इनका दर्द भी समझें

-विजय कुमार

मेरे पड़ोस में मियां फुल्लन धोबी और मियां झुल्लन भड़भूजे वर्षों से रहते हैं। लोग उन्हें फूला और झूला मियां कहते हैं। 1947 में तो वे पाकिस्तान नहीं गये; पर मंदिर विवाद ने उनके मन में भी दरार डाल दी। अब वे मिलते तो हैं; पर पहले जैसी बात नहीं रही।

अब वे दोनों काफी बूढ़े हो गये हैं। फूला मियां की बेगम भी खुदा को प्यारी हो चुकी हैं। झूला मियां और उनकी बेगम में होड़ लगी है कि पहले कौन जाएगा ? खुदा खैर करे।

30 सितम्बर को सारे देश की तरह वे दोनों भी रेडियो से कान लगाये इस विवाद के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे। निर्णय आते ही मुसलमानों के चेहरे पर मुर्दनी छा गयी, दूसरी ओर हिन्दू जय श्रीराम का उद्घोष करने लगे।

इस हलचल में रात बीत गयी। अगले दिन बाजार जाते समय वे दोनों मिल गये और इस निर्णय पर चर्चा करने लगे।

उन्हें सबसे अधिक कष्ट यह था कि न्यायाधीशों के अनुसार वह मस्जिद इस्लामी उसूलों के विरुद्ध बनी थी, अतः उसे मस्जिद नहीं कहा जा सकता। मियां फूला ने पूछा – क्यों भैया, तुम तो कई अखबार पढ़ते हो। ये बताओ कि जो इमारत मस्जिद थी ही नहीं, वहां पढ़ी गयी नमाज खुदा मानेगा या नहीं ?

– इस बारे में मैं क्या बताऊं चाचा; आपको किसी मौलाना से पूछना चाहिए।

– अरे खाक डालो उन मौलानाओं पर। उन्होंने तो हमारा जीना हराम कर दिया। वे सीना ठोक कर कहते थे कि बाबरी मस्जिद को दुनिया की कोई ताकत हिला नहीं सकती; पर वह तो कुछ घंटे में ही टूट गयी। फिर वे कहते थे कि हम पहले से बड़ी मस्जिद वहां बनाएंगे। इसके लिए हमने पेट काटकर चंदा भी दिया; पर अब तो न्यायालय ने उस मस्जिद को ही अवैध बता दिया।

– हां, यह ठीक है।

– कई साल पहले ईद पर न जाने कहां से कोई गीलानी-फीलानी आये थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि हमें अयोध्या-फैजाबाद में एक नया मक्का बनाना है। पूरी दुनिया के मुसलमान मक्का की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते हैं। यदि हम पांच में से एक वक्त की नमाज फैजाबाद की तरफ मुंह करके पढ़ें, तो हमारी इबादत जरूर कबूल होगी।

– अच्छा ?

– और क्या ? बीमारी के कारण अब मैं मस्जिद तो जाता नहीं; लेकिन घर पर ही रहते हुए मैंने पांचों नमाज फैजाबाद की तरफ मुंह करके पढ़ी, जिससे नया मक्का जल्दी बने; पर लाहौल विला कूवत…। सब नमाज बेकार हो गईं। या खुदा, अब मेरा क्या होगा ? कयामत वाले दिन मुझे तो जहन्नुम में भी जगह नहीं मिलेगी। इतना कह कर वे रोने लगे।

मैंने उनको शांत करने का प्रयास किया; पर उनका दर्द मुझसे भी सहा नहीं जा रहा था।

– मुझे वो मुकदमेबाज हाशिम पंसारी मिल जाए, तो..

– पंसारी नहीं, अंसारी। मैंने उनकी भूल सुधारी।

– अंसारी हो या पंसारी। अपने जूते से उसकी वह हजामत बनाऊंगा कि अगले जन्म में भी वह गंजा पैदा होगा। और उस गीलानी-फीलानी की तो दाढ़ी मैं जरूर नोचूंगा।

– चलो जो हुआ सो हुआ। अब बची जिंदगी में ठीक से नमाज पढ़ो, जिससे पुराने पाप कट जाएं।

मैं जल्दी में था, इसलिए चलने लगा; पर अब मियां झूला लिपट गये। उन्होंने अपना हिन्दी ज्ञान बघारते हुए कहा – भैया, एक लघु शंका मेरी भी है।

– उसे फिलहाल आप अपने मुंह में रखें; कहकर मैं चल दिया।

रास्ते भर मैं सोचता रहा कि इन मजहबी नेताओं ने मस्जिद का झूठा विवाद खड़ाकर अपनी जेब और पेट मोटे कर लिये। कइयों की झोपड़ियां महल बन गयीं। कई संसद और विधानसभा में पहुंच गये; पर झूला और फूला जैसे गरीबों ने उनका क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने बुढ़ापे में इनका दीन ईमान खराब करा दिया ?

2 thoughts on “इनका दर्द भी समझें

  1. क्या जोरदार मारा है जी…………………………हँसते हँसते बुरा हाल है……………..

  2. जिस दिन लखनऊ खंडपीठ का फैसला आया तो सारे देश ने टी वी पर देखा है -श्री हाशिम अंसारी जी को .उन्होंने उस दिन जो बयान दिया वह तो कम से कम सराहना के योग्य है ही .उस दिन का कोई भी अखवार उठा कर देखो .सभी का बयान बहुत ही संतुलित था अर्थात तात्कालिक तौर पर न्याय के प्रति आदर भाव .आपका आलेख सकारात्मक पहलुओं को नज़र अंदाज कर रहा है .जो cheej saari dunia maantee ho use aap nahin maane इसमें किसका कसूर है ?

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