हैदराबाद : यह “काण्ड” नही कई सवालों से रूबरू होने का “मुकाम” है

– अनिल अनूप

हैदराबाद में भी ‘निर्भया कांड’ को लेकर देश आंदोलित है. इस बार भी ‘निर्भया’ सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई और उसे जला  कर मार दिया गया. रांची में भी ‘निर्भया’ का केस सामने आया है. उसका भी त्रासद अंत इस देश ने देखा-सुना और पढ़ा है बेटियां लगातार दरिंदों की हवस का शिकार हो रही हैं. उन्हें जला कर राख किया जा रहा है, ताकि साक्ष्य ही मिट जाएं. देवियों के इस देश में बेटियों के अस्तित्व पर ही कुछ भुतहे, काले, पैने साये मंडराए हैं.  औसतन हर मिनट में एक बलात्कार किया जा रहा है। देश में हर रोज औसतन 89 रेप की घटनाएं दर्ज की जा रही हैं. यदि दिल्ली में संसद मार्ग के एक किनारे युवा अनु दुबे ‘डाक्टर निर्भया’ के लिए इंसाफ की गुहार करती धरने पर बैठती है, तो पुलिस सुरक्षा को खतरे के नाम पर उसे उठाकर ले जाती है. घंटों हिरासत में रहने के बाद, अंततः उसे घर लौटना पड़ता है.

 यह है हमारी पुलिस की संवेदनशीलता…! अनु का सरोकार भी ‘निर्भया’ के सिलसिलों के प्रति था. जो घटनाएं अपराध के रिकार्ड तक नहीं पहुंच पातीं, वह संख्या न जाने कितनी होगी? अनु का सवाल था और वह प्रत्येक संवेदनशील देशवासी का भी होगा कि आखिर बेटियों और महिलाओं को डर और बलात्कारी दरिंदों से निजात कब मिलेगी? बेशक दिसंबर, 2012 की ‘निर्भया’ ने सामूहिक बलात्कार और शारीरिक यंत्रणाओं की जो पीड़ा सही थी और अंततः वह हमेशा के लिए सो गई. तय है कि हैदराबाद की युवा डाक्टर को भी वही असहनीय वेदना झेलनी पड़ी होगी! वह चीखती-चिल्लाई होगी, जिंदा जलाए जाने पर तड़पी और छटपटाई होगी! अंततः प्रकृति ने उसे भी लंबी नींद में सुला दिया. आखिर ‘निर्भया’ के ये सिलसिले कब तक जारी रहेंगे? कानून के हाथ तो बहुत लंबे माने जाते रहे हैं, लेकिन हमें लगता है कि वह बौना और लेटलतीफ है. 2012 की दरिंदगी और हैवानियत के लिए फांसी की सजा सुनाए भी लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन कानूनी इंसाफ की अपनी प्रक्रियाएं जारी हैं. इतने अंतराल में ‘निर्भया’ के नये आंकड़े काफी बढ़ गए होंगे! शायद इसीलिए हैदराबाद की भीड़ भी इतने गुस्से में है कि पुलिस से बलात्कारियों को मांग रही है, ताकि उन्हें सरेआम दंड देकर समाप्त किया जा सके अथवा उनके तुरंत एनकाउंटर का आग्रह कर रही है. कानून की परिभाषा यहां भी बताई जाती है. 2012 के ‘निर्भया कांड’ के बाद जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी ने भी यौन दुष्कर्म की नई परिभाषा और कड़ी सजा तय की थी. संसद ने खूब उत्तेजना के साथ दिए गए भाषणों के बाद उस कानून को पारित किया था. सवाल भी है और जिज्ञासा भी है कि उसके बावजूद हजारों बलात्कार क्यों सामने आए हैं? कब तक इन ‘निर्भया’ चेहरों को देखते रहना पड़ेगा? हैदराबाद का ही उदाहरण लें, तो पुलिस ‘निर्भया’ के पिता को टोंचती है कि बेटी किसी के साथ भाग गई होगी! पुलिस सीसीटीवी देखने में मस्त रहती है और दूसरी तरफ अपराध हो चुका है. ‘निर्भया’ को यथासमय बचाया जा सकता था! यदि पुलिस की ऐसी ही भूमिका को उनका मानक व्यवहार मान लें, तो उसकी संवेदनहीनता पर खीझने के अलावा और क्या किया जा सकता है?

