राजनीति का प्रश्न नहीं है आज जगत के सम्मुख देश

राकेश कुमार आर्य

देश इस समय अपनी 17वीं लोकसभा के चुनावों के दौर से गुजर रहा है ।पिछले 7 दशक से अधिक के काल में हमने केंद्र में कई राजनीतिक पार्टियों या राजनीतिक गठबंधनो की सरकारों को बनते बिगड़ते देखा है। देश का हर लोकसभाई चुनाव अपने आप में ऐतिहासिक हुआ है ।पहले दिन से ही देश के राजनीतिक दलों ने और राजनीतिज्ञों ने देश के लोगों की समस्याओं से उन्हें मुक्ति दिलाने का आश्वासन दे – दे कर उनके वोट प्राप्त किए हैं, परंतु जन समस्याएं हैं कि समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं । राष्ट्र निर्माण की बात करते – करते हमने राष्ट्र निर्माण की दिशा में बहुत से कीर्तिमान भी स्थापित किए, परंतु इसके उपरांत भी हम अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं कर पाए या जो सपने हमने अपनी जनता को दिखाए थे, उन्हें पूर्ण नहीं कर पाए । ऐसा क्यों हुआ ? – इस पर आज विचार करने की आवश्यकता है ।
इस प्रश्न पर विचार करते – करते देश के कुछ राजनीतिक पण्डित व चिंतक लोग हमें बताते हैं कि देश की राजनीति की दिशा गलत है, राजनीतिक सोच गलत है , राजनीति में आए हुए लोग गलत हैं ,इसलिए प्रश्न राजनीति का है कि यदि राजनीति को सही कर लिया जाए तो सब कुछ ठीक हो सकता है । जबकि कुछ दूसरे लोग हैं जो अपने चिंतन से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि देश में यदि अर्थ साम्यता स्थापित कर दी जाए तो मनुष्य – मनुष्य के बीच जो आज गहरी खाई दिखाई दे रही है ,उसे पाटा जा सकता है ।फलस्वरूप दोनों दिशाओं में कार्य करने के लिए लोग लग गए । कुछ लोगों ने जनलोकपाल लाकर या राजनीतिक दलों के लोगों के आचरण को सुधारने के लिए राजनीतिक आचार संहिता को लागू करने के लिए बड़ी – बड़ी बातें कीं , तो कुछ ने अर्थ साम्यता के लिए लंबे – लंबे लेख लिखे या और दूसरी बातें स्थापित करने हेतु अपने निष्कर्ष निकाल – निकाल कर दिये । इन निष्कर्षों पर सरकारों ने काम करने का प्रयास भी किया ,परंतु परिणाम फिर भी आशानुकूल नहीं रहे। 
इस दिशा में रामधारी सिंह दिनकर जी की यह पंक्तियां बहुत ही सार्थक जान पड़ती हैं–
शांति नहीं तब तक, जब तक सुख भाग न नर का सम हो ।
नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो ।।
निश्चित रूप से ऐसी सोच से देश के लोगों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक न्याय की स्थापना की जा सकती है ,परंतु अन्ततः यह भी राजनीति का उद्देश्य हो सकता है ,यह राजनीति के कार्य करने की शैली नहीं है। राजनीति कैसे इस अपने उद्देश्य को प्राप्त करे? – प्रश्न तो यह है । हमने लक्ष्य तो बना दिया कि जब तक प्रत्येक नर का सुख भाग सम न होगा ,तब तक हम आराम से नहीं बैठेंगे , परंतु यह सुख भाग सम कैसे हो? – उसके लिए कौन सा रास्ता होगा ? प्रश्न तो यह था और इसी पर विचार करने की आवश्यकता थी।
इसके लिए सुमित्रानंदन पंत जी की यह पंक्तियां हमारे लिए बहुत सहायक सिद्ध हो सकती हैं । उन्होंने कहा है कि – 
राजनीति का प्रश्न नहीं है आज जगत के सम्मुख ।
अर्थ साम्य भी मिटा नहीं सकता मानव जीवन के दुख।। आज वृहत सांस्कृतिक समस्या जगके निकट उपस्थित।
खंड मनुजता को युग युग की होना है नवनिर्मित।।

