से भारत का कटिबन्ध रहा है जहा उत्तर ओर दक्षिण तथा पूर्व ओर पश्चिम का सम्मिलन स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश का इतिहास ओर संस्कृति इसके प्रचुर वनप्रदेशों के कारण उपेक्षित रही है ओर गोंड- भील राजाओं का इन वनप्रदेशों में एकाधिकार देखने को मिलता है। इस प्रदेश की जनता तितरी-वितरी ओर वैभवशून्य रही है। मध्यभारत के देवगिर के राजा रामचन्द्र यादव का साम्राज्य ओर उनके राज्य में उनके द्वारा चलाये गए सोने के सिक्के का जलबा दिल्ली के मुगल शासकों की नींद उड़ाये था ओर वे दक्षिण प्रान्तों में फैले यादवों का साम्राज्य हड़पने के षडयंत्रों मे जुट गए ओर अंततः मुसलमानों 1312 ईस्वी में यादवकुल का गौरवहीन अंत हुआ जब राजा शंकर यादव ने दिल्ली के मुगल शासक की अधीनस्थता को स्वीकार न कर उनके खिलाफ विद्रोह का विगुल बजाया तब मलिक काफ़ुर ने राजा शंकर यादव को हराकर उनकी ह्त्या कर दी ओर उनके बाद राजा रामचंद्र के जामाता हरपाल ने मुसलमान शासक मलिक काफ़ुर के खिलाफ विद्रोह का झण्डा उठाने का प्रयास किया तब राजा हरपाल का विद्रोह दमन कर सुल्तान मुबारक के आज्ञा से हिन्दू राजाओं में अपनी दहशत को कायम रखने के लिए राजा हरपाल की सरेआम सभी के सामने उनके जीते जी उनकी शरीर से खाल खींचने की क्रूरतम सजा देकर उनकी हत्या की गयी ।  

इतिहासकारों का मानना है कि मान्यखेट के राष्ट्रकूट तथा कल्याण के पश्चिमी चालुक्यों के पतन के बाद यादवों का उत्कर्ष हुआ ओर राजकुल के राजा भिल्लम पंचम यादव ने चालुक्यों की शक्ति को कमजोर ओर दयनीय स्थिति में पहुचा कर उसका लाभ लिया  ओर सोमेश्वर चतुर्थ के हाथों से कृष्णा नदी के उत्तर के प्रांत जीते ओर  अपनी राजधानी देवगिरि (हैदराबाद रियासत में आज का दौलताबाद)  में स्थापित कर राज्य की सीमाओं का विस्तार करने में सफल रहा। ओर 1191 ईस्वी में लक्कुण्डी (धारवाड जिला) वीर वल्लाल प्रथम को परास्त कर जीता। भिल्लम के उत्तराधिकारी उसका ज्येष्ठ पुत्र जैतुगी जैत्रपाल हौआ जिसने युद्ध में तैलंगों के राजा रुद्रदेव को मारकर काकतीय राज्य कि बागडोर अपने भतीजे गणपती को बैठाया।  जैतुकी प्रथम का पुत्र सिंघण बना जो देवगिरि का प्रसिद्ध राजा कहलाया ओर अपने राज्य के विस्तार के लिए राजा वीरभोज को हराकर पन्हल के दुर्ग पर कब्जा कर कोल्हापुर ओर शिलाहार प्रदेश को अपने राज्य में शामिल किया। मध्यभारत में अपने राज्य का विस्तार करने के लिए राजा सिंघण यादव ने मालवा के अर्जुनवर्मन ओर छत्तीसगढ़ के चेदिरजा जाजल्ल को हराया तथा गुजरात तक दो बार आक्रमण कर यादव साम्राज्य की सीमाओ को फैलाया।  देव गिरि का प्रसिद्ध यादव राजा हेमाद्रि का कार्यकाल ईस्वी 1098 से ईस्वी 1133 तक रहा 1133 से  प्रसिद्ध यादव राजा सिंघण ने 1177 ईस्वी तक शासन किया। 