 ‘निर्भया’ एक प्रतीकात्मक नाम है, जो 2012 के जघन्य कांड की शिकार बेटी के अंतिम संघर्ष के मद्देनजर दिया गया था, लेकिन वासनाओं के बर्बर खेल आज भी जारी हैं. क्या ‘बेटी बचाओ’ वाले नारे में संशोधन करके यह भी जोड़ देना चाहिए-‘बेटी लुटाओ…?’ संसद भवन के पास सड़क के किनारे बैठी अनु दुबे की भी यही चिंता है-‘कल मेरे साथ भी रेप न हो…मेरी भी हत्या न कर दी जाए…मुझे भी जिंदा जलाकर फेंक न दिया जाए, लिहाजा अपनी सरकार से पूछना चाहती हूं कि मैं और दूसरी सभी बेटियां कितनी सुरक्षित हैं?’ इस संदर्भ में सरकार, अदालत और पुलिस को अपनी बेटियों को जवाब देना पड़ेगा. हमें उपदेश नहीं सुनने कि घर का माहौल कैसा हो, बेटों को कैसे संस्कार दिए जाएं, समाज की मानसिकता कैसे बदलेगी और बलात्कार भी एक मनोरोग है. यह भी सचेत कर दूं कि मोमबत्तियां जलाने से भी न्याय नहीं मिलेगा. गांधीवादी या मौन आंदोलनवादी होना छोड़ दें। व्यवस्था पर पुरजोर दबाव बनाएं. मंत्रियों के आवास घेर लें. न्यायाधीशों को भी ज्ञापन लिखें बार-बार, लगातार. आखिर ‘निर्भया’ के सिलसिले तो रोकने ही हैं, बेशक ‘राक्षसों’ को सरेआम दंडित क्यों न करना पड़े! कानून को अपनी परिभाषा को तुरंत लागू कराना होगा और सजा भी एक निश्चित अवधि के दौरान देनी होगी. इन दरिंदों के लिए ‘दया’ का प्रावधान भी समाप्त करें.

देखते ही देखते पूरे देश में गुस्से की आग भड़क उठी. हर कोई यही चाह रहा है कि अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए. बहुत से लोग ये भी कह रहे हैं कि उन्हें जिंदा जला देना चाहिए. यहां तक कि एक आरोपी की मां ने खुद कह दिया है कि उनके दोषी बेटे को फांसी दे दी जाए या जिंदा जला दिया जाए. वाकई रूह कंपा देने वाली सजा होगी. लेकिन इसी समाज में एक ऐसा भी तबका है, जिसने प्रियंका रेड्डी की मौत के बाद उसके साथ बलात्कार से भी अधिक घिनौनी हरकत की है. ये तबका प्रियंका रेड्डी के रेप के वीडियो पोर्न वेबसाइट्स पर ढूंढ रहा है और उसे जो कुछ भी मिल रहा होगा, उसे बेहद बेशर्मी से देख भी रहा होगा.

