मनुष्य देह है, त्रिनेत्रधारी शिव !

शिव ही नहीं अपितु प्रत्येक जीवात्मा त्रिनेत्रधारी होता है जिसमें दो नेत्र खुले होते है और एक नेत्र बंद रहता है। हर मनुष्य के केन्द्र में छिपा होता है त्रिनेत्र, थर्ड आई, जो नेत्र बंद होता है, जिसे गुप्त नेत्र या दिव्य चक्षु कहते है। दिव्यचक्षु  को योगीजन शिवनेत्र कहते है और साधकों का वह तीसरा नेत्र होता है। यह अतीन्द्रिय इन्द्री, छठी इन्द्री थर्ड आई के नाम से पहचानी जाती है, अगर यह केन्द्र खुल जाये तो जीवन के सारे अर्थ -पदार्थ विलीन हो जायेगें और परमात्मा प्रगट हो जायेगा। आकार विलीन हो जायेगा निराकार प्रगट हो जायेगा, रूप मिट जायेगा, अरूप आ जायेगा, मृत्यु के स्थान पर अमृत का द्वार खुल जायेगा।
जगत में इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है और हमारे मस्तिष्क का बहुत थोड़ा सा हिस्सा ही सक्रिय है जो काम कर रहा है, बड़ा हिस्सा निष्क्रिय है। बड़े से बड़े प्रतिभावान, ज्ञानी, के मस्तिष्क का थोड़ा सा ही हिस्सा सक्रिय है जिससे वे दुनिया में जीनियस-सुपर बने हुये हैं, भीतर जीवनधारा सोयी हुई है। आमजन अपने शरीर के भीतर छिपी हुई इस सुप्रीम पावर ऊर्जा से अन्जान एवं अनभिज्ञ है कि वे भी शिव की तरह त्रिनेत्रधारी है, उन्हें तो इतना ही ज्ञान है कि शिव ही त्रिनेत्रधारी है यह उनका भ्रम है। जिस दिन वे यह भ्रम को तोड़ देगे ओर अपने अन्तस की अतीन्द्रिय इन्द्री से साक्षात्कार करेंगे तब उनके अन्दर दमित व्यक्तित्व का विसर्जन हो जायेगा ओर मनुष्यता का पुष्प खिल जायेगा, उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व एक बीज से अंकुरित होकर वृक्ष बन जायेगा। योगविद्या से स्पष्ट है कि इस सप्तशरीर में कुण्डलिनी जागरण के पश्चात तीसरा नेत्र स्वमेव खुल जाता है, फिर चाहे उसका उपयोग साधक इस जगत के दृश्यमान के लिये उपयोग करें या परा जगत की शक्तियों से साक्षात्कार कर भूत, भविष्य व वर्तमान के अन्दर झॉके, उसका जीवन एक उत्सव बन जाता है।

गोरखपुर से प्रकाशित पत्रिका कल्याण में लेखक चित्रगुप्त स्वरूप जी ने ’दिव्य चक्षु का उन्मीलन’’ शीर्षक से अपने लेख में लिखा है कि – शिवनेत्र में ब्रम्ह का, दाहिने नेत्र में काल का और बायें नेत्र में शक्ति का निवास है। इन तीनों अंशों की संयुक्तावस्था ही परमेश्वरका रूप हैं।  विराट में जो आत्ममण्डल की त्रिपुटी है, ये तीनों नयन उसी की छाया है। शिवनेत्र का सम्बन्ध ब्रम्हमण्डल से, दाहिनी का सूर्यमण्डल से और बॉये का सम्बन्ध चन्द्रमण्डल से है।ं शिवनेत्र से विचार उत्पन्न होता है, दाहिनी नेत्र से इच्छा पैदा होती है और बॉये नेत्र से क्रिया उत्पन्न होती है। प्रत्येक जीवात्मा में, मनुष्य-प्राणी में दिव्य चक्षु के होने का एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि जब आप सो जाते है तब वे बाहरी दोनों नेत्र बंद हो जाते है फिर जो सपना देखते है, वह उसी भीतरी नेत्र के प्रकाश से संभव होता है।
