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    Homeसाहित्‍यकविता‘सर' संबोधन का ये रिवाज मिटाना होगा

    ‘सर’ संबोधन का ये रिवाज मिटाना होगा

    —विनय कुमार विनायक
    ‘सर’ संबोधन का ये रिवाज मिटाना होगा,
    विदेशी गुलामी से हमें निजात पानी होगी,
    देशी संबोधनों को अब हमें अपनाना होगा!

    ‘सर’ में बड़ा अहं है, अधिकार का वहम है,
    ‘सर’ संबोधन में सेवा भावना बहुत कम है,
    तनिक नहीं रहम,’सर’ अंग्रेजों सा बेरहम है!

    सर में डर है,डरा-डरा देश का हर जन है,
    सर बोलनेवाले दीन,हीन,लाचार दीखते हैं,
    मगर सुननेवाले में अहंकार तो भरदम है!

    ‘सर’ ‘टर’ से बने सारे शब्दों में सदाचार नहीं है,
    जैसे अफसर, इंस्पेक्टर में भ्रष्टाचार अमूमन है!

    अंग्रेजी के पदनाम ‘सर’,’जर’, ‘टर’, ‘यर’ लगाकर,
    जो बने, बदनाम अधिक, जिम्मेदार कम लगते हैं!

    सर और नाइटहुड भी कुछ भारतीय बने थे,
    अंग्रेजों से मिले, ये गुलामी के बड़े तमगे थे!

    गोरों के जलियांवालाबाग नरसंहार से वे सहमे थे,
    नाइटहुड की सर उपाधि लौटाने वाले लोग भले थे!

    पर ये ‘सर’ हमारे घर बैठे हैं ‘सर जी’ बनकर,
    आगे सर, पीछे सर, बीच में सर, सर! सर! सर!
    ये ‘सर’ ही आज का काला देशी अंग्रेज अफसर है!

    सर! सर! सर! की गुलामी करना छोड़ो,
    देश धर्म संस्कृति से अब तो नाता जोड़ो,
    मानव को मानव समझो, सर से मुंह मोड़ो!

    सर से अच्छा संबोधन है, श्री मान, महोदय,महाशय,
    जिसमें श्री है, मन है, सहृदय भी दोनों का संभाषण है,
    इन संबोधनों में मान व सम्मान कहां किसी को कम है?

    छोटे और बड़े में भगवान तो आखिर होता सम है!
    इन देशी पदनाम में अहं-वहम-सहम नहीं, अपनापन है!

    सर को छोड़ो,वर लगाकर आत्मीय रिश्ता जोड़ो,
    बहुत सारे संबोधन है अपनी भाषा और संभाषण में,
    अगर सदाचार से नाता निभाना, भ्रष्टाचार को मिटाना है,
    तो आक्रांताओं,अताताईयों की उपाधि,पदवी,संबोधन को छोड़ो!

    कहो प्रियवर,बंधुवर, मित्रवर, मान्यवर, गुरुवर,आर्यवर,
    मुक्ति मिलेगी सर, अफसर से, भागेगा गुलामी का डर!

    जैसा संबोधन होगा,वैसी मानवता का बंधन होगा,
    वसुधैव कुटुंबकम् होगा, यहां नहीं कोई दुश्मन होगा!

    शिक्षक तो गुरुवर हैं,होते माता-पिता के समकक्ष,
    माता-पिता गुरुजन, कभी सर, मास्टर, होते नहीं!

    अंग्रेजी सर-मास्टर का अर्थ खुद मालिक,शेष नौकर,
    अक्षर है नाद ब्रह्म, अजर-अमर होता है हर अक्षर!

    सदियों से गूंज रहा हर अक्षर आकाशवाणी बनकर,
    हर नाम जीवंत होगा मन में, देख जरा उच्चारण कर!

    शब्द में शक्ति होती, शब्द से भक्ति, आशक्ति होती,
    शब्द अगर सात्त्विक होगा, परिणाम भी तो तात्विक होगा,
    पुकारोगे यदि रावण रुदन होगा, फिर राम का कहां रमन होगा?

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

    1 COMMENT

    1. कविता बहुत अच्छी लगी. सुचमुच हम लोगोंको यह “सर ” शब्द हमारे भाषा से हटाना होगा.

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