जज्बात में पागल होकर या नेतागीरी से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलता. दिल्ली गैंग रेप  के खिलाफ देशभर में हुआ यादगार आंदोलन सबको याद है. लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ. रेप की घटनाएं  बढ़ ही रही हैं. और अब सिर काटने या चौराहे पर लटकाने जैसा इस्लामी कानून लागू करने की बातें भी जज्बाती ही हैं. गहराई में जाइये. स्थाई समाधान की तरफ बढ़िए. निर्भया और दिशा के क़ातिलों को ग़ौर से देखिए-समझिये, और फिर बलात्कार की घटनाएं थमने का समाधान खोजिए. कल दिल्ली में और आज हैदराबाद में सामूहिक बलात्कार की चर्चित घटनाओं को अंजाम देने वाले 4+4 हत्यारों पर नजर डालिये. आठों शराबी. आठों गरीब और अशिक्षित. आठों की उम्र 16 से 22 के बीच. इसमें से ज्यादातर का पेशा ट्रक/बस में क्लीनर या ड्राइवर और साथ ही इसमें से ज्यादातर का रिश्ता बाल मजदूरी से.

उन चीजों का विरोध करना होगा जो बलात्कार की जनक हैं

बलात्कार के खिलाफ लड़ाई में क्या आपने कभी सरकार से शराब बंद करने की मांग की? खुलेआम जारी बाल मज़दूरी के खिलाफ सड़कों पर मोमबत्तियां लेकर निकले? कभी-कभी बाल मजदूरी इस क़द्र संस्कार हीनता की तरफ ले जाती है कि इंसान के रूप में हैवान पनपता है. हारमोन्स में बदलाव आने के समय संस्कारहीन और शराबी किशोर जंगली जानवरों से बद्तर व्यवहार कर सकते हैं. ये बायलोजिकल और समाज शास्त्र का सच है. इस सच पर क्या आप फिक्र करते हैं? बलात्कार के खिलाफ आंदोलन में क्या आपने कभी शिक्षा के अधिकार की अनिवार्यता के लिए सड़कों पर संघर्ष किया?

यदि ऐसे अपराधों को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखकर समाधान के प्रयास नहीं किए तो चंद दिनों बाद आक्रोश जताने के लिए पुनः रेडी रहिएगा. दूसरी ‘दिशा’ फिर हवस की लपटों में सती होगी. देश की राजधानी दिल्ली की चलती बस में फिर किसी निर्भया के गुप्तांग में लोहे की सरिया उतार दी जाएगी.

ये सब क्यों होता रहेगा? क्योंकि आप का विरोध गलत दिशा मे जा रहा है. पूरा देश सड़कों पर उतरा. कोई मोमबत्ती लेकर तो कोई उग्रता से. संसद घेरी, गांधी की प्रतिमा के नीचे प्रदर्शन किये. सत्ता को कोसा. सब कुछ किया, लेकिन बलात्कार की घटनाएं घटी नहीं बढ़ती गयीं. किसी मासूम बेटी का बलात्कार और फिर उसके ख़ाक हो जाने तक आप इतने जज्बाती रहते हो कि आपको इन घटनाओं के मूल कारणों की ख़बर ही नहीं रहती.

हम आम इंसान ही नहीं संसद सदस्य भी कह रहे हैं कि बलात्कारियों की लिंचिंग कर दो. चौराहे पर लटका दो. उनका सिर कलम कर दो. उनमें आग लगा दो. क्या ये संभव है? ये सब सिर्फ जज्बाती बातें हैं. इस्लामी देशों जैसा इस्लामी क़ानून भारत में लागू होना संभव नहीं है. हांलाकि हम बलात्कार की घटनाओं से बुरी तरह जूझ रहे हैं. हमें सख्त फैसले करने होंगे. गुनाहगारों को जल्दी से जल्दी सख्त से सख्त सज़ा दिलवाने के रास्ते भी तय करने होंगे. हैदराबाद सुर्खियों मे है. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कश्मीर. और दिल्ली जैसे लगभग सभी प्रदेश अलग-अलग वक्त की कहानी बन चुके हैं.