दिव्य चक्षु का प्रकाश बाहरी दुनिया में तब तक नहीं हो सकता, जब तक उसका वाकायदा उन्मीलन न किया जाये। परन्तु अतीन्द्रिय इन्दी-दिव्य चक्षु का प्रकाश भीतरी दुनिया में सूक्ष्म, जगत, कारण जगत, और आत्मजगत में स्वयं भरपूर रहता है। इसी कारण स्वप्न में भी जो कुछ होता है, वह दिखायी पड़ता हैं सपने को मन नहीं देखता, क्योंकि मन में देखने की शक्ति नहीं होती हैं। अगर मन ही देखता तो अपने मनका आकार क्यों दीखता ? सपने में अपना मन आकार धारण कर लेता है और सपना देखनेवाले की सूरत धारण कर लेता है। अगर मन ही देखता होता तो आप अपने मन का धारण किया हुआ साकार कैसे देख सकते थे? सपने में आप सहित सभी बातें दिखायी दिया करती है। शिवनेत्र का प्रकाश ही आपके मन का आकार आपको दिखाता है। अतः सपनों का दीखना मन की शक्ति के अर्न्तगत नहीं-दिव्यचक्षु की शक्ति के अर्न्तगत है।
त्रिनेत्र को सुसुप्तावस्था से जगाने के लिये योगमार्ग का अनुसरण करके पद्यासन में बैठनकर नेत्रों को बंद कर जीभ को तालु में चढ़ाकर योग क्रिया की शुरूआत की जाती है। ध्यान के समय दोनों भ्रृकुटि के केल के स्थान से यानि नाक की जड से दो अंगुल उपर जमाना होता है। इस बात का ध्यान रखना होता है कि सिर के बाहरी भाग पर न होना चाहिये भीतरी भाग पर होना चाहिये। ध्यान के समय शिव मंत्र का जाप मन से करना होता है। ब्रजयानी सिद्धों ने बुद्ध को चारों चक्रों में प्रतिष्ठित कर साम्प्रदायिक प्रतिद्धन्ति के कारण हरि, ब्रम्हों को गौण स्थान देकर तीन अत्यन्त शुद्ध नाडियों का अधिष्ठाता माना और उन साधकों के दिव्य चक्षु खुलने, उनके द्वारा ज्ञान और शक्ति से परे काम देखने की घटनायें दिखलायी पड़ने लगती है, उनका मन धीरे धीरे स्वयं, एकाग्र हो जाता है। अपने और पराये के भविष्य का हाल मालूम हो सकता है। उनका मन धीरे धीरे एकाग्र हो जाता है और वह अपने और पराये के भविष्य के अलावा उस परमात्मा को भी देख सकता है जिसके अनेकों उदाहरण देखने को मिल जायेगे।

मुस्लिम संत मलिक मोहम्मद जायसी यहॉ  तन में अरध और उरध में बसने वाले शक्ति और शिव का उल्लेख करते है। ’’अरध उरध के मध्य निरन्तर सुखमन चौक पुराई हो। रवि ससि कुंभक अमृत भरिया गगन मण्डल मठ लाई हो। साध सन्त मिल कियो बसीठी, सतगुरू लगन लगाई हो। दरस परस पतिबरता पिव की, सिव घर शक्ति बसाई हो। जायसी सिंघल जाने के पूर्व अपने मन में या चित्त में इस शक्ति और शिव को एकात्म करने का निर्देष करते है- गजपति यह मन सकती सीऊॅ।। जौ पहिलैं सिर पै पगु धरई, मुए केर मीचहु का करई।। सुख संकलपि दुख सांबर लीन्हेउ। तौ पयान सिंघल कह कीन्हेउ। जायसी ने शिव और शक्ति के अद्धैत की साधना में कुंभक प्राणायाम के बजाय प्रेम को महत्व दिया और अरध और उदध को शैव रूप देकर अपनी साधना में हठयोग के साथ भावयोग को स्वीकार कर भक्ति की सहायक साधना मानकर प्रेम को प्रमुख स्थान दिया। किन्तु इसी शक्ति और शिव के संयोग से सहज तत्व की उत्पत्ति होती है जिसे कबीरदास जी भॅलीभॉति जानते है- काटि सकति सिव सहज प्रकासियो एकै एक समाना ना, कहि कबीर गुर भेट महांसुख भ्रमत रहे मनु मान नां।।

