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    Homeसाहित्‍यलेखभारत और भारतवासियों की अपराजेय दृढ़ता, जीवटता एवं संघर्षशीलता का वर्ष- 2020

    भारत और भारतवासियों की अपराजेय दृढ़ता, जीवटता एवं संघर्षशीलता का वर्ष- 2020

    प्रणय कुमार
    प्रकृति अपने ढंग से संतुलन साधती है और निरंकुश, स्वेच्छाचारी, भौतिकवादी सभ्यता को समय-समय पर सचेत करती हुई अविस्मरणीय सीख भी देती रहती है। और निश्चित ही कोविड-19 भी आकंठ भोग में डूबी मानव-जाति के लिए भयावह चेतावनी है। निःसंदेह संपूर्ण विश्व एवं मानव-समाज को अनियंत्रित भोग-लिप्सा एवं अतृप्त-उद्दाम आकांक्षाओं की पूर्त्ति के लिए प्रकृति के अंधाधुंध शोषण और पर्यावरण-प्रदूषण की बढ़ती प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा और प्रकृति-पर्यावरण के संरक्षण हेतु सार्थक एवं गंभीर पहल करने होंगें।
    2021 दरवाज़े पर दस्तक दे चुका है। बीते वर्ष का आकलन-विश्लेषण करने वाले बहुत-से विचारकों-विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2020 शताब्दियों में कभी-कभार फैलने वाली कोविड-19 जैसी महामारी और उसकी विनाशलीला के लिए याद किया जाएगा। पर यह सरलीकृत एवं एकपक्षीय निष्कर्ष है। समग्र एवं सकारात्मक निष्कर्ष तो यह है कि 2020 मनुष्य की अजेय जिजीविषा और दुर्लभ प्राणशक्ति के लिए याद किया जाएगा। यह याद किया जाएगा पारस्परिक सहयोग और समूहिक संकल्प-शक्ति के लिए, यह याद किया जाएगा बचाव एवं रोक-थाम में अपना सब कुछ झोंक देने वाले कोविड-योद्धाओं और उनके फ़ौलादी हौसलों के लिए, यह याद किया जाएगा मानवता के प्रति उनके त्याग, समर्पण और कर्त्तव्यपरायणता के लिए, यह याद किया जाएगा प्रकृति-पर्यावरण के प्रति संवेदनशील मानव के चिंतन और सरोकारों के लिए। 
    चुनौतियाँ हमारे जीवन में केवल व्यवधान ही नहीं डालतीं, अपितु वह हमारे वैयक्तिक एवं सामूहिक सामर्थ्य, सामाजिक एवं राष्ट्रीय चारित्र्य और संकल्प-शक्ति की परीक्षा भी लेती हैं। वह हमें उन आंतरिक शक्तियों की अनुभूति भी करा जाती हैं, जो किसी व्यक्ति-समाज-राष्ट्र के भीतर होती तो हैं पर सामान्य परिस्थितियों में हमें उनका भान नहीं रहता। मानव-जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता ही यह है कि वह प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निरंतर गतिशील रहता है। अपितु यह कहना चाहिए कि गति ही जीवन है, जड़ता व ठहराव ही मृत्यु है। विनाश और विध्वंस के मध्य भी सृजन और निर्माण कभी थमता नहीं। संपूर्ण चराचर गतिशील एवं सृजनधर्मा है। और मनुष्य की तो प्रधान विशेषता ही उसकी सक्रियता, संवेदनशीलता एवं सृजनधर्मिता है। उसे विषम एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में से मार्ग निकालना आता है। यों तो भारतीय जीवन-दृष्टि प्रकृति के साथ सहयोग, सामंजस्य एवं साहचर्य का भाव रखती आई है। पर यह भी सत्य है कि मनुष्य की अजेय जिजीविषा एवं सर्वव्यापक कालाग्नि के बीच सतत संघर्ष छिड़ा रहता है। जीर्ण और दुर्बल झड़ जाते हैं, परंतु वे सभी टिके, डटे और बचे रहते हैं जिनकी चेतना उर्ध्वगामी है, जिनकी प्राणशक्ति मज़बूत है, जो अपने भीतर से ही जीवन-रस खींचकर स्वयं को हर हाल में मज़बूत और