देश की आजादी के बाद कुछ ही आंदोलन यादगार रहे हैं. दिल्ली में एक बस में निर्भया के गैंग रेप के खिलाफ देश भर में उबाल था. अब हैदराबाद का गुस्सा देशभर में गूंज रहा है. दिशा जैसी कितनी ही लड़कियां हवस का शिकार बनकर राख होती रहती हैं. कोई घटना ख़बर बन कर आंदोलन शुरु करवा देती है, लेकिन तमाम मामले ख़बर ना बनकर खामोशी के कफन से ढक दिए जाते हैं.

दरअसल हमें जब किसी सामूहिक रेप और दर्दनाक हत्या की खबर मिलती है तो हम इतने जज्बाती हो जाते हैं कि दिल हिला देने वाले सामूहिक बलात्कार के असल कारणों से ही बेखबर रहते हैं. ऐसे में क्या ख़ाक रेप का ऐसा सिलसिला रुकेगा. हरगिज नहीं. सिर्फ समाज का आम इंसान ही नहीं बल्कि जन प्रतिनिधियों द्वारा भी किसी रेप की घटना के बाद गैरसंजीदा और जज्बाती बयान आने लगते हैं.

इस्लामी क़ानून की तरह बलात्कारी को चौराहे पर सूली पर लटका दिया जाये. पब्लिक के बीच बलात्कारी का सिर कलम किया जाये. लेकिन करोड़ों आम और ख़ास लोगों में किसी ने भी सरकार पर इस बात का दबाव नहीं बनाया कि संस्कारों की हत्या करने वाली बाल मजदूरी बंद हो. शराब बंद कर दी जाये. बलात्कार के हर ऐसे कांड को अंजाम देने वाला हर हैवान शराब पीकर ही हैवान बनता है. किसी शराबी बलात्कारी ने किसी दिशा को ज़िन्दा जला दिया था. किसी बलात्कारी ने शराब पीकर ही किसी निर्भया के गुप्तांग में लोहे की सरिया डाल दी थी.

महिला डॉक्टर के हत्यारों के लिए समाज के लोगों में जो गुस्सा है, उसे इस एक खबर ने हैरानी में बदल दिया है. आखिर इसे किसी की मौत का तमाशा बनाना नहीं तो फिर क्या कहेंगे? भारत में लोकप्रिय पोर्न वेबसाइट्स पर महिला डॉक्टर का नाम टॉप ट्रेंड में दिखना साफ करता है कि समाज में अभी भी बहुत से ऐसे हैवान हैं जो रेप करने के लिए आमादा हैं. अगर नहीं भी, तो कम से कम वह किसी का रेप अपनी आंखों से देखना चाहते हैं. वरना आप ही सोचिए, किसी के रेप का वीडियो कोई क्यों सर्च करेगा? आपको बता दें कि किसी का भी नाम ट्रेंड तभी होता है, जब बहुत सारे लोग एक साथ एक ही कीवर्ड सर्च करें. यानी समाज में इस दूसरे किस्म के हैवानों की तादात काफी ज्यादा है.

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 साल की बच्ची से रेप की घटना तो आपको याद ही होगी. तब भी कुछ इंसानों ने हैवानों जैसी यही हरकत की थी. वह पोर्न वेबसाइट्स पर जाकर कठुआ की उस बच्ची के रेप की वीडियो ढूंढ रहे थे. उस दौरान उस मासूम बच्ची का नाम भी पोर्न साइट के टॉप ट्रेंड में था. बता दें कि इसी बच्ची के साथ हुए रेप के खिलाफ राजनीति में राम और तिरंगे का खूब इस्तेमाल किया गया था, सोशल मीडिया पर भी लोगों ने खूब भाषणबाजी की, लेकिन इसी समाज के कुछ दरिंदे दिन ढलते ही पोर्न साइट्स पर जा पहुंचे और वहां भी रेप पीड़िता को ढूंढने लगे.