सुमित्रानंदन पंत जी बहुत सुंदर बात कह रहे हैं । देश के सामने राजनीति का प्रश्न नहीं है ,जगत के लिए भी राजनीति का प्रश्न नहीं है ।अर्थ साम्यता भी मानव जीवन की समस्याओं का निदान नहीं है । यह दोनों चीजें तो अपने आप ही ठीक हो जाएंगी , जब सांस्कृतिक समस्या से जूझ रहे जगत के प्रश्न का उत्तर उसे हम दे देंगे। वर्तमान में खंड – खंड मनुष्यता को हम जोड़ने का प्रयास करना आरंभ करें तो दोनों प्रश्न अपने आप सुलझ जाएंगे या उनका उत्तर अपने आप आ उपस्थित होगा । यही भारत की राजनीति का , भारत के राजनीतिक दर्शन का और भारत की प्राचीन राजनीतिक प्रणालियों का अंतिम उद्देश्य रहा है ।स्वतंत्रता के उपरांत हमें इसी दिशा में काम करना चाहिए था । हम सांस्कृतिक समस्या को सुलझाने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते ,लोगों के भीतर मौलिक संस्कारों को स्थापित करते जो राजनीति और अर्थ साम्य्ता की दिशा को सीधा कर देते।
आज मानवता संस्कार चाहती है ।उस पर जो नाना प्रकार के विकार एकत्र हो गए हैं, उन सबको प्रेम से झाड़कर हमें परिशुद्ध मानव के दर्शन करने हैं । इसके लिए हमें हृदय में माता का सा वात्सल्य, बहन की सी ममता और सहोदर भाई का सा स्नेह लेकर सबके हृदय में प्रेम संचार करना होगा । भारत सहित विश्व की वर्तमान दयनीय दशा का एकमात्र कारण यही है कि हम लोगों के हृदय में माता का सा वात्सल्य, बहन की सी ममता और सहोदर भाई का सा स्नेह स्थापित करने की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं कर रहे हैं। लोगों को हमने केवल और केवल पैसा कमाने के लिए खुला छोड़ दिया है और एक ऐसी प्रतिस्पर्धा समाज में उत्पन्न कर दी है कि उसमें सब लोग पागल हो कर रह गये हैं । भारत का राजनीतिक चिंतन इस पागलपन को मिटाने की दिशा में काम करने का समर्थक रहा है । यह लोगों को पागल नहीं बनाता ,बल्कि लोगों को आनंद की खोज का पथिक बनाता है और आनंद की खोज के महान कार्य में लगे मानव के इस संकल्प को ही मानव का धर्म घोषित करता है । उसकी मानवता बताता है। कहता है कि आनंद की खोज करो , आनंद लोक के वासी बनो और उस आनंद को हृदय से निकाल कर संसार में फैला दो । यही भारत की सबसे बड़ी विशेषता है । 
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के राजनीतिक दलों ने इस दिशा में काम नहीं किया । इसका एक मात्र कारण यह है कि राजनीति में जाने वाले लोगों के लिए हमारे संविधान में कोई योग्यता स्थापित नहीं की गयी है ।ऐसे कितने सांसद हमने आज तक चुनकर भेजे हैं जो संसद में बैठकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मर्म को जानते हुए उस पर आकर्षक भाषण देने में कभी सफल रहे हों ? या जिन्होंने भारत की वसुधैव कुटुंबकम की नीति को विश्व के लिए उपयोगी मानकर संसार के मंच पर जाकर भारत की महानता के गीत गाए हों ? हमने ‘गन’धारी और बाहुबली लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाया जो बदतमीज ,बदमाश ,वाहियात और बहुत ही निकृष्ट स्तर के चिंतन के लोग रहे । जिस देश की संसद में एक तिहाई लोग ऐसे बैठे हों , जिन पर कोई ना कोई आपराधिक मुकदमा या तो न्यायालय में लंबित है या सजा प्राप्त कर चुके हैं ,उस देश के जनप्रतिनिधियों से आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे देश में सांस्कृतिक समस्या पर चिंतन करेंगे और पार्लियामेंट में बैठकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थापित करने की दिशा में गंभीर चिंतन प्रकट करेंगे? 