सकारात्मक बनाए रखते हैं। और इस दृष्टि से भारत और भारत के अधिकांश लोगों ने विषम, प्रतिकूल एवं भयावह कोविड-काल में जैसा अभूतपूर्व धैर्य, संयम एवं साहस का परिचय दिया है, वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। जहाँ कोविड के संक्रामक प्रसार, दुष्प्रभावों  को लेकर कनाडा-अमेरिका जैसे विकसित देशों में लोग सड़कों पर तोड़-फोड़, आंदोलन-उपद्रव करते दिखाई दिए, तमाम पश्चिमी देशों की जनता अपनी ही सरकारों से क्षुब्ध और असंतुष्ट दिखी, वहीं आम भारतीय जनमानस का अपनी सरकार के साथ सहयोग एवं सामंजस्य का रवैया दिखा। वे सरकार की नीति, निर्णय, नीयत और प्रयासों से कमोवेश प्रसन्न या संतुष्ट दिखे। और सरकार ने भी किसी प्रकार की सुस्ती, पंगुता या निष्क्रियता का परिचय न देते हुए कोविड-19 के अप्रसार हेतु निरंतर सजग, सतर्क एवं सक्रिय रहते हुए सभी आवश्यक क़दम उठाए। संक्रमण के संदिग्धों का व्यापक पैमाने पर परीक्षण करवाया, उसके लिए नई-नई प्रयोगशालाओं की स्थापना की, संक्रमितों के आइसोलेशन के लिए स्थाई-अस्थाई कोविड-केंद्र खुलवाए, माँग एवं आवश्यकता के अनुपात में वेंटीलेटर्स-बेड्स, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा-किट्स आदि उपलब्ध करवाए, सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क लगाने, हाथ धोने, सैनेटाइजेशन आदि के लिए जागरुकता-अभियान चलाया, कोविड-काल में यात्रा करने वालों की विधिवत निगरानी रखी, उनसे संबंधित सभी ज़रूरी ब्यौरों को सहेजा-संभाला-साझा किया। इतना ही नहीं बल्कि इस अवधि में सरकार अन्य तमाम मोर्चों पर भी चुस्त-दुरुस्त एवं मुस्तैद दिखी। खाद्य-सुरक्षा, गरीब-कल्याण, किसान सम्मान-निधि, मनरेगा रोजगार सृजन, उज्ज्वला जैसी तमाम  जन कल्याणकारी योजनाओं ने सरकार की साख़ और लोकप्रियता को बनाए रखा। सरकार जनता के हितों एवं सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध एवं संवेदनशील दिखी।
    इस कोविड-काल में भारत के आम नागरिकों की भूमिका भी योद्धा जैसी ही रही। यह कोविड-काल ऐसे तमाम योद्धाओं का विशेष रूप से साक्षी रहा, जो समय के सशक्त एवं कुशल सारथी रहे। जिन्होंने अपना सलीब अपने ही कंधों पर उठाकर प्राणार्पण से मानवता की सेवा और रक्षा की। वे कर्त्तव्यपरायणता के ऐसे कीर्त्तिदीप रहे, जिन्होंने प्राणों को संकट में डालकर भी मनुष्यता का पथ प्रशस्त किया। इन अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं ने इस महामारी की चपेट से भारतीय जनजीवन को बचाए रखने में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रखी। उन्होंने सेवा परमो धर्मः को सही मायने में साकार कर दिखाया। शिक्षा, सेवा, कृषि, सुरक्षा, सफाई, स्वास्थ्य, यातायात, जनसंचार (मीडिया) जैसे तमाम क्षेत्रों में लड़ते-जूझते ये योद्धा सचमुच किसी महानायक से कम नहीं! उन्होंने एड़ी टिका, सीना तान, बुलंद हौसलों से उम्मीदों के सूरज को डूबने से बचा लिया। समय के इन सारथियों ने संपूर्ण तत्परता एवं कुशलता से अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह किया। एक ऐसे दौर में जबकि यह आम धारणा-सी बन या बना दी गई है कि समाज और तंत्र में अब ईमानदारी, सहयोग और कर्त्तव्यपरायणता नाम मात्र को ही शेष