विज्ञान में इंसान को जानवरों में सबसे श्रेष्ठ जानवर कहा गया है, लेकिन अब लग रहा है कि जानवरों की श्रेष्ठता की लिस्ट में इंसान सबसे निचले पायदान पर जा पहुंचा है. आधुनिकता का उपयोग करने वाली इंसानों की एक ऐसी जमात भी है, जो जानवरों से भी बदतर काम कर रही है. महिला डॉक्टर और कठुआ की मासूम बच्चियों के रेप के वीडियो ढूंढने वाले ये लोग वही हैं जो शाम ढलते ही बॉलीवुड अभिनेत्रियों के नाम भी इन वेबसाइट्स पर सर्च करते हैं. अपने आस-पास झांकिए और सतर्क रहिए, क्यों ऐसे लोग इंसान की खाल में भेड़िए जैसे होते हैं.

खुद कातिलों से सुनिए कि उन्होंने प्रियंका के साथ क्या किया था

पुलिस ने इस मामले में 4 लोगों को गिरफ्तार किया है जिनमें एक ट्रक ड्राइवर मोहम्मद आरिफ 25 साल का है और वही मुख्य आरोपी है. उसके साथ तीन हेल्पर – सी चेन्नाकेशवुलु, जे शिवा और जे नवीन भी हैं, जिनकी उम्र करीब 20 साल है. पुलिस के सामने सबने रेप और हत्या का गुनाह कबूल किया है.

इस जुर्म की प्लानिंग तभी कर ली गई थी जब इन लोगों ने प्रियंका को वहां स्कूटी पार्क करते देखा था. जब प्रियंका वहां नहीं थीं तो नवीन ने जानबूझकर स्कूटी पंक्चर कर दी. रात 9.18 पर जब प्रियंका स्कूटी लेने आईं तो टायर की हवा पूरी तरह निकल चुकी थी. तब परेशान प्रियंका की मदद करने के बहाने से आरिफ वहां पहुंचा था. ये वही व्यक्ति था जिसने कहा था कि सारी दुकाने बंद हैं. लेकिन प्रियंका उससे मदद के लिए मना करती रही. शिवा उसके स्कूटर को ठीक करवाने के लिए लेकर गया था. जिसने आकर कहा था कि दुकान बंद हो गई.

पुलिस ने बताया कि प्रियंका आवाज न करे इसलिए रेप के दौरान हमलावरों ने उसका मुंह और नाक बंद कर दिया था. प्रियंका का दम घुट गया और उसकी मौत हो गई. फिर उन लोगों ने पेट्रोल खरीदा और प्रियंका के शरीर को जला दिया. प्रियंका जिन लोगों से डर रही थी वही लोग या तो जबरन या फिर मदद के बहाने से उसे वहां से ले गए और उसके साथ हैवानियत की.

 अब भी कहेंगे कि डॉ प्रियंका निर्भया थी?

इस पूरे मामले में एक बात जो ध्यान आकर्षित करती है वो ये कि डॉक्टर प्रियंका डरी हुई थीं. वो बार-बार अपनी बहन से यही कह रही थीं कि उसे डर लग रहा है. लोग उसे घूर रहे हैं. ये अच्छे लोग नहीं हैं. इस भय में जीने वाली अकेली प्रियंका नहीं थी बल्कि हर लड़की इस भय के साथ सड़क पर उतरती है कि लोग उसे गंदी निगाह से घूर रहे हैं. निर्भय होने या निर्भया बनने का कोई अवसर ये समाज महिलाओं को नहीं देता. प्रियंका भी इसी भय के साथ दुनिया छोड़ गई.