सिंघण के बाद उसका पौत्र राजा कृष्ण यादव ने 1177 ईस्वी से शक 1222  तक राज्य किया। कृष्ण यादव ने अपने राज्य का विस्तार करने के लिए मालवा, कोंकण ओर गुजरात के राजाओं से घोर संग्राम किया किन्तु उनकी म्रत्यु होने पर उनके भाई महदेव यादव ने शासन संभाला। उसके बाद राजा रामचंद यादव का कार्यकाल ईस्वी 1271  से 1309  तक राज्य संभाला ओर इनके राज्य में  इनके द्वारा सोने के सिक्के चलाये जाने का इतिहास भी मिलता है। उस समय पूरे भारत में अनेक राजाओ के साथ यादव राज्य भी मुस्लिम राजाओं के साथ आपसी रंजिस के रहते जीत लिए गए, अलाउद्दीन खिलजी  दक्षिण के राज्यों की विजय पर निकला तब 1294 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि को चारों ओर से घेरकर राजा रामचन्द्र को बंदी बना लियाओर दिल्ली की शर्तों के तहत राज्य करने को राजी कर मुक्त कर दिया, राजा रामचन्द्र ने दिल्ली दरवार कि कोई शर्त नहीं स्वीकार कि तब अलाउद्दीन खिलजी नाराज हो गया ओर उन्हे दंड देने कि खबर भेजी।  इस बीच ईस्वी 1299 में रणथंबोर का किला राजपूतों ने जीत लिया इस पर रामचन्द्र ने एक बड़ी फौज तैयार कर ईस्वी 1303 में भयंकर युद्ध लड़कर रणथंभोर को वापिस जीत कर मांडू, उज्जैन ओर चँदेरी के के राजाओ को ईस्वी 1305 में परास्त कर दक्षिण की ओर कूच कर गया। देवगिरि के राजाओं ने सेकड़ों मंदिर, अनेक धर्मशालाए,मठों के अलावा अनेक भव्य भवन बनाए थे जो स्थापत्य कला के सर्वोत्तम उदाहरण है।  

दक्षिण भारत में उस समय पाँच शक्तिशाली राज्य थे जिसमें देवगिर के यादव का राज्य ईस्वी 1098  से 1309 तक रहा। दूसरा राज्य काकतीय वंश था जो तेलंगाना के शेष भाग से बरंगल तक था ओर बरंगल उसकी राजधानी थी जिसका राजा प्रतापरुद्रदेव था। तीसरा राज्य पश्चिमी चालुक्य, चौथा विक्रमादित्य एवं पांचवा राज्य लिंगायत संप्रदाय के राजा विजज्ल का शासन था।  यहा इतिहासकर ईश्वरी प्रसाद ने उल्लेख किया है कि सिंघण के पोते राजा रामचन्द्र को 1294 ईस्वी व अलाउद्दीन खिलजी द्वारा पराजित कर राज्य पर अपना अधिकार कर लिया, खिलजी को हराकर मलिक काफ़ुर ने राज्य पर भारी कर/टेक्स लेना शुरू किया वही राजा रामचंद कि मृत्यु हो जाने पर उनके बेटे शंकरदेव यादव के उत्तराधिकारी होने पर मुगल शासक ओर उसकी सैना को हराया ओर फिर देवगिरि कि सत्ता पर काबिज हो गया।