है, कोविड-काल में हमने पुलिस, पत्रकार, शिक्षक, चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मियों, सरकारी कर्मचारियों की कर्तव्य-निष्ठा एवं सेवा-भाव की ऐसी-ऐसी उजली-मनावीय-ईमानदार तस्वीरें देखीं, जो सहसा विस्मित करती हैं, भविष्य के प्रति उम्मीद जगाती हैं। कहते हैं कि बुरा-से-बुरा वक्त भी कुछ-न-कुछ अच्छा दे जाता है। कोविड ने भी डिजिटिलाइजेशन को गति एवं विस्तार दिया। हमने कागज़ रहित कार्यसंस्कृति एवं कैशलेस लेन-देन को आत्मसात किया। नवाचार को अधिक-से-अधिक बढ़ावा मिला। 30 करोड़ से भी अधिक विद्यार्थी ऑनलाइन शिक्षा से सीधे तौर पर जुड़े। लॉकडाउन ने हमें कला, संगीत, साहित्य, संस्कृति से जुड़ने का अवसर दिया। इस अवधि में अपनी रुचियों को जीने के साथ-साथ लोग उसके परिष्करण-परिमार्जन के लिए भी समय निकाल पाए। कुछ ने तो पाक-कला जैसी भिन्न एवं नई चीज़ें सीखने में भी हाथ आजमाया। और इन सबसे अधिक कोविड ने हमें स्वयं से जुड़ने, चराचर में व्याप्त दिव्य संगीत को सुनने का अवसर दिया। यह आपदा सांसारिक राग-रंग, कृत्रिम एवं यांत्रिक दिनचर्या, गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा में बेसुध वर्तमान पीढ़ी को प्रकृति के अनिंद्य सौंदर्य एवं अनिर्वचनीय सुख की न्यूनाधिक अनुभूति भी करा गई।
    यों तो पूरी दुनिया के लिए कोरोना जैसी महामारी से लड़ना आसान नहीं था। परंतु भारत जैसे विशाल जनसंख्या एवं भिन्न भौगोलिक संरचना वाले देश के लिए तो यह और भी कठिन था। जहाँ पश्चिम के विकसित देश कोविड से लड़ते-जूझते हुए हाँफते या कदमताल करते दिखे, वहाँ सीमित पूँजी-संसाधनों वाले अंतर्बाह्य चुनौतियों से घिरे देश- भारतवर्ष का कोविड से लड़ना, दृढ़ता एवं सफलता से लड़ना अद्भुत, असाधारण, अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक है।  और यह लड़ाई अभी भी अहर्निश-अविराम ज़ारी है। मानव-सभ्यता के इतिहास की सबसे भयावह महामारियों में से एक कोविड के विरुद्ध भारत का यह साहसिक संघर्ष इतिहास के पृष्ठों में स्वर्णाक्षरों में अंकित होने योग्य है। कदाचित आने वाले दिनों-वर्षों-सदियों में यह कहा जाए कि जब कोविड-19 नित नवीन-परिवर्तित प्रकृति और मारक-विध्वंसक क्षमता के साथ संपूर्ण भारतवर्ष को ही लीलने को उद्धत-आतुर था, तब वहाँ के निवासियों ने अपराजेय जीवटता एवं दुर्लभ संघर्षशीलता का प्रदर्शन कर विस्मयकारी इतिहास रचा। कोविड और भारतवासियों के संघर्ष की यह गाथा अभी अधूरी है। कोविड पर संपूर्ण विजय के साथ यह शीघ्र ही पूरी  होगी।
    प्रणय कुमार

    प्रणय कुमार
    प्रणय कुमार
    शिक्षक, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। जीविकोपार्जन हेतु अध्यापन। आईआईटी, कानपुर में 'शिक्षा सोपान' नामक सामाजिक संस्था की संकल्पना एवं स्थापना। हाशिए पर जी रहे वंचित समाज के लिए शिक्षा, संस्कार एवं स्वावलंबन के प्रकल्प का संचालन। विभिन्न विश्वविद्यालयों, संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में राष्ट्रीय, सनातन एवं समसामयिक विषयों पर अधिकारी वक्ता के रूप में उद्बोधन। जन-सरोकारों से जुड़े सामाजिक-साहित्यिक विमर्श में सक्रिय सहभाग।

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