त्रिनेत्रधारी मनुष्य अपनी काया में शिव के त्रिनेत्र को दृष्टिगोचर करते थे किन्तु कभी घोषणायें नहीं करते थे। वे सच्चे सदगुरू का मार्ग समझ अपनी देह में उस परमात्मा की अनुभूति में डूब जाया करते थे, एक बंगाल के नाथ योगी ने स्वीकारा कि-चूड़ते चूड़ामणि ब्रम्हमूल स्थिति, पाट मध्ये महाविष्णु केरछे बसति। चक्खेते कालाचार सदाई करे ध्यान, कर्णेते चैतन्य गोसा हयेछे सावधान। उपरोक्त पद में देह को आठ मुकामों में विभाजित किया गया है और शिव तथा शक्ति को भग और लिंग में स्थित माना है किन्तु वैष्णव देवताओं और आचार्ये को अधिक महत्व दिया गया है। सिद्धों ने इस शरीर को जिनपुर माना है, जिनमें ध्यानी बुद्धों का वास है वहीं जैनों ने भी देहरूपी देवालय में शक्तियों सहित जो देव वास करताहै, वह शिव कौन है ? देहा देवलि जो बसई सत्तिहिं सहियउ देह। को तहिं जोइय सत्तिसिउ सिग्यु गवेसहिं भेउ।ं अर्थात उसी शिव और शक्ति के कारण यह देह देवालय है, तीर्थो सेभी अधिक पवित्र है। उस शिव और शक्ति का वास नाथ योगियों और संतों ने भी देह में माना है।

योगियों का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ कार्य देह को स्थिर करना है, देह को स्थिर रखने का उद्देश्य इस देह को जरारहित करके अमरत्व प्रदान करना है। अगर देह स्थिर हो जाये तो वह न तो चंचल होती है और न ही किसी विकार से ग्रसित ही होती है, इसलिये प्राचीन काल से इस संसार में गुप्तभाव से देहसिद्धि की क्रियायें सम्पन्न की जाती रही है। योगियों को यथार्थ कर्मपथ ज्ञानचक्षुओं के खुलने से प्राप्त होता है, उसके पूर्व नहीं। इस विराट में चलने के लिये योगियों को अपनी देह को सुरक्षितरूप में अपने अधीन रखना आवश्यक है तभी वह दीक्षित होकर कुछ अंश में चरम सत्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहॉ हठयोगियों तथा बौद्ध, शैव, शाक्त, वैष्णव प्रभृति उपासकों में कोई न कोई देहसिद्धि के रहस्य से अवगत थे जिसका सबसे बड़ा प्रमाण आद्यगुरू शंकराचार्य के गरू गोविन्द भगवत्पाद ने रस प्रक्रिया द्वारा निज सिद्ध देह को प्राप्त किया था, माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह में ’’रसेश्वर दर्शन’’ पर  लिखते हुये प्राचीन कारिकाओं का उद्धरण देते हुये बहुतेरे सिद्ध देहसम्पन्न योगियों का उल्लेख है, ये समस्त योगी आज भी अक्षत देह में विद्यमान रहकर जगत में सर्वत्र विचरण करते है, यह उनके त्रिनेत्र सिद्धि से ही संभव है जिसका श्वेताश्वतरोपनिषद में ’’योगाग्मिय शरीर’’ उल्लेख कर सिद्धदेह का महात्म्य बताया है।

पुरूष षोड्शकला है, अर्थात देहावच्छिन्न आत्मा की सोलह कलायें है जो अगम-शास्त्र में तथा तदनुयायी अनेकों ग्रंथों, उपनिषदों आत्मा की षोडसकलाओं का उल्लेख देखने को मिलता है। इन सोलह कलाओं में 15 कलायें धर्मशास्त्र तथा ज्योतिषशास्त्र में तिथिरूप में कालचक्र के अंगस्वरूप में वर्णित है। 16 कला विशिष्ट चन्द्रमा की पन्द्रह कलायें आर्विभाव तिरोभावविशिष्ट और अनित्य है। ये मृत्युकला, काल की कला अथवा नश्वर कला नाम से प्रसिद्ध है परन्तु सोलहवी कला कालचक्र की नाभिस्वरूप है, यही बिन्दुरूप अमृतकला है -पुरूपे षोडशकलेस्मिन तामाहुरमृतां कलाम। अतएव देहपुराधिष्ठाता पुरूष की पन्द्रह कला उसका देह है और सोलहवी कला उथवा अमृतकला उसका आत्मा है। इन 16 कलाओं को विस्तार से स्पष्ट किया जा रहा है-भवन्ति मंत्रयोगस्य षोडशाड्गानि निश्चितम्। यथा सुधांशोर्जायन्ते कलाः षोडस शोभनाः।।