यह गाथा है भगवान बुद्ध की

—विनय कुमार विनायक
यह गाथा है भगवान बुद्ध की,
कपिलवस्तु के इक्ष्वाकु शाक्य
क्षत्रिय महाराज शुद्धोधन और
महारानी महामाया के राजकुंवर,
अहिंसा,दया, करुणा निधान की!

नेपाल के लुम्बिनीवन में जन्मे
ई. पू. पांच सौ तिरेसठ वर्ष में,
मानव के दु:ख से द्रवित होकर,
गृह त्यागी शाक्य मुनि बने जो
उस महात्मा के धर्म दर्शन की!

नाम था उनका सिद्धार्थ गौतम,
मानव के दुःख से दुःखी था मन,
माता पिता भी चिंतित थे उनके
यशोधरा के संग किया गठबंधन,
एक पुत्र हुआ उत्पन्न राहुल जी!

किन्तु हो वीतरागी, बैरागी जन,
उन्तीस वर्ष में त्याग राजभवन,
पहुंचे गया, बिहार मगध जनपद
बोधिवृक्ष की छांव में तप करने,
आलारकालाम ने ब्रह्मविद्या दी

शून्यवाद का उपनिषदीय ज्ञान,
फिर उद्रक रामपुत्र से योग की
शिक्षा पाकर, वे संतुष्ट नहीं थे!
निरंजना फल्गु नदी के तट पर
उरुवेला में ठानी तप करने की!

पर अधर में अटके उनके प्राण,
मिल ना सका संबोधि का ज्ञान
दुःख, जरा, मृत्यु से मुक्ति का!
उन्होंने सुजाता का खाकर खीर,
बचायी जान, बदली जीवनशैली!

क्षुधाग्रस्त चित चिंता करता है,
चिंतन,मनन, गुणन नहीं करता,
अस्तु त्यागा अनशन, वज्रासन,
विचरे वन,पाकर मन की शांति,
पीपल के नीचे लगा दी समाधि!

पीछे पड़ गई कामदेव मार की
कामना,वासना, तृष्णा की मार,
‘हे मार! मुझे मत मार,देख मेरा
क्षमा,धर्म, बुद्धि, ज्ञान विस्तार,
मिली प्रतीत्यसमुत्पाद सम्बोधि!’

इस प्रतीति से, उस की उत्पत्ति,
जन्म हुआ है, तो होती है मृत्यु,
जन्म, जरा, मृत्यु का कारण है,
जन्म,जरा,व्याधि, मृत्यु दुःख से
त्राण दिलानेवाला बुद्ध थे ज्ञानी!

बुद्ध ने कहा चार आर्य सत्य
जन्म,जरा,व्याधि,मरण दु:ख है,
दु:खों की उत्पत्ति का कारण है,
दु:ख के कारणों से निवारण ही
दिलाता मुक्ति मार्ग-अष्टांगिक!

संसार दुःख मय है,दुख कारण-
इच्छा, लालसा, काम वासना है,
सम्यक दृष्टि, संकल्प, वचन,
कर्म, आजीविका, प्रयत्न, ध्यान
और विचार से मिलती मुक्ति!

बुद्ध का मध्यम मार्ग यही है,
इसी मार्ग पर चलना सिखाकर
बुद्ध ने सारनाथ में दिया था,
प्रथम ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ सम्बोधि!
कुशीनगर निर्वाण भूमि उनकी!

मानव जब जन्म मरण आत्मा
परमात्मा, पुनर्जन्म के दुष्चक्र से
मुक्ति हेतु भटक रहा था अंधबली
गोदान, मिथ्या कर्मकाण्ड के पीछे
ये बोधी भगवान बुद्ध ने दी थी!

भगवान बुद्ध ना अनात्मवादी थे
ना ईश्वर विरोधी वे सहजज्ञानी थे
अंधविश्वास ग्रस्त होरी, धनिया,
गोबर जैसे प्रेमचंद के गोदान के
पात्रों के शोषण मुक्ति दाता वो
बुद्ध चले गए होरी जैसे के तैसे!

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