 प्रागेतिहासिक काल में जो विदर्भ राज्य था जो आज बरार कहलाता है का राजा भीष्मक था जिनकी पुत्री रुक्मणी से कृष्ण का विवाह हुआ था। भीष्मक की राजधानी कौड़िन्यपुर थी जो आज भी अमरांवती में है। प्राचीन इतिहास की रश्मिया संकेत करती है कि महाभारत के समय आधी से अधिक धरती पर यादवों का शासन रहा है। राजा यदु की संतानों ने आर्यावर्त जिसे भरत का देश कहते थे पर सेकड़ों वर्ष राज्य किया है। इतिहासकारों ने यादव राजाओं का इतिहास लेखन पर ज्यादा ध्यान नही दिया तभी भारत का प्राचीन इतिहास ई-पू- 3500 के लगभग से शुरू माना गया है जबकि इसके पूर्व भी हमारा देश आबाद था । प्राचीन ताम्रपत्र, शिलालेख एव ग्रन्थों में कृष्ण के वंशज राजा वज्र (वज्रनाभ) द्वारा इंद्रप्रस्थ के स्थान पर मथुरा को राजधानी बनाने का उल्लेख मिलता  है। वज्र का पुत्र प्रतिबाहु तथा प्रतिबाहु का पुत्र सुबाहु प्रसिद्ध यादव शासक रहे है। इनके वंशजों के मथुरा के बाद बयाना, कामां,तिमनगढ़ करौली आदि राज्य स्थापित कर दक्षिण भारत में अनेक राज्यों की स्थापना की। देवगिरि के राजाओं का वर्णन किया है। देवगिरि आज दौलताबाद के नाम से जाना जाता है जो हिंदुस्तान के बड़े भाग में फैला हुआ था।

 किसी भी देश का इतिहास वहाँ के निवासियों ओर भूमि का वास्तविक आधार माना गया है ऐसे ही यादवों के इतिहास का गौरवशाली पक्ष देखने को मिलता है। जहां एक ओर राजा ययाति के पुत्र यदु की संतानों के द्वारा मध्यभारत जो मध्यप्रदेश की सीमाओं ओर उसके आसपास का है में देखने को मिलता है कि यदु का पुत्र सहस्त्रद ओर सहस्त्रद के पुत्र हैहय ने नर्मदा के तट पर अपने राज्य स्थापित किये । हैहय का पुत्र धर्मनेत्र बड़ा प्रतापी था जिसके पौत्र कीर्ति ओर कान्त थे। कीर्ति का पुत्र भद्रसेन ओर उसका पुत्र दुर्मद था । दुर्मद का पुत्र कनक जिनके कृतवीर्य, कृतौजा,कृतवर्मा ओर कृताग्नि चार पुत्र थे। कृतवीर्य का पुत्र कार्तवीर सहस्त्रबाहु था , जिसका उल्लेख शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों में ईस्वी स0 575 में किया गया है। इसी हैहयवंश से कौकल्लदेव नमक चेदीदेश का प्रबल राजा हुआ जिसके वंशज आगे कलचूरी कहलाते है ।

इतिहास खँगालने पर देवगिरि के यादवों का इतिहास डॉ॰ मोरेश्वर गं दीक्षित ने पुरातत्व के रूपरेखा में अन्य राजाओं के साथ उल्लेख किया है वही राय बहादुर डाक्टर हीरालाल द्वारा मध्यभारत के इतिहास में इसे समाहित किया है। मध्यप्रदेश की दक्षिणो सीमा पार उनकेस्वर में यादव साम्राज्य का पहला लेख शक संवत 1222 का मिला है  जिसमे वाशी टाकली के एक मंदिर निर्माण का उल्लेख किया गया है वही मराठी भाषा के दूसरे शिलालेख जो नांदगाव में मिला उसमे यादव राजा द्वारा विशेष मंदिर में पुष्पादि, अर्चना सामग्री व्यय के दान का प्रमाण है। रामटेक के शिलालेख में कई निकटस्थ पवित्र स्थानों, जिन्हे तीर्थ के नाम से लेखांकित किया है महाराज रामचंद यादव द्वारा किए जनकल्याण के कार्यों का उल्लेख है। हैदराबाद राज्य के आंबे नामक ग्राम में एक शिलालेख मिला जो बताता है की राजा रामचंद यादव ने अचलपुर में विष्णु मंदिर बनवाया तथा पायोष्णि (पूर्णा ) नदी के तट पर उनके सेनापति ने अपने ही नाम पर एक नगर  खोलापुर  बनवाया ओर इसी क्रम में वरदा नदी के तट पर कतिपय मंदिरों, कूपों, तालाबों का निर्माण कराया।  