भक्तिः शुद्धिश्चासनं च प़ंचागस्यापि सेवनम्। आचारधारणे दिव्यदेशसेवनमित्यपि।।प्राणक्रिया तथा मुद्रा तर्पण हवनं बलिः। यागो जपस्था ध्यानं समाधिश्चेति षोडश।। चन्द्रमा की सोलह कलाओं की तरह मंत्रयोग भी इन सोलह अगों से परिपूर्ण है 1/भक्ति 2/शुद्वि 3/आसन 4/पंचागसेवन, 5/आचार 6/ धारणा 7/दिव्यदेशसेवन 8/प्राणक्रिया 9/मुद्रा 10/तर्पण 11/ हवन, 12/बलि,13/याग 14/जप, 15/ध्यान और 16/समाधि। मंत्रयोग के इन 16 अंगों को मेरे द्वारा आगे अध्याय- ’’नवधा भक्ति और मंत्रयोग के अंग’’ मे विवेचित करने का प्रयन्त किया है।
        जीव पितृयानमार्ग से संचरण करके इन पंचदश कलाओं के साथ ही परिचित होता है। देवयानमर्ग में गये बिना षोडसीकला का पता नहीं चलता है। इन षोडसीकला का शास्त्रों के अध्ययन में 16 अंगों का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है जिसमें 1/ भक्ति का वर्णन पुराणों आदि शास्त्रों में प्रमुखता से किया गया है और अनेक भक्ति शास्त्र भी प्रगट में आ चुके है। 2/शुद्धि के भी अनेक भेद देखने को मिलते है जिसमें किस दिशा में मुख करके साधक को साधना या भक्ति करनी चाहिये यह दिक्शुद्धि है। कैसे और किस प्रकार के स्थान पर बैठकर भक्ति करनी चाहिये यह स्थानशुद्धि है। साधक या भक्त को अपने शरीर को शुद्ध करने के लिये स्नानादि से निवृत्त होना शरीरशुद्धि है। मन,इन्द्रिय को संयमित करके प्राणायाम की स्थिति में पहुॅचने को मनशुद्धि कहा गया है। 3/आसन- भक्ति साधना में आसन का विशेष महत्व है इसलिये विभिन्न आसनों का प्रमाण प्राप्त होता है जिसमें साधन को किस प्रकार के आसन पर बैठना चाहिये उसे प्रमुख माना हैं तभी चैलासन, मृगचर्मासन,कुशासन या कम्बल आदि आसनों को शुद्ध माना गया है। 4/पंचागसेवन -गीता, शहस्त्रनाम, स्तव, कवच और हृदय ये पॉच पंचाग कहे गये है। 5/आचार के अनेक भेद तंत्र, वेदं और पुराणों में वर्णित किये गये हैं। 6/ धारणा-मन को बाहर मूर्ति आदि में लगाने से अथवा शरीर के भीतर स्थान विशेषों में मन को स्थिर रखने को धारणा कहा गया है।
7/ दिव्यदेश-जिन 16 प्रकार के स्थानों में पीठ निर्माण कर पूजा की जाती है उनको दिव्य देश कहा गया है। उदाहरणार्थ -मूर्धास्थान, हृत्प्रदेश, नाभिस्थान, घट, पट, पाषादि की मूर्तिया, वेदी एवं यंत्र आदि दिव्यदेव कहे गये है। 8/प्राणक्रिया-मंत्रशास्त्र में प्राणायामों के अतिरिक्त शरीर के  स्नायु तंतों द्वारा इस शरीर के प्रत्येक अंग में प्राणों को लेजाकर साधना करने की आज्ञा है जिसे प्राणक्रिया कहा गया है जिसमें न्यास आदि भी सम्मिलित है। 9/मुद्रा -मंत्रयोग में अपने अपने इष्ट देवों को प्रसन्न करने के लिये जो शारीरिक विशेष चेष्टायें की जाती है वह मुद्रा कहलाती है जिसमें शंखमुद्रा, गदामुद्रा आदि शामिल है। 10/तर्पण -पूजा में अपने ईष्टदेव सहित अन्य देवों को पदार्थ विशेष द्वारा तर्पण करना तर्पण कहलाता है। 11/ हवन-विशेष दृव्य आदि सामग्रियों द्वारा अग्नि को आहूति देना हवन कहा गया है। 