अब देश के चुनाव 17वीं लोकसभा के लिए चल रहे हैं। ऐसे समय में हमें प्रत्येक राजनीतिक दल की कार्यशैली को बड़ी सावधानी से देखना होगा। यह विचार करना होगा कि कौन सा दल हमारे लिए किस प्रकार के प्रत्याशी को चुनाव में टिकट दे रहा है ? संपूर्ण चुनावी प्रक्रिया में हम सजग और सावधान रहें। यह समय सतर्क रहने का है ।राजनीतिक दलों के लोग हमारे सामने आएंगे और हमारी आंखों में मिर्ची झोंक पर अगले 5 वर्ष के लिए सत्ता को हमसे छीनने का प्रबंध करेंगे । हमें आँख खोलकर रखनी हैं। हम उस राजनीतिक दल को अपना समर्थन दें जो जाति ,धर्म , संप्रदाय ,भाषा ,क्षेत्र आदि के नाम पर वोट न मांग कर मानव निर्माण के नाम पर वोट मांगने को प्राथमिकता दे । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करता हो , हम उसे बता दें किहमारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानव निर्माण को प्राथमिकता देता है ।आपने हमारे सामने यदि जाति, धर्म , संप्रदाय आदि के नाम पर अपनी ओर से चुनाव में प्रत्याशी खड़ा किया है तो हम उसे स्वीकार नहीं करते। हम ऐसे सुयोग्य ,सुपात्र ,सुशिक्षित , सुशील ,देश के मुद्दों के प्रति गंभीर और देश में ही नहीं बल्कि संसार में भारत के वसुधैव कुटुंबकम केआदर्श राष्ट्रीय संकल्प को स्थापित करने की दिशा में गंभीर चिंतन रखने वाले प्रत्याशी को अपना समर्थन देंगे जो हमारी इन अपेक्षाओं पर खरा उतरता हो।
टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने वाले किसी राजनीतिक दल या राजनीतिक दल के किसी प्रत्याशी को हमारा वोट नहीं जाना चाहिए । मानव अधिकारों के नाम पर देश की एकता और अखंडता को क्षति पहुंचाने वाले आतंकवादियों का समर्थन करने वाले किसी राजनीतिक दल या राजनीतिक दल के किसी प्रत्याशी को भी हमारा वोट नहीं जाना चाहिए। देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोध करने वाले और विदेशी सभ्यता और संस्कृति का समर्थन कर उसे भारत में आधुनिकता के नाम पर परोसने का नाटक करने वाले राजनीतिक दल या उसके किसी प्रत्याशी को भी हम अपना समर्थन ना दें , हम ऐसे लोगों को या राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को भी अपना वोट ना दें जो किसी भी प्रकार से आतंकवाद का समर्थन करते पाये जाते हों , या देश में सांप्रदायिक आधार पर तुष्टिकरण करते हों या धर्मांतरण को देश के लिए आवश्यक और उचित मानते हों ।
यह बहुत ही दुखद है कि हमें अपने देश का प्रधानमंत्री चुनने के लिए भी राजनीति की घुमावदार घाटियों में घुमा दिया जाता है, और ऐसा उलझा कर रख दिया जाता है कि हम सत्य- असत्य के बीच विवेक नहीं कर पाते , परंतु फिर भी पिछ्ले 70 साल के अनुभव के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि देश की जनता महत्वपूर्ण निर्णय लेना जानती है । देश को आज मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है और देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आस्था रखने वाले प्रधानमंत्री की भी आवश्यकता है ,इसलिए बहुत समझदारी के साथ मजबूत हाथों में ही हम देश को दें और यदि इस अपेक्षा पर प्रधानमंत्री मोदी खरा उतरते हैं तो निश्चित रूप से उन्हें समर्थन मिलना चाहिए । यदि मनमोहन सिंह दुबारा देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो मोदी क्यों नहीं? दोनों के व्यक्तित्व , कृतित्व , कार्यशैली और कार्यों के परिणामों पर अधिक प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है । देश का मतदाता अब जागरूक है और हम अपेक्षा करते हैं कि वह जागरूक होकर ही अपना निर्णय सुनाएगा।

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