       शिलालेखों में यादव साम्राज्य

       यादवों का इतिहास ग्रंथ रूप में नहीं है किन्तु कतिपय विवरण शिलालेखों , ताम्रपत्रों ओर तत्कालीन ग्रन्थों में देखने को मिलता है। बंबई गजेटियर में भांडारकर ओर फ्लीट द्वारा सर्वोत्तम विवरण मिलता है। देवगिरि के यादव शासकों का साम्राज्य ईसा की ग्यारवी- बारहवी शताब्दी में मध्य के विदर्भ में फैला हुआ था। हेमाद्रि का बार्शी टाकली लेख,शक 1098  से पता चलता है की वारंगल के काकताय राजाओ को परास्त करने के बाद सिंघण ओर रामचंद यादव का शासन उत्तर की ओर विदर्भ में फैला है ओर उन्होने कई विरासतों पर आधिपत्य किया हुआ है। अमड़ापुर में सिंघण के शिलालेख के अनुसार शक 1133 तक राज्य करने का जिक्र है। यादव कृष्ण के काल का  नंदगांव शिलालेख शक 1177 शासन करने का प्रमाण है वही रामटेक शिलालेख  में शक 1222 मे रामचंद यादव का उल्लेख है वही काटा शिलालेख एवं लाज्जी शिलालेख जो लांजी के एक मंदिर के खंबे पर अंकित मिला के अनुसार ईस्वी 1226 में राजा रामचन्द्र यादव के आधिपत्य की बात कही गई है। इसकी पुष्टि एक अन्य लेख जो मध्यप्रदेश के पश्चिमी सीमा पर पांढरकवढ़ा यवतमाल के पास मिले शिलालेख से भी होती है। यादवकालीन अन्य शिलालेख की जानकारी इतिहासकर हीरालाल ने सूचीबद्ध की है जिसके अनुसार यादवों के साम्राज्य के शिलालेखों में ठाणेगांव शक 1145 का शिलालेख, कोरंबी भंडारा शिलालेख, सिरपुर वाशिम शक 1334 का शिलालेख,सातगांव बुलढाणा जैनमूर्ति लेख शक 1173, मार्कण्ड चांदा मराठी भाषा में मिलता है।   

       यादव राजाओ के निर्मित मंदिरों ओर स्मारकों की सूची –

बंबई के गजेटियर, कशिन्स की सूची तथा पुरातत्व सर्वे की रिपोर्ट पर यादवकालीन हेमांडप्ंति के नाम से विख्यात 21 संरक्षित स्मारक ओर 71 मंदिरों का निर्माण किया गया जो कुल 92 निर्माण की जानकारी का इतिहास में अंकन देखने को मिलता है। जो भी मंदिर यादव राजाओं ने बनाए है उनमें अधिकांश शिव मूर्ति, देवी मूर्ति ओर बिष्णु मूर्ति देखने को मिलती है । मंदिर बनाते समय बड़ी बड़ी शिलाओ को काट छांट कर सुडौल प्रस्तरखंडों को एक दूसरे पर रखकर आकर्षक रूप दिया है जिनमे चूने का जोड़ इस्तेमाल नही किया गया है। मंदिरों के भीतरी छतों पर उभरी हुई कलाकृति कमलाकर आकार में है ओर खंबे वर्गाकार है।  वे उनकी दूरी जिला मुख्यालय से 35-40 किलोमीटर के अंदर है-  