माना कि निर्भया के साथ दरिंदगी करने वाले लोग भी ड्राइवर और हेल्पर ही थे और वो कांड भी रात में ही हुआ था. हैदराबाद का ये मामला निर्भया मामले की तरह वीभत्स तो है लेकिन निर्भया मामले से बिल्कुल अलग है. निर्भया मामले में निर्भया का गैंग रेप चलती बस में किया गया था जो पहले से planned नहीं था. हां, निर्भया के हमलावरों ने ये माना था कि वे शिकार की तलाश में ही निकले थे. हैदराबाद की घटना को अंजाम देने की प्लानिंग सुबह से ही शुरू हो गई थी. अपराधियों ने सब कुछ सोच-विचार कर ही किया था. निर्भया के आरोपियों को तो ये नहीं पता था कि उनके साथ क्या हो सकता है. लेकिन प्रियंका के दोषियों के सामने तो निर्भया कांड उदाहरण के रूप में था. उन्हें अच्छी तरह से पता था कि वो एक महिला का रेप और हत्या प्लान कर सकते हैं और किस तरह से बच सकते हैं. वे बैखौफ थे क्योंकि ये जानते थे कि फांसी की सजा सिर्फ डराने के लिए होती है, हकीकत में कहां किसी को फांसी होती है.

इन्हें लगता था कि निर्भया मामले के आरोपियों को फांसी की सजा भले ही सुनाई गई थी लेकिन फांसी दी नहीं गई. इन्हें लगा कि निर्भया तो बच गई थी इसलिए उसके आरोपी फंसे. और मामला वहीं खत्म करने और खुद को बचाने के लिए उन्होंने प्रियंका को मौके पर ही जला दिया. यही तो किया जाता है आजकल, रेप करके सीधे हत्या ही कर दी जाए जिससे आरोप लगाने के लिए कोई बचे ही न.

ये समझिए कि न आज कोई लड़की निर्भया है और न कोई अपराधी खौफ में. कोई भी सरकार न अपराधियों के मन में भय पैदा कर सकी और न महिलाओं के मन से अब तक भय निकाल सकी है. हमारा समाज तो इन्हीं भेड़ियों से भरा पड़ा है इसलिए पढ़ लिखकर बेटियां बची रहेंगी इसकी गारंटी भी अब नहीं रही. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे अब कोई बकवास की तरह हैं, प्रेरित करने के लिए नहीं. क्योंकि आज के माता-पिता जब भी बेटियों को पढ़ाने की बारे में सोचते हैं, ऐसी कोई न कोई खौफनाक घटना उनके हौसले तोड़ने का इंतजार करती रहती है. कैसे आज की बेटियां अपने माता-पिता को यकीन दिलाएं कि बाहर वो सुरक्षित हैं. कैसे उनसे कहें कि उन्हें पढ़ने के लिए बाहर जाने दो.

हैदराबाद के प्रियंका रेड्डी मर्डर केस ने एक बार फिर सरकार और सुरक्षा का वादा करने वाली पुलिस को निकम्मा साबित कर दिया है. हैदराबाद की पुलिस और सरकार तो पहले ही 100 नंबर का राग अलाप कर प्रियंका रेड्डी पर ही दोष मढ़ चुकी है. इतना ही नहीं, उसी शमशाबाद इलाके में प्रियंका रेड्डी केस के अगले ही दिन एक और महिला का जला हुआ शव मिला है जो ये बताने के लिए काफी है कि हैदराबाद पुलिस कितनी सक्रिय है. 122 पेट्रोलिंग कारें भी प्रियंका और इस महिला को जलते नहीं देख सकीं, तो लानत है ऐसी पुलिस पर. 

लेकिन भारत सरकार के लिए क्या कहा जाए जिसकी आंखें अपराध के आंकड़े देखकर भी नहीं खुलतीं. जिस देश में हर साल औसतन 40 हजार रेप होते हों, हर दिन में 106 रेप और हर 10 रेप में से 4 वारदात की शिकार छोटी बच्चियां होती हों, जहां conviction rate सिर्फ 25 फीसदी हो यानी 40 हजार रेप करने वालों में से सिर्फ 10 हजार को ही सजा मिले और 30 हजार खुला घूमें वहां कोई क्यों डरे. अपराधियों इन आंकड़ों से हौसला बढ़ता है और वे अगले अपराध की प्लानिंग करते हैं – सरकार तो सिर्फ बकैती ही कर सकती है.

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