12/ बलि-देवी-देवताओं अथवा ईष्टदेव को चरू आदि की बलि दी जाती है जिसे तीन भागों में विभक्त किया गया है जिसमें साधक द्वारा आत्मबलि के माध्यम से अपने अहंकार की बलि देना, इन्द्रियों की बलि जिसमें काम-क्रोध,लोभ,मोह एवं मद से ग्रसित भाव से मुक्ति पाना है, 13/याग-अर्न्तयाग और बर्हियाग भेद से याग के दो प्रकार किये गये है।    14/जप- अपने इष्टदेव या जिस देवता-देवी की साधना की जा रही है उनके नाम एवं मंत्रों का जाप  जप कहलाता है।  जप के तीन भागों में विभक्त किया गया है जो वाचनिक, उपांशु और और मानसिक कहे जाते है।       15/ध्यान -प्रत्येक मनुष्य के मन के अन्दर अपने ईष्टदेव अथवा परमात्मा की जो छवि अंकित है उस छवि को मन के द्वारा ध्यान करने से जो पूजा-पाठ, साधना संपन्न होती है, वह ध्यान कहलाती है। 16/ समाधि-इष्टदेव की रूपमाधुरी का ध्यान करते करते साधक अपने अस्तित्व को विस्मृत कर देता है और उस परमतत्व से जुड जाता है वह समाधि कहा गया है और मंत्रयोग में इसे महाभाव समाधि की संज्ञा दी गयी है। इन षोड्सीकला से मृत्युकाल में देह से वियुक्त होकर सूर्यमण्डल भेदकर उससे उर्ध्व नित्य चन्द्रमण्डल में लौट जाती है, परन्तु देह के ऊपर अमृत किरणे नहीं गिरती है।
श्रुति कहती है -’अपाम सोमममृता अभूम।’’ यह वेदवाक्य सोमपान के फलस्वरूप अमृत्वप्राप्ति का  निदर्शन करता है। यह अमृतत्व, देह सिद्धिजनित अमरत्व है, आत्मा का स्वभावसिद्ध अमरत्व नहीं है, क्योंकि आत्मा के स्वभावसिद्ध अमरत्व में सोमपान की आवश्यकता नहीं होती है। खेचरीमुद्रा की सिद्धि के समय इन षोडशीकला रूप चन्द्रबिन्दु के अमृतस्त्रवण के साथ न्यूनाधिकरूप से परिचित हो जाते है। तालु मूल के साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। साधारण अवस्था में चित्त की एकाग्रता के अभाव में यह सोमधारा नित्य विगलित होकर कालरूपी अग्निकुण्ड में नाभिस्थल में नियमितरूप से गिरती है। एक लक्ष्य के उन्मीलित हुये बिना अर्थात ज्ञान चक्षु के खुले बिना यह अमृतपान नहीं किया जा सकता हैं, इसलिये मंत्रयोगी मंत्र के जप-क्रिया अथवा अजपा-क्रिया के द्वारा इस उद्देश्य की पूर्ति की चेष्टा करते है वही तांन्त्रिक उपासक भूत शुद्धि करके उपासना के लिये विशुद्ध भूतमय अभिनव देह की सृष्टि करते है ताकि उनको भी इस उद्देश्य प्राप्ति की प्रेरणा मिले।
       चन्द्रबीज के बिना देह रचना नहीं होती , यह एक अत्यन्त परिचित सत्य है जो लोग रस साधना में निष्णात हैं, वे इस लक्ष्य के द्वारा प्रणोदित होते है। रस अथवा पारद स्वरूपतः शिववीर्य है, परन्तु यह बहुत मल से आच्छन्न है, जिसे विभिन्न संस्कारों के द्वारा इस मल के दूर करने पर विशुद्ध शिवविन्दु प्राप्त होता है, इस बिन्दु से उत्पन्न देह ही ’’वैन्दव देह’’ कहा गया है। योगमार्ग में महानिष्क्रिमण करने वाले  सिद्ध देह प्राप्ति अर्थात शंकर की तरह अपना तीसरा नेत्र खोलने वाले यही वैन्दवदेही’’ देहसिद्धि कर  अपने आप में पूर्णत्व प्राप्त कर चुके साधक है, जिनका प्रमाण इतिहास में यदा कदा मिलता है। 

आत्‍माराम यादव पीव 

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