       नागपुर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर के सीमाओं में जिन स्थानों पर मंदिर बनाए है वे क्रमश अदासा,अंभोरा, भूगांव जाखपुर कंदल, कैलोध पारसिवनी,साबनेर है जबकि रामटेक में स्मारक बनवाया गया जो पुरातत्व द्वारा संरक्षित है।  वर्धा जिले में पोहना,तलेगांव एवं ठाणेगांव है। चांदा जिले में आमगांव,चांदपुर,खरवर्द, वागनाक,येड्डा में देवालयों बनाए वही भोजेगांव, चुरुल,घोसरी,महावाड़ी, मारोती, पालेवारस एवं नालेश्वर में स्मारकों का निर्माण किया गया। भंडारा जिले में जहा देवालय बनाए गए वे अड्धार, चकाहेटी, गणेशतोला, कोरंबी,पिगलाई , बालाघाट जिले में भीर, अनसिंग,गोरेगांव, कुटासा,महेशपुर, निरट, पाग्रा,पाटखेड़,पिंजर,सिंदखेड़ एवं व्याला ग्राम शामिल है वही इस जिले के वार्शीटाकली एवं सिरपुर का स्मारक देखा जा सकता है। अमरावती जिले में लासुर बुलढाणा जिले में अमड़ापुर, अंजनी,अत्री, ब्रम्ह्पुरी,चिखली, चिचखेड़,देउलघाट, दूधा, गिरोली, महसाले, नाद्रे, सायखेड़ा, बडाली,मढ़, मासरुल,सेंदुरजना,सोनरी, वरबंड ,गीर्दा सोनटी में विभिन्न देवालय तथा सिंधखेड, मेहेकर, साकेगांव,लोणार, कोठाली धोत्रा में स्मारक बनवाए है जो संरक्षित है। इसी शृंखला में यवतमाल के लोहारा, पाथरोट ओर तपोना ओर नेर  के स्मारकों को पुरातत्व ने संरक्षित किया है वही झाडगांव, यवतमाल,वरुड, वाई, सोनेवरोना, पांडरदेवी, लारखेड़,लाक,कुहाड़,केलापुर, कलमनेर, जुगड़,जबलगांव,दूधगाँव,दाभाड़ी, पोफली ओर पुसद के देवस्थान की सूची उपलब्ध है। इतिहासकार हीरालाल इसे अपूर्ण सूची मानते है ओर उनका मानना है की कई देवालय का समय तथा स्थापत ओर उसके निश्चित स्वरूप को नही बतलाया गया है।

       यादव सिक्के

       इतिहासकारों ने सरकारी माणक सूची में चित्रफ़लक 13 क्रमांक 49 में उल्लेख किया है कि देवगिरि के यादवों के शासन काल में उनके द्वारा सोने के बनाए सिक्के का प्रचलन था। क्लम्ब यवतमाल के पूर्व मे 16 मील पर राजा सिंघण राजा महादेव यादव तथा रामचन्द्र यादव के 38 स्वर्ण टंकित सिक्के का संचय 1950-51 में किया गया जो हैदराबाद एवं बंबई के संग्रहालय में है।

       विदर्भ में यादव शासकों के द्वारा हेमांडप्ंती मंदिरों का जो उल्लेख है तथा उनके शासन में सोने के सिक्के चलने का प्रमाण मिलता है उससे यादव राज्यों की वैभवता ही झलकती है। यादव साम्राज्य अकोला, बुलढाणा, यवतमाल, वर्धा, वाशिम, नागपुर, भंडारा से तेलंगाना हैदराबाद तक विस्तार से फैला हुआ था। नर्मदा के उसपर छत्तीसगढ़ में यादवों के साम्राज्य का उल्लेख नही है किन्तु हेमांडप्ंती मंदिरों का उल्लेख बालाघाट, लांजी तथा मीर में होना से जान पड़ता है की ये दो सीमांत स्थान यादव शासकों का हिस्सा रहे होंगे। व उनके विशेष धर्म कर्म के साथ कला के प्रति समर्पण का उदाहरण है

                                                              आत्माराम यादव पीव

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